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रविवार, 31 मई 2015

कक्कू और उनका फेसबुक-स्टेटस !

शाम को बाज़ार से पैदल ही वापिस आ रहा था कि अचानक कराहने की आवाज़ सुनाई दी।मैं रुक कर इधर-उधर देखने लगा।शाम के धुंधलके में पहले तो कुछ समझ ही न आया कि आवाज कहाँ से आ रही है फ़िर ज़रा गौर से पड़ताल की तो पता चला कि बगल से बह रही नाली में कक्कू अपनी साइकिल समेत समर्पित भाव से गिरे हुए थे।मैंने झट से उनको पकड़ना चाहा तो वे बोल पड़े -बच्चा,पहले तुम साइकिल निकालो,यह हमरे ही ऊपर चढ़ी है।हम कहीं ना भाग रहे।’

मैंने पहले साइकिल निकाली फ़िर कक्कू बाहर आए।साइकिल को खास नुकसान नहीं हुआ था,बस मडगार्ड जरा-सा टेढ़ा हो गया था।कक्कू उसे ही ताके जा रहे थे,तभी मैंने पूछा-आप कैसे हैं कक्कू ? कहीं चोट तो नहीं आई ?’’कुछ नहीं बेटा,लगता है ई ससुरा हाथ अपनी जगह से हिल गवा है।बस पिलास्टर-पट्टी का खर्चा थोड़ा बढ़ गया है और कुछ नहीं’,कक्कू ने अपनी साइकिल से नज़रें हटाये बिना उत्तर दिया।
‘मगर ये अनर्थ हुआ कैसे ? आपको तो साइकल अच्छी तरह से चलानी भी आती है !’ मैंने अपने चेहरे पर गंभीरता लादकर चिन्ता प्रकट की।कक्कू ने हाथ की पीड़ा से उबरते हुए जवाब दिया,’बच्चा,हमें साइकल चलानी तो ख़ूब आती है।हम इसका हैंडल भी पकड़े रहे,पर ई ससुर फेसबुकवा हैंडल करै मा  सारी आफत आई है।’

अब मैंने अचरज-भरी निगाह से उनकी ओर देखा और सीआईडी के एसीपी प्रद्युम्न की तरह उनसे एक खोजी सवाल कर दिया-‘पर आपके नाली में गिरने से फेसबुक का क्या सम्बन्ध ? क्या कोई सेल्फी-उल्फी के चक्कर में यह सब हो गया या किसी ने ब्लॉक कर दिया आपको ?’
कक्कू अब कराह उठे,कहने लगे-नहीं बेटा ! सांझ में इस मोबाइल से सेल्फी की साफ़ तस्वीर भी नहीं आती और ना ही हमें किसी ने ब्लॉक किया है।हम तो सबके कमेन्ट भी लाइक करते हैं।सो ऐसी कउनो  दुश्मनी भी नाय है।हम बस अपनी  फोटू पर आए इकलौते कमेन्ट को लाइक भर कर रहे थे कि तभी साइकिल-रानी हमको लेकर गड्ढे मा समाय गईं।अब बताओ यहिमा हमरी कौन-सी गलती है ? अगर कमेंट को केवल हसरत-भरी निगाह से ही फेसबुकवा लाइक मान लेता तो ई अनर्थ ना होता।’

‘लेकिन खाली इसके लिए आपने अपनी जान जोखिम में डाल दी।कमेन्ट में लाइक थोड़ी देर बाद कर लेते’ मैंने पूछ लिया।मैं अभी भी इस दुर्घटना के असली कारण तक पहुँचना चाह रहा था।

कक्कू शायद मेरी मंशा समझ गए थे,कहने लगे-बच्चा,अगर हम लाइक करने में देरी करते तो कमेन्ट करने वाली कामिनी जी फेसबुक से नदारद हो जातीं।उनके फेसबुक में आने का यही टाइम है।इसके बाद वो रात में दो बजे आती हैं।तुम तो जानत ही हौ कि तुमरी काकी हमरा कितना खयाल रखती हैं।ऊ कहती हैं कि रात मा जागने वाला खाली उल्लू होत है।फ़िर अगर हम तुरतै लाइक न करते तो कामिनी जी नराज हो जातीं।हम नहीं चाहते थे कि उनको हमरे लाइक की खबर देर मा मिले।अब इस उमर मा हम ना काकी को नराज कर सकते हैं और न कामिनी जी को।तुमही बताओ हमने ठीक किया ना ?’

