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शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

पुस्तक मेले में किताबों से बातचीत !

मेला पहुँचे तो बड़ी गहमागहमी थी।कोई ख़ाली नहीं था।सबके पास अपने-अपने झोले थे।पाठक और लेखक अपने दायित्व निर्वाह में तल्लीन थे।कुछ लेखक मंच पर चढ़े थे,कुछ सम्मान के लिए अड़े थे।कुछ सेल्समैन बनकर पाठकों को पटा रहे थे तो कुछ उनके साथ सेल्फ़ी खिंचवाकर महानता सेलिब्रेट कर रहे थे।ऐसे में किताबें ख़ाली थीं और हम भी।अपनी सहूलियत और पसंद की किताबों के पास पहुँच गए।उनसे उनके लेखकों के बारे में पूछना चाहा तो कुछ स्वयं ही बोल उठीं और कुछ के पात्र ही किताबों से बाहर निकल आए।
सबसे पहले 'नारद की चिंता' से बात की।आख़िर समकालीन व्यंग्य में सबसे प्रिय पुस्तक है यह मेरी।
हम :आपके लेखक कहाँ हैं ?
उत्तर: इन दिनों वो सबसे ऊँचे टीले पर चढ़ने में लगे हैं।उनका मानना है कि बड़ा होने के लिए ऊँचाई पर चढ़ना ही सेफ़ पैसेज और अंतिम सत्य है।इससे बाक़ियों पर नज़र बनी रहती है और कोई थूकने की हिम्मत भी नहीं करता।
हम : पर इस बात की आशंका हुई ही क्यों ? वे तो अच्छा-ख़ासा लिख भी लेते हैं।
उत्तर : तुमसे ज़्यादा इस बात की चिंता हमें है।पाठक जब तक मेरा पन्ना पलटता है,उसके पहले ही वो पलट लेते हैं।
हम  : इस पर कभी तुमने उन्हें टोका नहीं ?
उत्तर : कई बार कहा।उनका यही जवाब होता है ,' मैं तो लेखक हूँ।सारी अपेक्षाएँ मुझसे ही क्यों ?मैं भी इसी दुनिया में रहता हूँ।' आदि आदि।
इतना सुनते ही पास में रखी 'व्यंग्य यात्रा' सिसक पड़ी।कहने लगी- हमारे उनका तो और बुरा हाल है।अपने काम में इतना व्यस्त रहते हैं कि पूछो मत।मैं ख़ुद ही बताए देती हूँ।उनके दोनों पैर हमेशा यात्रा में रहते हैं।एक पैर विमोचन संभालता है तो दूसरा लगातार मिल रहे सम्मान को।
हम : यह तो अच्छी बात है।सम्मानों का गिनीज़ बुक रिकार्ड वे ही हमारे साहित्य को दे सकते हैं।
उत्तर: देने को तो वे साहित्य को लेखक भी ख़ूब दे रहे हैं।उनके लिए लेखक बनाना गोल-गप्पे खाने जैसा आसान है।कुछ समय पहले ऐसे ही एक कवि को उन्होंने बहुत बड़ा लेखक बना दिया है।वह अब दूसरों को बना रहा है।कई लोग इसीलिए उनके आगे-पीछे पड़े हैं।इससे उनकी यात्रा बाधित होती है।
'वह तो हो चुकी है बहन !'पास ही टुकुर-टुकुर ताक रही 'ब से बैंक' के अंदर से आह निकली।मैं अब उस ओर मुख़ातिब हो चुका था।मेरा अगला सवाल उसी से।
हम : सुना है कि जवानी के दिनों में आप बड़ी हॉट सॉरी हिट रहीं ?
उत्तर : सही सुना है।हिट तो मैं अभी भी करती हूँ।मुझे तो व्यंग्य के खुदाओं ने इतना खोदा है,नहीं तो इतनी खुरदरी नहीं थी मैं।अब इनके रास्ते का बड़ा पत्थर बन गई हूँ।
हम : पर आपके लेखक जी कहाँ गए ?
उत्तर : लिखते हैं ना वो।तीस समीक्षाएँ लिखकर तीन को उखाड़ चुके हैं।आगे भी उखाड़ेंगे।
