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गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

जाते हुए के साथ जाना !

यह साल बीत गया और इसके साथ आए कई उबाल भी।सम्मान अपमान बन गया और असहिष्णुता नया हथियार।इस साल दाल ने बड़ा कष्ट दिया पर जाते-जाते खुद ही निपट गई।उसकी हालत ऐसी हो गई है कि अब उसकी कोई बात भी नहीं करता।समस्याएं ऐसे भी खत्म होती हैं।ड्राइंग रूम के सोफे में पसरकर प्राइम टाइम में जो दिखाई दे,वही समस्या।हर दिन खबर बदल रही है।साल बदलने के साथ बीते साल की सारी मुश्किलें खुद-ब-खुद खत्म हो लेंगी।


बगदादी पूरे साल बरगद की तरह छाया रहा।इससे इतना तो पता चला कि विकसित देशों के अलावा विकास और कहाँ-कहाँ है।कहा यही जाता है कि वह स्वयं विकसित देशों द्वारा किया गया विकास है।विकास तभी समझ में आता है जब सर्वनाश शुरू होता है।दिल्ली का ट्रैफिक तभी सामान्य होगा,जब यह विकास को पूरी तरह पहचान लेगा।सरकारों के हाथ-पाँव तभी सक्रिय होते हैं जब पानी खतरे के निशान से ऊपर चला जाता है।यह अलार्म किसी ने बहुत पहले फिट कर दिया है।इसलिए समय से पहले काम न करने का दोष किसी पर नहीं।सब निर्दोष हैं,सिवा ज़ालिम जनता के।

नए साल में दिल्ली सम-विषम के फार्मूले के बीच झूलेगी।पढाई के दौरान जो लोग हिसाब में कमजोर रहे हैं,उनके लिए मुसीबतें शुरू होने वाली हैं।ऐसा भी नहीं है कि नए साल में हिसाब-किताब में कमजोरों के पल्ले बस मुसीबतें ही आने वाली हों।हर दूसरे-तीसरे दिन रेलभाड़े में हो रही बढ़ोत्तरी हिसाब में कमजोरों के लिए वरदान की तरह है।जो रोज किराये का हिसाब लगाकर सरकार के लिए मातमपुर्सी करते हैं,वे डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं।इसलिए बीते साल की ऐसी-वैसी बातें उसी के साथ बीत जाएँगी।पीछे मुड़कर देखना वैसे भी समझदारी की बात नहीं मानी जाती ।

बीते साल में जो आतंक था,नए साल की आहट में वह शान्ति का प्रतीक हो गया।देशद्रोह राष्ट्रप्रेम में और निंदनीय कृत्य ‘मास्टर-स्ट्रोक’ में तब्दील हो गया।ऐसे साल का बीतना भला जिसने दोस्त को दुश्मन बना दिया था।पुराना वक्त और पुराने बयान विकास की राह में बाधक होते हैं।इसलिए ‘बीती ताहि बिसार दे’ के मन्त्र का समय है।

नये का स्वागत है क्योंकि इसके साथ स्पेस होता है और बाज़ार भी ।आगे तीन सौ पैंसठ दिन पड़े हैं।पिछले संकल्प और टारगेट स्वतः एक्सपायर हो जाते हैं।आओ नए साल के लिए नए संकल्प बना लें।जो बीत गया,उसकी क्या बात।अस्त होते सूरज को कोई सलाम करता है भला ?

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

नायक का बचना जरूरी है!

नायक सदैव हँसता है।रोने वाला नायक नहीं होता।वह स्वयं न्याय करता है,किसी से याचना नहीं।नायक हमेशा निर्दोष होता है और ‘न्यायप्रिय’ भी।हमारे सपनों का आधार यही नायक होता है।क्रान्तिकारी कवि पाश बड़े दूरदर्शी थे।तभी शायद उन्होंने इसी दिन के लिए कहा था,’खतरनाक होता है सपनों का मर जाना’।इसलिए सपने नहीं मरे।नायक बच गया।नायक कभी मरते भी नहीं।

जो मरे वे पहले से ही मरे हुए थे।फुटपाथ पर चलने वाले मनुष्य नहीं होते।जो चलते हैं और गतिमान हैं,वे ही मनुष्य हैं।इंसान की चाल से अगर यह दुनिया चले, तो सदी दो सदी तो दूर की बात है,दो कदम भी आगे न बढ़े।आधुनिक मनुष्य के बूते ही हम हवा में रॉकेट से और धरती में बुलेट ट्रेन से चलने लायक हुए हैं।सड़क की खूबसूरती उस पर पैदल चलकर नहीं बढ़ती।सड़क का तारकोल हहराती आती लैंड क्रूजर और बलखाती बीएमडब्लू की गर्मी पाए बिना पिघलता भी नहीं।ऐसे में ठिठके हुए इंसानी कदम विकास की राह में केवल बाधक ही बनते हैं।

नायक बचा है तो सब कुछ बचा है।सब कुछ में सबसे पहले बाज़ार समाहित है।करोड़ों रुपए जो दाँव पर लग जाते,अब जेबों के अंदर होंगे।फिजा खुशनुमा होगी और मंगलगीत गाए जायेंगे।जो मर गया,उसे मुक्ति मिल गई।भूख से भी और जिल्लत से भी।एक नायक के बचने से बहुत कुछ बचा रह गया।मल्टी-प्लेक्स की कतारें और लम्बी हो गईं।ईद और दिवाली की रिलीज़ सुनिश्चित हो गई।दोनों त्यौहारों को रिलीफ मिली।लोगों को साफ़ हवा मिले न मिले,बुद्धू बक्से के विज्ञापन को अधिक से अधिक एयर-टाइम मिल गया।इस सबसे बड़ी बात कि नायक के चाहने वालों को ख़ुदकुशी से बचा लिया गया।सर्वत्र शांति पसर गई है;उस इंसान के घर में भी जो सड़क की पटरी पर सुकून की तलाश में चला आया था।

कानून को अँधा कहा गया है पर वह देख नहीं पाता यह बात गलत है।तमाम गवाहों और बयानों की रोशनी में उसे इतना दिखाया जाता है कि बस मतलब भर का दिखाई दे जाए।यह काम उतनी ही कुशलता से सम्पन्न होता है जितनी उम्दा सर्चलाइट होती है।टिमटिमाते हुए दिये की रोशनी से इन्साफ जैसी भारी-भरकम चीज़ दिखेगी भी कैसे ?अब कुछ लोग चाहें तो जंतर-मन्तर या इण्डिया गेट पर दो-चार मोमबत्तियाँ जला सकते हैं।कम से कम इतना तो अभी बचा हुआ है।

सजा की भी अपनी हनक होती है।नायक और अधिनायक को मिली हुई सजा उनके लिए वरदान में बदल जाती है।पहले से हिट नायक सुपरहिट हो जाता है।हारा हुआ अधिनायक ‘भारत भाग्य विधाता’ बन जाता है।इसी को कहते हैं कि पारस लोहे को भी कुंदन बना देता है।नायक और अधिनायक पारस की दुर्लभ बटिया जैसे हैं।इसलिए सजा भी उनसे मिलकर निहाल हो उठती है।सुंदर चेहरे पर बना तिल दाग नहीं सौन्दर्य कहलाता है।यह अंतर जिसे समझ में नहीं आता,वही विवाहोत्सव में रुदाली गाता है।

अंततः नायक बचा और हम सबकी लाज भी।यथार्थ में हमारा हासिल भले शून्य हो पर सपनों को तो हमें बचाना ही चाहिए।और सपने तभी बचेंगे,जब नायक बचेगा।एक तरफ एक के बचने पर पूरी दुनिया के बचे रहने की उम्मीद है,अर्थव्यवस्था की मज़बूती है और दूसरी तरफ एक हल्की-सी आह और पटरी पर लौटती मौत...सॉरी ज़िन्दगी।

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

सेल्फी-संक्रमित लोगों के बीच हमारी असहिष्णुता !

सत्ता में अकड़ न हो तो उसकी पकड़ भी नहीं रहती।ढीली-ढाली दिखने वाली सरकार का प्रशासन तो ढीला रहता ही है ,उसकी ढंग की सेल्फी भी नहीं आ पाती।जैसे डंडे वाली सरकार बड़ी कारसाज मानी जाती है,वैसे ही स्टिक वाली सेल्फी सबसे कारगर।अब सेल्फी है तो सरकार दिखती है।जहाँ सरकार और सेल्फी दोनों एक साथ हों,ऐसा ‘संजोग’ दुर्लभ होता है।इस तरह के मौके को कोई छोड़ता है भला ! मीडिया चौथा खम्भा है।उसने यही खम्भा सरकार के काँधे से टिकाया हुआ है बस।खम्भे की मजबूती उसके टिके रहने तक ही है।इसलिए यह खम्भे की अतिरिक्त जिम्मेदारी है कि वह सरकार को अपने कंधे पर उठाए रहे।इससे मीडिया की सेल्फी भी निखरकर आती है ।पोज़ के बहाने ‘पोल’ दिखती है.

सेल्फी कैमरे का शॉट भर नहीं है।वह हमारा अन्तःचित्र है,हनक है।हर आदमी अपने को अभिव्यक्त करना चाहता है।जब उसके पास शब्द न हों या कमजोर हों तो उसका दिखना बड़ा काम करता है।बड़े नेता या कलाकार के साथ की सेल्फी अपनी हैसियत बयान करती है।बिना कुछ कहे सामने वाला ‘फ्लैट’हो जाता है।सब एक-दूसरे को इसीलिए रौंद रहे हैं।सूखी फसलों और भूखी देहों के साथ कोई नहीं सेल्फियाना चाहता।ऐसी लोकेशन में दाल-रोटी के अनावश्यक मसले मूड बिगाड़ते हैं।इसीलिए सेल्फी के लिए सबसे सुरक्षित और नयनाभिराम जगह लुटियन ज़ोन है।यहाँ किसी तरह के सवाल नहीं किये जाते।उत्तर सब चेहरों पर छपे होते हैं पर उनको पढ़ने की तमीज अमूमन सबमें नहीं होती।

सेल्फी-संक्रमित व्यक्ति से आम जन को दूर रहना चाहिए।आत्ममुग्धता से लैस आदमी मिनटों में सामने वाले को अपने आभामंडल से ढहा सकता है।जिनके पास ऐसी आभा नहीं है और संक्रमित होने के इच्छुक होते हैं,वे किसी न किसी बहाने अपनी अंतिम इच्छा पूरी कर लेते हैं।कोई भी नैतिक मिशन इसके आड़े नहीं आता।

ऐसे ही एक सेल्फी-संक्रमित पत्रकार से भेंट हो गई।मैंने कहा-यह बहुत खतरनाक प्रवृत्ति है।पत्रकार को सरकार और सत्ता से दूर रहना चाहिए।कहने लगे-आप पूर्वाग्रही हैं और परले दरज़े के पाखंडी भी।हम सरकार और सत्ता से दूर रहेंगे तो आपको इनके नजदीक कैसे लायेंगे ?सरकार आम आदमी से जुड़ना चाहती है।वह अकेले कहाँ-कहाँ जाएगी? हम सब संक्रमित होंगे,तो सरकार की सोच का ही विस्तार होगा।आइए,हमसे लिपटकर सहिष्णु हो जाइए !

हमने अपनी असहिष्णु-काया को सम्मानित-शाल से ढकते हुए उनसे हाथ मिलाया।मौका पाते ही उन्होंने एक ज़ोरदार सेल्फी खींच ली और बोले-आज की ब्रेकिंग न्यूज़ मिल गई है !

रविवार, 29 नवंबर 2015

सोशल मीडिया में 'दंगल'!

‘दंगल’ की रिलीज सिनेमाघरों से पहले सोशल मीडिया पर हो गई है।लोग फेसबुक और ट्विटर पर बने बंकरों से फ़िल्मी नायक पर गोले दाग रहे हैं।अभिनेता सीरियाई युद्धक्षेत्र-सा बन गया और रूस और नाटो की सेनाएं उस पर टूट पड़ी हैं।सोशल मीडिया के ‘दंगल’ में हिस्सा लेना सबसे सुरक्षित और आसान होता है।इसके लिए न तो हथियारों के लिए किसी और पर निर्भर रहना होता है और न ही किसी लाइसेंस या सेंस की ज़रूरत पड़ती है।जैसे ही कोई बे-स्वाद बयान आया,दन्न-से अपने मोबाइल को मिसाइल बनाकर दो-चार स्टेट्स और दस-बीस कमेन्ट से विरोधी खेमे को तबाह कर दिया जाता है।


यह तो बस मोर्चे पर पहुँचने की सूचना भर होती है।इसके तुरंत बाद अफवाह-लांचर से ‘दुश्मन’ के व्यक्तिगत रिकॉर्ड को ध्वस्त किया जाता है।पाताल से ऐसी-ऐसी सूचनाएँ प्रकट होती हैं कि सामने वाले की सात पुश्तें तर जाएँ।सोशल मीडिया पर आयोजित होने वाले ‘दंगल’ की खासियत है कि ‘बयानधारी’ की पूरी बनियान उधेड़ दी जाती है।अभिनेता तभी तक है जब तक वह अभिनय करता है।यदि उसने ‘रियलटी शो’ का संचालन करने का मन बना लिया तो उसे सात समन्दर पार पहुँचाने का मौका दिया जाता है।

बयानबाजी करना केवल संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों और नेताओं का काम है।कलाकार और साहित्यकार नाचने-गाने और कागज रंगने तक ही सीमित रहें।प्रकृति-विरुद्ध कोई भी काम उचित नहीं होता।कूकने वाली कोयल कांव-कांव नहीं कर सकती।यह काम कौवों के लिए ही मुफीद है।सोशल मीडिया के आने से कांव-कांव’ को बड़ा बल मिला है।क्रांति कभी कूकती नहीं,इसलिए जब ‘कांव-कांव’ की बाढ़ आती है तो क्रांति का संकेत मिलता है।यह असहिष्णुता नहीं है,नए समाज के संस्कार हैं,जो परिष्कृत रूप में सामने आते हैं।अब ‘जनमत’ यहीं बनता है और आपूर्ति के लिए तैयार होता है।

‘दंगल’ का सिनेमा हिट है और अभिनेता भी।असहिष्णुता हिट है और सरकार भी। बयान हिट है और जवाबी बयान सुपरहिट।यहाँ सबके ‘हिट’ होने के मायने भले अलग हों,पर समाज के ‘हिट’ होने का अर्थ एक ही है ।इस पर ज्यादा तवज्जो की ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि सबने अपने लिए नए समाज बना लिए हैं।वे इस पर सुबह-शाम या किसी भी वक्त मूंगफली या भुट्टा चबाते हुए अपनी आमद दर्ज़ कर सकते हैं।बिना अखाड़े में कूदे,प्रतिद्वंद्वी के बिना सामने हुए उसे पटखनी दे सकते हैं।ये इस ‘दंगल’ के नए विजेता हैं।

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

मँहगाई का ‘महागठबंधन’ !