कक्कू हमें अब सोशल मीडिया के हीरो नज़र आने लगे थे।उन्होंने हम जैसे नई पीढ़ी के लोगों को उचित राह दिखाई थी।मन ही मन हम उन्हें अपना आदर्श मान बैठे।उन्होंने केवल एक लाइक के लिए अपना सगा हाथ कुर्बान कर दिया था।इधर हम हैं कि अपने खास दोस्त की पोस्ट पर सौ-सौ लाइक देखकर उसे गिनकर सौ गालियाँ देते हैं।मैंने फटाक से उनकी फोटू खींची और इस वीरोचित कार्य को अपना स्टेटस बनाकर सीधे फेसबुक को समर्पित कर दिया।देखते ही देखते उस पर धड़ाधड़ लाइक और कमेन्ट आने लगे।मैंने कक्कू को दिखाया तो बोले-बच्चा,पन्द्रह दिन बाद जब पिलास्टर उखड़ेगा,हम इस पर लाइक ज़रूर करेंगे।‘

बुधवार, 27 मई 2015

बुरे दिन चले गए !


‘अच्छे दिन’ ठीक एक साल पहले आए थे।कुछ लोगों को फ़िर भी भरोसा नहीं हो रहा था।वे दूरबीन लगाये ताकते ही रह गए पर उन्हें ‘वे दिन’ दिखाई न दिए।इस बीच साल पूरा हुआ और उसका ज़श्न शुरू हो गया।देश में चौतरफ़ा मच रहे जलसे की मार से ‘बुरे दिन’ बड़े आहत हुए।वे अचानक उठे और चले गए।अच्छे दिनों की आमद को नकारने वाले एकदम से सन्न रह गए हैं।अब तो सरेआम यह प्रमाणित हो चुका है कि ‘अच्छे दिन’ हमारे साथ हैं क्योंकि ‘बुरे दिन’ हैं नहीं।दोनों एक साथ रह भी तो नहीं सकते !
‘अच्छे दिन’ और बुरे दिन’ का फंडा एकदम सीधा है।जो लोग यह मानने को तैयार नहीं हो रहे थे कि अच्छे दिन आ गए हैं,उनका मुँह इस बात से बंद हो गया है कि बुरे दिन चले गए हैं।इस बात की तस्दीक सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी कर दी है।’अच्छे दिनों’ की आवक के लिए विदेशों में ‘दुःख भरे दिन बीते रे भइया’ का कोरस-गान भी किया गया।और देखिए,ठीक एक साल बाद पके आम की तरह ‘अच्छे दिन’ हमारे सामने टपक पड़े।
कहा तो यह भी जा रहा है कि ‘बुरे दिन’ भयभीत होकर भागे हैं।जैसे कृष्ण ने मथुरा जाकर कंस का विनाश किया था,वैसे ही मथुरा में ‘बुरे दिनों’ का खात्मा हुआ है।कुछ लोग इसे महज ऐलान मान रहे हैं पर सच्ची बात तो यह है कि जब ऐलान करके ‘अच्छे दिन’ आ सकते हैं,तो ‘बुरे दिन’ जा क्यों नहीं सकते ?
  जिस तरह ‘काला धन’ जुमला बनकर गायब हो गया,ठीक उसी तरह विरोधियों द्वारा लगायी जा रही  ‘अच्छे दिनों’ की रट भी हमेशा के लिए दफ़न हो गई है।सरकार ने यह भी साफ़ कर दिया है कि ‘अच्छे दिनों’ की गारंटी सबके लिए नहीं थी,हाँ,उसके मुताबिक ‘बुरे दिन’ ज़रूर कुछ के आए हैं और इस प्रक्रिया को वह और विस्तार देगी।

‘बुरे दिनों’ के चले जाने का सरकार का दावा इसलिए भी मजबूत जान पड़ता है क्योंकि उसने बताया है कि जित्ते रूपये में पहले कफ़न नहीं मिलता था,उसने बीमा करा दिया है।लोग बेफिक्र होकर मर तो सकेंगे !

