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बुधवार, 23 मार्च 2016

मोम का पुतला बनना और बुरा न मानने का मौसम !

कहते हैं पुतलों में जान नहीं होती पर अब ऐसा नहीं रहा।पहले लगातार मौन रहने वाले को लोग पुतला कह देते थे।मतलब यह होता कि बंदा पुतले जैसा बेजान है।अब खूब बोलने वाले पुतले बन रहे हैं।बातें बनाने वाले पुतलों की डिमांड में हैं।मतलब यह भी है कि जो बोलने से रोके नहीं रुक रहे हैं,उन्हें पुतला बना दिया जाय।इससे लोगों को उनके मुँह बंद रखने का भरम तो होगा ही बाकी दुनिया भी हमारी अनोखी उपलब्धि से महरूम नहीं होगी।इसलिए हम विलायत को लगातार पुतले सप्लाई कर रहे हैं।ये पुतले भले मोम के बने हैं पर इनकी ब्रांड वैल्यू मोम जैसी नहीं है।

देश में होली का माहौल है।इस वक्त कोई किसी बात का बुरा नहीं मान रहा।सो,नेताओं को भी कलाकारों और विदूषकों के साथ बुत बने रहने में कोई हर्ज़ नहीं।हम उस समय में जी रहे हैं जहाँ एक जीते-जागते इंसान से बुत बनना अधिक फ़ख्र की बात मानी जाती है।पुतले इतने ताकतवर हैं कि इसके लिए लोग नप रहे हैं।छोटा-मोटा आदमी अगर नप जाय तो जीते-जी उसकी मिटटी पलीद हो जाती है।यहाँ छप्पन-इंची छाती मोम बनकर पिघलने को आतुर है।वह नप कर भी दर्शनीय है।यही फर्क होता है छोटे और मोटे आदमी में,मिटटी और मोम में।

अच्छी खबर यह है कि हमारे पन्त-प्रधान के पुतले बन जाने के बाद मफलर-मैन को भी यह गौरव हासिल हो रहा है।यह बहुत अच्छी शुरुआत है।वास्तविक दुनिया में जो एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते,वे मोम के पुतले बने एक दूसरे के बगल में खड़े रहेंगे।जिनको लगता है कि ये कभी अपने आगे किसी की सुनते नहीं,पुतले बनाकर यह साबित किया जायेगा कि ऐसा नहीं है।वे इनसे अपने मन की बात कर सकते हैं।इस बात का भी पहले से इंतजाम कर लिया गया है कि इन्हें वहाँ घर का सा अपनापन मिले।इसीलिए मशहूर कॉमेडियन को भी इनके बीच जगह दी गई है।अब ‘बाबा जी के ठुल्लू’ के साथ ‘मेक इन इंडिया’ और ‘मैं ईमानदार हूँ’ की एक साथ प्रस्तुति होगी।ऐसे में हमारी देसी प्रतिभाओं से विलायत वाले भी जगमगा जायेंगे।

पहले नपना फिर मोम का पुतला बनना दोनों बातें प्रतिष्ठा की प्रतीक हैं।अब महापुरुष वही जो नपकर पुतला बन सके।होली तो आई है,चली जायेगी पर पुतलों के आपस में बुरा न मानने का मौसम बदस्तूर जारी रहेगा।किसी के पुतला बन जाने का आगे से हम भी बुरा नहीं मानेंगे।

रविवार, 20 मार्च 2016

रंग लाएगी हमारी देनदारी एक दिन !

