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बुधवार, 31 दिसंबर 2014

ठंड में नहाना एक राष्ट्रीय समस्या है!

सामने आधी बाल्टी पानी था और मुझे बड़ी देर से ललकार रहा था।पिछले आठ दिनों से सफाई के बारे में श्रीमती जी की नसीहतें सुनने के बाद इतना हौसला जुटा पाया था कि उसे भर नज़र देख सकूँ।स्नानघर तक मैं ऐसे पहुँचा था,जैसे कसाई बकरे को जिबह के लिए पकड़कर ले जाता है।मामला केवल नहाने या सफाई भर का होता तो कोई न कोई तोड़ मैं निकाल ही लेता पर बात यहाँ तक पहुँच गई थी कि हमारे न नहाने से यदि कोई संक्रामक बीमारी फ़ैली तो उसका सीधा-सीधा जिम्मेदार मैं ही होऊँगा।यानी यह तय था कि पाला गिरे या बर्फ़,हमें अपनी क़ुर्बानी तो देनी ही पड़ेगी।

मैंने बाल्टी की ओर से नज़रें हटाकर एक बार फिर बाहर की ओर दौड़ाई।पर कोहरे की सफ़ेद चादर ने नज़र को वहीँ ठिठका दिया।बाहर की धुंध के बजाय मुझे बाल्टी के अंदर का खुलापन ज्यादा अच्छा लगा।इससे मुझे जो थोड़ी हिम्मत मिली,उसे साथ लिए मैं बाथरूम के अंदर कूद पड़ा।मैंने पानी से अध-भरा डिब्बा पहले अपनी हिम्मत पर ही उड़ेला,हिम्मत वहीँ जम गई।इतने में बाहर से श्रीमती जी की आवाज आई कि साबुन वहीँ रखा है,उसे भी आजमा लेना।इतना सुनते ही मेरी हिम्मत को थोड़ी गर्माहट मिली और मैंने झट से पानी का दूसरा डिब्बा साबुन पर न्यौछावर कर दिया।बचे हुए पानी में मुझे अपने अन्तःवस्त्र भी भिगोने थे,इसलिए मैंने इसका भी ख्याल रखा।एक भले समाजवादी की तरह मैंने यह कर्म पूरे मनोयोग से किया।जब बाथरूम में मेरे नहाने के सारे साक्ष्य मौजूद हो गए,मैं ‘अच्छे दिनों’ के रैपर में लिपटकर बाहर आ गया।

बाथरूम के बाहर जश्न का माहौल था।श्रीमती जी ने गोभी के गरम पकौड़ों के साथ गिलास भर चाय हमारे सामने पेश कर दी।बच्चे देशभक्ति के गाने गा रहे थे।मैं सोचने लगा कि हमारे बाथरूम जाते ही ऐसा क्या हो गया है ? देश में हमारे नहाने से भी ज्यादा ज़रूरी और काम हैं।ऐसी ठण्ड में कश्मीर में बाप-बेटी या बाप-बेटे की सरकार नहीं बन पा रही है,यह चिंता का विषय होना चाहिए पर श्रीमती जी को राजनीति से कोई दिलचस्पी नहीं।उन्हें लगता है कि सरकार बनाने से कहीं अधिक कठिन काम पकौड़े तलना है।पकौड़े बनाने के लिए हर बार एक ही फार्मूला मेनटेन करना पड़ता है जबकि सरकार तो कैसे भी बन जाती है।उसके बनने के सारे विकल्प खुले रहते हैं।काश,मेरे नहाने को लेकर भी सारे विकल्प खुले रहते पर लगता है कि इस समय नहाना ही सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या है ।

रविवार, 28 दिसंबर 2014

अपनी-अपनी घरवापसी!

कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी।कुल्हड़ में चाय छनकर आ गई थी पर घने कोहरे के कारण हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था।चाय कुल्हड़ में ही पड़ी-पड़ी जमने लगी थी।अचानक मिले इस जीवनदान से चाय का हौसला बढ़ गया।उसने कुल्हड़ को थोड़ी-सी कुहनी मारी और कहने लगी--‘मेरे मन की बात सुनोगे ?’ कुल्हड़ पहले तो थोड़ा कुनमुनाया फिर कोहरे को चेहरे से झाड़कर बोला-कोई फायदा ना है।तू सुनाकर करेगी भी क्या ? या तो अभी पेट के अंदर चली जाएगी या मेरे अंदर पूरी की पूरी जम जाएगी।ऐसे में तू कहना क्या चाहती है ?’

चाय भीषण ठण्ड में भी उबल पड़ी।कुल्हड़ का इस तरह का रवैया उसे बिलकुल पसंद नहीं आया।उसने मुँहतोड़ ज़वाब देते हुए कहा—मेरा जीवन भले ही अल्पकालिक है पर यह क्या बात हुई कि हमें अपने मन की बात कहने का भी अधिकार नहीं है।तुम्हें अभिमान का नशा है और नशा किसी भी चीज़ का हो,बुरा होता है।सबको अपनी-अपनी बात कहने का हक है।सुड़कने वाले की बातें मैं हमेशा सुनती आयी हूँ।आज भी मैं उसकी बातें सुन-सुनकर केतली में ही उबल रही थी।अब न जाने कहाँ चला गया है वो ?

चाय की बात सुनकर कुल्हड़ थोड़ा सेंटिया गया और कहने लगा—हाँ,तुम ठीक कह रही हो।शाम को ही चौपाल में घरवापसी की बातें हो रही थीं।अभी रेडियो में भी कुछ ऐसा ही सुनाई दे रहा था।पर मेरी समझ में कुछ आया नहीं।अगर तुम्हारी घरवापसी हुई तो तुम पहले केतली में,फिर चूल्हे में और फिर उसके बाद कहाँ-कहाँ पहुँचोगी ? चाय-बागान तक चली भी गई और फिर घरवापसी की बात उठ गई तो इसी ज़मीन में मिलना होगा।सब कुछ कितना गड्ड-मड्ड सा हो जायेगा ना ? ’

चाय अब तक गम्भीर हो चुकी थी।’मन की बात’ की रट लगाये उसे अंदाजा नहीं था कि बात उसके अस्तित्व तक पहुँच जायेगी।’हाँ,तुम भी अपनी घरवापसी के लिए तैयार हो जाओ।तुम्हें कुम्हार के यहाँ भी जाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि तुम्हें मिलना तो इसी मिटटी में है।घरवापसी का यह सबसे बढ़िया शॉर्टकट होगा।लेकिन क्या हमें सुड़क जाने वाले की भी कभी घरवापसी होगी ?’ चाय ने थोड़ा ठंढाते हुए पूछा।

कुल्हड़ ने कुछ याद करते हुए बताया-‘एक दिन कुम्हार अपने मन की बात कह रहा था।पहले तो वह घरवापसी की बात सुनते ही बहुत खुश हो जाता था,पर अब डरा-सा रहता है।पूछ रहा था कि उसके पुरखे सायबेरिया से आये थे,तो क्या उसे वहां जाना पड़ेगा ? मेरे कुम्हार को तो ठण्डी भी बहुत लगती है।रही बात सुड़कने वाले की,वो तो तुम्हें पीकर अपनी गर्माहट वापस पा लेता है।घरवापसी के लिए उसे आदिमयुग में जाने की ज़रूरत नहीं है।अब जंगल में बचा ही क्या है ? इसलिए भुगतना तो तुम्हें और हमें ही है।’

चाय और कुल्हड़ की यह वार्ता चल ही रही थी कि घने कोहरे से निकलकर दो हाथ कुल्हड़ की गरदन तक आ गए।ये दोनों अपनी ‘घरवापसी’ के लिए तैयार हो चुके थे और सुड़कने वाला अब पहले से बेहतर महसूस कर रहा था।ऐसी कड़ाके की ठण्ड में उसे भी अपने घर जाने की चिंता सता रही थी।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

आइये घरवापसी पर आपका स्वागत है !