मंगलवार, 26 मई 2015

सरकार का एक साल और शाल में लिपटी शर्म !

नई सरकार अब एक साल पुरानी हो गई है।चारों तरफ ढोल-ताशे बज रहे हैं।हर चैनल और हर दरवाजे पर ‘अच्छे दिनों’ की थाप दी जा रही है।विरोधियों को थपकी देकर सुलाया जा रहा है।सरकार उत्सव के मूड में है।सर्वत्र इत्र का छिड़काव हो चुका है।मंहगाई और भ्रष्टाचार इतनी धमक सुनकर कहीं कोने में दुबक गए हैं।एक साल पूरा होने पर इतना चौकस और जबरदस्त इंतजाम है तो पाँच साल होने के बाद की स्थिति रोमांचित करती है।उम्मीद है तब तक देश भर के हर मतदाता को ‘अच्छे दिनों’ की वैक्सीन पिला दी जाएगी।इससे बुरे दिनों की आशंका पूरी तरह ख़त्म हो जाएगी।

विकास को देखना है तो जोश देखिये,नीयत नहीं गति देखिये।जहाँ पिछले कई सालों से सर्वत्र मौन तारी था और सरकार एक जगह ठहरी हुई लग रही थी,वहीँ पिछले साल से हमारे मन की बात भी हमारी न रही,उनकी हो गई है।सरकार ठिठकी नहीं बल्कि रोज छलाँगे मार रही है।अंदर की अधिकतर समस्याओं का समाधान बाहर ही है,इसलिए उस मोर्चे पर लगातार सेल्फियाँ दागी जा रही हैं।घर के लोग बातों की भभूत से ही अभिभूत हैं तो बाहर वाले मनमोहक सेल्फी से।पहले के लोग निरा मूरख थे जो विदेशों के लिए बड़ी मेहनत से कूटनीतियाँ बनाते थे।नई सरकार अब उन्हें महज सेल्फी से ही कूट रही है।यह बदलाव नहीं तो क्या है ?

झुमरीतलैया से लेकर झकरकटी तक एक ही फरमाइश बजाई जा रही है।जब बजाने में एका है तो दिखने में क्यों नहीं ? विकास और प्रगति अख़बार के पन्नों और टीवी-स्क्रीन पर छितराई हुई है।रंगीन नजारों को देखने के लिए काला चश्मा मुफ़ीद नहीं होता क्योंकि वह एंटी-चकाचौंध होता है।विकास को उसी की नज़र से देखा जाता है।इसके लिए आँखें और संवेदनाएं झक सफ़ेद होनी चाहिए।सरकार का जोर इसी बात पर है।वह देखने में समाजवाद लाना चाहती है।सब एक जैसा देखें और एक जैसा सुनें।

फ़िलहाल,अच्छे दिनों के नगाड़े बज रहे हैं।आम आदमी धरातल पर और रुपया रसातल पर आराम फरमा रहा है।शर्म पिछले साल से अपना ठिकाना ढूंढ रही है पर उसे गले लगाने वाला कोई नहीं मिला।कुछ लोग कह रहे हैं कि पुरानी शर्म ने अब नए-नवेले गौरव से अपनी गाँठ बाँध ली है।शायद इसीलिए वह अब ढूँढे नहीं मिल रही है।अख़बारों और चैनलों पर नज़र गड़ाए रखिए,हो सकता है शर्म को भी लाज आ रही हो और वह शाल में दुहरी हुई जा रही हो !