सयाने बहुत पहले कह गए हैं कि ‘यावद् जीवेत् सुखम् जीवेत,ऋणं कृत्वा घृतम् पीबेत’ अर्थात् जब तक जियो,सुख से जियो,क़र्ज़ लेकर घी पियो।इस जीवन-सूत्र को हमने बड़ी शिद्दत से अपनाया है।पैदा होते ही हम पर ऋण चढ़ने लगता है।इस बारे में हमें पढ़ाई के दौरान ही पता चलता है कि हम पर माता,पिता और गुरू के नाम पर एडवांस में बकाया हो गया है।साथ में यह भी हिदायत होती है कि ये ऋण पूरी तरह से चुकता होने वाले नहीं हैं,इसलिए समझदार लोग इसे चुकाने की कोशिश ही नहीं करते।इस तरह का ऋण भले ही आभासी होता है पर वह हमारे डीएनए में पैबस्त हो जाता है।जैसे ही हम असल ज़िन्दगी से मुक़ाबला शुरू करते हैं,वह हमारे लिए खाने में ‘लोन’ की तरह हो लेता है।इस तरह हम ‘लोन-फ्रेंडली’ हो जाते हैं।

लोन बाँटने वाले भी बड़े सहृदय होते हैं।वह बार-बार हमारी चिरकुटपना का स्मरण कराते रहते हैं।अगर हम इस ज़रूरी जीवन-कर्म से चूक गए हैं तो वे दोपहर के खाने के गैर-ज़रूरी वक्त भी फोन पर याद दिलाते हैं कि लो न ! आपको गाड़ी चलानी नहीं आती पर नई अर्थव्यवस्था को ढंग से चलाने के लिए उनके दस्तावेजों में बस एक बार आपका अगूंठा लग भर जाए,उसे जड़ से काट लेने की प्रक्रिया वे स्वयं पूरी कर लेते हैं।माल उधार लेने वाला ‘बिरला’ ही पचाने की हैसियत रखता है।लोन लेने की हैसियत से अधिक हाजमा दुरुस्त होना ज़रूरी होता है।इसके लिए किंग-साइज़ का पेट और विलायती-वीसा आवश्यक अर्हता है।जिनको दो जून की रोटी का जुगाड़ नहीं,वे क्या खाकर भाग पायेंगे ?

कर्ज़ लेने के लिए बूता और जूता दोनों मजबूत होना चाहिए।जो इस मामले में कमजोर पड़ते हैं,पेड़ों से लटक जाते हैं।ऐसे लोग समाज के लिए अभिशाप हैं।इनके जीते रहने से तो हमारी नाक कटती ही है,मरने पर जेब भी।मुआवजे से हमारी अर्थ-व्यवस्था चौपट होती है।दूसरी ओर भारी कर्ज़ लेकर अर्थ-व्यवस्था को गति देने वाला नायक होता है।उसकी प्रतिष्ठा उसकी देनदारी से बड़ी होती है।वह कर्ज़ लेकर पेड़ पर नहीं चढ़ता,बल्कि आसमान में उड़ जाता है।कर्ज़ लेने का एक सलीका और शऊर होता है।सूटेड-बूटेड बंदा कर्ज लेते हुए भी ऋणदाता पर एहसान करता है।हमारे बैंक सार्वजनिक संस्थान हैं।फटेहाल और दीन-दुखियों के लिए खोले गए परमार्थ आश्रम नहीं।
कर्जदार होना आदमी का मौलिक अधिकार है।पहली कार से लेकर पहला घर तक कर्ज से उसके प्रेम को दर्शाता है।कर्ज सबको लेना चाहिए ताकि बाज़ार ज़िन्दा रहे।ईएमआई इसीलिए आई है,जिससे गरीबी किश्तों में मरती रहे।उसका एकदम से खतम हो जाना बाज़ार की सेहत के लिए ठीक नहीं होगा।अब तो लोन लेकर पढ़ाई भी हो रही है ताकि शुरुआत से ही उधार लेने का कौशल डेवलप हो सके।

