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मंगलवार, 28 जून 2016

मँहगाई कहाँ है,कहाँ है मँहगाई !

सरकार ने दो टूक कह दिया है कि मँहगाई नहीं है तो नहीं है।वह कभी भी गलतबयानी नहीं कर सकती।उसका कहा आधिकारिक वक्तव्य होता है।विपक्ष मान नहीं रहा।उसको लगता है कि मँहगाई उसकी छाती पर सवार है।इसमें उसकी गलती नहीं है।इसका अहसास उन्हें ही होता है,जो विपक्ष में होते हैं।कुर्सी से दूर रहना कितना मँहगा पड़ता है,वे ही जानते हैं।


सच यह है कि मँहगाई सबको अपने दर्शन नहीं देती।जो खुद को उसके भरोसे छोड़ देते हैं,उन्हें साफ़-साफ़ दिखती है।पिछले चुनावों के समय वह अपने यौवन पर थी।तत्कालीन सरकार को तब भी नहीं दिख रही थी।उस समय विपक्ष को धुन सवार थी,’अबकी बार, मँहगाई पर वार’।चुनाव हुए,वार सही पड़ा और वह चित्त हो गई।इसीलिए आज वह नज़र नहीं आ रही।सरकार जोर-जोर से पुकार रही है,’कहाँ है मँहगाई’ पर कहीं हो तो दिखे !

दाल,आलू और टमाटर में तो इत्ती हिम्मत नहीं है कि ऐसी बोल-बहादुर सरकार को हिला सकें।देश-विदेश में जिस सरकार के नगाड़े बज रहे हों,वहाँ नक्कारखाने में तूती की आवाज़ कौन सुनेगा ?सरकार समझदार है,सब जानती है।वैसे भी मँहगाई चुनावों से पहले कहीं नहीं आने वाली।तब तक ऐसे मुद्दों का पलायन इतनी तेजी से हो लेगा कि लोगों को सिर्फ़ ‘पलायन’ याद रह जाएगा।

देश बदल रहा है।उसके विकास की गाड़ी दादरी,जेएनयू से होते हुए कैराना के ब्रॉडगेज तक पहुँच चुकी है।विपक्ष उसे मँहगाई के मीटरगेज पर उतारना चाहता है।यह केवल सरकार को पता है कि उसने ऐसी कोई पटरी बिछाई ही नहीं।इसलिए वह उसके झाँसे में नहीं आ रही।उसे दुर्घटनाग्रस्त होने का कतई शौक़ नहीं।

मँहगाई को दाल-टमाटर से तौलने वाले नासमझ हैं।जब दाल को पतली करने का हुनर मौजूद है तो इसके लिए शीर्षासन करने की क्या ज़रूरत ? बस एक लोटे पानी में दाल के दो दाने पीसकर ठीक से मिला लें और एक साँस में पी जाएँ।इससे भूख तो भूख,दाल खाने की ‘हुड़क’ भी गायब हो जाएगी।गर्मियों में टमाटर खाने से पथरी की शिकायत हो सकती है,इसलिए इससे तो परहेज ही करें।बस खाली पेट योगा करें,इस जुगत से तन,मन और धन तीनों में जमकर बरकत बरसेगी ।


सरकार लगातार मँहगाई को ढूँढ़ रही है।पर लगता है कि वह सीमा पार कर चुकी है।इसलिए उस पर वह आक्रमण भी नहीं कर सकती।उसकी हिम्मत हो तो लुटियन ज़ोन में दाखिल होकर दिखाए।सरकार उसी दम प्राणायाम करा के उसके प्राण हर लेगी।

शुक्रवार, 17 जून 2016

कुछ खाने के क़ाबिल तो बनिए !

