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बुधवार, 21 दिसंबर 2016

मिलते रहा करिए, इससे गरमाहट आती है !

जो दिल संसद में नहीं मिल पाए,वो उसके बंद होते ही मिले।मिल तो संसद में भी जाते पर उधर हंगामा बरपा था।वहाँ मिलजुलकर बात करने से भूकंप की भी आशंका थी इसलिए बाहर मिले।इन्होंने कहा भी ,'मिलते रहा करिए, अच्छा लगता है।'अब इनके कहे का मान तो रखना है।उन्होंने रखा भी।देश को बड़े भूकंप से बचा लिया।


मिलने-जुलने से आपसी सम्बंधों में गर्मी आती है।मौसम वैसे भी ठंड है।'हाथ' पर इसका असर कुछ ज़्यादा है।बिलकुल सुन्न पड़ा है।इनके पास पावर है,इसलिए मिलने का ऑफर दे रहे हैं।ठंडे हाथ को तभी गर्मी मिल सकती है,जब 'पावर' वाले हाथ से मिले।मिलने में कोई बुराई नहीं है।इससे सम्बंध मजबूत होते हैं और भविष्य सुरक्षित।जो काम संसद न कर सकी,वह इस अद्भुत मिलन ने कर दिया।

हम तो बहुत चिंतित हो गए थे।अगर यह मेल-मुलाक़ात न होती तो गुब्बारा फूट सकता था।फटा हुआ गुब्बारा पूरे देश के लिए मुश्किलें पैदा कर देता।बच्चे तो बच्चे,बड़े रोने लगते।इसलिए एक बड़ी अनहोनी टल गई।ऐसी आपदा टालने के लिए ये और वे रोज मिलें,तो हमें क्या हर्ज है ! हम तो चाहते हैं कि जो इनके मिलने से दुःखी हैं,वे भी मिल जाँय।इससे सबके गुब्बारे 'सेफ' रहेंगे।जमीन में पड़ी सुई अकेले रहकर कुछ नहीं कर सकती।गुब्बारे में चुभने के लिए उसको भी हाथ का सहारा चाहिए।हाथ को भी उठने के लिए गर्मी चाहिए।बस 'दोनों' हाथ इसीलिए मिले हैं।इस पर ईमानदारी बिलबिला रही है कि सब मिले हुए हैं।पर वो हमेशा की तरह ग़लत है।

वे जब से इनसे मिलकर गए हैं,भाषणों की गति बढ़ गई है।यह मिलने का ही असर है।पहले ही मिल लेते तो और बोल पाते।ये तो बोलने के उस्ताद हैं ही।सब मिलकर भाषण देंगे तो कैशलेस से पहले ही ठंडी पड़ी जनता को इस भीषण सर्दी से निजात मिलेगी।

कुहरा घना हो रहा है।सबूत भी नहीं दिख रहे हैं।यह आपस में मिल जाने का सबसे मुफीद समय है।



शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

फ़कीरों की कतार में राजाओं की सेंध !

लोग अचानक फ़कीर बनने पर उतारू हो गए हैं।क्या राजा,क्या प्रजा,सब मोह-माया त्याग रहे हैं।सब कुछ छोड़-छाड़कर लोग कतारों में खड़े हैं।खाली जेबें जीवन के प्रति वैराग्य पैदा कर रही हैं।कोहराती शाम में मूँगफली खाने तक की लालसा नहीं रह गई है।जी चाहता है कि धुनी रमाकर जंगल की ओर निकल चलें।खाली पेट और खाली थैले डिजिटल दुआओं से स्वतः लबालब हो जाएँगे।इससे उजाड़ और बियाबान होती बागों में भी बहार आएगी।

प्रजा का फ़क़ीर बनना ज़्यादा बड़ी बात नहीं।वह अकसर  इसके आसपास ही रहती है।बड़े त्याग की बात तब है जब कोई राजा एकदम से फ़क़ीर बन जाए।हमेशा वस्त्रहीन रहने वाली काया का शीत भी कुछ बिगाड़ नहीं सकती।त्याग तो उस राजा का महत्वपूर्ण है जो वातानुकूलित भवन और राजपथ छोड़कर अचानक धुंध भरे जंगल-पथ पर चल दे।