सुनते हैं टमाटर फिर से लाल हो गया है।कुछ लोग इसी पर लाल-पीले हो रहे हैं ।टमाटर का गुणधर्म ही लाल होना है।वह तो केवल अपना धर्म निभा रहा है।वैसे भी देश में महागठबंधनकी सफलता की खबर उस तक पहुँच गई है।वह भी सरकार के खिलाफ प्याज,दाल और तेल के साथ महागठबंधनमें शामिल होना चाहता है।विकास का दौर है तो कोई क्यों पीछे रहे ?टमाटर विकास-यात्रा का नया राही है।
मँहगाई ऐसी-ऐसी जगहों से निकलकर आ रही है कि इसके खिलाफ मोर्चा भी नहीं बन पा रहा है।सरकार को भी इसके लिए कुछ करने की ज़रूरत नहीं पड़ रही।कोई न कोई चीज़ उसे राहत देने के लिए मैदान में आ जाती है।विकास की गाड़ी सरपट दौड़ रही है।बुलेट ट्रेन आने से पहले रेल-किरायों का लेवल भी वहाँ तक आना जरूरी है ।इसीलिए हर दूसरे-तीसरे दिन किराया अपने आप बढ़ लेता है।यात्री को किराए के तौर पर अहसास होना चाहिए कि वह ए सी क्लास में चल रहा है,भले ही कोच स्लीपर का हो।विकास धीरे-धीरे ही पटरी पर आएगा।इसमें समय लगेगा ।साठ साल की पुरानी  मालगाड़ी एकदम से राजधानीकी रफ़्तार नहीं पकड़ सकती।
खाने-पीने की चीज़ें मँहगी हो रही हैं,यह कहना गलत है।हमारी क्रय-शक्ति कितनी बढ़ गई है,इससे यह पता चलता है।विकास फटे-पुराने चीथड़े पहनकर नहीं आता।वह सूटेड-बूटेड होगा,तभी उड़ता हुआ दिखेगा।इसलिए अब विकास की दौड उड़ानमें बदल गई है।हवा में उड़ने के लिए भी तो ईंधन चाहिए।बस,सरकार उसी का जुगाड़ कर रही है।
टमाटर के दाम बढ़ गए हैं तो नूडल्स की तरह देसी सूपका पाउच लाया जा सकता है।इससे प्याज,दाल और टमाटर के महागठबंधनकी चुनौती से निपटा जा सकता है।आखिर सब कुछ सरकार ही तो नहीं करेगी।जनता को कुछ तो छोड़ना होगा।
प्याज,दाल,तेल और टमाटर सब मिले हुए हैं।यह गठबंधन घोर अवसरवादी है।ऐसे समय में जब सरकार विकास को विदेशों से घसीटकर लाने को कृत-संकल्प है,उसकी हौसला-अफजाई करनी चाहिए।इसलिए टमाटर पर लाल होने से पहले यह सोचें कि यह किसकी साजिश है।तेज भागती हुई  सरकार दाल-रोटी पर चिंतन करने लगेगी तो विकास-यात्रा क्या खाक़ होगी?



                

गठरी में लागा चोर !

धर्म अब अपनी विकास-यात्रा के अंतिम चरण में पहुँच चुका है।पहले धर्म-भीरु होने को ही धार्मिक होना मान लिया जाता था,अब धर्म-वीर यानी जेहादी ही धार्मिक है।धर्म-भीरु बड़े कायर किस्म का होता था।किसी भी प्रकार की हिंसा को पाप समझता था।भूल से चींटी भी पैरों तले आ जाती थी तो तीन दिन तक प्रायश्चित्त करता था।अब हिंसक होना वीरता की निशानी है।कागज के टुकड़ों में दर्ज धर्म को बचाने के लिए इंसानियत के टुकड़ों की दरकार पड़ती है।धर्म बलिदान माँगता है,शायद इसीलिए धर्म-वीर आत्मोत्सर्ग कर रहे हैं।पहले दूसरों की जान बचाने के लिए करते थे,अब लेने के लिए।

जिहाद धर्म की रक्षा के लिए तलवार ताने है।धर्म का कमजोर होना मंजूर नहीं है।धर्म पहलवान बनेगा तो बचेगा।इंसानियत दहशत में रहेगी तभी धर्म की छतरी सलामत रहेगी।धर्म अब जीवन शैली का नाम नहीं है,अस्तित्व की लड़ाई है।मानवता भले मिट जाए,पर धर्म जीवित रहना चाहिए।धर्म रहेगा तो जीने का मकसद भी होगा।दिल में बदले की आग होगी तो ज़िन्दगी सार्थक होगी।धर्म नहीं होगा तो यह सब कौन बताएगा ? इसलिए धर्म सुभीते का व्यापार हो गया है।

व्यक्तिगत जीवन सुधारना अब धर्म का काम नहीं रह गया है।वह अब राज्य और देश को बचाता है,मनुष्य को नहीं।मनुष्य बचकर भी क्या करेगा ? दूसरी वजहों से मर जाने से अच्छा है कि धर्म के नाम पर मर मिटा जाए।खुद न सही तो दूसरों को ही मिटाकर।धर्म-ग्रन्थों को पढ़कर धार्मिक बनना लम्बी क़वायद है।कलम और की-बोर्ड पकड़ना बच्चों का खेल है।धार्मिक बनने के लिए ज्ञान का नहीं आतंक का पाठ सीखना होता है।जो जितना बड़ा आतंक पैदा कर सकता है,वो उतना ही बड़ा धार्मिक बन जाता है ।

हमने किताबों में पढ़ा है,‘धर्मो रक्षति रक्षितः।अर्थात तुम धर्म की रक्षा करो,स्वयं रक्षित हो जाओगे ।आधुनिक पढ़ाकुओं ने इसे सही ढंग से समझा है।इसीलिये वे धर्म की रक्षा के लिए बम,गोली और मिसाइल से लैस होकर समर-भूमि में कूद पड़े हैं।धरती के कई जन-खंड केवल भूखंड बन गए हैं पर मजाल कि धर्म को जरा भी आंच आई हो! धर्म के आधुनिक रणबाँकुरों ने उसे एक कीमती सामान की गठरी में तब्दील कर दिया है।ऐसे में उसके लुटने और नष्ट होने की उम्मीद भी बढ़ गई है।अब तो हर तरफ से यही धुन सुनाई दे रही है कि तेरी गठरी में लागा चोर,मुसाफिर जाग जरा।पर मुसाफिर तो यही सोचने में लगा है कि गठरी स्वयं उसकी रक्षा करेगी।


सोमवार, 16 नवंबर 2015

पकड़ में डाॅन !

आज के समय में चोर-उचक्का होना बहुत बुरा है।पुलिस तो पुलिस पब्लिक तक हाथ-पैर तोड़ देती है।छोटी-मोटी हेराफेरी जहाँ जिंदगी तबाह कर देती है,वहीँ हवाला रैकेट चलाकर जेड प्लस सिक्योरिटी हासिल हो जाती है।एक ओर अपहरण और फिरौती का सतत अभ्यास जनतंत्र के मंदिर के कपाट खोल देता है वहीँ दूसरी ओर उठाईगिरी समाज से आपका सम्मान उठा लेती है।इसलिए करो तो कुछ बड़ा करो।गली के मुस्टंडे गुंडे नहीं देश-दुनिया के डॉन बनो।सफलता आपके कदम चूमेगी।चोर से एक अदना-सा सिपाही भी निपट लेता है और डॉन से बड़ी से बड़ी रणनीतियाँ पिटती और निपटती हैं।जेबकतरी,लूटमार आपको खतरे में डालती है पर आतंक और हत्याओं की जुगलबंदी आपको सेलेब्रिटी बनाता है।डॉन बाहर होता है तो राजनीति उपकृत होती है,अंदर होता है तो कारागार धन्य होता है।

डॉन पकड़ा नहीं जाता।वह अपने पकड़े जाने की बकायदा मुनादी करवाता है।जो पकड़ा जाए,वो डॉन नहीं।वह किसी चोर-उचक्के की तरह पांच या छह फीट का सींकिया पहलवान नहीं होता बल्कि गठीले किस्म का रोबदार रोल-मॉडल होता है।उसकी भूमिका सिनेमाई नायक या खलनायक जैसी होती है,किसी कॉमेडियन की तरह नहीं।छुटभइये से ‘भाई’ बनने का सफर ज्यादा लम्बा भी नहीं होता।पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं।किसी अपराधी को पकड़ने से पहले ही पुलिस को पता चल जाता है कि उसमें आगे बढ़ने की कितनी सम्भावनाएँ मौजूद हैं।पुलिस उन्हीं पर अपना हाथ साफ़ करती है जो छोटी-मोटी जेबें साफ़ करते हैं।लम्बे हाथ मारने वाले ‘माफिया’ श्रेणी में अपग्रेड हो जाते हैं।उनके ऊपर हाथ डालने में पुलिस के भी हाथ बंधे होते हैं।उठाईगीर इस मामले में पुलिस से पूरा सहयोग करते हैं।पुलिस भी इसलिए उनकी यथोचित आवभगत करती है।

चोर और डॉन का ट्रीटमेंट न एक सा होता है न हो सकता है।न पुलिस इच्छुक होती है न ही डॉक्टर।हट्टी-कट्टी देह पुलिस के संसर्ग में आते ही डायलिसिस पर आ जाती है।डॉन हमेशा हवाई रास्तों से आता है।बिजनेस क्लास में मुफ्त की डकार मारते और हवाई सुन्दरी से पेपर नैपकिन ग्रहण करते हुए वह सभी को कृतार्थ करता है।तमाम कैमरों के सामने एयरपोर्ट पर अवतरित होने के बाद कैमरों के फ्लैश देखकर ‘फ्लाईंग किस’ देता है।और इस तरह वह पूरी धज के साथ हमारी ‘पकड़’ में आता है।

वहीँ चोर-उचक्के और इलाकाई बदमाश परिवहन निगम की बस में खड़े-खड़े ही और मटमैले रूमाल से मुंह बाँधे हुए आ लेते हैं।हाँ,रास्ते में हवलदार साहब को उनका  साथ देने के लिए पकौड़े और जलेबियाँ ज़रूर बेमन खानी पड़ती हैं।उनके लिए अखबार में खबर का एक कोना भी बमुश्किल से नसीब होता है जबकि डॉन कई दिनों तक प्राइम टाइम के विमर्श को कब्जा लेता है।डॉन बाहर हो या अंदर,बाज़ार उसके साथ होता है।उसकी खबरों के प्रायोजक ‘भारत-निर्माण’ में लगी सीमेंट होती है।एक तरफ जेबकतरा अँधेरे कमरे में हवलदार से माँगी हुई बीड़ी सुलगाता है,वहीँ दूसरी तरफ डॉन विशेष कक्ष में मूंग की खिचड़ी में घी डालने की मनाही करता है।

डॉन का फिट और सुरक्षित होना सबसे ज़रूरी होता है।जो लोग उसके पकड़े जाने को लेकर जाल फैलाते और जान गँवाते हैं,वही उसकी चाक-चौबंद सुरक्षा में मुस्तैद हो जाते हैं।जो डॉन बाहर रहकर हमेशा चौकन्ना रहता है,पुलिस के हाथ लगकर आला दार्शनिक बन जाता है।चोर बमुश्किल इंसान होता है जबकि डॉन हिन्दू या मुसलमान होता है। चोर अपनी हैसियत के मुताबिक ‘थर्ड डिग्री’ से पास होता है जबकि डॉन न केवल सम्मान सहित उत्तीर्ण होता है,बल्कि राष्ट्रीय चैनल पर हमें दर्शन-सुख भी करवाता है।इसीलिए डॉन की पकड़ इतनी मानीखेज है।

बुधवार, 11 नवंबर 2015

लालटेन ने पॉवरहाउस में आग लगा दी !