नेता जी जैसे ही पब्लिक मीटिंग के बाद बाहर निकले,पार्टी के प्रति समर्पित पुराने कार्यकर्त्ता ने खुद को उनके चरणों में अर्पित कर दिया।वह बहुत घबराया हुआ था।नेता जी इस क्रिया से द्रवित होते हुए बोले,’किस बात का कष्ट है तुम्हें ? टिकट-विकट चाहिए तो अध्यक्ष जी से मिलो’।कार्यकर्ता संवेदनशील था, सुबक पड़ा-सर जी टिकट तो हमें मिल चुका है,इसीलिए अधिक चिंतित हूँ।’ 'तो फिर क्या हुआ ? चुनाव नहीं लड़ना या टिकट मिलते ही तबियत ख़राब हो गई ? नेता जी ने एक साथ कई सवाल पूछ लिए।'नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।हमें डर दूसरी वजह से लग रहा है। चुनाव जीतने के बाद आपने जनता द्वारा लात मारने की जिस स्कीम को लॉन्च करने का ऐलान किया है,डर तो उससे लग रहा है।कहीं जनता हमारी परफोर्मेंस को देखकर सचमुच हमें लतियाने पर उतारू न हो जाए ? हमारी तो अब रीढ़ की हड्डी भी कमज़ोर हो चुकी है।' कार्यकर्ता दूर की सोचते हुए बोला।

नेता जी एकदम से मौलिक रूप में आ गए।'कौन है ये आदमी ? इसका पता करो कि ये अपना कार्यकर्त्ता है भी कि नहीं ? ‘ चुनाव प्रभारी साथ में ही थे।ऐसी स्थितियों का उन्हें पूर्वानुमान होता है।बात को दबाते हुए बोले ,’हम तो इस बार भी इनका टिकट फाइनल नहीं कर रहे थे पर पार्टी को इनके बुढ़ापे पर तरस आ गया।अब इनको लात खाने से भी डर लग रहा है ! समझा दूँगा मैं।'

नेता जी ने मना किया।वे स्वयं सहमे हुए कार्यकर्ता से मुखातिब हुए 'अच्छा यह बताइए, देश बड़ा होता है या प्रदेश ?' कार्यकर्ता डरते हुए बोला,'सर जी,निश्चित रूप से देश'।जवाब सुनते ही नेता जी हँस पड़े।कहने लगे,'देश के चुनावों में सबको पंद्रह लाख देने और मँहगाई को मारने का वादा किया था।आज भी जब हम बोलते हैं,तो सिर्फ हाथ उठते हैं तालियाँ बजाने के लिए।यहाँ तक कि दाल और टमाटर तो हमें स्टैंडिंग ओवेशन दे रहे हैं।रही बात लात मारने की,इसके लिए पाँव होने भी तो ज़रूरी हैं।'
अब कार्यकर्ता चकित होते हुए बोला,'तो क्या हम जनता के पाँव काट डालेंगे ?'

'बिल्कुल नहीं।अव्वल तो हम इत्ते नए मसले पैदा कर देंगे कि उसे स्मृतिदोष हो लेगा।वह हाथ-पाँव मारकर इतना थक लेगी कि लात मारने का माद्दा ही खत्म हो जायेगा।नहीं तो उसे जुमला बनाना हमारे हाथ में है ही।'

समर्पित कार्यकर्ता फिर से नेता जी के चरणों में लोट गया।चुनाव प्रभारी ने उसे चुनाव-सूत्र देते हुए कहा,'जाइए पहले कुछ खाने के क़ाबिल तो बनिए।'

बुधवार, 15 जून 2016

सरकार की कार और काग के भाग !