हम : पर यह किरपा तीन पर ही क्यों रुकी हुई है ?
उत्तर : इन्होंने तीनों का उत्थान अपने इन्हीं चक्षुओं से देखा है।इनके सामने वे बुलेट ट्रेन में चढ़ गए और इन्हें पसेंजर पकड़ा दी।तब से ये एक ही प्लेटफ़ॉर्म पर रुके हुए हैं।इन सबको साहित्य में मरता हुआ देखना चाहते हैं।
अचानक बग़ल से आवाज सुनाई दी,'हम न मरब।हम न मरब।' मैंने देखा,बब्बा कराह रहे थे।कहने लगे-मेरा स्टेटमेंट भी ले लो।अभी हमने अपनी वसीयत नहीं बनाई है।
मैं सहम गया।फिर संभलकर बोला,'आप ऐसा न कहें।आप तो प्रातः स्मरणीय हैं।कुछ सवालों के जवाब देना चाहेंगे ?
उत्तर : वैसे तो मैं किसी को कुछ नहीं देता,मगर तुम्हें ज़रूर दूँगा।पूछिए।मेरा लेखक किसी बात का बुरा नहीं मानता।
हम : लिखने के अलावा वे और क्या कर लेते हैं ?
उत्तर : इस वक़्त तो ये मुझे भी नहीं मालूम।सुना ज़रूर है कि उन पर किसी प्रेत का साया है इन दिनों।वही उनको बौराए हुए है।
हम : तुमने ग़लत सुना है।'प्रेतकथा' उनकी पहली किताब का नाम है।मेरा सवाल इस बात को लेकर है कि वे लिखने के अलावा अपने समकालीनों पर क्या कहते हैं ?
उत्तर:अजी,क्या कहेंगे ? आजकल कुछ भी कहने लायक नहीं है।शुरुआती दिनों में उन्होंने थोड़ा-बहुत सह क्या लिया ,बुद्धिजीवियों को ग़लतफ़हमी हो गई कि वे मैला ढोते हैं।
हम : पर कहने को तो अब भी लोग यही कह रहे हैं ?
उत्तर :नहीं।अब फ़ॉर्मैट बदल गया है।मैला उन्हें ढो रहा है।जल्द ही वे पागलखाने' का लोकार्पण करेंगे।
'च च च ......ऐसी कुफ़्र की बातें मैं नहीं सुन सकता।तुम अभी अंडे हो।आमलेट बनने में देर नहीं लगेगी।'
मैंने ग़ौर से देखा तो 'कल्लू मामा ज़िंदाबाद' के पन्नों से एक बूढ़ा कबूतर फड़फड़ाकर निकल रहा था।उसे देखते ही हमने उस पर सवालों की गोली दाग़ दी।
हम : तुम्हारी घर वापसी कब हुई ?अब किस थाने में  बयान है ?
उत्तर :भई,मेरी पसंदीदा जगह मंच है,थाना नहीं।वो इतिहास की बात है।अब मैं मंच से ही बयान पढ़ता हूँ।किसी भी मंच में बैठकर ईमानदारी से दाना चुगता हूँ और उड़ जाता हूँ।
हम :और नए कबूतरों के लिए क्या संदेश है ?
उत्तर :यही कि हमेशा झुंड में रहें ,जहाँ दाना मिले दबोचें और उड़ लें।हम जैसे बुज़ुर्गों की इज़्ज़त करें,किरपा मिलती रहेगी।
तभी पीछे से अट्टहास की आवाज सुनाई दी।गर्दन पलटकर देखा तो 'अट्टहास' के पन्नो में जटायु दबे हुए थे।हमने पूछा ,कैसे हैं आप ?कहने लगे-जब तक साँस है,आस है।इधर नए बंदरों ने जीना हराम कर दिया है।लेकिन मैंने भी सोच रखा है कि जब तक 'सब मिले हुए हैं ',हमारे इनबॉक्स की बत्ती जलती और लालबत्ती की कार चलती रहेगी।
बत्ती की बात शायद पुस्तक मेले वालों ने सुन ली थी।रात के आठ बज चुके थे ।वे बत्तियाँ बुझाने लगे ताकि किताबें भी लेखकों की तरह घोड़े बेचकर सो सकें।बस,इसके बाद हम भी मेले से निकल भागे।

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

मार्गदर्शक मंडल में आपका स्वागत है !