‘सबका साथ,सबका विकास’ का उद्घोष करने वाले अब पूर्ण रूप से सक्रिय हो गए हैं।अभी तक दड़बों में घुसे देश-उद्धारक और समाज-सुधारक यक-ब-यक सामने आ गए हैं।आठ सौ सालों के बाद देश अब जाकर जागा है।खबर है कि दो हज़ार इक्कीस तक इसे किसी भी सूरत में सोने नहीं दिया जाएगा।लूटे गए माल की तुरंत ‘घरवापसी’ ज़रूरी है।कितने अच्छे दिन आ गए हैं कि इंसान अब माल बन गया है।जगह-जगह शिविर लग रहे हैं ताकि भूले-बिसरे लोग अपने घरों को सुरक्षित लौट सकें।समाज-सुधारकों द्वारा बनाये गए असली घरों में आते ही उन्हें भूख,बेकारी और छुआछूत से पूरी तरह निजात मिल जाएगी।यह नए हिन्दुस्तान का निर्माण है।

साहिबे-आलम चुप हैं।वैसे तो वे अकसर अपने मन की बात को जनता के पास रेडियो और टीवी द्वारा ‘फेंकते’ हैं पर उन्होंने घरवापसी पर गहन चुप्पी साध रखी है।कई लोग जब उन्हें सदन में ढूंढ रहे थे तब वे राज्यों में अपनी सत्ता ढूँढ रहे थे।ख़ास जगहों और मौकों से ख़ास का गायब हो जाना ही असली जादूगरी है।ठण्ड में घरवापसी भी आम की ही ज़रूरी है,ख़ास तो चलता-फिरता हीटर होता है।उसके बयान में धार और उसकी म्यान में तलवार दोनों बाय-डिफॉल्ट होते हैं।

धर्म के पुजारी मैदान में अपनी-अपनी कुदालें लेकर कूद पड़े हैं।धर्मयुद्ध करने का यही सही समय है।अब न अंग्रेजों के ज़ुल्म सहने की आशंका है और न ही नए देश को साधने की चुनौती।खाते-पीते और शांति से बढ़ते समाज में वैसे भी धर्म की पूछ-परख नहीं होती,ऐसे में उनके बाज़ार का क्या होगा ? लुटा हुआ माल दुकान पर आ जाये तो उसे मनमाने ढंग से फिर बेचकर लूटा जा सकता है।बाज़ार में इकलौती दुकान होगी तो ज़ाहिर है,टर्न-ओवर भी बढ़ेगा।बार-बार ‘अच्छे-दिन’ की माँग करने वाले अब खामोश हो गए हैं।उन्हें अब न मंहगाई दुखती है और न भ्रष्टाचार हलकान करता है।बड़े डर के आगे इस तरह भी छोटे डर दूर किये जा सकते हैं।यह तो बस ‘अच्छे दिनों’ का एक सैम्पल भर है.

पहले सफाई-अभियान को बुलंदी पर चढ़ाया गया और इसके लिए सड़कों और कार्यालयों की सफाई के बजाय सोशल मीडिया को ग्लैमरस फोटुओं से नहला दिया.इसके साथ गाँधी जी को भी जी भर के याद किया गया.अब सफाई वाली झाड़ू किसी कोने में पड़ी है और गाँधी जी फ्रेम में टांग दिए गए हैं.
फ़िलहाल मुक्ति का नया राग ईज़ाद हो गया है.सब इसे पंचम सुर में अलाप रहे हैं.मंहगाई-मुक्त,भ्रष्टाचार-मुक्त,कांग्रेस-मुक्त,परिवारवाद-मुक्त भारत अब मानवता,समानता और सौहार्द-मुक्त होने की दहलीज़ पर खड़ा है।आइए,इन अच्छे दिनों में आपका...नहीं नहीं, केवल घरवापसी करने वालों का स्वागत है !

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

लुटे हुए माल की वापसी!