भाग केवल आदमियों के ही नहीं खुलते।पक्षियों में अपशकुन का प्रतीक कौआ भी भाग्यशाली हो सकता है।रसखान ने इसका सबूत देते हुए कहा भी है ‘काग के भाग बड़े सजनी,हरि हाथ से ले गयो माखन-रोटी’।पर तब की बात अलग थी।अब एक कौए के हाथ रोटी के बजाय नई कार लगी है।एक मुख्यमंत्री की नई-नवेली गाड़ी पर उनके बैठने से पहले काला कौआ बैठ गया।बिलकुल लालबत्ती के पास।सरकार को कार में शनिदेव दिखाई दिए।उसका ‘भाग’ उस कौए का ‘भाग’ बन गया।मजबूरन सरकार को अपने ‘भाग’ के लिए दुबारा ऑर्डर देना पड़ा।इस के लिए सरकार बहादुर को केवल मुंडी हिलाने की ज़रूरत थी कि राज्य की हुंडी उनके सामने खुल गई।इस बात का ध्यान ज़रूर रखा गया कि इस बार किसी और कौए को उनके ‘भाग’ में चोंच मारने का मौक़ा न मिले।इससे उनकी गाड़ी और कुर्सी दोनों सलामत हो गई।

इस छोटी बात पर विरोधी कांव-कांव करने लगे।कहा जाने लगा कि मुख्यमंत्री जी अन्धविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं।पर उन्होंने बिलकुल ठीक किया।पहली बात कि गाड़ी में कौआ बैठा था।इसे सबने देखा,इसलिए यह अंध-विश्वास की श्रेणी में नहीं आता।दूसरी यह कि कौए को हमारे यहाँ संदेशवाहक माना गया है।उन्होंने सोचा होगा कि हो न हो,यह कौआ हाई कमान का कोई संदेश लेकर आया हो।उसकी तौहीन करना ठीक नहीं।जिस गाड़ी पर हाई कमान का कौआ बैठ चुका हो,उस पर सेवक कैसे बैठ सकता है !

बरसों से यह मान्यता है कि आंगन की मुंडेर पर बैठा कौआ घर में मेहमान आने की सूचना देता है।यहाँ तो ससुरा सीधा मंत्री जी की छाती सॉरी गाड़ी पर ही चढ़ गया।अब ई तो पक्का असगुन हुआ ना ! मंत्री जी तो अपने लिए गाड़ी पर बैठने जा नहीं रहे थे।वे ठहरे भाग्य-विधाता।जनता का भाग्य सुधारने से पहले खुद का बिगड़ जाए,वह भी कोई भाग्य है भला !उनका तो पूरा जीवन ही जनता के लिए अर्पित है सो मुहूर्त के लिए एक गाड़ी और अर्पित हो गई तो कौन-सा आसमान टूट पड़ा !

एक काले कौए से बड़ा ‘भाग’ राजा और उसके राज्य का होता है।शापित हो चुकी गाड़ी से जनता पर वरदान नहीं बरस सकते।इसलिए एक कौए ने राज्य की जनता को बड़े संकट से उबारा ही,साथ ही गाड़ियों की बिक्री को नया सूत्र दिया।आप चाहें तो उसके ‘भाग’ पर रश्क कर सकते हैं !

सोमवार, 13 जून 2016

चूजे बांग दे रहे हैं क्योंकि मुर्गे यात्रा पर हैं !

पहले अंडा हुआ या मुर्गी,यह सवाल आदिकाल से चला आ रहा है पर उसका दो टूक उत्तर अभी तक नहीं मिला।इस बीच एक अनहोनी और हो गई।ताज़ा ताज़ा पैदा हुए चूजों ने वरिष्ठ मुर्गों को ही फोड़ना शुरू कर दिया।हालत यह हो गई है कि चूजे बांग दे रहे हैं और मुर्गे परम्परा और सम्मान का हाँका लगा रहे हैं।पर यह साहित्य की व्यंग्य-परम्परा ठहरी।वो स्वयं को भी नहीं बख्शती।बुजुर्ग मुर्गे बरसों से केवल मंच पर चढ़ने व नारियल फोड़ने के अभ्यासी रहे हैं।पिछले दिनों एक चूजे ने ऐसे ही एक मंच से अपनी तोतली-भाषा में कुछ सवाल उठाये तो व्यंग्य के मुर्दा-मुर्गों को प्राण-वायु मिल गई।वे तब से यहाँ-वहाँ खुद के मुर्ग-मुसल्लम बन जाने का अफसाना बयां कर रहे हैं।