कुछ लोग कर्ज़ का नाम सुनते ही बड़े संवेदनशील हो उठते हैं।संवेदनशीलता प्रगति के लिए घातक है।हमें आगे की ओर देखना चाहिए।हमारे प्रिय शायर ग़ालिब कह भी गए हैं कि ‘कर्ज़ की पीते थे मय और समझते थे,रंग लाएगी हमारी फाका-मस्ती एक दिन’।उन्हें कर्ज लेकर ही क्रांति आने की उम्मीद थी।ऐसा तो तब था,जब शायर कर्ज लेकर शराब पीता था।आज कर्ज़ लेकर शराब बेची जा रही है।कर्ज़ परेशान नहीं खुशहाल और दार्शनिक बनाता है।कर्ज तो लिया जाता है गम गलत करने के लिए ताकि परेशानी गड्ढे में गिरे।जिस आदमी को कर्ज़ लेने के लिए कोसा जा रहा है,उसने तो पीने वालों का कतई भला किया है।उसकी बनाई दवाई से जान-जहान की परेशानियाँ दूर हो रही हैं।

जब एक शायर को उम्मीद थी कि उसकी तंगहाली एक दिन ज़रूर रंग लाएगी तो कर्ज लेकर ऐश करने वाले का आत्म-विश्वास ऊँचा क्यों न हो ! कर्जदार कोई छोटी मछली नहीं जो किसी भी काँटे में फँस सके।छोटे-मोटे लोन लेकर सरकारी अफसरों से डरकर भागने वाले निश्चिन्त होकर रहें।कर्ज़ लेकर शराब पिएँ और देनदारी भूल जाएँ।हाँ,कर्ज़ भूलने से पहले अपना पासपोर्ट बनवाना न भूलें।

शनिवार, 12 मार्च 2016

क्रांति का पैकेज !

वे झुंड के बीच खड़े हैं।माइक उनकी पकड़ में है।कोशिश देश को पकड़ने की है।सामने माहौल है,उत्साह भी।देश दम साधे सुन रहा है।लग रहा है कि जरा सी चूक हुई कि दम निकला।यह दृश्य एक जगह का नहीं है।क्रांति वही है जो आग की तरह फैले।क्रांतियों के लिए यहाँ खूब स्कोप है;सिनेमास्कोप से लेकर चैनल-स्कूप तक।यह देश गजब अभ्यासी है और क्रांति-फ्रेंडली भी।बहुत पहले कभी वह रुपहला परदा फाड़कर आई थी।क्रांति का क्या है,वह चना बेचने भर से ही आ जाती है और भाड़ झोंकने से भी।तब परदे पर चना इतनी जोर से गरम हुआ था कि निर्माता,निर्देशक सबकी जेब गरम हो गई थी।अब तो साक्षात् प्रकट हो गई है।पूरा देश गरम हो रहा है।

आज़ादी से पहले केवल एक ही क्रांति आई थी।सन सत्तावन की उस तलवार में अब अच्छी-खासी जंग लग चुकी है।इसलिए जबानें ही तलवार का काम कर रही हैं।क्रांति के नए-नए पैकेज आ गए हैं,सुपारी दी जा रही है।इस क्रांति में घर-परिवार त्यागने की जहमत नहीं उठानी पड़ती है।बस दो इंच की जीभ लपलपाइए और क्रांतिकुमार बन जाइए।छोटे पैकेज में बड़ी डील।यानी हर्रा लगे न फिटकरी और ‘सत्यमेव जयते’ की तुरंत स्थापना ।

वे अभी भी खड़े हैं।उन्हें खड़े ही रहना है।चुनाव आएगा,तब भी खड़े होंगे।कुर्सी मिलने तक वे खड़े ही रहेंगे।देश की सेवा के लिए वे इतना तो कर ही सकते हैं।बैठते ही चुप्पी ओढ़ लेंगे।मन हुआ तो ट्वीट कर सक्रियता का प्रमाण दे देंगे।अधूरे काम बैठकर ही पूरे होते हैं।खड़े होकर तो केवल क्रांति की जा सकती हैं।इसीलिए वे अन्याय के खिलाफ़ खड़े हैं।उनके बैठते ही न्याय हो जाएगा।ऐसे न्याय का वे सम्मान करते हैं।उनका संघर्ष अपने लिए नहीं,दलितों और पिछड़ों के लिए है।तब तक वे चुप नहीं बैठेंगे।