बाहर बड़ी धुंध छाई थी।रजाई छोड़ने की हिम्मत न हो रही थी पर बजरंगी काका ने आज पार्क में बुलाया था,सो बेमन से उठ के चल दिया।पार्क में पहुंचा तो देखा कि काका पूरी तैयारी के साथ आये हुए थे।उनके साथ चार बंदे और थे।मेरा चेहरा मफलर से पूरा ढंका हुआ था,सो वे पहचान नहीं पाए।मुझे देखते ही बोले,’घरवापसी करने आये हो क्या ? कहो तो इन चारों के साथ तुम्हारा भी किरियाकरम कर डालें ?’ इतना सुनते ही सुन्न हो चुकी मेरी देह में पता नहीं कहाँ से ऊर्जा आ गई।मैंने मफलर को थोड़ा परे सरकाते हुए जवाब दिया,’ काका,मैं तो अभी घर से चला आ रहा हूँ।अभी जिन्दा भी हूँ और आप क्रियाकर्म की बात करते हो ?’

बजरंगी काका मेरे करीब आकर फुसफुसाए,’नहीं भाई ! तुम्हें घरवापसी करने की कउनो ज़रूरत नाहीं है।ये तो विधर्मियों के लिए है।तुम तो भरे-पूरे इंसान लगत हौ।ई जो दुसरे धरम मा हमरा माल फँसा पड़ा है,वो ही लाने वास्ते सब करना पड़ रहा है।’मैंने अनजान बनते हुए कड़ाके की सर्दी में भी गरम सवाल दाग़ दिया,’तो क्या अब आपको मंहगाई,भ्रष्टाचार और कालाधन परेशान नहीं कर रहा ? चुनाव के पहले हमने तो यही सब सुना था ?’

बजरंगी काका अब अपनी पर आ गए,’देखो बचुआ ! पुरानी मसल है कि कहने और करने में फर्क होवे है ।हम ठहरे पुरनिया मनई इसलिए पुरानी बात ही हमरे लिए पत्थर की लकीर हवै।वो ही हमारे लाने गीता और रामायन है।हम लोगन ने बहुत बुरा टैम देखा है।अब हमरे अच्छे दिन आये हैं तो काहे न पूरा मजा लियें ? जल्दी ही अपन देश में सनातन धर्म का झंडा लहराएगा और हम विश्व-गुरु बन जइहैं।फिर बाकी देश हमरी ही पूजा-पाठ करैंगे।’

'तो  क्या इसीलिए ‘घरवापसी’ की अलख जगाये फिर रहे हो ? फिर तो आप को वनवासी होना पड़ेगा ?मैंने आख़िरी तीर मारते हुए पूछा।काका ने सारी आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा,’घरवापसी का मतलब औरों का हमारे साथ समा जाना है.मतलब जइसे समन्दर मा नदी-नाला मिल जात हैं।हम वनवासी थोड़े बनेंगे।माना कि हमरे पूर्वज पेड़न पर उछलत-कूदत रहे पर अब हम पूँछ कहाँ ढूँढ़त फिरेंगे ?असल बात तो या है कि जो हमरे धर्म को मानत हैं उनको बेकारी,भूख और छुआछूत से जिल्लत नाहीं होत है।बस सारी गड़बड़ उनके अधरम होने में ही है।इसलिये पूरे देश में अब हमरा ही झंडा और डंडा चलेगा।‘


इतना सुनते ही मुझे अपनी गरम रजाई का ख्याल आया और मैं घर की ओर चल पड़ा।काका अपने साथ लाए हुए माल की वापसी में व्यस्त हो गए।

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

गायब होते देश में।

उधर फाइल से दो पन्ने गायब हुए और इधर कोहराम मच गया।देश भर में इस पर गहन चिन्तन शुरू हो गया है कि आखिर वे पन्ने गए कहाँ ? ऐसा भी हो सकता है कि फाइल पर पड़े-पड़े वे ऊब गए हों और हवा-पानी के लिए बाहर चले गए हों।इसका मतलब उनके पाँव आ गए हैं पर कुछ लोग कह रहे हैं कि इसमें किसी का हाथ है।यानी सारा मसला पाँव के आने में हाथ का है।अब जांच एजेंसियां इसी बात पर हाथ-पाँव मार रही हैं।सरकार भी शुक्र मना रही है कि अच्छा हुआ कि पूरी फाइल को पाँव नहीं आये, नहीं तो वह पूरी की पूरी अदृश्य हो जाती।तब वह क्या करती ? बहरहाल,सरकार इस बड़े संकट से बच गई है।