व्यंग्य को अपनी चांदनी रात बनाने वालों के पेट में मरोड़ तभी से शुरू हुई जब कुछ खद्योतों ने उनकी कृत्रिम रोशनी लेने से इनकार कर दिया।उनकी सम्मान-यात्रा में पटाखे जलाने के बजाय अंगार बरसाने शुरू कर दिए।वे वरिष्ठ हैं और घर के बूढ़े हैं,इस ओट में वे अब तक बचे रहे पर इधर उजाला कुछ जल्दी फट गया।उनको लगा कुछ और फटा।वे सोच रहे थे कि उनके बांगने से ही व्यंग्य में भोर होगी पर इन नामुराद चूजों ने सब बिगाड़ दिया।अब वे सनीचर को बांग देते हैं तो भी ‘भास्कर’ उदित नहीं होते।तो क्या हुआ,उनके थैले में पड़े बासी पुष्प-पत्र फिर भी मुदित होते हैं।वे ‘वाह-वाह’ करके बाहर कूद पड़ते हैं।

व्यंग्य की इतनी लम्बी और दुसह यात्रा करना बुजुर्ग व्यंग्य-यात्री के लिए आसान नहीं है।इसकी साधना के लिए पहाड़ों में जाना पड़ता है।सम्मान का टोटा न पड़ जाए इसलिए वे हमेशा एक कोटा साथ रखते हैं।दिनोंदिन दुर्गम होती इस यात्रा में एक-दो एनजीओ और एकाध मुटल्ले प्रकाशक हमेशा उनके बगलगीर होते हैं।यही उनके सम्मान की ‘शोभा’ बढाते हैं और उन्हें रीचार्ज करते हैं।बीच-बीच में वे अपने लम्बे झोले से व्यंग्य के सिपाही निकालने का जादुई कारनामा अंजाम देते रहते हैं।सम्मान-समारोहों में यही सिपाही शाल ओढ़ाने और ताली बजाने सॉरी स्टैंडिंग ओवेशन के काम आते हैं।जादूगर खुश होता है,यात्रा आगे बढ़ती है।सुनते हैं कि इस यात्रा का अंतिम पड़ाव राष्ट्रपति-भवन का प्रांगण हैं,जहाँ पद्मश्री अपने प्रेमी का वरमाला लिए इंतज़ार कर रही है।इसके लिए बस किसी कमलगट्टे की तलाश है।

व्यंग्य में ‘क से कबूतर’ लिखकर गायब हो जाने वाले आजकल ‘उ का दास यानी उदास’ की टूटी माला जप रहे हैं।व्यंग्य की छाती पर चढ़े हुए सनीचर अब उन्हें व्यंग्य के उद्धारक नज़र आते हैं।समकालीन व्यंग्य में नई भोर तब आई जब व्यंग्य के पप्पुओं ने अचानक बांग देकर सोए हुए महारथियों की नींद हराम कर दी।हाँ,इससे थके-हारे लेखन के पुनर्वास की समस्या ज़रूर पैदा हो गई है।यह शिष्टाचार के विरुद्ध है पर हर पुराने को एक न एक दिन विसर्जित होना पड़ता है।यदि उसके लेखन में नयापन है तो इसके लिए आर्तनाद करने या हाहाकार मचाने की नहीं केवल लिखने की ज़रूरत है।कुछेक वरिष्ठ हैं भी जो बांह चढ़ाकर ज्ञान नहीं बघारते।वे नहीं उनकी कलम दहाड़ती है।

जो कलम अपनी विसंगतियों पर न चले,वो अधूरी है।जिन अंडों को आमलेट बनना था,सनातनी-भूखों के दुर्भाग्य से वे चूजे बन गए।व्यंग्य के भोर में चूजों की बस इतनी भर बांग है कि बुजुर्ग मुर्गे अपनी सम्मान-यात्रा के बीच में थोड़ा सुस्ताकर यह भी सोचें कि व्यंग्य के सम्मान के लिए वे कब बांग देंगे !