बिहार में दीवाली से पहले दीवाली मन गई।कई तरह के पोल और पैकेज पर जनता ने पटाखे सुलगा दिए ।हवा किसी की थी,उड़ा ले गया कोई और।यह जनमत नहीं जादू-टोना है।महागठबंधन ने आँखों में धूल झोंक दी है।ई सब जरूर काला जादू सीखे हैं।कमल को खिलाने के लिए खूब कीचड़ किये,पर तीर बड़का छाती में धँस गवा।एक तरफ हाईटेक जनरेटर चलता रहा वहीँ दूसरी तरफ लालटेन की दिप-दिप रोशनी में मजमा लुटता रहा।गाय जंगलराज के खेत में विकास चर गई और भैंस अपने तबेला में फिर से मुँह मारने आ गई।लोग अब उस तांत्रिक को ढूंढ रहे हैं,जिसने सुशासन बाबू के कान फूँके थे।

अगड़ा,पिछड़ा,अति पिछड़ा सब बौरा गए।किसी ने विकास में रूचि नहीं दिखाई।विकास पर बड़ी-बड़ी टॉर्चें मारी गईं पर मतदाताओं की मति ही मारी गई थी।उन्होंने लालटेन की रोशनी में ही अपनी थाली में पड़ा दाल का पानी देख लिया।अपने डीएनए की रिपोर्ट भी दे डाली।बैलगाड़ी ने बुलेट ट्रेन को पछाड़ दिया।लगता है इससे इतनी ऊर्जा पैदा हो गई है कि पाटलिपुत्र मेल अब सीधे इन्द्रप्रस्थ जाकर ही रुकेगी ।

चुनाव नतीजों ने महाबलियों और बाहुबलियों का सारा बल उतार दिया।महागठबंधन को शठबंधन कहने वाले अब शब्दकोश में ‘सबक’ और ‘संकेत’ ढूंढ रहे हैं।भुजंग प्रसाद,शैतान,नरभक्षी और ब्रह्मपिशाच पर पाँच साल के लिए गर्द पड़ चुकी है।रैलीबाज विकास-यात्रा खत्म कर विलायत दौरे पर जा रहे हैं।हार की समीक्षा रेडीमेड रखी हुई है।यही कि भव्य-विकास की राह को जातियों की गोलबंदी और अवसरवादियों की एकता ने रोक दिया है।इस चुनाव से उनको अब तक यही सबक मिल पाया है।

वे पार्टी के असली ‘शत्रु’ हैं जो कहते हैं कि ताली कप्तान को तो गाली भी कप्तान को मिलनी चाहिए।भला ऐसा कभी होता है ! जीतने का नायक एक होता है,जबकि हारने पर पूरी टीम हारती है।यह नियम हर खेल में चलता है।इसीलिए ‘मैन ऑफ़ द मैच’ अकसर विजेता टीम से ही सामने आता है।खेल उनका है तो नियम भी उन्हीं के चलेंगे।वैसे भी जंग में सब जायज माना जाता है।

ये चुनाव संजीवनी वाले रहे।जहाँ सालों से बुझी लालटेन भक्क से जल उठी वहीँ सुन्न पड़े हाथ में भी हरकत शुरू हो गई है।एक तीर से कई शिकार हुए हैं।घायल शेर को घेरने के लिए हांका लग चुका  है।बेरोजगार हो चुके लोगों को रोजगार और अहंकार को आइना मिल गया है।फ़िलहाल,लालटेन ने पॉवर हाउस में आग लगा दी है।

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

लात नहीं सत्ता-प्रसाद है यह !

ऐसे कठिन समय में जब सब कुछ वापस किया जा रहा हो,एक खबर पढ़कर दिल को बड़ा सुकून मिला।खबर आई कि मंत्री जी ने एक बच्चे को एक रुपया मांगने के ‘अपराध’ में लात रसीद कर दी।इस ‘भारतरत्नीय-कर्म’ पर आपत्ति दर्ज करने वालों को पता नहीं है कि राजा जब भी अपनी रियाया के सामने अपना अनुराग दर्ज करता है तो वह अपने ‘पर्स’ की ओर नहीं निहारता,बल्कि सीधे उसका ‘परस’ कर लेता है।चुनाव से पहले जब वह उसके चरण-कमल धोकर पी सकता है तो चुनाव बाद वह उसे लात से क्यों न धोए ? बड़ों से लात खाकर अपने जीवन में आगे बढ़ जाने वाले हमने कई लोग देखे हैं।हो सकता है मंत्री जी के अंदर यही परोपकार का भाव रहा हो।वह इसके लिए हलफ़ तक उठाने को तैयार हैं।मंत्री का हर काम जनता की सेवा के लिए उठता है।इसी दिशा में उठाया गया कदम है यह।इसे लात कहकर उठाये गए नेक क़दमों का अपमान है।

दरअसल,मंत्री जी ने लात नहीं मारी,यह उनकी ओर से जनता को दिया गया सत्ता-प्रसाद है।वह तो एक अदना-सा जन प्रतिनिधि भर है जो अपनी अमूल्य निधि को,बिना सब्सिडी के,तन-मन-धन से जनता को समर्पित कर रहा है।ऐसा करने में उसके तन को जो कष्ट होता है,उसका तो वह मुआवजा भी नहीं वसूलता।सोचिये,जब उस प्रजापालक ने अपने चरण-कमलों को उस मैले-कुचैले और शुष्क-देहधारी बालक से‘परस’ किया होगा,उसके कोमल चरण कराह उठे होंगे।पर उन्होंने उफ़ तक नहीं की।इसके उलट जनता को तनिक भी कष्ट मिलता है तो महाकृपालु अपने खजाने (व्यक्तिगत तहखाने छोड़कर) खोल देते हैं और जी भर कृपा करने का सुख एन्जॉय करते हैं।

वैसे भी बड़ों से जो मिल जाय,थोड़ा है।इससे आगे यह भी हो सकता था कि प्रसाद पाने वाला उनके लात-घूँसे खाकर सीधा भूमि-पूजन करने लगता।मंत्री जी के पास समय का अभाव रहा होगा,नहीं तो यह कृपा भी सुलभ हो जाती।मंत्री जी के लात-प्रसाद का विरोध करने वाले इस बात से अनजान हैं कि उनके हाथ खाली नहीं हैं।सत्ता में आने पर दोनों हाथों से उलीचकर अपनी फसल की सिंचाई करनी पड़ती है।ऐसे में भला हाथ कहाँ से फुर्सत में होंगे ? सूखे का मारा किसान और भूखा नेता कोई भी कदम उठा सकता है।मंत्री जी ने फिर भी ‘एक कदम’ उठाया।इससे यह भी पता चलता है कि वे मंत्री जी गरीबों की सब्सिडी-योजना के विरोधी नहीं हैं।मंत्री जी का लात चलाना बिलकुल तार्किक है।ऐसा करके वे सत्ता के रंग को और निखार रहे हैं।यह भी हो सकता है कि वह बच्चा उनके ‘भारत-निर्माण’ अभियान के आड़े आ रहा हो !ऐसे रोड़े को राह से हटाना ज़रूरी होता है।बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस तरह के धतकरम भी ‘मिशनरी-कर्म’ में तब्दील हो जाते हैं।यही नया बदलाव है।

इसलिए लानत-मलामत करनी है तो उस लेखक की करिए,जो लिखना-पढ़ना छोड़कर समाज और राजनीति-सुधार में लगा है। उस कलाकार की करिए ,जो नाच-गाना छोड़कर देश के माहौल पर मर्सिया गा रहा है।नून-तेल-लकड़ी से आहत आत्माएँ सत्ता के चरण-कमल भी नहीं सह सकतीं,तो मानिए देश में घोर असहिष्णुता तारी है।

रविवार, 1 नवंबर 2015

पुताई का सूत्र !

दीवाली सिर पर हैं पर घर की दीवारें वैसी ही गंदी नज़र आ रही हैं।कई ठेकेदारों से सम्पर्क किया लेकिन बजट ऐसा कि बूते के बाहर।अभी पाँच दिनों की ऑनलाइन शॉपिंग से उबरा नहीं था कि श्रीमती जी ने तीखा बयान जारी कर दिया-अबकी दीवाली में साफ़-सफ़ाई बहुत ज़रूरी है।पिछले तीन सालों से टालते आ रहे हैं।अब तो सामने वाले गुप्ता जी ने भी रंग-रोगन करा लिया है।और कितनी भद्द पिटवाओगे ?’

इस बात को हमने दिल पर ले लिया।बात केवल सफ़ाई तक होती तो ढांपी जा सकती थी,पर एकदम सीधे इमोशन पर आ लगी।गुप्ता जी के रंग-रोगन ने घर में क्रान्ति के बीज बो दिए थे।इससे निपटना बेहद ज़रूरी था।पर जेब खाली थी और आगे दीवाली थी।दफ्तर से एडवांस लेकर ‘बिग बिलियन सेल’ और ‘दिल की डील’ में पहले ही शहीद हो चुका था।श्रीमतीजी की बात भी ठीक थी।सफ़ाई से अधिक जरूरी था कि हमारा खोया हुआ आत्म-विश्वास लौटे।इसलिए पड़ोसी गुप्ता जी के नाम की उलटी माला जपते हुए पार्क की ओर बढ़ गया।

पार्क में चार-पाँच लोग मिलकर एक निहत्थे पर लिपटे हुए थे।पास जाकर देखा तो उसके चेहरे को स्याही से पोत दिया था।हमने पूछा-भाई यह क्या कर रहे हो? एक ने उत्तर दिया-यह पिछले दो दिनों से राजेश जोशी की कविता बांँच रहा था।हम इसे कसकर पोतेंगे।‘पुताई से याद आया कि हमारे घर में भी सबसे ज़रूरी काम इस समय यही है।हमें ये लड़के बडे़ संस्कारी और परोपकारी किस्म के लगे।लगा कि हमारी समस्या का समाधान अब होकर रहेगा।

पुताई-अभियान का नेतृत्व करने वाले युवा से हमने अपनी परेशानी बताई।हम चाहते थे कि वे सभी उसी निस्पृह भाव से हमारी दीवारों को अच्छे रंगों से पोत दें।लड़के के चेहरे से देश का भविष्य टपक रहा था।उसने हमें अजीब नज़रों से देखा।अपने मिशन को तनिक विराम देते हुए वह हमारे बिलकुल पास आ गया।बोला-भाई साहब,आपको गलतफहमी हुई है।हम पुताई वाले बंदे नहीं हैं।यह तो देश-व्यापी साफ़-सफ़ाई अभियान में लगे हुए हैं।हमारा उद्देश्य जरा व्यापक है।‘

उसका जवाब सुनकर हम पर जैसे कालिख गिरी हो ! किस मुँह से गुप्ता जी के घर को फेस करूँगा।उससे फ़िर विनती की,’देखिए,आप लोग रंग पोतने में एक्सपर्ट मालूम पड़ते हैं।हमारे बदरंग घर को भी रोशन कर दें ,प्लीज़।’ लड़का समझदार था,हँसकर बोला-अरे भाई,हम सामान्य रंगरेज नहीं हैं।एक ही रंग का प्रयोग करते हैं और उससे दीवारें बोलती नहीं कराह उठती हैं।हमारे पास केवल कालिख है।हम इसका निःशुल्क वितरण करते हैं।जब कभी चेहरे पर कालिख पुतवानी हो,बता देना।लड़के भेज देंगे।'

हमारी आखिरी आशा भी धूल-धूसरित हो चुकी थी।पार्क से आगे बढ़े तो पड़ोसी गुप्ता जी टकरा गए।हम कुछ बोलते कि वे शुरू हो गए-और बताइए क्या चल रहा है लेखक जी ?’ हमने भी सँभलते हुए कहा कि बस पुताई के लिए...’बात बीच में ही काटकर वे पूछ बैठे,’आप भी कुछ लौटाने जा रहे हैं क्या? ज़रा ध्यान से।कहीं दीवाली में ही होली वाली कालिख न लगवा बैठना !’ मन ही मन हम सोचने लगे कि अपने ऐसे नसीब कहाँ,पर आत्म-विश्वास को बटोरकर बोले-नहीं गुप्ता जी,हम तो कबीर के अनुयायी हैं,बिलकुल फक्कड़।पुताई तो घर की करवानी थी,पर इस समय कोई खाली ही नहीं।’

गुप्ता जी हमारे और नज़दीक आए और फुसफुसाते हुए बोले,’मजदूर तो मिल रहे थे पर उनके रेट सुनकर हमने तो मना कर दिया।किसी और को न बताओ तो आपको भी इसकी जुगत बता दें?’ मरता क्या न करता।हमने उसी अंदाज में हामी भर दी।गुप्ता जी ने रहस्य खोला कि उनकी श्रीमती जी ने सुझाव दिया कि पिछले साल हमने कैमरों के सामने ख़ूब साफ़-सफ़ाई की थी तो इस बार अपने घर में क्यों नहीं करते ! बस हमने यह काम अँधेरे में कर लिया ताकि मुँह में कालिख न लग सके।चाहो तो आप भी यही फार्मूला अपना लें,पर किसी और को मत बताना।‘

हमने गुप्ता जी को गले लगा लिया।अब उसी सूत्र से सफ़ाई अभियान में जुट गए हैं।

बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

धीरज धरें,दाल-रोटी भी मिलेगी !