उनके हाथ में माइक है और मुँह में जुबान।वह मिसाइल से भी अधिक कारगर है।खड़े-खड़े ही वायरल हो रही है।गली-गली में क्रांति हो रही है।सब अपनी-अपनी जीभें लिए खड़े हैं।माइक वहीँ पहुँच जाते हैं,जहाँ जीभ निकलती है।अलग-अलग किस्म की जीभें हैं।दाँतों के नियन्त्रण से बाहर होते ही जीभें लाखों की हो जाती हैं।आदमी की कीमत गिर जाती है।

देश क्रांति की चपेट में है।नारेबाज स्वतंत्र हैं।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वर्णिम दौर है इसलिए जीभें लटककर बाहर आ गई हैं।रुपहले परदे की क्रांति तो सिनेमा खत्म होने के बाद ठंडी पड़ जाती है पर हमारी आँखों में गिरा यह परदा स्थायी हो रहा है।हमें क्रांति का इंतज़ार है और आजकल क्रांति ऐसे ही आती है।इसीलिए वे खड़े हैं।

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

बाज़ार हमारे ऊपर चढ़ेगा,तभी विकास दिखेगा !

नया बजट आ गया है।चौतरफ़ा प्रगति हुई है।इससे एक बात साफ़ हुई है कि सरकार भेदभाव-विरोधी है।उसने सबके साथ समान व्यवहार किया है।बीड़ी को छोड़कर सबने छलाँग लगाई है।सिगरेट और सिगार की तरह वह मोटे पेट वाली नहीं है।उसे आगे धकेलने के लिए किसी पैकेज की दरकार भी नहीं है।वह आत्मनिर्भर है इसलिए पहले की तरह सस्ती बनी रहेगी।हाँ इस बहाने सरकार ने दिलजलों का ख़ास ख्याल रखा है।अब वे सारा काम-धाम छोड़कर महुए के पेड़ के नीचे बैठकर ‘बीड़ी जलइले जिगर से पिया’ का बेमियादी आलाप कर सकते हैं।इससे तन,मन और धन तीनों को परम शांति मिल सकती है।

बाहर खाना-पीना मँहगा करके सरकार आम आदमी का खर्च तो घटा ही रही है,वह अपने परिवार के साथ घर पर ज्यादा से ज्यादा समय बिताए,इसका भी ख्याल रख रही है।मोबाइल बिल मँहगा होने से आदमी घर से बाहर बात करना अवॉयड करेगा।यानी अब वह खाने-पीने और बात करने के लिए घर पर ही पूरी तरह निर्भर होगा।इस लिहाज़ से यह बजट महिला-समर्थक भी है।

मॉल और होटल अब कहीं अधिक सुकून देंगे।मिडिल क्लास की भीड़ सम्पन्न लोगों के ऐश में अब खलल नहीं डाल पाएगी।पूरा विपक्ष सरकार पर यह आरोप लगा रहा है कि उसने आम आदमी पर ध्यान नहीं दिया है,पर यह बात सही नहीं है।उसे बखूबी पता है कि अब आम आदमी वैसा नहीं रहा।उसकी तो दिल्ली में सरकार भी चल रही है।इसीलिए वह गरीब आदमी ढूँढने गाँव में घुस गई है।सरकार ने लाखों कुएँ खुदवाने का इंतजाम कर दिया है।देश भर में जब इतने गड्ढे खोदे जायेंगे,बेरोजगारी अपने आप दफ्न हो जाएगी।