डिस्क्लेमर : अ-व्यंग्यकार इसे इग्नोर कर सकते हैं पर व्यंग्य का चूजा भी किसी विसंगति को बर्दाश्त नहीं कर सकता।



शुक्रवार, 10 जून 2016

सेंसर बोर्ड की कैंची और उड़ता विवाद

फिल्म सेंसर बोर्ड ने गज़ब का सेंस दिखाया और सही समय पर उसने कैंची उठा ली।नब्बे से एक कम कट मारकर बोर्ड ने ‘उड़ता पंजाब’ को हवा में उड़ा दिया।हमने ‘उड़ती खबर’ और ‘उड़ता मजाक’ तो सुना था,पर कोई राज्य उड़ता हो,कभी नहीं सुना।माना कि देश बदल रहा है पर इतना भी नहीं कि एक खुशहाल और समृद्ध राज्य को आप सोलह रील की फिल्म बनाकर दो घंटे में उड़ा दें।इसलिए कई दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए ’उड़ता पंजाब’ पर बोर्ड को गहरी आपत्ति है।बात को बवाल बनते आजकल देर नहीं लगती।इन दो लफ़्ज़ों की कहानी को ट्रेंड बनाकर आगे चलकर न जाने किस-किसको उड़ाया जा सकता है ! यह बात बोर्ड के अलावा कोई नहीं समझ सकता।

कल को कोई सिरफिरा ‘उड़ता पीएम’,‘उड़ता बादल’ जैसे निरर्थक शब्दों तक पहुँच सकता है।इससे कितने नुकसानदेह परिणाम निकल सकते हैं,इसका अंदाज़ा हमारे जागरूक बोर्ड को पहले से है।छोटी-सी बात का कितना बड़ा अफ़साना बन सकता है,यह फिल्म वालों से बेहतर कौन जानता है ? सूखे के मौसम में पानी से लदे-फंदे बादल अगर हवा में यूँ ही उड़ जाएँ तो यह बेहद चिंता की बात है।आने वाले चुनावों में केवल फिल्म के नाम से ही सत्ता-दल की संभावना उड़ सकती है।और किसी भी संभावना का नष्ट होना सबसे बुरा होता है।यह है,तो जीवन है।इसलिए सेंसर बोर्ड ने ऐसा करके कई लोगों के जीवन की रक्षा की है।

फिल्म के निर्माता,निर्देशक इस कदम का विरोध कर रहे हैं।उनका कहना है कि वे इसके माध्यम से राज्य से गांजा,अफीम,चरस जैसे नशों को उड़ा रहे हैं।इसका विरोध करने वाले कह रहे हैं कि इससे राज्य की गरिमा,इज्जत और खुशहाली उड़ जाएगी।फिल्म बनाने वालों को यहाँ तक भरोसा है कि जैसे ही लोग उनकी यह फिल्म देखेंगे,उनका देखने तक का नशा काफूर हो जाएगा।निर्देशक का कहना है कि फिल्म की खासियत है कि इसमें ईमानदारी कूट-कूटकर भरी है।इसका सबूत तब और मिला जब ‘ईमानदार पाल्टी’ ने विवादित गुब्बारे में हवा भरनी शुरू कर दी।अब यह हवा फिल्म को हिट करती है या चुनाव को,समय बताएगा।



फ़िलहाल,हवा में विवाद उड़ रहा है।बोर्ड अध्यक्ष का कहना है कि फिल्म निर्देशक अफवाह उड़ा रहे हैं।इस सबसे यह तो जाहिर है कि इसमें ‘उड़ता’ शब्द को कोई नहीं उड़ाना चाहता।अब या तो ‘पंजाब’ उड़े या बोर्ड की कैंची,इसमें एक का उड़ना तय है।

बुधवार, 8 जून 2016

मुक्ति-पथ पर हम !