सरकार विकास करना चाहती है पर उसके विकास-पथ में सबसे बड़ी बाधा विरोध है।वह इधर काम में जुटती है उधर विरोधी उसे डिस्टर्ब करने लगते हैं।सरकार को मजबूरन बयान देती है। विरोधी इसी ताक में रहते हैं,वे उस बयान को ले उड़ते हैं। इस तरह मासूम बयान को खमियाजा भुगतना पड़ता है। हर चैनल पर उसकी तुड़ाई होती है।वह अपने बचाव में उतर आता है,स्वयं को तोड़-मरोड़कर सबके आगे प्रस्तुत करता है।विरोध को उस पर तनिक दया नहीं आती।आखिरकार बयान विकास के रास्ते में घुस जाता है। वहाँ विरोध की दाल नहीं गलती।

सरकार का रास्ता विकास का है जबकि असहिष्णु लोगों का विरोध का। यह विरोध भी केवल लुटियन जोन तक सीमित है।इसी से पता चलता है कि असहिष्णुता का रास्ता लंबा नहीं है।विकास का रास्ता लंबा है इसीलिए उसे पहुँचने में देरी हो रही है।सरकार विकास के लिए प्रतिबद्ध है।पर इसके लिए जनता को सहिष्णु होना चाहिए। जल, जंगल और जमीन पर सरकार की नजर है। नया विकास-पथ यहीं से होकर गुजरेगा।असहिष्णुता विकास-विरोधी और आभिजात्य-कर्म है।खाए-अघाए लोग ही इस समय 'बोलने का संकट' बता रहे हैं।गरीब, मजदूर और किसान अभी भी सरकार के 'मन की बात' सुन रहे हैं। उन्हें पता है कि कभी न कभी विकास रेडियो के रास्ते कूदकर बाहर आएगा। ऐसी सहिष्णुता से ही पिछले सत्तर सालों से देश चल रहा है।

सरकार को इन्हीं सहिष्णु ताकतों पर भरोसा है।मंहगाई, भ्रष्टाचार और मार-काट की बाधाएं उसकी राह में रोड़ा नहीं बन सकतीं।जो सरकार से सहमत नहीं हैं उनके लिए उसके पास पिछले कई उदाहरण हैं। वह काम से नहीं बयान से ही उन्हें चित्त कर देगी। कहा भी गया है कि 'जहाँ काम आवे सुई, कहा करै तरवारि'।
सरकार का मूल-मन्त्र है सबके प्रति सहिष्णु हो जाओ। इससे सरकार अपना काम करेगी और जनता अपना।दाल मँहगी है तो आलू खाइए। लुटियन जोन में रहने वाले आलू के चिप्स खाकर ही गंभीर विमर्श करते हैं।आप सहिष्णु बनिए।अभी तो' मन की बात 'के दो सौ छप्पन एपीसोड आने बाकी हैं। रास्ता लंबा है पर तय ज़रूर होगा। तब तक आँख-कान को आराम दीजिए,गाजर-मूली का स्टॉक करिए।सरकार विकास और बिहार से फुरसत पा ले,जादू-टोना सीख ले, फिर आपको दाल-रोटी भी खिला देगी।

लतियाने का साहित्यिक महत्त्व !

आलोचक-प्रभु जी प्रस्तर-पीठिका पर विराजमान थे।हमें देखते ही उन्होंने अपना दाहिना हाथ शून्य की ओर उठाया,मानो वे हमारी जड़ता को तोड़ने का संकेत दे रहे हों।उनका इतना स्नेह देखकर मैं अभिभूत हो गया।मेरी दृष्टि बरबस उनकी काया के सबसे निचले भाग की ओर ताकने लगी।मुझे ऐसा करते हुए प्रभु बोल पड़े,’क्या खोज रहे हो वत्स ? किसी गम्भीर तलाश में दिखते हो ! ’ मैंने चेहरे पर पूर्ण चेलत्व-भाव लाते हुए निवेदन किया,’प्रभु आपके चरणारविन्द कहाँ हैं ? मैं उन्हें स्पर्श कर अपना जीवन धन्य करना चाहता हूँ।आप जानते हैं कि जब तक मुझे आपके चरणों का संसर्ग नहीं मिलता,की-बोर्ड पर मेरी उँगलियाँ आगे नहीं बढ़तीं।’

प्रभु पक्के अन्तर्यामी ठहरे।हमारी विवशता तुरंत समझ गए और बोले,’वत्स ! चरण अभी खाली नहीं हैं।बड़ी दूर से ये कविश्री आए हुए हैं और चरणों पर स्नेह-अर्पित कर रहे हैं।इस बार की साहित्य-अकादमी इनके ही नाम बुक करवाई है।तुम तो मेरे गुणों के नियमित ग्राहक हो ।तुम्हारे लिए कुछ और मैनेज कर देंगे।तुम पहले तनिक विश्राम तो कर लो,फ़िर यह आवश्यक कर्म भी कर लेना।’ मैंने कहा,’प्रभु ! मैं बहुत चिंतित होकर ही आपके पास आया हूँ।इधर राजनीति से खबरें आ रही हैं कि बहुत ही खास और निकट के लोगों को लात मारकर आगे बढ़ाया जा रहा है।कहीं साहित्य इस मामले में पिछड़ गया तो ?’

‘नहीं वत्स,उसकी भी व्यवस्था मैंने सोच रखी है।साहित्य इस मामले में न पिछड़ने पाए इसके लिए हम प्रतिवर्ष लातोत्सव का आयोजन करने जा रहे हैं।जिससे सभी किस्म की लातें अपना हुनर दिखा पाएंगी।इससे यह फायदा भी होगा कि सबकी लातत्व-क्षमता देख-परखकर ही गुरु चुना जा सकता है।गुरु यदि ढंग से लतिया सकता है तो शिष्य भी मौका पाकर उसे अगूँठा दिखा सकता है।’आलोचक जी इतना कहकर हमारी ओर देखने लगे।हमने भी बिना मौका गँवाए पूरे समर्पित भाव से उनकी आशंका खारिज करते हुए कहा,’मेरी पीठ आपके लिए सदैव हाज़िर है।आप जैसे चाहें,उछलें-कूदें।यह पीठ आजीवन आपकी आभारी रहेगी।भविष्य की,सॉरी साहित्य की चिन्ता में मैं इस बार पिछवाड़े से कूदकर आया हूँ ।मेरी अंतिम इच्छा थी कि आप मुझे ही लतियायें,पर यहाँ तो कविवर पहले से ही लिपटे हुए हैं।’


आलोचक-प्रभु जी यह बात सुनकर थोड़ा चौकन्ने और सतर्क हो गए ।थोड़ा विचारकर कहने लगे,’राजनीति में लात मारने की कला से मैं अनभिज्ञ नहीं हूँ वत्स, पर वहाँ अभी भी इस क्षेत्र में पिछड़ापन है।साहित्य में ये विधा बहुत पहले से चलन में है।यहाँ तो आगे से ही लात का प्रहार किया जाता है जबकि राजनीति में अभी भी उसे पीछे से मारा जाता है।लतियाना साहित्य की मौलिक परम्परा रही है।हम इस विधा के अग्रदूत हैं तभी इतनी बड़ी पीठिका में चरण धरे हुए हैं।तुम्हारी चिन्ता व्यर्थ है वत्स ! यह कवि बहरा है।इसे अपनी कविताओं के अलावा कुछ सुनाई भी नहीं देता है।इससे आतंकित मत हो।’

अभी भी मेरे मन को पूर्ण आश्वस्ति नहीं हुई थी।मैंने प्रभु को कातर नेत्रों से देखते हुए उनसे याचना की,’पर मेरे मौलिक अधिकार पर किसी अन्य ने डाका डाल लिया तो चिन्ता तो होती है भगवन ! बिना आपके लतियाये मेरी साहित्यिक यात्रा आगे कैसे बढ़ पाएगी ?मैं तो अनाथ हो गया प्रभु !’

प्रभु ने सदा की तरह मेरे ऊपर अपना पूरा स्नेह निचोड़ दिया,बोले-‘वत्स ! मैं जो भी कर रहा हूँ,तुम्हारे कल्याणार्थ ही है।समय अब बहुत बदल गया है।इस क्षेत्र में प्रतियोगिता बहुत बढ़ गई है।इसलिए अच्छे परिणाम पाने के लिए चरणों में तेल-मालिश करवा रहा हूँ।इसके बाद लतियाने की गुणवत्ता चौगुनी बढ़ जाती है।हमें भी बुढ़ापे में अब सूखी लात मारने में बड़ा कष्ट होता है,इसलिए चिकने चरण मेरी और लात खाने वाली पार्टी,दोनों की सेहत के लिए मुफीद हैं।और हाँ,तुम चिन्ता मत करो,पहले प्रहार पर तुम्हारा ही अधिकार है।इससे तुम्हें वंचित नहीं करूँगा।कविवर सूखी लात खाकर ही सुखी हो जायेंगे।’

आलोचक-प्रभु जी के ऐसे स्नेहसिक्त वचन सुनकर मेरे नयन आर्द्र हो उठे।मैंने उनसे अगली साहित्यिक गोष्ठी के विमर्श के लिए निवेदन किया तो बोले,’अगली बार गोष्ठी प्रारम्भ होने से पहले ही अपने गुट के सभी सदस्यों को सामूहिक रूप से लतियाया जायेगा ताकि उनके अंदर के सभी मनोविकार अपने सहज रूप में बाहर आ जाएँ और आगामी लातोत्सव-प्रतियोगिता में बेहतरीन प्रदर्शन कर सकें।इससे सदस्यों में अतिरिक्त ऊर्जा का संचार होगा और वे बैठक में विरोधी गुट से लतिहाव करने की स्पर्धा में पिछडेंगे भी नहीं।’


इस बीच कविश्री ने कुछ पलों के लिए प्रभु के चरण छोड़े।मैंने इस स्वर्णिम मौके को झट से लपकते हुए उनके चरणों में अपनी पूरी काया समर्पित कर दी।प्रभु ने भी बिना मौका गँवाए,तेल-मालिश युक्त लात का मुझ पर ऐसा प्रहार किया कि मैं वहाँ से सीधे नगर के एक सम्मान-समारोह में जा गिरा।

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

हो गई है घाट पर पूरी व्यवस्था !

कल शाम प्रवक्ताजी मिले,बड़े गुस्से में थे।सरकार बनने के बाद ऐसा पहली बार था।पहले तो उन्होंने हमें घूरा फिर ऊपर से नीचे तक पूरा मुआयना किया। हमें सम्मान-हीन देखकर आश्वस्त हुए और बोले,’ इतने दिनों बाद ऐसी सरकार आई है और आपकी बिरादरी कुछ मांगने के बजाय वापस लौटा रही है..।यह हमारे खिलाफ साजिश है।’

हमने भी कहा,’हो सकता है कि कोई गहरी साजिश हो।इसकी जाँच कराई जाय कि जिन लेखकों के हाथ में कलम और कागज होना चाहिए उन्होंने अपने सम्मान-पत्र के गोले बनाकर सरकार पर कैसे फेंकने शुरू कर दिए।यह तो हद है ! प्रवक्ताजी बिफर पड़े,’हम पर उन्हें अपमानित करने का आरोप लग रहा है,जबकि सम्मान वापस करके उन्होंने स्वयं अपमान चुना है।अरे भाई,दोनों चीजें एक आदमी के पास कैसे रह सकती है ?वैसे साहित्य को सहिष्णु और तटस्थ होना चाहिए।इसके लिए हम उन्हें तट पर बैठाकर उनका पुनर्वास कर सकते हैं।वे अपने मनपसंद घाट चुन लें।’

हमने मामले को ठंडाने की गरज से उनके साथ चिन्ता साझा की,’आप सौ फीसद सही कह रहे हैं।पर सम्मान को अपमान में न बदला जा सके इसके लिए आपकी सरकार क्या कर रही है ?प्रवक्ताजी संयमित होते हुए बोले,’हमने एक योजना बनाई है कि जिस सरकार के रहते साहित्यकारों को सम्मान दिए जाएँ,उस सरकार के जाते ही वे सम्मान एक्सपायर हो जाएँ।इसमें इस विकल्प पर भी विचार हो रहा है कि दूसरी सरकार के दिए गए सम्मानों के लिए वर्तमान सरकार जिम्मेदार नहीं होगी।यह बात साहित्यकार के मान-पत्र पर ही चस्पा कर दी जाये।’

हमने ध्वनिमत से वह प्रस्ताव तुरंत पास कर दिया।सरकारी सम्मानों के लिए यह बेहतरीन योजना लगी।’साहित्यकारों को और क्या-क्या करना चाहिए,यह भी अगर सरकार द्वारा बता दिया जाय तो ऐसी स्थिति निर्मित ही न हो।नेताजी अचानक से चहक उठे,’इसीलिए हम आप जैसे लेखकों का सम्मान करते हैं।हम आम लोगों के खाने-पीने से लेकर बोलने-कहने तक सबके लिए एक नियम बनाने जा रहे हैं।’वेदों की ओर लौटें’ हमारे इसी प्रोजेक्ट का हिस्सा है।उनमें वर्णित बातें हमारे लिए कानून हैं।हम इसकी पालना सुनिश्चित करेंगे।’

‘पर एक अड़चन आ सकती है।हमारा संविधान कहीं इसके आड़े आ गया तो..?’हमने गम्भीर चिन्ता प्रकट करते हुए प्रवक्ताजी की ओर ताका।वे भी तैयार थे,कहने लगे,’संसद की संप्रभुता ख़तरे में है।ज़रूरी हुआ तो इस पर हम रोजाना ट्वीट करेंगे।’

इसके बाद हमारे सीने में उठ रहा दर्द कुछ शांत हुआ।

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

एक दिन का निदान !