शुक्रवार, 22 मई 2015

काले चश्मे का गुनाह !

देश में नई सरकार बने हुए एक साल हो रहा है।इस बीच कई ऐसी बातें हुई हैं,जो पहली बार ही हुई हैं।सब देखने-सुनने के बाद तो यही लगता है कि सरकार केवलपहली बारकरने के लिए ही बनी है।हाल ही मेंकाले चश्मेको लेकर पहली बार कलेक्टर को फटकार लगी है।उसकी गुस्ताखी यह थी कि एक साल में आएअच्छे दिनोंको वह काले चश्मे की आड़ से देखना चाहता था।यह बात सरकारी चश्मे को नागवार गुजरी।उसने तुरंत अपने कार्यालय में काले चश्मे को तलब किया।हमारे खुरपेंची पत्रकार ने वह संवाद दूंढ निकाला है जो अविकल रूप से यहाँ प्रस्तुत है :
सरकारी चश्मा :तुमने काला चश्मा और रंगीन शर्ट क्यों पहन रखी थी ? क्या पता नहीं कि इससे सामने वालारंगहीनहो जाता है और साफ़ चीज़ें धुंधली दिखती हैं।ऐसा परिधान डिप्रेशन को भी बढ़ावा देता है।इसने पूरी आचार-संहिता को अचार के डब्बे में डालने का काम किया है।तुम ने ऐसा भीषण कृत्य आखिर किया क्यों ?
काला चश्मा:हुज़ूर,यह तो हमारा मौलिक रंग है।हमारा रंग भले काला है,पर इससे सब कुछ साफ़-साफ़ दिखता है है।इसकी सबसे बड़ी क्वालिटी है कि यह एंटी-चौंध है,जिससे हमारी आँखें चुंधियाती नहीं हैं।वैसे भी चकाचौंध तो जनता को दिखाने के लिए होती है,हम तो आपके ही अंग हैं।
सरकारी चश्मा :तुम हमारे अंग हो तो हमारी नज़र से देखो ना ! खुद को दूसरों की नज़र से देखना हमें कतई पसंद नहीं है।हम काली चीजों को इसलिए भी पब्लिकली पसंद नहीं करते क्योंकि जनता काले रंग को लेकर बड़ी संवेदनशील है।उसे तुरत ही काले-धन व काली करतूतों की याद सताने लगती है।यह प्रोटोकॉल का सरासर उल्लंघन है।
काला चश्मा : पर सरकार,इससे प्रोटोकॉल का किस तरह उल्लंघन होता है,समझ नहीं पा रहा हूँ।
सरकारी चश्मा : हमने यह चश्मा ही नहीं,बाल भी धूप में सफ़ेद नहीं किए हैं।जिस समय पब्लिक को सब कुछ निखरा-निखरा,साफ़-सुथरा दिखना चाहिए,उस वक़्त तुम सरेआम उसे काले और सफ़ेद में भेद करना सिखाते हो।तुमकाला-कालादिखाकर उसका ध्यान डायवर्ट करना चाहते हो ?
काला चश्मा : साहेब,हमें काले-सफ़ेद के बारे में इतना नहीं पता था।हम केवल आपके लेवल तक आकर आपसे सामंजस्य बिठाने की कोशिश भर कर रहे थे।इस नाते हम तो आप का ही विस्तार कर रहे थे,हुज़ूर !
सरकारी चश्मा: देखिए,हमारे विस्तार की चिन्ता मत करिये।इसके लिए हमारीसेल्फी-डिप्लोमेसीबखूबी काम कर रही है।हमने आते ही जनता को रंगीन चश्मे बाँट दिए थे।फ्रेम जनता का है और लेंस हमारा।अब जो हम दिखायेंगे,जनता वही देखेगी।जो हम सुनायेंगे,जनता वही सुनेगी।यह हमारी सरकार में पहली बार हुआ है कि जनता नियमित रूप से देख-सुन रही है।उसे किसी आपदा से कोई परेशानी न हो,इसके लिएमन की बातका भी ख़ूब स्टॉक भर लिया गया है।पब्लिक के नैन-सुख के लिए हम बार-बार विदेश-यात्रा पर जा रहे हैं और सेल्फी पोस्ट कर रहे हैं।
काला चश्मा:हाँ,हुज़ूर ! सुना है कि चाइना में ली गई सेल्फी को जुकरबर्ग साहब ने भी लाइक किया था ! क्या यहमेक इन इण्डियाका ही कोई उपक्रम है ?
सरकारी चश्मा:नहीं,यहग्लोबल फ्रेंडशिपका बड़ा प्रोजेक्ट है।इससे सारी दुनिया इसी पर चर्चारत हो जाती है और हम अपना टूर आसानी से पूरा कर लेते हैं।पहली बार किसी सरकार को विदेश में घोड़ा गिफ़्ट में मिला है,अब अगली सेल्फी उसी पर चढ़कर पोस्ट की जायेगी।अब तुम सामने से हटो क्योंकि हमें अगले टूर को ओके करना है।