न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री ने अपने परिवार के लिए पद छोड़ दिया।वे राजसी भोग करते हुए अपने निजी जीवन के लिए एक कोना नहीं तलाश पा रहे थे।यह उनकी असफलता है।उन्होंने दुनिया के इस सर्वमान्य नियम को चुनौती दी है कि कुर्सी के आगे रिश्ते-नाते और संवेदनाएँ शिथिल पड़ जाती हैं।ये घटना पूरी तरह दुनियावी-सिद्धांतों के विरुद्ध है।ऐसे समय में जब संत-फकीरों में राजसी-भाव जाग्रत हो रहे हों,राजाओं में फकीरी के कीटाणु आ जाना ठीक नहीं है।

संवेदनाओं और रिश्तों को ज़िन्दा रखने के लिए बाकी दुनिया को हमारे देश के उन नेताओं से प्रेरणा लेनी चाहिए जो देशहित में फकीर बन गए हैं।ये पूरे देश को अपना परिवार मानते हैं इसलिए मौक़ा मिलते ही पूरे परिवार को देश-सेवा की शपथ दिला देते हैं।हमारे नेता ज़िन्दगी की आखिरी साँस तक देश-सेवा में जुटे रहते हैं।लब्बो-लुबाब यह कि राजपद त्यागने की नहीं भोगने की चीज होती है।जनता भी शायद इसीलिए भोगती है।

हमारे यहाँ किसी भी नेता को पदत्याग करने की ज़रूरत नहीं पड़ती।वह अपने पद और शरीर में कोई भेद नहीं करता।पद शरीर के साथ ही जाता है।जनता को भी इस बात का टेंशन नहीं रहता।जो उसे फ़क़ीर बनाता है,बदले में सही समय आने पर उसका एहसान चुका देती है।देश की जनता अपने नेता को उसके परिवार के पास आने के लिए त्यागपत्र देने जैसा पाप-कर्म नहीं करने देती बल्कि अपने जैसा ही फ़कीर बनाकर उसी लम्बी कतार में खड़ा कर देती है।

कालेधन की बाढ़ और चंद आँसू !

काला धन बड़ा ही कमजोर निकला ! एक ही डंडे से डरकर बाहर आ गया।लम्बे समय से बोरियों में भरे-भरे वैसे भी उसका दम घुट रहा था।मौक़ा मिलते ही वह गंगा में तैरने लगा,सड़क पर नाचने लगा।नोटों की नदियाँ बहने लगीं।ऐसी बाढ़ में कुछ गरीबों ने भी फ़ायदा उठा लिया।आँखों में बची हुई दो-चार बूँदें बहाने का उन्हें भी बहाना मिल गया।कालेधन के इस तरह एकदम से सामने आ जाने से रामराज्य आने की आशंका पैदा हो गई है।जो लोग हरे और लाल रंग के नोटों के पीछे अब तक भाग रहे थे,वे अब पीछा छुटाने में लग गए हैं।पता चला है कि जिन नोटों का रंग छूट रहा है,वे ही अब लम्बी रेस के घोड़े हैं ।सफ़ेद मुद्रा तो पहले से ही रंगहीन थी,अब प्राणहीन होकर कतार में गिर रही है।कालिख-पुती मुद्रा सफ़ेद होने पर उतारू है।सुना है कि रंग छोड़ने और बदलने वाली मुद्रा ही असली है।गिरगिट इसीलिए नए जमाने का देवता है।लोग हैं कि कतारों में लगकर भी बदरंग होना चाहते हैं।
काला-धन हमेशा से सेलेब्रिटी रहा है।रैंप से उतरकर अब वह सड़क पर चलना चाहता है।सफ़ेद है कि मुँह छुपाए घूम रहा है।कल तक जिस काले धन के पीछे वह पड़ा हुआ था,आज कतार में उसी के पीछे खड़ा है।कातर को कतार में आने के लिए अतिरिक्त मेहनत की ज़रूरत नहीं पड़ती।एक कदम चलकर ही वह इस गति को और सौभाग्य हुआ तो अंतिम गति को प्राप्त हो सकता है।कतार में होना ही अनुशासन में होना है।अनुशासित व्यक्ति देशप्रेमी होता है।वह कोई सवाल नहीं करता।कतार भीड़ बन जाए तो अराजक और देशद्रोही हो जाती है।ऐसे में व्यवस्था को आगे आना पड़ता है।वह चाहती है कि कतारें कभी खत्म न हों।हर कतार बताती है कि देश में सरकार है।अस्पताल और बैंक से होते हुए यही कतार अंततः मतदान-स्थल तक चली जाती है।इसलिए कतार का नियंत्रित होना ज़रूरी है।कतार होगी तभी 'गाँधी का आखिरी आदमी' पहचानने में सरकार को सहूलियत होगी।वर्ना वह उसके आँसू कैसे पोंछ पाएगी ?