आप किसी भी समस्या से परेशान हैं तो खुश हो जाएँ ।जल्द ही इसका समाधान निकलने वाला है।सरकार के हाथ ऐसी जुगत लग गई है जिससे समस्या कितनी भी बड़ी हो,उसका नैनो-हल उसके पास आ गया है।शहरों में ‘टेरेफिक’ होते हुए ट्रैफिक को ‘कार-फ्री डे’ मनाकर इसकी शुरुआत कर भी दी गई है।अब हमें तीन सौ पैंसठ दिन यातायात के बारे में नहीं सोचना है।साल में या महीने में एक दिन किसी एक सड़क को आम जनता के लिए खोला जायेगा।उस पर लोग अपनी साइकिल दौड़ा सकते हैं,गन्ने चूसते  हुए टहल सकते हैं और मनपसंद फ़िल्मी-गाने गुनगुना सकते हैं।उसी सड़क पर बने डिजाइनर गड्ढों में बच्चे एडवेंचर कर सकते हैं,कागज की नाव बहा सकते हैं और गप्पियों में कंचे खेल सकते हैं ।

अब धीरे-धीरे हर काम टोकन के जरिये किया जा रहा है।पहले पैसा पाने के लिए हुंडी तोडना पड़ता था या अँगूठे की छाप देना पड़ता था।अब मशीन में टोकन अंदर और पैसा बाहर।यानी बड़े तामझाम को एक टोकन में समेट लेना।इसी तरह दूध और पानी भी मिलने लगा है।ऐसा रहा तो ताज़ी हवा भी हमें टोकन के जरिये मिलेगी।इसके लिए बस एक ‘डे’ ही टोकन है।एक ही दिन में हम अपने फेफड़ों में इतनी हवा भर लेंगे कि पूरे साल भर तक रीचार्ज होते रहेंगे।

कामों को जल्दी करने और आसानी से करने की इस अनूठी योजना से प्रभावित होकर ‘संविधान-दिवस’ की तैयारी की जा रही है।हर समय संविधान को अपने हाथ में लेकर चलने वाले अब सावधान हो जाएँ।‘कानून-फ्री डे’ रोज मनाने वालों के लिए पाबंदी आयद की जा रही है।उन्हें अपनी जुबान और म्यान को काबू में रखना होगा।केवल एक दिन की ही तो बात है।इससे कानून से हताश और निराश लोगों को सरकार बड़ी राहट देगी।ऐसे ही मांसाहार से परेशान लोग ‘मांसाहार-फ्री डे’ की माँग करके मामला रफा-दफ़ा कर सकते हैं ।जानवरों को भी इससे संदेश जायेगा कि इंसान अभी भी जानवर नहीं बन पाया है।

यह ‘एक-दिनी’ आइडिया है गजब का।इससे उत्साहित होकर ‘लोकपाल-लोकपाल’ चिल्लाने वाले अब ‘भ्रष्टाचार-फ्री डे’ की माँग कर सकते हैं ।इस योजना से अफसरों और बाबुओं को भी ऐतराज नहीं होगा। इस एवज में उन्हें ‘ड्यूटी-फ्री’ नाम से भत्ता दिया जा सकता हैसरकार का भ्रष्टाचार पर वार करने का वादा ऐसे ही पूरा होगा।भ्रष्टाचार पर इतनी सब्सिडी तो हर कोई छोड़ देगा।हाँ,इसके बाद विकास कार्यों में किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़नी चाहिए,यह ज़रूर सुनिश्चित करना होगा ।

पहले एक दिन किसी संकल्प के लिए अलॉट होता था,अब किसी न किसी काम के लिए होगा।यह बदलाव बहुत बड़ा है।जमीनी-स्तर पर काम तो अभी शुरू हुआ हैवह दिन जल्द आएगा जब हर दिन किसी काम के लिए अलॉट होगा और केवल टोकन के रूप में किया जायेगा।रोजाना आ रहे एक से बढ़कर एक बयानों पर पाबंदी तभी लग सकती है जब इसके लिए एक दिन निश्चित कर दिया जाये।’बयान-फ्री डे’ होने से जनता का कुछ नुकसान तो होगा पर बयानबाजों को दुगुनी शक्ति के साथ रीचार्ज होने के लिए टोकन भी तो मिल जायेगा।उन्हें अब टोकने की नहीं टोकन की ज़रूरत है।

इससे पहले कि सारे दिन खत्म हो जाएँ,‘दुराचार-फ्री डे’,’लूटमार-फ्री डे’,’कदाचार-फ्री डे’ पर भी सबकी सहमति बन जानी चाहिए।

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

कालिख तेरे हाथ की!

जितना उजला और झक सफ़ेद हो,उस पर उतनी ही कालिमा फबती है।काले कारनामे में एक-दो बार कालिख और पुत गई तो क्या फर्क पड़ता है ! कालिमा इसीलिए सहज होती है और मौलिक भी।उजले और धुले वस्त्र अंततः कालिख की गति को प्राप्त होते हैं।कालिमा कभी भी धवल और उज्ज्वल नहीं हो सकती।काला रंग पक्का होता है और काले कारनामे भी।’काली कामरी’ सभी रंगों को आत्मसात कर लेती है,इसीलिए इसकी महत्ता है।सब इसीलिये इसे ओढ़ना चाहते हैं।

चेहरे पर कालिख पोतना अब केवल मुहावरा भर नहीं रहा।शिक्षित और विकसित होने का सबसे बड़ा प्रमाण-पत्र आज यही है।जो जितनी ज़्यादा कालिख पोत सकता है,वह उतना ही बड़ा क्रान्तिकारी और विचारक माना जाता है।केवल पढ़े-लिखे होने से कुछ नहीं होता जब तक कि आप व्यावहारिक रूप से वैसे कारनामे न करने लगें।परिवर्तनकारी होने के लिए अब बड़े-बड़े ग्रन्थ पढ़ने और दिन-रात सिर खपाने की आवश्यकता नहीं है।बाज़ार से एक अदद स्याही की टिक्की और अपनी आँखों में बचे दुर्लभ पानी से ही यह मनोरथ पूर्ण हो सकता है।किताबों में तर्क खोजने और कानून का निबाह करने की जहमत उठाने की भी ज़रूरत नहीं है।बस,अपने निठल्ले हाथों से कैमरों के चमकते फ्लैश के सामने इसे झोंकना भर है।यह काम पढ़ाई में भाड़ झोंकने से भी ज़्यादा आसान है।

किताबों पर स्याही खर्चने वालों से स्मार्ट वे लोग हैं जो इसे उजले चेहरों पर पोत रहे हैं।जहाँ किताबी-कालिख जीवन-नैया को पार लगाने में हिचकोले खाने लगती है,वहीँ ये कालिख सत्ता की वैतरणी को एक झटके में पार करा सकती है।यहाँ तक कि जूता उछालकर भी कालिख-कर्म सम्पन्न किया जा सकता है।ऐसे लोग संविधान और संस्कार अपने हाथ में लेकर चलते हैं।ये ‘बाय-डिफॉल्ट’ संस्कारी-जीव हैं।संस्कृति के प्रति पूर्णतः समर्पित भी ।अपने मन और धन को तो पहले ही वे अपने प्रिय रंग में रंग चुके हैं,कालिख चुपड़कर तन को भी वैसा बनाना चाहते हैं तो इसमें हर्ज़ क्या है ! वे अब तन-मन-धन से देश-सेवा कर रहे हैं।

अँधेरा काला होता है इसीलिए सारी विशिष्ट कलाएं उसी की शरण में फलती-फूलती हैं।सबसे बड़ा समाजवाद तो अँधेरे का होता है।छोटे-बडे का कोई भेद नहीं रहता।न किसी का सूट-बूट दिखता है न यह कि कौन लंगोटी में है ! अँधेरा गरीब का पक्षधर है।उसके खाली पेट को ढाँपता है।अमीर को और समृद्ध होने की राह दिखाता है।काला इसीलिए सबका अभीष्ट है,फ़िर चाहे वह धन हो या मन।कालिख लगना  कलियुग का प्रताप है।जिसे लग गई वह देश का भविष्य बन जाता है।इसलिए कालिख से नहीं उजाले से डरो।उजाला विकास का शत्रु है,भेदिया है।और भेदिये देशद्रोही होते हैं।

अगली बार जब आप उजले-धुले बने रहने की जद्दोजहद करें तो कालिख पोतने वालों का भी खयाल रखें।आपके उजले होने तक ही उनकी कालिमा का असर रहेगा।इसलिए उनकी मजबूरियों को नज़र-अंदाज़ न करें।जिनके पास सम्मान है,वे उसे वापस दे रहे हैं,उनके पास कालिख है,वे उसे लौटा रहे हैं।

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

कुछ तो ले ले रे.....!

चुनाव सिर पर हैं और नेताजी सांताक्लॉज बन सड़क पर घूम रहे हैं।उनके लम्बे झोले में अनगिन उपहार भरे पड़े हैं।झोला भी अब स्मार्ट होकर ‘विज़न डाक्यूमेंट’ बन गया है।इस पर केवल दृष्टिपात ही किया जा सकता हैजिनकी दृष्टि कमजोर होगी,उन्हें यह ‘विज़न’ दिखेगा भी नहीं क्योंकि इसमें सारे उपहार डिजिटल फॉर्म में रखे गए हैं।ऐसा ‘डिजिटल इंडिया’ की मजबूती के लिए किया जा रहा है । उपहारों की डिलीवरी की शत-प्रतिशत या उससे भी अधिक की गारंटी दी जा रही है।लोग कम हैं और उपहार ज़्यादा।अब इस इस बात को लेकर कन्फ्यूज़न हैं कि वे दाल-रोटी में ही बसर करें या पिज्जा-बर्गर का ऑर्डर भी रिसीव कर लें ! वे नगर के नारकीय-नागरिक बनें रहें या मंगल ग्रह के स्मार्ट सिटिज़न हो जांय ! बहुत कम समय में लोग इतनी सौगातों की बारिश में डूब-उतरा रहे हैं।ऐसी आपदा तो कोशी की बाढ़ के समय भी नहीं आती।इससे उबरें तो उपहारों को पंजीरी बनकर फांकने का लाभ उठा सकें।

सांताक्लॉज के झोले में वह सब कुछ मौजूद है जो एक स्मार्ट नागरिक के पास होना चाहिए।लैपटॉप,स्कूटी और टीवी जैसी चीजें आते ही फटेहाली और भूख अपने-आप भाग जाती है।बंदा लैपटॉप लेकर फेसबुक में यह थोड़ी लिखेगा कि उसके पास रोटी नहीं है।नियमित रूप से स्टेटस अपडेट करने वाले भूखे-नंगे और पिछड़े लोग नहीं होते।खैरात में मिली स्कूटी में बैठकर ‘सेल्फी ले ले रे’ गाते ही डामर वाली सड़क नेताओं के बातों जैसी चिकनी-चुपड़ी हो उठेगी।ऐसे स्टेटस पर लाइक्स की दनादन बौछार होगी।अति स्मार्ट होने का यह दस्तावेजी-सबूत है।
यहाँ तक कि उपहारों का वर्गीकरण भी हो गया है। लड़कों को लैपटॉप,लड़कियों को स्कूटी और उनके माता-पिताओं के लिए टीवी देने की योजना बनाई गई है।इससे चुनाव में सरकार तो बदल ही जायेगी,समाज में भी क्रान्तिकारी बदलाव आएगा।लड़के लैपटॉप लेकर फेसबुक पर ‘गौमाता-बचाओ’ अभियान में व्यस्त रहेंगे और उनकी माताएँ बैग से झाँकती उनकी किताबों को हड़काती रहेंगी।लड़कियाँ स्कूटी में बैठकर ‘ऑल द फन’ की ब्रांडिंग करेंगी और माता-पिता टीवी पर भाभी जी के साथ ‘सही पकड़े हैं’ देखकर मगन होते रहेंगे।यानी सब अपने काम पर।इस तरह सरकार भी अपना काम निश्चिन्त होकर करती रहेगी।
   
लैपटॉप,स्कूटी और टीवी ने बिजली,सड़क और पानी को बड़ी आसानी से रिप्लेस कर दिया है।अब ये सभी चीजें डिजिटल फॉर्मेट में मिलती हैं या टोकन के रूप में।इसीलिए न तो बिजली अब खम्भों और तारों से आती है और न पानी नल से।इनके टोकन रीचार्ज करने के लिए ही लैपटॉप बाँटे जा रहे हैं । टोकन डालने पर दूध और पैसे की तरह पानी निकलेगा।इससे पानी पैसे की तरह बहेगा।अगर उपहार बंटने का मौक़ा मिला तो मंगल का सारा खारा पानी मीठा बनकर बोतल-बंद हो जायेगा ।रही बात स्कूटी की तो वह सड़क से ज्यादा सोशल-मीडिया पर चलेगी।ऐसे में ऊबड़-खाबड़ सड़क में जितने ज़्यादा ‘एडवेंचर’ होंगे,सोशल मीडिया में सरकार की टीआरपी उतनी ही अधिक बढ़ेगी।इस क्रांति से एक फायदा यह भी है कि नई पीढ़ी के रोजगार के लिए एक नया सेक्टर खुल जायेगा।
   
जनता को हर हाल में उपहार मिलना तय है,भले ही किसी को हार मिले।बस उसके लिए उपहार चुनना आफत का काम है।दीवाली और क्रिसमस ऑफर एक साथ आ गए हैं।एक दूसरे  झोले में गाँवों को शहर बनाने का फार्मूला रखा हुआ है।उसको कई लोग लादे हुए हैं और अब जनता पर लादना चाहते हैं।अभी तक चारा चबाने और ‘सुशासन’ ढोने से ही ‘टैम’ नहीं मिला।था।इस बार यदि जनता ने फ़िर लदने दिया तो वे उसके लिए ‘कामधेनु’ और ‘कल्पवृक्ष’ का इंतजाम कर देंगे।इसके लिए तो टोकन की भी ज़रूरत नहीं रहेगी।जो चीज़ जब चाहिए,मिल जायेगी बशर्ते उसका नेता मिल जाये।‘कामधेनु’ और ‘कल्पवृक्ष’ को जगाने का मंतर उसी के पास है।

फ़िलहाल,बेशुमार उपहार हवा में तैर रहे हैं।जिन्हें लो-नेटवर्क में सिग्नल पकड़ने का हुनर मालूम है,वे पकड़ लें क्योंकि कभी भी कॉल-ड्रॉप हो सकती है।


सेवा के लिए शॉर्प-शूटर.!