कहते हैं पूत के पाँव पालने में दिखाई देते हैं पर वे ऐसा नहीं मानते।पालने में तो वह अपने हाथ-पैर चलाता है और मजबूर होता है।उसकी प्रतिभा का पूरा प्रदर्शन भी नहीं हो पाता।जिधर इशारा किया जाता है,वह उधर ही देखता है।यहाँ तक कि दूसरे के हिलाने-डुलाने पर ही हिलता है।पाँव चलाने की उसकी हद होती है।और इधर कुर्सी का कमाल देखिए।पूत जैसे ही कुर्सी पर बैठता है,पाँव पसार लेता है।दूसरों की छोड़िए,अपनों का मार्ग प्रशस्त करने लगता है।जो पिता उसे उँगली पकड़कर चलना सिखाता है,वह सिर्फ़ दर्शक बनकर रह जाता है।यह पिता का बचपना है कि उसे पालने में हिलाने और कुर्सी में विराजने में फ़र्क़ नहीं समझ आता।

पिता भले ही अपना कर्तव्य भूल जाए पर कुर्सीधारी पुत्र ज़मीन नहीं छोड़ता।असली धरतीपुत्र वही है जो हर हाल में धरती से जुड़ा रहे।कुर्सी टिकती तभी है,जब वह गोंद की तरह चिपकी रहे।ऐसी मज़बूत कुर्सी पर बैठकर पुत्र अपनी लात का सदुपयोग मनचाही दिशा में कर सकता है।वे इस मामले में उन पिताओं से बड़े भाग्यशाली हैं कि उन्हें किसी अनाथाश्रम का मार्ग नहीं पूछना पड़ा।अब वे मार्गदर्शक मंडल में आराम से बैठकर अपने हाथ-पाँव मार सकते हैं।

कुछ लोग बार-बार पिता-पुत्र के रिश्ते को बीच में लाने की कोशिश कर रहे हैं।इसमें वे भी लोग शामिल हैं जो पिता के खेमे में हैं।उन्हें यह सामान्य बात नहीं पता कि खेमे रिश्तों की चौपाल में नहीं,जंग के मैदान में बनते हैं।दूसरी बात यह कि बीच में कुर्सी आने पर किसी रिश्ते के लिए गुंजाइश कहाँ बचती है।रिश्तों से मोह करने वाले अज्ञानी और अदूरदर्शी होते हैं।रिश्ते पीड़ा का बोध कराते हैं जबकि कुर्सी सबका दुःख हरती है।कुर्सी में इत्मीनान से बैठा राजा ही दुखियारी प्रजा को मात्र सम्बोधित करके ही उसके दुःख हर सकता है।रही बात बड़े-बूढ़ों की,तो वे कमंडल लेकर मार्गदर्शक मंडल में बैठकर अपनी अंतिम इच्छा पूरी कर सकते हैं।

पलटता हुआ साल और हमारे संकल्प !

पुराना साल जा रहा है,नया आ रहा है।साल पलटने पर कोई दस या पचास दिन की मियाद नहीं गिनता।नया साल हमारी झोली में एकदम से पूरे तीन सौ पैसठ दिन डाल देता है।इस तरह नए संकल्पों के लिए हमें एक्स्ट्रा स्पेस मिल जाता है।