पन्नों के गायब होने पर शोर मचना बहुत बचकाना टाइप का मामला लगता है।जहाँ प्लॉट के प्लॉट ,खेत के खेत और कम्पनी की कम्पनी मिनटों में गायब हो जाने का रिकॉर्ड क़ायम हो चुका हो,वहाँ एक फाइल से दो-चार पन्ने गायब होने से कौन-सा पहाड़ टूट गया ?उल्टे यह तो प्रशासन की साख बढ़ाने वाला कृत्य है।अब कार्यालय के अफसरों और बाबुओं के इतने बुरे दिन आ गए हैं कि वे ऐसी छोटी-मोटी गुमशुदगी करने में इतना टाइम ले रहे हैं।सरकार कहती है कि इस तरह के टुटपुंजिये काम में उसका कोई हाथ नहीं है।यह काम तो हाथ वाली सरकार ही कर सकती है।जाते-जाते उसी ने अपने हाथों का सदुपयोग किया होगा।हम तो बस इस पर जांच बिठा सकते हैं और अगर अगले पाँच साल में पन्ने मिल गए तो केस आगे तक भी ले जायेंगे।हम किसी को छोड़ेंगे नहीं।

जांच समिति पूरे मनोयोग से जांच में जुट गई है।उसे बड़ी-बड़ी फाइलों और दस्तावेजों के गुम होने की जांच करने का तगड़ा अनुभव है।इन पन्नों की खोज-खबर मीडिया और जांच समिति के गायब हो जाने तक जारी रहेगी।वैसे भी दो पन्ने गायब हो जाने से अधिक फर्क नहीं पड़ता है।दिन भर में कितने कार्यालयों से कितनी फाइलें गायब हो जाती हैं,क्या इससे कभी कुछ फर्क पड़ा है ?इससे कम से कम यह तो पता चलता है कि हमारे कार्यालयों में फाइलें धूल ही नहीं खाती हैं ,कभी-कभार टहलने भी निकल जाती हैं।ऐसे ही कभी कोयला फाइलें भी टहलने निकल गई थीं,जो आज तक पर्यटन पर ही हैं।हाँ,उनको टहलाने वाले ज़रूर सड़क पर आ गए हैं।

दरअसल,गायब होते समय में इतना कुछ गायब हो रहा है कि किसी फाइल का या कुछ पन्नों का गायब होना मायने नहीं रखता।गायब होते देश में इनका गायब हो जाना बेहद मामूली बात है। जहाँ रोजाना हजारों बच्चे खेल के मैदान और स्कूल से गायब होते जा रहे हों,चुनाव बाद मुद्दे हवा हो गए हों,लोगों के बीच से भरोसा और सरकार से सरोकार गायब होने लगा हो,वहाँ दो-चार पन्नों का गायब होना खबरों में कितनी देर तक टिक पायेगा,सोचना मुश्किल नहीं है।हमें तो उस दिन का इंतजार है,जिस दिन लिखी हुई इबारत से स्याही और दस्तावेज से तहरीर गायब हो जाएगी।

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

धरती का आँचल उड़ गया !

पहला दृश्य

स्कूल की घंटी उदास है।आज उससे मिलने न कोई हथौड़ा आया और न ही कोई बजानेवाला।उसे लगता नहीं कि फिर कभी वह पहले जैसा बज पायेगी।पहले उसे अपने बजने पर बहुत दर्द होता था,पर अब तो कोई दर्द ही महसूस नहीं होता।उसे लगता है कि कोई उसे जोर से बजाये ताकि वह अपने होने का अहसास कर सके पर हथौड़ा भी तो उसके पास नहीं आ रहा है।वह दूर कहीं चुपचाप पड़ा सुबक रहा है।हथौड़े को लगता है कि वह वार करना ही भूल गया है।उसका सारा जोर एकदम से कमजोर पड़ गया है।उसे उठाने वाले नन्हें हाथ कहीं बिला गए हैं।वह भारी बोझ तले दबा जा रहा है।