बचपन से सुनते आये हैं कि सेवा में ही मेवा होती है।अब उसका प्रत्यक्ष दर्शन हो रहा है।लोग सेवा करने के लिए टूटे पड़ रहे हैं।पहले सेवा स्वेच्छा से होती थी और अब पर्ची काट कर की जा रही है।उस सेवा का कोई वक्त तय नहीं था यह मौसमी है।पाँच साल में एक बार ही जनता के ‘भाग‘ खुलते हैं।सेवक ज्यादा हैं इसीलिए इसके लिए रार और मार मची है।एक अदद पर्ची के लिए कपड़े फट रहे हैं,जूते चल रहे है।सेवा का ऐसा जज्बा पहले कभी न था।
सेवा करने के लिए जेब भरी और भारी होनी चाहिए जिससे सेवा करने का जज्बा उबल कर बाहर आ जाए ।फटी जेब वाले जज्बा रखें तो कहाँ ? अभी इसमें ईएमआई स्कीम भी नहीं आई है।कोई भी काम करने के लिए ‘तन-मन-धन’ का सूत्र यूँ ही नहीं दिया गया है।बाहुबली और थैलीशाह इसीलिए सेवा करने के सबसे पहले हक़दार हैं।
जन-सेवा निवेश का मुख्य क्षेत्र है।इसके लिए टेंडर उठते हैं,बोलियाँ लगती हैं।सेवा करने का ज्वार इतना तीव्र होता है कि विचार अचार के मर्तबान में आ जाते हैं।लम्बे हाथ और लम्बी जेब के स्वामी सेवक बनने के लिए सबसे काबिल माने जाते है।बस उन्हें एक मौका चाहिए ।इस प्रक्रिया में बड़ा श्रम लगता है।बाद में वे दस हाथों और बीस आँखों से जनता की सेवा करके अपना श्रम सार्थक करते हैं।यही ‘मेकिंग ऑफ़ जनसेवक’ है।
जिनको सेवा करने का लाइसेंस नहीं मिल पाता वो बड़े अभागी होते हैं।उनके पास काम लायक एक-दो सेक्टर ही होते हैं।बालू-खनन वाला देश की शिक्षा-नीति की खुदाई भी करना चाहता है पर ऐसे में वह पिछड़ जाता है।इलाके का तड़ीपार कानून और व्यवस्था दुरुस्त करना चाहता है,पर समय से पर्ची नहीं मिल पाती।सेवादार यदि शॉर्प-शूटर हो तो कोई समस्या ही नहीं।सेवा की पर्चियाँ कटनी चालू हैं।हर तरफ सेवादार घूम रहे हैं।वे सेवा को आतुर हैं पर जनता भूमिगत है।उसे हर पाँच साल में अपनी सेवा करवानी पड़ती है।इसके लिए शार्प-शूटर तैयार हैं,बस आपको एक बटन-भर दबाना है।

बुधवार, 30 सितंबर 2015

सरकार से नहीं डिस्लाइक से डर लगता है साहब !

जंतर-मंतर का डिजिटल-संस्करण फेसबुक पर जल्द ही आने वाला है।इससे क्रान्ति का आखिरी चरण भी संपन्न हो जायेगा।डिसलाइक बटन का इंतज़ार कर रहे नवेले क्रांतिकारी अब पुलिस की लाठी-गोली-गैस से मीलों दूर होंगे।धरने और अनशन अब अपनी आरामगाहों से ही सरकार की नींद हराम कर सकेंगे।डिजिटल-इंडिया के मिशन में डिसलाइक-बटन अहम भूमिका निभाने जा रहा है।सबने अपने-अपने अँगूठे अभी से पैने कर लिए हैं।जो काम कलम या तलवार नहीं कर सकती,वह काम अब एक अदद अँगूठा करेगा।

पसंद-नापसंद का कॉन्सेप्ट भारतीय समाज में नया नहीं है।पर पहले यह मौन-क्रान्ति की तरह महसूस होता था।आदमी को ज़िन्दगी में एक ही बार पसंद या नापसंद करने का मौका मिलता था,जब वह अपनी शादी के लिए लड़की देखने जाता था।तब नापसंदगी की बात को घर के बड़े-बूढ़े दबा लेते थे।जिसने उस वक्त लाइक पर अपनी मुहर लगा दी,ज़िन्दगी भर फ़िर किसी और चीज़ को लाइक करने लायक नहीं रह जाता था।अब समय बदल चुका है।बंदर के हाथ  अँगूठा लग गया है,यह जानकारी उसे अभी-अभी लगी है।

फेसबुक अब केवल मीडिया का हिस्सा नही है।बेहद अन्तरंग बातें और निजी रिश्ते रोज यहीं जन्मते और मरते हैं।डिजिटल-इंडिया में आचरण और संस्कार धार्मिक पुस्तकों से नहीं फेसबुक से निर्मित हो रहे हैं।आदमी की ज़िन्दगी में भूख,प्यास का विकल्प हो न हो,रोबोट बने इंसान को लाइक के साथ डिसलाइक का बटन तो चाहिए ही ताकि वह पलक झपकते ही आटे-दाल को अँगूठा दिखा सके।वह दिन हवा हुए जब उसे आटे-दाल का भाव पता होता था।हो सकता है कि आटे-दाल को इतने लोग डिसलाइक कर दें कि उसको लाइक करने वाले खुद शर्मसार हो जाएँ।

फेसबुक पर अनेक सेलेब्रिटीज के पेज बने हुए हैं।कई तो इन्हीं पेज पर आए लाइक्स से सेलेब्रिटी बन गए हैं।पसंद की भी अपनी गति होती है,यहीं से पता चलता है।प्रति मिनट की दर से किसको कितने लाइक्स मिले हैं,इसका रिकॉर्ड भी गिनीज बुक के पास होगा।अब डिसलाइक की रफ़्तार इसको टक्कर देगी।फैन-पेज के समानांतर हेट-पेज बनाने की ज़रूरत नहीं होगी।लाइक के बगल में दमकता डिसलाइक बटन ज़िन्दगी में ‘कुछ हट के’ करने वालों को प्रेरित करेगा।

एक डिसलाइक बटन के आने भर से छोटी-सी लाइफ में बड़ा-सा बदलाव देखने को मिल सकता है ।लाइक बढ़ने पर जहाँ खून बढ़ता था,वहीँ डिसलाइक बढ़ने पर ब्लड-प्रेशर उछाल मारेगा ।डॉक्टर का मरीज से पहला सवाल यही होगा,’पिछली बार कितने डिसलाइक मिले थे ?’डॉक्टरी की पढ़ाई में डिप्रेशन के लक्षणों में डिसलाइक का विशेष रूप से उल्लेख किया जायेगा।फेसबुक में गैंडे जैसी सेल्फियों से उकताए हुए लोगों को बड़ी राहत मिलने वाली है।मजबूरी में हर सूरत को लाइक करने का टन्टा ही खतम।‘हजारों की डिसलाइक में एक मेरी भी’ गुनगुनाते हुए बढ़ते लाइक को काबू कर लिया जायेगा।

सरकार डेंगू जैसी महामारी से निपटने के लिए अखबारों में बडे-बडे विज्ञापन ज़ारी करेगी।उसमें कहा जायेगा कि आप इसे अधिक से अधिक डिसलाइक करें।इतने से ही डेंगू मच्छर रो पड़ेगा,’सरकार से नहीं डिसलाइक से डर लगता है।और देखते ही देखते वह छू हो जायेगा।सरकार के विरोधियों को इससे ज़बरदस्त आइडिया मिलेगा।जिनको ’मन की बात’ फूटे कान नहीं सुहाती,वे आगे से चुनाव आयोग नहीं जायेंगे।सब फेसबुक पर ही सामूहिक रूप से अँगूठा दिखाकर महा-एकजुटता का प्रदर्शन कर देंगे।और तो और आम आदमी भी अब पाँच साल का इंतज़ार नहीं करेगा।रात बारह बजे उठकर वह सरकार के किसी बयान को डिसलाइक कर चैन की नींद सो जायेगा।

 नापसंदगी नए दौर का ‘अलादीन का चिराग’ है जिसे पाकर हर मुश्किल आसान लगती है।फेसबुक में नई कविता के प्रकोप से डिसलाइक बटन ही बचा सकता है।आत्म-मुग्धता पर राशन लगा सकता है।सरकार के स्टेटस को तबाह कर सकता है।प्रतिद्वंद्वी साहित्यकार का मठ उजाड़ सकता है।इस सबके बावजूद डिसलाइक बटन उम्मीद का दुश्मन है।खुशफहमी को नष्ट करने वाला है,विकास-विरोधी है।बैन-संस्कृति की आदी सरकार को इसके आने के पहले ही बैन कर देना चाहिए क्योंकि एक डिसलाइक-बटन वह सब कर सकता है जो करोड़ों बटन दबाने से चुनी सरकार नहीं कर पा रही है।

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

बधाई हो, हादसा हुआ है!

कभी हादसों की वजह से मंत्री-पद खतरे में पड़ जाते थे पर अब स्वयं मंत्री हादसों को अपने लिए एक मौक़ा मानते हैं।वे इस इंतज़ार में रहते हैं कि कब हादसा हो और उन्हें जनता के साथ खड़े होने का सुयोग मिले।इस तरह वे सरकारी बजट को राहत-कार्य में बाँटकर अपना मंत्री बनना सार्थक कर सकें।कुछ ऐसे ही हृदयोद्गार व्यक्त किये हैं देश के हृदय-प्रदेश के बड़े मंत्री ने।एक बड़े हादसे के बाद जब उनसे पूछा गया कि इतनी मौतों का जिम्मेदार कौन है तो मंत्री जी ने बेलौस अंदाज़ में उत्तर दिया कि ये हादसे हैं और ये होते रहते हैं।अगर ये न हों तो जनता की सेवा करने का मौक़ा उनको कैसे मिलेगा !

हादसों को मौकों में बदलने वाले ऐसे लोग हमारे लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने में जुटे हैं।ऐसे लोगों का लोकतंत्र में प्रवेश किसी हादसे से कम नहीं।हमारे मुहल्ले का कल्लू पहलवान अखाड़ेबाजी में छोटे-बड़े दाँव आजमा लेता था।दैवयोग से एक दिन उसके दाँव से विरोधी की गरदन ने बाकी शरीर से जुड़े रहने की जिद त्याग दी।उसके घरवाले चिल्लाते रहे कि यह हत्या है पर पुलिस ने माना कि यह महज हादसा था।हादसे का संयोग मिलते ही कल्लू पहलवान सत्ताधारी दल में शामिल हो गए।उन्होंने इसे ईश्वर की ओर से दिया गया एक मौक़ा माना और आज वे प्रदेश के सुरक्षा मंत्री हैं।

लोकतंत्र की खूबी इसी में है कि नियमित अन्तराल पर ऐसे हादसे होते रहने चाहिए।इससे जनता के लिए बने बजट का कुछ हिस्सा उस तक पहुँचता ही है, राहत-राशि पहुँचाने से आपदा-राहत का पुनरभ्यास होता है सो अलग।मंत्री जनता के सामने खाली हाथ और बिना प्रयोजन के जाने लगें तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। मिले मौके का लाभ विरोधियों को लपकने भी नहीं देना चाहिए ! सरकार उनकी है,बड़े जोड़-जतन से बनी है तो लोगों को दिखनी भी चाहिए।हादसे के समय मंत्री जी का पीड़ित परिवार को ढांढस बँधाना और मातम से भरी भीड़ में अपनी मुस्कुराती पोज़ देना सबसे दुष्कर कार्य है।यूँ भी हादसा एक होता है और सरकार के मंत्री अनेक।गलती से हादसा कहीं और बड़ा हो गया तो मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के आगे मंत्री को मौक़ा गंवाना पड़ सकता है ! इसलिए जितने ज्यादा हादसे, उतनी अधिक कामकाजी सरकार।हादसों के बिना मौके का और बिना मौके के लोकतंत्र का भविष्य खतरे में दिखता है पर कुछ नासमझ इसे अवसरवाद से जोड़ देते हैं।यह गलत प्रवृत्ति है। 

शनिवार, 26 सितंबर 2015

कौन जाए जौक, ये दिल्ली की गलियाँ छोड़कर !

दिल्ली में डेंगू है और उससे ज़्यादा उसका डर।डेंगू का डंक अभी टूटा नहीं पर स्वाइन फ्लू की आहट सुनाई देने लगी है।राजधानी का स्टेटस वीआईपी है सो बीमारी भी वीआईपी।छोटे-मोटे लोगों से काबू में आने को राजी नहीं है।मुख्यमंत्री विज्ञापन दे रहे हैं पर डेंगू मान नहीं रहा है।निगम वाले चालान कर रहे हैं पर शायद उसके पास राष्ट्रीय परमिट है।दिल्ली की हर समस्या की तरह डेंगू भी प्रधानमंत्री से वक्तव्य देने का इंतज़ार कर रहा है।हो सकता है कि वे ‘मन की बात’ में डेंगू को समझा दें तो वह चला भी जाए।इतना भी बहरा नहीं होगा।


मुश्किल यह है कि दिल्ली आकर कोई जाना नहीं चाहता,इसीलिए डेंगू का निदान नहीं हो पा रहा।जो यहाँ आ जाता है,दिल्ली उसे ढोती है।यह दिल्ली को वरदान मिला हुआ है।कहा जा रहा है कि थोड़ी सरदी आ जाए तो डेंगू अपने-आप चला जायेगा।उसी का इंतज़ार है।जब सरदी में स्वाइन फ्लू आएगा,फ़िर गर्मी का इंतज़ार रहेगा।समस्याएं मौसम-चक्र की तरह अदला-बदली करने लगें तो खुद करने के लिए कुछ नहीं होता।वैसे भी वीआइपी संस्कृति वाले किसी के ठेले-ठाले से जाते नहीं।

दिल्ली में जमना आसान नहीं होता और उखड़ना उससे भी मुश्किल।कुर्सी और बीमारी के लिए दिल्ली का मौसम सदैव अनुकूल रहा है।साहित्य और राजनीति इसीलिए सबसे अधिक यहीं फलती-फूलती है।इनके सम्पर्क में आने वाले लोग स्वाभाविक रूप से संक्रमित हो जाते हैं।इससे बचाव के लिए अभी तक कोई वैक्सीन नहीं बन पाई है।डेंगू और स्वाइन फ्लू के लिए भी नहीं।

नई सरकार इस दिशा में लगातार काम कर रही है।‘मन की बात’ नामक अनूठी वैक्सीन खोजी गई है।जानकार कह रहे हैं कि पूरे पाँच साल तक यह कोर्स चलेगा तभी मरीज को पूरी राहत मिलेगी।चिन्ता की बात नहीं है।ऐसी मौसमी बीमारियाँ स्वयम् ही दम तोड़ देंगी।इस बीच कुछेक जानें चली भी जाती हैं तो यह वीआईपी कल्चर के आगे महज मौन-क्रांति होगी।और मौन का कोई इतिहास नहीं होता।

दिल्ली के मिजाज से जो परिचित नहीं हैं,वे खौफ खा रहे हैं,डर से भाग रहे हैं।उन्हें असल ख़तरे का पता ही नहीं है।एक कवि ने कहा भी है कि यमराज अब सभी दिशाओं में विद्यमान हैं।डेंगू का मच्छर भले अनपढ़ हो पर यमराज को वीआइपी और आम आदमी की पहचान है।वे इतना खयाल तो रख ही सकते हैं कि सब्सिडी का फायदा गरीब को सबसे पहले दें।

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

सब मिले हुए हैं!