बुधवार, 20 मई 2015

शर्म का सालाना जलसा !

एक साल पूरा होने पर सरपंच जी ने पंचों की बैठक बुलाई। सर्कुलर में साफ़ लिखा था कि कृपया अपनी शर्म साथ लाएँ,जो एक साल पहले तक उनके पास थी। पंच यह जानकर घबरा उठे कि बीते साल में तो उन्हें कुछ करने ही नहीं दिया गया, इस वज़ह से शर्म का भारी स्टॉक इकठ्ठा हो गया है पर बताएँ कैसे? कहीं ऐसा न हो कि यह सुनते ही उनकी नई नवेली शर्म को सरपंच जी खुदई न अपना लें।


इन पंचों में कुछ ही नए थे, बाकी पुराने घाघ और अव्वल क़िस्म के प्रपंची थे । नियत समय पर पंच इकट्ठे हुए तब सरपंच ने मन की बात शुरू कर दी।


लगभग दो घंटे तक बात-वमन करने के पश्चात सरपंच जी पंचों से अलग-अलग मुखातिब हुए ।



सरपंच:दुखमा जी, आप बताइए पिछले एक साल में आपने ऐसा क्या किया है जिस पर आपको दु:ख हो ?



दुखमा :हुजूर, जो कुछ भी किया है, आपने किया है। आपने मेरा इतना ख्याल रखा है कि हमने अपने दु:ख की तरफ़ मुड़ के देखा तक नहीं। जिधर भी नजर जाती, आपकी सेल्फी देखकर संतोष हो जाता। मैं अपनी जगह पर बिलकुल ठीक हूँ। किसी भत्ते की कमी का भी दु:ख नहीं है, सो बताऊँ क्या?



सरपंच :ओके, पोटली जी, आप अपने अनुभव शेयर करिए?



पोटली :सरकार! शेयर बाजार हमारे कंट्रोल में है। रुपया और आम आदमी अपनी औक़ात में आ गए हैं। मौसम केजरीवाल हो गया है। दिल्ली की बाक़ी ख़बर जगन्नाथ जी के पास है। फिलहाल हम पिछले साल से खूब खुशहाल हैं, तो जाहिर है कि जनता भी होगी।




सरपंच :बिलकुल ठीक। आय एम प्राउड ऑफ़ यू! हाँ तो बताइए जगन्नाथ जी, दिल्ली आई मीन देश के अंदरूनी हाल क्या हैं? बात यह है कि मैं पिछले दो घंटे सत्ताइस मिनट से यहाँ हूँ, मुझे जल्द रपट चाहिए!