हम सभी की चाह अंततः मुक्ति पाने की होती है।हर समय हम किसी न किसी से मुक्ति की चाह रखते हैं।हमारी इस बुनियादी ज़रूरत को केवल सरकार समझती है।अपनी इसी दूरदर्शिता के चलते वह मुक्ति-मार्ग पर चल पड़ी है।दूसरी सरकारें जहाँ जनता का इहलोक सुधारने का टेंडर उठाती थीं,इसने परलोक को भी अपने हाथ में ले लिया है।यह काम पहले जिनके ‘हाथ’ में था,वे स्वयं मुक्त हो चुके हैं.जनता अब भी  छटपटा रही है.सरकार इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती.इसलिए वह बार-बार मुक्ति के गीत गा रही है.

मुक्ति पाने के लिए अब किसी साधक को घनघोर तपस्या या हठयोग करने की ज़रूरत नहीं है।सीधा-सा फंडा है-मुक्त-भाव से जीवनपर्यन्त ऐश और आखिर में गंगाजल की दो बूँदें।इससे दालरोटी के शाश्वत चिन्तन से भी मुक्ति मिलती है और मोक्ष का द्वार खुलता है सो अलग।जिनको ऐसा तिलस्मी फंडा नहीं मिलता,उन्हीं के गले फंदे संग मोहब्बत कर बैठते हैं और निर्वाण को प्राप्त होते हैं.

 सरकार इस दिशा में लगातार काम कर रही है।उसकी कोशिश कई तरह के कर ईजाद कर चीजों को मूल्य-मुक्त करने की है।इस तरह वस्तु का वास्तविक मूल्य उसमें लगे कर से स्वतः कम हो जाएगा।लोगों को चीजें तो मुफ़्त मिलेंगी पर उन्हें इसके लिए सरकार को ‘सेवाकर' चुकता करना होगा।आखिर जितनी ज्यादा सेवा,उतना ज़्यादा सेवाकर।अब तो यह सब मानते हैं कि यह सरकार उसकी अधिकतम सेवा कर रही है। अख़बार ,टेलीविजन और रेडियो भी यही बता रहे हैं।इतनी व्यस्तता के बीच भी सरकार का ध्यान ‘कर- मुक्त' भारत पर है।यह परियोजना सीध-सीधे चुनावी-जंग से जुड़ी हुई है।अभी हाल ही में कई राज्य ‘करमुक्त’ हुए भी हैं।मुक्त होने वाले इसमें सरकार का हाथ मानते हैं ।विपक्ष को लगता है कि दरअसल सरकार का उद्देश्य पूरी तरह विपक्ष-मुक्त हो जाना है।यह निर्वाण की राह नहीं उनके नाश की साज़िश है।गंगाजल को घर-घर पहुँचाना इसी रणनीति का हिस्सा  है।यह धरती अगर पापमुक्त हो गई तो कोई चुनाव कैसे जीता जाएगा?

तुलसी बाबा बहुत पहले मुक्ति पाने की तरकीब बता गए हैं।उनका कहना था कि मुक्ति चार प्रकार से मिल सकती है;’दरस,परस,मज्जन अरु पाना’।अर्थात दर्शन करने,छूने,नहाने और पीने से।सरकार ने इन सभी विकल्पों को हमारे लिए उपलब्ध कर रखा है।जिसे मंहगी दाल से मुक्ति पानी है तो बस एक नजर उसे देख भर ले।सूखे इलाकों में जिन्हें पानी नहीं मिल रहा,वे नल की टोंटियों को छू भर लें।इससे उनकी प्यास छू हो जाएगी और जल को ढोकर लाने से मुक्ति भी मिलेगी।नहाने से मुक्ति यूँ ही मिल जाएगी,जब बूँद भर पानी ही नहीं होगा।आखिरी और इन सबसे बढ़िया उपाय पीकर मुक्ति पाना है।जो लोग समर्थ हैं,वे आलरेडी ‘पी’ रहे हैं।बाकियों के लिए सरकार ने डाकिए का इंतजाम कर दिया है।यह मुक्ति का सबसे सरल मार्ग है।बस एक एसएमएस भेजिए और मुक्ति-प्रदायिनी गंगा आपको सभी भौतिक दुखों से मुक्त कर देंगी।

सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में भी मुक्ति-राह खोल दी है।कई महापुरुष जो आज़ादी के बाद से किताबों में बंद पड़े छटपटा रहे थे,उसने उन्हें हटाकर मुक्त कर दिया है।इससे वे तो मुक्त हुए ही हैं,पढ़ने वाले भी हो गए।आखिर हमारे शास्त्रों में कहा ही गया है,’सा विद्या या विमुक्तये’ ,अर्थात विद्या वही जो मुक्ति प्रदान करे;ज्ञान से,डिग्री से और तर्क से।सो देश राह बदल रहा है,आगे बढ़ रहा है।


शुक्रवार, 3 जून 2016

बेक़रार करके हमें यूँ न जाइए !

सुनते हैं कि सरकार ने कई करार रद्द कर दिए हैं।ऐसा इसलिए किया गया है ताकि होने वाले घपले-घोटाले जहाँ हैं,वहीँ ठिठक जाएँ।घपला असरकारी तभी होता है जब करार सरकारी हो।बिना करार के घपला भी भाव नहीं देता।या यूँ कहिए कि सारी रार ही करार के लिए होती है।ऐसे में एकदम से बेक़रार हो जाना घपले से करार तोड़ना है।यह प्राकृतिक न्याय नहीं है।सरकार तो अपनी पैदाइश से ही करार से बंधी होती है।जनता और सरकार के बीच हर पाँच साल में एक करार होता है।जिसके पास करारों की सबसे बड़ी पोटली होती है,उसी की सरकार बनती है।करारों को निभाने के लिए ही इस पोटली में घपलों-घोटालों को जन्म लेना पड़ता है।यह सब 'संभवामि युगे युगे' की गौरवशाली परम्परा के ही अनुपालन में होता है।

करार की ज़मीन तैयार तभी होती है जब घपले का उन्नत बीज हाथ लगता है।ऐसे में करार को खत्म करना घोटाले की भ्रूण-हत्या करनी है।सरकार का यह कदम घोटालेबाजों को अल्पसंख्यक बना देने व उसे हतोत्साहित करने जैसा है।यह करार की मुख्य भावना के साथ खिलवाड़ है।इस तरह की एकतरफ़ा कार्रवाई से जनता अचानक बेक़रार हो सकती है,साथ ही विकास-प्रिय घोटालों के बजाय मुसीबत पैदा होने की आशंका बढ़ सकती है।



करार को लेकर हम भारतीय बड़े संवेदनशील होते हैं।सरकार हमसे किए करार भले भूल जाय पर हम अपने छोटे-मोटे करार दिल से लगा लेते हैं।कोई उन्हें पूरा करने के लिए तो कोई तोड़ने के लिए प्रतिबद्ध होता है।करार तोड़ने पर जहाँ हम सरकार को पलटकर उससे इसका बदला ले लेते हैं,वहीं प्रेम का करार टूटने पर करुण-पुकार कर उठते हैं,'बेक़रार करके हमें यूँ न जाइए,आपको हमारी कसम लौट आइए'।सरकार तो करार टूटने पर घपलों-घोटालों का आह्वान भी नहीं कर सकती क्योंकि घपले अंधे-बहरे होते हैं।वे तो बस करार होते ही बाय-डिफ़ॉल्ट उसके साथ चले आते हैं।वे किसी कसम से बंधे कच्चे रिश्ते भी नहीं होते ,जो जरा सा हाथ झटक लेने पर टूट जाते हों। उनको इस बात का पूरा करार है कि वे हमारी तरह कभी बेकरार नही हो सकते।