दूसरा दृश्य

कक्षा में चिर शांति है।दरवाजे खुले हैं पर कोई हलचल नहीं नज़र आती।जो शोर कभी तमाम प्रयासों के बाद भी काबू में नहीं आता था,आज बिलकुल नदारद है।बेंच सपाट पड़े हैं।उनने दरवाजे की तरफ से आँखें फेर ली हैं।वैसे उन पर मक्खियों के बैठने की भी जगह नहीं बची है।डेस्क उखड़े हुए हैं और उनकी गोद पथराई हुई है।ब्लैकबोर्ड रंगीन होकर पूरी कक्षा में छितर गया है।रोशनदान में एक उल्लू बार-बार फड़फड़ा रहा है।

तीसरा दृश्य

आँगन टकटकी लगाये ताक रहा है।अरसा हुआ नन्हें पांवों से उसे ठोकर खाए हुए।उसके सन्नाटे को चीरने के लिए उसके आर-पार कोई नहीं आ-जा रहा।गेंद दालान में बल्ले से चिपटी हुई पड़ी है।सामने खूँटी पर बस्ता टंगा है,जिस पर एक बदरंग टाई लटक रही है।किताबें बस्ते से झाँक रही हैं पर उनका मुँह बंद है।वे बस्ते के अंदर से छटपटा रही हैं पर निकल नहीं पा रहीं।किताबों के पन्ने हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं और ड्राइंग कॉपी के सारे रंग उड़ गए हैं।

चौथा दृश्य

आले पर रखा दिया टिमटिमा रहा है।चूल्हा खामोश है और आग पहले से अधिक सर्द हो गई है।दूध की कटोरी बताशे के बिना बिन पिए ही पड़ी है।अम्मा का अंजन डिबिया में ही सूख गया है और बाबा की छड़ी टांड़ पर हमेशा के लिए पसर गई है।घर की डेहरी पर दो आँखें अभी भी टंगी हुई हैं और उनका रुख बाहर की ओर है।ऐसा लगता है जैसे स्थाई रूप से वे वहीँ गड़ गई हों।घर के दरवाजे कभी न बंद होने के लिए खुले पड़े हैं पर वहाँ किसी भी मौसम के आने के आसार नहीं दिखते।लगता है,बयार ने भी रास्ता बदल लिया है।

इन चार दृश्यों को देखने के बाद किसी और दृश्य को देखने की ताक़त हममें नहीं बची है।आखिरी बार देखता हूँ कि धरती ने अपने आँचल को हवा में जोर से उछाल दिया है और आसमान ने अपना कद झुकाकर खूँटी पर टंगे बस्ते को अपने कंधे पर लाद लिया है।धीरे-धीरे वह क्षितिज में कहीं विलीन हो गया है।दूर कहीं सियारों के रोने की आवाजें आ रही हैं।इससे इतना तो ज़रूर पता चलता है कि धरती पर कुछ बचा हुआ है।

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

नशे की बात और चिलम !



संतू महराज कल शाम को अपनी चौपाल पर अलाव सुलगाते ही मिल गए।वे बहुत भड़के हुए थे।हमने सोचा सर्दियों में सरकार ने अपनी तरफ से अलाव न जलवाकर उनका तापक्रम बढ़ा दिया होगा पर बात कुछ और ही निकली।हमने उन्हें फुल इज्ज़त बख्शते हुए ऐसी कड़ाके की ठण्ड में भी उनका यूँ शोले-सा भड़क जाने का सबब पूछा।वे भरे बैठे थे और मौक़ा मिलते ही फट पड़े।कहने लगे-‘एक बार बयान देने के बदले में एक बार की माफ़ी पर्याप्त क्यों नहीं मानी जाती ? इतनी ठण्ड में भी हमसे तीन-तीन बार माफ़ी मंगवा ली गई ! यह कहाँ का लोकतंत्र है और कैसा न्याय है ?हमारे बयान की न सही,हमारे चोले की तो इज्ज़त की जाती !’