जगन्नाथ :देश की तो चिंता को नी करो आप।आप बाहर ढोल, सारंगी बजाते रहें, हम सब मिलकर यहाँ बैंड बजा रहे हैं। रही बात दिल्ली की,स्थिति नियंत्रण में है। परेशानी इतनी भर है कि हमारी जंग अपनी ही बिरादर-भाइयों से है। वे बड़ी बढ़िया नौटंकी खेल रहे हैं पर पर हम आपको आश्वस्त करते हैं कि आपके रहते हम उन्हें जीतने नहीं देंगे।



सरपंच :और गणपूर्ति जी आप ! क्या अनुभव रहा एक साल का?



गणपूर्ति :सर, देश में माल की कोई कमी नहीं है। हम माँग से ज्यादा आपूर्ति कर रहे हैं। अब तो ड्राइवर ने ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं कि कुछ बुरे दिनों के लिए भी बचाकर रखा जाये। इस समय तो वैसे भी अच्छे दिन चल रहे हैं।




सरपंच :ठीक है फिर सारे लोग अपनी-अपनी सेल्फी कुछ इस तरह से लें कि सबके पेट आड़े आ जाँय। जनता को भी तो लगना चाहिए कि हम कित्ते शर्मीले हैं!





बुधवार, 13 मई 2015

भूकम्प से गुजरते हुए !

लो जी,फिर आ गया भूकम्प।बड़ी मुश्किल से फिर अपनी जान बचा पाए ! लगता है यह किसी दिन हमारी इकलौती जान लेकर ही रहेगा।जिस तरह से हर दूसरे-तीसरे दिन यह आ धमकता है,उससे तो लगता है कि इसके पास भी और कोई काम नहीं है।हम तो आराम से तीसरी मंजिल पर बैठे दोस्तों के संग गप्प मार रहे थे,तभी नीचे से ‘भूकम्प,भूकम्प’ की आवाज सुनाई दी।तस्दीक करने के लिए हमने तुरंत फेसबुक खोला,तो सबके स्टेटस हिलते हुए नज़र आये।पक्का हो गया कि भूकम्प आया है।हम कमरे से बाहर जल्दी से निकलने लगे तो एक साथी ने कहा ,’भाई ज्यादा परेशान न हो।तुम सीढ़ियों से नीचे देर में पहुँचोगे,भूकम्प उससे पहले तुम्हें नीचे पहुँचा देगा।’इतना सुनते ही हम वहीँ ठिठक गये।

हमारे दिल की धडकन को उस समय मापा जाता तो बिलकुल वही रीडिंग आती,जो रिक्टर-स्केल मापता है।जो दिल पहले सामान्य-सा होता है,कई बार तो केवल भूकम्प की तीव्रता जानकर ही कांपने लगता है।इसलिए भूकम्प की खबरें सुनने से मैं बचता हूँ।धरती भूकम्प से जितना नहीं थर्राती,उतना तो चैनल वाले भूकम्प की पिछली तस्वीरें दिखाकर हिला डालते हैं।इससे भी अधिक डराने का काम फेसबुक करता है।झुमरीतलैया से लेकर अंडमान निकोबार तक सारी धरती डोलती नज़र आती है और हर आदमी भूकम्प का चश्मदीद।भूकम्प से बचने का तरीका तो सब बताते हैं पर इनसे कैसे बचा जाए,कोई नहीं बताता।

पहले सलमान को बेल मिलने से हिन्दुस्तान की मीडिया में भूकम्प आया,फिर अम्मा की रिहाई पर पूरे दिन आता रहा।कोई इसे न्याय-व्यवस्था पर भूकम्प बता रहा था तो कोई पॉवर और पैसे के डेडली-कॉम्बिनेशन को।इसके बाद आज फिर असल भूकम्प आ गया।अब इस पर परिचर्चा होगी।ग्लोबल-वार्मिंग पर चिंता जताई जाएगी और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जायेगा।

भूकम्प के इस तरह हमारी जिंदगी में आये दिन दखल देने से खुद भूकम्प की महत्ता घट रही है।पहले कभी दस-बीस साल में ऐसी खबरें आती थीं,अब दस-बीस मिनट में।शायद खबरों को भी बने रहने के लिए ऐसे भूकम्प आने ज़रूरी हैं।हमारे दिल की धड़कन सामान्य रहने से न चैनल वालों का भला है और न ही सरकार का।हम तो सरकार से आग्रह करते हैं कि दाऊद को चाहे पकड़े या न पकड़े,पर इस भूकम्प का ज़रूर कुछ करे।

गुरुवार, 7 मई 2015

मंगल जाओ,सब भूल जाओ !