विचारधारा में मेल है पर सीटों पर सहमति नहीं है।जल्द ही वो भी बन जायेगी।सत्ता की सामूहिक पेंग के सामने मजबूत से मजबूत वैचारिक दीवार ढह जाती है तो फ़िर असहमति क्या चीज़ है ! वैसे भी राजनीति में विचार और असहमति का आपसी रिश्ता है।कुर्सी पर बैठने के लिए सहमति को असहमति या असहमति को सहमति बना लेना सामयिक होशियारी है।अच्छा राजनेता विचार को तलवार या ढाल में बदलने का हुनर बखूबी रखता है।लोकतंत्र में विचार के खूंटे से बंधे रहने वाला सत्ता के शामियाने से बाहर हो जाता है।विचारों को तेजी से कूदते रहना चाहिए ताकि जैसे ही मलाई से भरी गगरी दिखे,उसमें वे डूब सकें।’जिन डूबा तिन पाइयां’ की सार्थकता तभी समझ में आती है।यहाँ विचारों का आयात बड़ी तेजी से होता है।उनके डूबकर नष्ट हो जाने की आशंका भी नहीं होती।


कई विचार गोलबंद होकर अपनी यात्रा पर निकल पड़ते हैं।पैबंद लगी विचारधारा की नाव पर पर सभी सवार हो जाते हैं।जहाँ सीट टपकती दिखती है,वहीँ एक नवीन विचार चिपका देते हैं।पार जाने के लिए पतवार से अधिक ज़रूरी है नाव में हुए छेदों पर कील ठोंकना।यह विशुद्ध जनसेवा है इसलिए सब आतुर हैं।ऐसे में मतभेद प्रकट हो जाते है।लोकतंत्र में मतभेदों का अपना महत्त्व है।ये जितने ज़्यादा तीखे और मुखर हों,उतने ही अधिक फलदायी सिद्ध होते हैं।मतभेद होते इसीलिए हैं कि बड़े नुकसान से बचा जा सके।

सत्ता कोई संतई नहीं है।जननायक को जनता की सेवा खुलेआम करनी पड़ती है।इसलिए बड़ी-बड़ी नामपट्टिकायें लगती हैं,अख़बारों में खबरों के बीचोंबीच बैठना पड़ता है।ये सब मैनेज करना आसान नहीं होता ।सेवा करने में हाथ-पाँव चलाने पड़ते हैं।इससे सेवा की प्रहारक-क्षमता बढ़ती है।जनता के सामने आने के लिए पीठ पीछे दुरभिसंधियाँ करनी पड़ती हैं।लानतें देनी-लेनी होती हैं।धर्मयुद्धों में यह सब जायज माना गया है।महाभारत और रामायण काल से ऐसा चला आ रहा है।हमारे नए नायक उन्हीं परम्पराओं के वाहक हैं।

वे सत्ता में अपना हिस्सा माँग रहे हैं तो कोई अपराध नहीं कर रहे हैं।गनीमत है कि बिना लाठी-डंडे के अपनी बात कही जा रही है।सभी को गाँधी की अहिंसा-नीति पर पूरा यकीन है।गाँधी स्वयं अपने साथ लाठी लेकर चलते थे इसलिए लाठी उनका आदर्श है।रामराज्य की बहाली में लाठी की अपनी भूमिका है।वह कभी-कभी बे-आवाज भी होती है।फ़िर,दीन-दुखियों की सेवा करना उनका मौलिक अधिकार है।यह कबीर और दादू भी कह गए हैं।वे तो बस इसे लागू करना चाहते हैं।चूँकि बिना सत्ता में आए सेवा संभव नहीं है इसलिए उनको छटपटाहट है।लोकतंत्र को बचाने के लिए अंतिम सर्कुलर जारी कर दिया गया है।मुख्य चिन्ता यही है कि यदि वांछित कुर्सियों की गणना कम हुई तो विचारधारा कहाँ बैठेगी ! उसे तो ज़मीन पर पटक नहीं सकते।उसकी गठरी को आजीवन ढोना है।वह सत्ता की कुर्सी पर बैठकर ही फबती है।विचारधारा को कुर्सी से ही ऑक्सीजन मिलती है।इसलिए कुर्सी हर हाल में चाहिए,ताकि विचारधारा जीवित रहे।इसके जरिये वे परमपद पाना चाहते हैं।

कुछ लोग अभी भी आशंकित हैं कि यदि गठबंधन टूट गया तो क्या होगा ? गठबंधन बचे तो देश बचे। हमें अपने नायकों पर तनिक भी शंका नहीं है।पिछले सत्तर सालों में उन्होंने समय-समय पर अपनी उपयोगिता सिद्ध की है।वे इधर रहें या उधर,कुर्सी के पास ही उनका तम्बू गड़ता है।सबको अपने-अपने खूँटे गाड़ने हैं।शामियाने के संतुलन से अधिक ज़रूरी सत्ता-संतुलन है।वे लोकतंत्र की ज़रूरत हैं और गति भी।जनता की गत बने तो उनका तम्बू तने।इसलिए सब मिले हुए हैं।जल्द ही मतभेदों के अफ़वाह बनने की खबर आएगी।हमारा लोकतंत्र अब पूर्णगति को प्राप्त हुए बिना नहीं रह सकता।

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

वादें यूँ होते हैं हवा !

उन पर हवाबाजी करने का इलज़ाम लगा है।पर यह कोई छोटा-मोटा करतब नहीं है।हवा में रहकर गुलाटी मारना बडे ख़तरे का काम होता है।यहाँ तो ज़मीन से ही हवाबाजी का कमाल किया जा रहा है।वादे करना जितना आसान होता है,उनमें हवा भरना उतना ही मुश्किल।काफ़ी पड़ताल के बाद यह बात साबित हो पाई है कि साठ साल के वादों में जितनी हवा नहीं थी,साल भर में उससे ज़्यादा भर दी गई है।अब हवा पर तो किसी का नियंत्रण नहीं है वर्ना इसकी सप्लाई बंद की जा सकती थी।वादों में हवा है या हवा में वादे,इससे वादों की बुनियादी स्थिति में फर्क नहीं पड़ता।
अब जब आरोप लग चुका है तो ज़ाहिर है यह हवा में तो नहीं होगा।मगर इसके लिए एक अदद दूरबीन की नहीं सूक्ष्मदर्शी की ज़रूरत होती है।दूर से हवा का अनुमान लगाना कठिन होता है।हवा का अहसास पास आकर ही होता है।जब वह बगल से गुजरती है तो पता चलता है कि वह मलयानिल है या लू का थपेड़ा ! पहाड़ की हवा जहाँ दिल को सुकून देती है,वहीँ मैदानी हवा  तन सोख लेती है।वादों में भरने वाली हवा गरम होती है इसीलिए झम्म से उड़ जाती है।ऐसी वादे-हवा को देखने के लिए ही दूरबीन निकालनी पड़ती है।
हवाबाजी करना बच्चों का खेल नहीं है।इसके लिए सतत अभ्यास की ज़रूरत होती है।वादों में हवा भरने के लिए उसे बाहर से भी आयात किया जाता है।इसके लिए बार-बार हवाई यात्रायें करनी पड़ती हैं।विदेशों में जाकर पम्प करना पड़ता है,तब कहीं जाकर विकास का गुब्बारा फूलता है।जिनके पास न काम बचा है,न हवा,वे वादे भी करें तो किस भरोसे ? बिना हवा के काम तो क्या वादे भी नहीं उडाये जा सकते।इसलिए हवा भी उन्हीं की है,जिनके पास वादे करने के करतब हैं।

वादों को हवा का साथ बहुत रास आता है।वे स्वयं जल्द से जल्द उड़ना चाहते हैं ताकि नए वादे के लिए स्पेस पैदा हो सके।शायद इसीलिए आजकल वादे हवा के संग ‘स्पेस’ में अधिक घूम रहे हैं।जिन्हें हवाबाजी का ज़्यादा शौक हैं,वे ‘स्पेस’ में ‘मास्क’ लगाकर जाएँ क्योंकि वहाँ की हवा में ऑक्सीजन नहीं होता।

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

ई शो-बाजी का दौर है बबुआ !

चुनाव सिर पर हों और शो-बाजी न हो,यह कैसे हो सकता है ! सबने अपने-अपने घोड़े खोल दिए हैं।यह तो चुनाव बाद ही पता चल पाएगा कि ये घोड़े थे या गधे।हमारे यहाँ घोड़े खोलने की परम्परा प्राचीनकाल से है।तब चक्रवर्ती सम्राट बनने के लिए अश्वमेध का आयोजन होता था।जो राजा का घोड़ा पकड़ता,माना जाता कि वह उसको चुनौती दे रहा है।तब राजा को उसे परास्त करना होता था.अब खुला खेल है।घोड़े और गधे सब मिलकर आपस में लड़ लेते हैं।मजे की बात यह है कि सब एक-दूसरे को गधा समझते हैं।
कई तरह के शो चल रहे हैं।एकल-शो महागठबंधन के शो पर भारी पड़ता दिख रहा है।अपने शो में अतिरिक्त भार लाने के लिए पहले गठबंधन बनाया गया,फ़िर उसे ‘महा’ किया गया।महा शब्द जुड़ते ही वह महान हो गया।सामने एक महान हैं तो गठबंधन में जितने शामिल हैं,सब महान हैं।यह समाजवादी सोच है।यहाँ कोई छोटा हिस्सेदार नहीं है।सबको अपनी महानता बचानी है तो एक-दूसरे को महान बताना है।जनता भी समझदार है।वह जान लेती है कि जब इत्ते सारे महान एक जगह जुटे हैं तो जाहिर है कि कोई ‘महान’ उद्देश्य ही होगा।
गठबंधन वाले कह रहे हैं कि अगर शो-बाज़ी से ही सत्ता मिल रही है तो वे भी इसमें पीछे नहीं रहेंगे।शो में किरदारों ने क्या परफार्मेंस दी,इस पर फोकस कम होता है।शो करने वाले चाहते हैं कि ऐसे एंगल से फोटोग्राफी की जाय जिससे कैमरा खाली गड्डे को भी आदमी की मुंडी दिखा सके।इस हिकमत से पचास हज़ार की संख्या पाँच लाख बन जाती है।यानी शो-बाजी में ट्रिक्स आनी भी जरूरी है।जिसकी ट्रिक काम कर गई,वह अगले पाँच साल में गड्ढे में गिरे आदमी को फोटोशॉप के जरिये बाहर निकाल लाएगा।उसके विकास का असली चित्र यही होगा।
ऐसे ही एक महा-शो को सफलतापूर्वक सम्पन्न कर चुके एक शोमैन से हमने पूछा,’आप अपनी जीत को लेकर कितना आश्वस्त हैं ?’ शोमैन ने पूरे आत्मबल को चेहरे पर घसीटते हुए उत्तर दिया,’हमरा कन्फीडेंस का लेबल एकदम्मै हाई है।ठीक उतना ही जेतना ऊ हर खाते में पन्द्रह लाख जमा कर ‘मन की बात’ में ले आते हैं।आप कभी उनसे भी पूछ-पछोर किया करो।एक तो हम जनता के खातिर साँप तक बन गए हैं दूसरे हमारे गठबंधन में आपको हर तरह का वैरायटी मिलेगा।लिखो,यह सब लिखो अपने पेपर मा।’

हमने उनसे आखिरी सवाल किया ,’क्या चुनाव बाद भी गठबंधन बचा रहेगा ?’ उन्होंने खिलखिलाते हुए उत्तर दिया,’ई शो-बाज़ी का दौर है बबुआ ! खेल के बाद कहीं तम्बू लगा रहता है क्या,बुड़बक कहीं के !’

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

बाजार का बचना जरुरी है !