मिडिल क्लास अब बजट की चिन्ता नहीं है।उस पर अगले चुनाव से ठीक पहले बात करना ठीक होगा।दाल-रोटी गम्भीर चिन्तन का विषय कभी रहा भी नहीं।उल्टे दाल-रोटी खाकर प्रभु के गुण गाने से चिंता दूर होती है ।वैसे भी दाल अब घर की नहीं संग्रहालय की वस्तु हो गई है।विदेशी-निवेश के जमाने में दाल-रोटी का जाप करना पिछड़ेपन की निशानी है।मध्यवर्ग के पास अब बहुत काम हो गए हैं।काम करने से अधिक वह सरकारें बनाने-बिगाड़ने के खेल में लगा है।इसलिए उसकी ज़रूरतें देखते हुए सरकार उसे अतिरिक्त हाथ (कर) मुहैया कराने जा रही है।

बजट के बाद बाज़ार चढ़ा है।आम आदमी नीचे है और विकास ऊपर।सोचिये,विकास ने अपने कंधे पर कितना बोझ उठा रखा है और आपको केवल बाज़ार दिखता है !

मंगलवार, 1 मार्च 2016

परीक्षाओं का मौसम और झुमका !

परीक्षाओं का समय है।बच्चों की होने वाली हैं,सरकार की हो रही है।स्कूली परीक्षा देने का मौक़ा जिन्दगी में एकाध बार ही आता है पर सरकार आए दिन देती रहती है।ऐसी भी क्या परीक्षा जिसे देकर ज़िन्दगी भर के लिए सर्टिफिकेट मिल जाता है।इसमें फल-सुधार की गुंजाइश भी बहुत कम होती है।अति सयाने लोग रट्टा मार कर मैदान मार लेते हैं पर अमूमन परीक्षार्थी के पास सीमित विकल्प होते हैं।ऐसी परीक्षाएं बच्चे एक बार देते हैं और उसका फल ज़िन्दगी भर भोगते हैं।

सरकार की परीक्षा जरा अलग टाइप की होती है।इसमें पेपर देने वाला खुदई पेपर सेट कर लेता है।उसकी जाँच भी खुद करता है पर फल का टोकरा दूसरों के ऊपर गिरता है।यह झुमका भी नहीं है जो केवल बरेली में ही गिरता हो।इसकी जद में बरेली और रायबरेली सब आते हैं।बार-बार आते हैं।बच्चे पेपर देने से पहले खाना-पानी तक भूल जाते हैं पर सरकार परीक्षा-भवन जाने से पहले कड़ाही भर हलवा उदरस्थ करती है।हलवे में पड़े काजू और चिलगोजे अपनी परीक्षा में पहले ही पास हो जाते हैं।जनता खाली हुई कड़ाही की छन्न से ही अपने छिन्न-भिन्न होने का ज़श्न मना लेती है।

इस परीक्षा की सबसे बड़ी खासियत है कि इसमें पेपर देने वाला पहले से ही पास होता है।वह सवालों को आगे पास भर करता है।परीक्षार्थी के पास एक नहीं हज़ार मौके होते हैं सुधरने के लिए।अव्वल तो उसे फेल होने की आशंका तक नहीं होती।अगर ऐसी कोई साजिश हुई भी तो वह एक ट्वीट से ‘सत्यमेव जयते’ का बिगुल बजा देता है।

डर कर परीक्षा देने वाले कायर होते हैं।उनको दुबारा मौक़ा देना मतलब कायरता को प्रतिष्ठित करना है।सरकार बहादुर होती है इसीलिए उसकी परीक्षा रोज होती है।वो इन परीक्षाओं से घबराती भी नहीं।उसे पता होता है कि उसकी अच्छी पढाई का असर तो उस पर पड़ता है,खराब का नहीं।

किसी सरकार का फेल होना देशहित में नहीं होता।उसकी परीक्षा देश की परीक्षा होती है।इसलिए बच्चे अपनी परीक्षाओं में पास हों न हों,सरकार का पास होना उतना ही निश्चित है,जितना झुमके का बरेली में गिरना।