मंगल ग्रह पर जाने वालों के लिए एक और खुशखबरी।वहाँ जीवन के चिह्न मिलने के बाद से कई लोगों ने कॉलोनी बसाने और कुछ ने प्लॉट काटने का मंसूबा पहले से ही तैयार कर रखा है पर इधर एक नया शोध आया है,जो मंगल की खूबसूरती में आठ चाँद लगा देगा।शोध-पत्र कहता है कि मंगल में कुछ दिन प्रवास करने पर व्यक्ति की याददाश्त जा सकती है।वह पुरानी सभी बातें भूल सकता है।इस चमत्कारिक प्रभाव के प्रकाश में आने से क्या आम आदमी,क्या नेता,सभी की बांछें खिल गई हैं।

सोचिए,यदि ऐसा हुआ तो क्या होगा ? पृथ्वी पर नाना दुखों से बेजार आदमी एक बार मंगल जाकर अपने गमों से पूरी तरह से निजात पा सकता है।आम आदमी सरकार बदल कर और नेता पार्टी बदल करके भी बड़े दुःख में जीते हैं।स्वयं सरकार ढेर सारे वादे कर आग के मुहाने पर रोज़ दहकती रहती है।ऐसे में मंगल-आइडिया सबके काम का है।ट्रैवेल एंड टूर कम्पनियों का बिजनेस ख़ूब चमक सकता है।डूबती हवाई कंपनियों के शेयर अंतरिक्ष तक पहुँच सकते हैं।व्यक्तिगत समस्याओं से आजिज लोग परिवार सहित मंगल की सैर कर सकते हैं।पत्नी से पीड़ित पति या पति की बेवफाई से दुखी पत्नी दोनों मंगल ग्रह पर जाकर शांति पा सकते हैं।हाँ,इस दौरान बच्चों को वहाँ न ले जाएँ ,नहीं तो वे अपने माँ-बाप को भी भूल सकते हैं।

सबसे लाभकारी स्कीम वे नेता उठा सकते हैं,जो सरकार में होते हैं।चुनाव से ऐन पहले अपने मतदाताओं को मंगल घुमा कर पिछले सारे वादे साफ़ कर सकते हैं।मंगल-वापसी पर फ़िर वही वादे दोहराने पर किसी अनिष्ट की आशंका नहीं रहेगी।एक खास बात और होगी।नेताओं को रोज-रोज टीवी के आगे आकर अपना माफीनामा नहीं बाँचना पड़ेगा।मंगल से लौटा आदमी किसी माफ़ी की डिमांड ही नहीं करेगा।लम्बे-लम्बे टीवी सीरियल और लोकप्रिय फिल्मों का रीमेक बनाने वाले निर्माता भी दर्शकों को मंगल भेजकर नई कहानी के झंझट से बच सकते हैं।करोड़ों रूपये लगाने के बजाय ‘मंगल-रिटर्न’ उनकी झोली भर सकता है।दर्शकों को पचास साल के सलमान भी नए अभिनेता-सी फील देंगे।जिस पीड़ित को वर्षों से न्याय न मिल रहा हो,उसे मंगल की सैर करा के लम्बित पड़ा मामला जल्द सुलट सकता है।यानी सौ मर्जों की एक दवा।

सरकार अपने कर्मचारियों को एलटीसी पैकेज देकर मंगल पर भेज सकती है।इससे पब्लिक और सरकार दोनों खुश।दफ्तर भी खाली और जंतर-मंतर भी।
 

बुधवार, 6 मई 2015

आदमी और 'बादल' का बरसना !