बाज़ार धड़ाम से गिरा है और इसकी गूंज भी चौतरफ़ा सुनाई दे रही है। चढ़ते-चढ़ते वह एकदम से बैठ गया है। इस पर न मीडिया चुप है न सरकार।बाजार के भाव गिरे तो खलबली मच गई जबकि आम आदमी की थाली से दाल-रोटी कब गिरी, किसी को खबर ही नहीं।इसका सीधा कारण यही है कि बाजार भारी है सो उसके गिरने पर आवाज आती है। आम आदमी का क्या है, वह मजे-मजे में ही गिर लेता है। वह उठकर भी क्या कर लेगा, इसलिए अर्थशास्त्री या सरकार उसकी ओर से बेफिक्र है।

विकसित हो रही अर्थव्यवस्था पर अचानक अंदेशे के बादल घिर आए हैं। यहाँ तक कि सरकार भी अपने मौन-कक्ष से बाहर निकल आई है। उसने बताया है कि बाजार जल्द ही गुलजार होगा। बड़े लोगों को उस पर वैसा ही भरोसा है जैसे छोटों को ‘अच्छे दिनों’ पर था.बहरहाल सरकार के एक मंत्री ने इसी दौरान यह बता दिया कि ‘अच्छे दिनों’ को लाना उनकी तरफ से कोई वादा नहीं नारा था। और यह भी उनका नहीं सोशल मीडिया में बैठे कुछ निठल्लों का। अब सरकार निठल्ली थोड़ी बैठी है! उसे तो बाजार के साथ चलना होता है।इसीलिए बाजार का बैठना उसे नहीं भा रहा।

पर क्या करें, रुपया और शेयर बाजार बैठ रहा है। इसे चलाने की उसे अधिक चिन्ता है। प्याज और दाल लगातार उठ रहे हैं। उसे उठने से परहेज नहीं है,सिवाय खुद के उठ जाने से। सरकार को फ़िक्र है कि बाजार इसी तरह बैठा रहा तो उसकी डोली भी जल्द उठ सकती है। बुलेट ट्रेन का वादा नारा बनकर हवा में उड़ सकता है। विदेशी दौरों से प्राप्त होने वाली हजारों बिलियन की धनराशि ‘कालेधन’ की तरह जुमला बन सकती है। प्याज और दाल का बढ़ना वैसे भी विकास का प्रतीक है। उसे लगता है कि इससे आम आदमी की क्रय-शक्ति और मज़बूत होगी। उसे इस समय पेट की नहीं ‘मन की बात’ सुननी चाहिए।'किरपा' वहीं से आएगी।

बाज़ार इस वक्त बुलिश नहीं बियरिश हो चला है। हम सबको ‘बियर’ करना ही होगा।कतई चिन्ता नहीं करनी चाहिए। बाज़ार को जल्द पैकेज मिलेगा।सरकार आवाज देगी ,’कितना कर दूँ...? पचास हज़ार...नहीं...साठ हज़ार....नहीं, लो सौ हज़ार करोड़ दिया’ और इस पैकेज के मिलते ही दड़बों में घुसे लोग सरपट दौड़ने लगेंगे। जिनके पेट और पीठ एकाकार हो चुके हैं,वे बैठे-बैठे योग करें।उन्हें 'भूख-मारक आसन' को दिन में तीन बार करना होगा। फिलहाल बाजार का बचना जरूरी है।

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

बात ‘ब्रेक’ क्यों हुई !

बात टूट गई है पर चर्चा नहीं।पहले चर्चा का एजेंडा था कि बात क्यों हो रही है फ़िर इस पर कि बात क्यों नहीं हुई ? दोनों ओर के वार्ताकार ब्रेकका मजा ले रहे हैं। वहीं कुछ एक्सपर्ट बात के टूटने का 'क्लू' तलाशने में जुट गए हैं ।एक चैनल ने तो सारे फसाद की जड़ को ही खोज लिया है ।कहते हैं कि बात टूटने की बड़ी वजह यह भी रही।इस बीच हमारे हाथ भी एक क्लूलगा है जिससे पता चल जायेगा कि बात क्यों टूटी ?

हेलो,हमारी तरफ से टॉक कैंसल।यह हमारा करारा जवाब है।

देखिए,यह अच्छी बात नहीं है।वार्ता तो होनी चाहिए।हम उसे बीच में तोड़कर मुंहतोड़ जवाब देना चाहते हैं।

हम आपकी मंशा समझ रहे हैं ।हम तो आपकी सीमा के अंदर ही घुसते हैं,आप लोग तो हमारे बेडरूम तक घुस आए।यह बर्दाश्त नहीं।

तो क्या आप मानते हैं कि डॉन आपके यहाँ है ?

हमने कभी नहीं कहा कि वह हमारे यहाँ है।फिर वह अपने बेडरूम में सो रहा है।ऐसे आदमी से आपको क्या खतरा ?

हम यही जानना चाहते हैं कि इतनी चर्चा होने के बाद भी वह घोड़े बेचकर कैसे सो रहा है ?कम से कम उसे चैनलों के लिए एक बाइट तो देनी चाहिए थी।

मगर आपने यह कैसे जान लिया कि वह कराची में है ?और वह घोड़े बेचकर ही सो रहा है ?

भाई हमारे एक चैनल को एक सैटेलाइट-फुटेज मिला है,जिसमें साफ़-साफ़ दिखता है कि कराची की एक छत पर एक लुंगी टंगी हुई है। वह ताजादम नहाई हुई लगती है और उससे पानी टपक रहा है।इससे बिलकुल स्पष्ट है कि डॉन जागता भी है।हमें उसके जागने पर एतराज है।हम चाहते हैं कि वह हमेशा के लिए गहरी नींद में सो जाए।

हम इसकी जाँच कराएँगे।पहले आप वह फुटेज भेजें ,जिससे साबित हो कि कराची हमारे ही यहाँ है।लुंगी की बात तो बाद में।रही एतराज की बात,तो कुछ हमारे भी हैं।आपने पहले हमारे लड़के को पकड़ा।फ़िर सुना कि उसे बिरयानी नहीं दी जा रही है।भई,अगर आपके मुल्क में प्याज की इतनी ही किल्लत है तो हमसे बताओ।हम अगली खेप में प्याज के साथ ही लड़के भेज देंगे।

आपका एतराज बेबुनियाद है।हम उसकी जमकर सेवा कर रहे हैं।फ़िलहाल उसको अपने माँ-बाप की याद आ गई है और जल्द ही नानी भी याद आ जायेगी।आप यदि क्रिकेट के खेल को बहाल करना चाहते हैं तो खूनी खेल बंद करना होगा।आप हमारी बाॅल सीमापार करें, लड़ाके नहीं।हमारे बीच अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा। आई मीन, हम केवल आतंकवाद पर बात कर सकते हैं।

क्या - क्या! यह बीच में आतंकवाद कहाँ से आ गया!  हम तो केवल कश्मीर और हुर्रियत को जानते हैं।आतंकवाद हमारे एजेंडे में नहीं डीएनए में है और इस बात पर हम कोई बात नहीं करते। लगता है आपने रांँग नम्बर डॉयल कर दिया है। सॉरी....!

इसके बाद बात अचानक कट जाती है।यह महत्वपूर्ण सुराग है जो बताता है कि बात क्यों टूटी ? अब चारों ओर चर्चा इस बात पर है कि बात न हुई न सही, खेल तो हो सकता है।कुछ हो ना हो, होने पर चर्चा तो हो ही सकती है। 


बुधवार, 19 अगस्त 2015

आजादी का अलार्म !

आजादी का एक दिन था,गुजर गया।आजादी अब महसूसने की नहीं मनाने की चीज़ है।हर वर्ष इसके लिए एक तिथि नियत कर दी गई है।हम इस काम में कभी नहीं चूके।आज़ादी मिलने के साथ ही वार्षिक अंतराल पर आजादी का अलार्म लगा दिया गया था।हर बार यह अलार्म लालकिले से बजता है।बहरे हुए लोगों को चीख-चीखकर जगाया जाता है कि मूर्खों,हम आज़ाद हैं।और सुनने वाले वाकई मूर्ख होते हैं।वे उस ‘हम’ में अपने को भी शामिल कर लेते हैं।

अगर आप समझते हैं कि आज़ादी एक अमूर्त चीज़ है तो भी आप गलत हैं।इसमें अप्रतिम सौंदर्य है।आज़ादी के इस रूप का अहसास कराने के लिए ही कहीं ‘स्टेचू ऑफ लिबर्टी’ है तो कहीं ‘स्वतंत्रता की देवी’।आप इसके निकट आयें और महसूस करें।यह स्वयं किसी के निकट चलकर नहीं जाती।जिस चीज़ को हासिल करने के लिए हजारों कुर्बानियाँ दी गई हों,वह आपको साल में एक बार लालकिले से यूँ ही मिल जाती है ! वैसे तो सरकारी दफ्तरों में हर समय आज़ादी रहती है पर उसके लिए कठिन परीक्षा पास करनी होती है।खेत-खलिहान में काम करने वाले यह मुश्किल नहीं समझते।इस जानकारी के अभाव में वे आज़ादी की चाहत रख लेते हैं।गलती उन्हीं की है।

आज़ादी पर बोलना सबसे कठिन काम है।यह काम तब और मुश्किल हो जाता है जब हर साल किया जाता हो।रिकॉर्ड तोड़ते हुए बोलना और भी मुश्किल है।नए-नए फ्लेवर डालकर उच्चगति से आलाप करना पड़ता है,जिससे सुनने वाला नए तरीके से बहरा हो जाये।आज़ादी अब तरकीब भी है और मौका भी।बोलने की आज़ादी इसीलिए मिली है कि जैसा चाहो,जब चाहो बोलो।पर बोलना भी एक कला है।आज़ादी की तरह यह भी सबके पास नहीं होती।सफल होने के लिए कलाकार होना ज़रूरी है।मेहनत-मजूरी कोई कला नहीं है,उसके लिए पसीना बहाना पड़ता है।पसीने से गंधाये हुए लोग न कलाकार हो सकते है और न सफल।

अगर बोलने की आज़ादी है तो सुनने की भी।दोनों असीमित हैं।बोलने में ऊर्जा नष्ट होती है तो सुनने में संचित होती है।इस तरह से सुनना अधिक उपयोगी उद्यम है।इस क्रिया से धैर्य अपने आप आ जाता है।शायद इसीलिए एक शायर ने कहा भी है,’बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे’।बोलना और सुनना आज़ादी के अंग हैं तो ‘करना’ इसका आवश्यक विस्तार।हमें जितनी आज़ादी काम करने की मिली है,उससे भी अधिक न करने की।हम अधिकता की ओर अग्रसर हैं,इसलिए बोलने के रिकॉर्ड टूट रहे हैं।हमारी आज़ादी की उपलब्धि यही है।

बुधवार, 12 अगस्त 2015

फाइलों का निपट जाना!

अब कोई भी खबर हैरान नहीं करती पर इधर एक दिलचस्प खबर आई है।उत्तम प्रदेश के सचिवालय की कुछ फाइलों को दो कुत्तों ने कुतर दिया।हैरानी वाली बात यह है कि इसके लिए किसी कुत्ते को न टेंडर दिया गया और न ही वह इसकी पात्रता रखता था।फ़िर भी यह अनहोनी हो गई।जाँच के आर्डर दे दिए गए हैं कि इतनी पुख्ता व्यवस्था होने के बावजूद कुत्ते आखिर फाइलों तक कैसे पहुँचे और उन्होंने किस नीयत से उन्हें कुतरा ?

इस वाकये की जाँच मुस्तैदी से होगी और होनी भी चाहिए।आखिर कुत्तों ने आदमी के काम में दखल दिया है।पुलिस ‘अमानत में खयानत’ के आरोप में कुत्तों को अदालत में घसीट सकती है।नगर निगम को सतर्क कर दिया गया है कि वह साफ़-सफ़ाई जैसे रूटीन कार्यों को छोड़कर इस आपदा में प्रशासन का सहयोग करे।हमें राज्य की पुलिस-व्यवस्था पर पूरा भरोसा है.गुम हुई भैंसों की तरह ये कुत्ते भी जल्द बरामद कर लिए जायेंगे।

यहाँ मुख्य बात यह है कि आखिर कुत्तों को फाइलें चबाने की सूझी ही क्यों ? यह काम अमूमन चूहे करते रहे हैं या ऑफिस का पुराना बाबू।चूहे या कुत्तों द्वारा फाइलें निपटाने का तरीका बिलकुल अलग है।वे अक्सर उन्हीं फाइलों को कुतरते हैं,जिनकी उपयोगिता खत्म-सी हो जाती है।जिनके न रहने से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है पर टेबल पर पड़ी रहने से कभी भी विस्फोटित हो सकती हैं।इसलिए उनका कुतरा जाना ही उनकी नियति है।बाबू किसी भी फाइल को यूँ ही नहीं निपटाता।उसके बनने और चलने का सारा व्यय जोड़ता है,पूरी तरह दुहता है और आगे के लिए बढ़ा देता है।यदि फ़ाइल गैर-दुधारू हुई तो उसे अन्ना(छुट्टा)छोड़ देता है।वह अपने-आप ही धूल-धूसरित होकर निपट लेती है।

सवाल फ़िर भी यही है कि कुत्तों ने ऐसा क्यों किया ? हो सकता है उन्होंने बड़ी बारीकी से सचिवालय की गतिविधियों का अध्ययन किया हो।यह भी हो सकता है कि वे इस बात का रहस्य जान गए हों कि दफ्तर में घुसा दुबला-पतला आदमी बाहर निकलकर अचानक इत्ता मोटा-ताजा कैसे हो जाता है ! इसलिए महज एक प्रयोग करने के लिए यह कदम उठाया हो.जानने वाले बताते हैं कि कुछ आदमियों ने कुत्तों के भौंकने की आवाजें सुनी थीं.कुत्तों से यहीं गडबड हो गई.ऐसे काम परम शान्ति के क्षणों में किए जाते हैं.जाँच का मुख्य विषय यही होना चाहिए।

रही बात फाइलों के कुतरे जाने की,उनको तो हर हाल में निर्वाण की गति को प्राप्त होना ही है ।