ऐसा ही अनुभव कल शाम मिला।वे हमारे पुराने मित्र हैं।इससे भी बड़ी बात कि वे बड़े लेखक हैं।साल की तरह खुद भी पलट लेते हैं।कल मिले तो पिछले दिनों की गई उस स्थापना से पलटने लगे जिसके लिए कभी उन्होंने जबर्दस्त जंग लड़ी थी।मैंने टोका तो कहने लगे,लेखक को हमेशा  जल की तरह बहना चाहिए।वह एक जगह टिक जाएगा तो काई लग जाएगी।और तुम तो जानते ही हो कि काई लगा जल न पीने के काम आ सकता है न अभिषेक के।ऐसी व्यर्थता किस काम की।इसलिए अपने कहे और लिखे से जितनी जल्दी हो सके ,पलट लो।इससे संभावनाओं के नए द्वार खुलते हैं।विकल्पों की गुंजाइश बढ़ जाती है।

मैंने कहा-पर आपने अपनी पिछली पुस्तक में इस बात पर ज़ोर दिया था कि व्यक्ति को अपने कहे पर टिकना चाहिए।शास्त्रों में भी लिखा है कि नीति और सिद्धांत पर हमें अडिग रहना चाहिए।हम नीति पर टिकें या नीयत पर ? अचानक ऐसे हम पलटेंगे तो दस सवाल उठेंगे ?

मित्र एकदम से सोशल मीडिया के रंगमंच पर उतर आए।लेखकीय-ढाल पहनकर हम पर भड़क उठे-तुम सरकार से ऊपर हो क्या ? देख नहीं रहे हो देशहित में सरकार रोज पलट रही है।नीति तो फ़िक्स होती है।उसके खिसकने या बदलने को लेकर तुम चिंतित न हो।इसीलिए नीति-आयोग बनाया गया है,नीयत का नहीं।नीयत लचकदार यानी फ़्लेक्सिबल होनी चाहिए।साहित्य का नुक़सान तुम्हारे जैसे जड़ लोगों ने ही अधिक किया है।प्रगतिवादी लेखक मौक़ा सूँघकर पलट लेते हैं।तुम सरोकारों की कंठी बनाकर गले में लटकाए घूमते रहो।गली-मोहल्ले की लेखक सभाएँ भी तुम्हें भाव नहीं देंगी।लेखक वही है जो समय,सरकार और सरोकार के साथ घलमेल कर ले।एक भूखा और राजपथ से भटका लेखक न अपना भला कर सकता है न समाज का।इसलिए उसे कभी भी पलटने से परहेज नहीं करना चाहिए।इस काम को केवल नेताओं के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं है।देखते नहीं हो,इसी विशिष्ट गुण के कारण वे जननायक बने हुए हैं !

मैंने पुनःप्रतिवाद किया-अपने साहित्यिक और व्यक्तिगत जीवन में कभी ऐसा प्रयोग नहीं किया।इस आशंका के चलते हमने कभी रात में करवट तक नहीं बदली।पता नहीं कब कोई पलटने का इल्ज़ाम लगा दे ! वे पूरे आत्मविश्वास से बोले-अव्वल तो कोई बोलेगा ही नहीं क्योंकि जो वरिष्ठ हैं,नीति-आयोग के संस्थापक-सदस्य हैं।और छोटों की बात पर बड़े नोटिस नहीं लेते।फिर भी कुछ शोर हुआ तो पत्रिका के सम्पादकीय या पुस्तकीय-समीक्षा में ध्वस्त कर देंगे।फ़िलहाल,नए साल का संबल तो है ही।नए संकल्पों के कंबल में पुराने पाप यूँ ही ढक जाते हैं।मौसम है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी।पलटने के लिए कोहरे का मौसम सबसे मुफ़ीद होता है।आँखों में धूल झोंकने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।इसलिए सरकार और कलेंडर की तरह अपने सरोकार पलट लो,समाज में सम्मान भी मिलेगा और स्पेस भी।

अब हम निश्चिन्त होकर पलट सकते हैं।दिन में भी रात में भी।गोष्ठी में भी,बिस्तर में भी।नए साल में पलटने वाले नए संकल्पों की सूची बना रहा हूँ।इस बीच कंबल पहले से अधिक गर्म हो गया है।