पहले बादल बरसे,बेमौसम बरसे।कहा गया कि यह तो ईश्वर की लीला है।इस पर न किसी का ज़ोर है न वश।फ़िर भूडोल आया,जबरदस्त आया।कहा गया कि शेषनाग ने बस जरा सी करवट बदली है।इस पर भी किसी का वश नहीं।इसके बाद चलती बस से शैतानियत बरसी,इंसानियत मरी।फ़िर से कहा गया,’रब दी मर्जी है हम कुछ नहीं कर सकते ।आदमी बड़ा हलकान है।वह सरकार से लड़ सकता है।जंतर-मंतर जा सकता है पर भगवान से कहाँ जाकर लड़े ? उसका कोई एक ठिकाना भी तो नहीं।मंदिर में जाए तो पुजारी अड़ जाता है।मस्जिद में जाए तो मुल्ला भिड़ जाता है।चर्च में पादरी तो गुरूद्वारे में ग्रंथी उसकी राह रोक लेता है।

सरकार से बेबस आदमी बरसना चाहता है पर किस पर बरसे ? उसके बरसने के सारे रास्ते बंद हैं।बात जब ईश्वर की आ जाती है,सरकार भी बे-बस हो जाती है।बस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है पर जनता पूरी तरह उसके वश में है।सुरक्षा-व्यवस्था चाक-चौबंद है।अपराधी सरपट भाग रहे हैं।सरकार के पास बस तो है पर वह बेबस है।ईश्वर की मर्ज़ी के आगे बड़े-बड़े बे-बस हो जाते हैं।शायद ऐसे ही लोगों को मौक़ा मिलने पर जनता पैदल कर देती है।पर अभी वह खुद पैदल है और सरकार के पास बस है।मगर सरकार भी क्या करे ? उसने साफ़ कर दिया है कि बस की स्टेयरिंग ईश्वर के हाथ में है और वह नामुराद इन दिनों जरा कुपित है।

आदमी बसमें है,सरकार को यह जानकारी है।यही उसके अख्तियार में है।उसके बे-बस होने की न तो उसके पास पुख्ता खबर है और न ही उस पर उसका ज़ोर है।बस की मालिक सरकार भले है पर उसमें सफ़र करते सामानका मालिक ऊपरवाला है।बस में लिखा भी होता है,’सवारी अपने सामान की रक्षा स्वयं करे।ऐसी स्पष्ट उद्घोषणा के बाद भी यदि कोई बादलपर बरसता है तो यह सर्वथा अनुचित है।बादल पर न कोई गरज सकता है न ही बरस।यह काम बादल का ही है।संकट के बादल दूसरों पर ही छाते हैं,इसलिए उन्हें डरना चाहिए जिनके पास अपने छाते नहीं है।सरकार के पास उसका बना-बनाया छाता है:ईश्वर की मर्ज़ी,इसीलिए सब उसके वश में हैं।

प्रतिकूल मौसम में बादल बरसना दुखदायी होता है।इसमें सरकार या उसके कारिंदों का दोष नहीं है।ईश्वर की मर्ज़ी से जब एक पत्ता तक न हिलता हो,इतने बहुमत से आई सरकार भला कैसे हिल सकती है ? मगर नादान परिंदों को क्या पता ! वे तपती दोपहर में काले बादल से एक बूँद की उम्मीद लगा बैठे हैं।उन्हें घाघ की कहावत नहीं याद कि काला बादल जी डरवावे,भूरा बादल पानी लावे।उन्हें तो यह भी नहीं पता कि सरकारी-बादल के पास जीवित प्राणियों के लिए केवल कहर है।हाँ अगर कोई मर-मरा गया तो मुआवजे की एक बूँद टपकाने में रत्ती-भर की देरी नहीं होती।फ़िर भी आप बादल से उम्मीद लगाये बैठे हैं तो गलती किसकी है ?