लाइन में लगे लोगों को काले रंग का टीका लगाने का फ़ैसला बेहद समझदारी है।इसे माथे के बजाय उँगली पर इसलिए लगाया गया कि वोट देते समय वाली फीलिंग नोट लेते समय भी रखें।कतार में वोट देना ही केवल देशभक्ति नहीं है,नोट लेते समय भी इसे महसूसें।वोट देते और नोट लेते समय कालिख़-पुती रियाया सरकार के समकक्ष होती है।कतार में खड़े सभी लोग स्याह होंगे तो सरकार पर भेदभाव का आरोप भी नहीं लग सकता।

कुछ लोग लाइन में खड़े-खड़े गिर गए।कुछ उठे भी नहीं।इससे उनमें जज्बे की कमी झलकती है।ये लोग भूख-प्यास से नहीं 'देशभक्ति' में दिनोंदिन हो रहे ह्रास के शिकार हुए हैं।सौ-पचास रूपये निकालने के लिए दुश्मन-सीमा पर तैनात सिपाही जैसा जज्बा होना चाहिए।जब वह अपनी 'देशभक्ति' पूरी निष्ठा से साबित करता है तो अपने पैसों के लिए लाइन में लगकर मर-खप जाना कतई बुरा नहीं है!हाँ,कुछ सावधानियाँ ज़रूर बरतनी चाहिए।लाइन में जोश बना रहे,इसके लिए बीच-बीच में 'भारत माता की जय' बोलते रहें और भूख-प्यास की अधिकता होने पर योगी बाबा का चमत्कारी शहद चाँटते रहें।इससे नोट मिलने की संभावना तो बढ़ेगी ही,'देश-विरोधी' बट्टे से भी बचेंगे।साथ ही गीता में अर्जुन को दिया भगवान कृष्ण का कहा भी चरितार्थ होगा;जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि जीते तो राज्य मिलेगा और मृत्यु हुई तो यश।लाइन में खड़े हर व्यक्ति को यह सूत्र याद रखना चाहिए।वह कतार से नोट या देशभक्ति में से कुछ तो कतर कर लाएगा ही।

नोटबंदी से किसी को परेशानी नहीं है।सभी राजनैतिक पार्टियाँ सफेदी से पुती हुई हैं।इसलिए उनका कुछ  हमें दिख नहीं रहा।लोग खामखाँ अपनी स्याह उँगली उनकी तरफ उठा रहे हैं।वैसे भी चुनाव नोट से नहीं चोट से जीते जाते हैं।कालेधन और आतंक पर चोट हो गई है।जल्द ही राम और गाय को मलहम की ज़रूरत पड़ेगी।ये चोटें गहरी हैं।इनके भरने से ही सत्ता की कुर्सियाँ उगेंगी।
फ़िलहाल आम जनता परेशान बिलकुल नहीं है बल्कि वह अपनी ख़ुशी का इज़हार कर रही है।यह सब काली-पट्टी बांधे न्याय की देवी को नहीं दिखाई दे रहा है।काले धन वाले सो नहीं पा रहे हैं और आम आदमी कतार में जाग रहा है।देश मजे में है,इस बात की मुनादी राजा ने ताली पीटकर कर भी दी है।