हमने उनकी पीड़ा की गहराई को समझा और उतने ही गहरे उतर कर बोले-महराज ! आप अधिक कुपित न हों।सफ़ाई-अभियान के दौर में जितना भी कूड़ा-कचरा है,बहकर निकल जाये,अच्छा है।आप वैसे भी विरागी हैं,कुछ असर होगा नहीं।आपके बयान ने इत्ती ठण्ड में गर्माहट पैदा कर दी,यह क्या कम है ? लोग नादान हैं,आपके योगदान को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं’

संतू महराज ने पलटकर जवाबी हमला किया,’हमें अपने बयान देने का दुःख नहीं है।हमारी जेब से एक साथ तीन-तीन माफियाँ सरका ली गईं जो बेहद आपत्तिजनक है।बयान तो हमारे पास ख़ूब भरे पड़े हैं या यूँ कहिये कि हम बयानों के रंग में ही रंगे हुए हैं।इस रंगीन माहौल में माफ़ी हमें पैबंद-सा लगती है।सबसे अखरने वाली बात है कि इसका स्टॉक भी हमारे पास पर्याप्त मात्रा में नहीं है।ऐसे में हम कुपित न हों तो क्या करें ?’


‘पर अब तो रामराज्य है,आपको किसी से डरने की क्या जरूरत ? रही बात लोकतंतर की,सो वो तो पहले ही सठिया गया है।उसकी बातों को अब कोई गंभीरता से लेता भी नहीं है।अब उसके वानप्रस्थ का समय आ गया है,आपकी किरपा रही तो जल्द ही उसका वनगमन हो जायेगा।’हमने उन्हें दिलासा देते हुए पुचकारा।


संतू महराज ने घने कोहरे में मुक्केबाजी करते हुए चिलम की ओर हाथ बढ़ाया तो हमने उन्हें ‘मन की बात’ याद दिलाई।वे बोले-‘वत्स ! हम नशे के लिए चिलमबाजी नहीं करते।हम तो आलरेडी नशे में हैं।चिलम तो ज्ञान-चक्षु खोलती है।आप भी आजमायें और ‘राष्ट्रीय-ज्ञान’ पाएँ ।’हमने उनके इस ज्ञानी-बयान को सर पर लपेटा और सुरक्षित घरवापसी के लिए नई योजना बनाने लगा।उधर संतू महराज की चिलम धू-धू कर जलने लगी थी.

रविवार, 14 दिसंबर 2014

सरकार को ही 'राष्ट्रीय' घोषित कर देना चाहिए।

देश में इस समय सब कुछ राष्ट्रमय हो गया है।सरकार भी समझ रही है कि सारे लोग उसकी थाप पर राष्ट्रवादी मूड में नाच रहे हैं।राष्ट्रवादियों ने बड़ा दिमाग लगाया और पाया कि विभिन्नता में एकता वाले राष्ट्र से बड़ा कन्फ्यूजन क्रिएट हो रहा है।इसलिए राष्ट्र की अलग-अलग पहचान घोषित कर दी जाए,जिससे आने वाली पीढ़ी अपने बीच में से गैर-राष्ट्रीय को छाँटकर अलग कर सके।निश्चय यह किया गया कि जितने प्रतीकों पर ‘राष्ट्रीय’ का लेबल लगाया जा सके,जल्द लगाया जाय।यह काम खुलेआम अच्छा-सा बयान फेंककर किया जा सकता है।इससे पारदर्शिता के लिए सरकार की प्रतिबद्धता पर किसी को कोई शक भी न होगा।

राष्ट्रहित में गंभीर चिंतन करते हुए ऐसे बयान आने भी लगे हैं।सबसे पहले गीता को ‘राष्ट्रीय ग्रन्थ’ का दर्जा देने की बात की गई।बयान के साथ ही कुछ वजहें भी नत्थी की गईं,जिससे ऐसा करना निहायत ज़रूरी हो गया था।कहा गया कि देश में ग्रन्थों को लेकर बड़ी सुस्ती बरती जा रही है।लोग आधुनिक संचार साधनों के जंजाल से इतना चिपटे रहते हैं कि उन्हें धर्म की बातें पढने-सुनने का मौका ही नहीं मिलता।इन्हीं वजहों से लोग बाबाओं के आश्रमों और डेरों की ओर पलायन कर रहे हैं।यही सही समय है कि उन्हें ‘राष्ट्रीय ग्रन्थ’ की उपयोगिता से अवगत कराया जाय।

गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने के पीछे इसका सूत्र-वाक्य है,’कर्म किये जा,फल की इच्छा मत कर तू इंसान,ये है गीता का ज्ञान’।अब इसको ढंग से समझने की ज़रूरत है,पर कुछ लोग केवल गीता का नाम सुनकर ही उछल पड़े हैं।अरे भाई ! ज़रा सेकुलर-खाँचे से निकलकर सोचिये,अर्थ स्पष्ट हो जायेगा।गीता कहती है कि तुम्हारा काम केवल कर्म करना है।फल की चिंता तुम मत करो।उसे तो हम हासिल कर ही लेंगे।तुम्हें मिलेगा भी तो किसी काम का नहीं।आजकल फल पाने से ज्यादा उसको बचा या पचा पाना बहुत मुश्किल हो गया है।इसे राष्ट्रीय घोषित करने से इसका संरक्षण स्वतः हो जायेगा और हमारी राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी पूरी हो जाएगी।लोग तो केवल इसका जाप करें,किसी तरह की उम्मीद न करें।अगले चुनावों से पहले हम उसकी उम्मीदों को जगा देंगे और याद दिला देंगे कि उसका काम केवल वोट देना है ,बस।

सरकार की इस ‘राष्ट्रीय नीति’ में हमें भी दम लगता है।लगे हाथों इस विषय में कुछ सुझाव हमारी ओर से भी पेश हैं।सरकार को चाहिए कि वह योग सिखाने वाले बाबा को राष्ट्रीय संत घोषित कर दे,इससे उन्हें पूर्ण संरक्षण प्राप्त होगा और वो बेखटके अपना धंधा-पानी बढ़ा सकते हैं।कालेधन को ‘राष्ट्रीय शर्म’ घोषित कर देने से उसका नाम लेना भी शर्म का विषय हो जायेगा।ऐसे में मारे शर्म के कोई भी उस मुद्दे को उठाने से बचेगा।सरकार को भी अपना काम करने का समय मिलेगा।

सरकार को सबसे बड़ी राहत बयानबाजी के क्षेत्र में मिलेगी।आये दिन कोई न कोई मंत्री ऐसा बयान दे देता है,जिससे तूफ़ान आ जाता है।इसकी काट के लिए एक अचूक उपाय है।जिस बयान पर भी हंगामा शुरू हो जाय ,उसे तुरंत ‘राष्ट्रीय बयान’ घोषित कर दिया जाय।इससे उस बयान और सम्बंन्धित मंत्री को स्वतः संरक्षण प्राप्त हो जायेगा।संसद में इस बहाने कुछ काम-धाम भी हो लेगा।

आये दिन स्त्री-सुरक्षा को लेकर सरकार लाचार दिखती है ।इस फार्मूले से इसका भी निदान हो जायेगा।क्यों नहीं स्त्री को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ घोषित कर दिया जाय ! इससे वो अपने-आप संरक्षण पा लेगी और सरकार भी अपने दायित्व से मुक्ति।’राष्ट्रीय धरोहर’ के लिए किसी दिवालिया होती विमानन कम्पनी से बेहतर कुछ नहीं होगा।इससे नए साल के आकर्षक कलेंडर छपना भी सुनिश्चित हो जायेगा और बेरोजगार मॉडलों को काम भी मिल सकेगा।

लोग कहते हैं कि कुछ बदल नहीं रहा है।जब ‘राष्ट्रीय’ तमगा मिलने पर ही सब कुछ चकाचक और दुरुस्त हो जाने की उम्मीद है तो सरकार को पहाड़ खोदने की क्या ज़रुरत है ? फिर भी किसी को सरकार से शिकायत रहती है तो सरकार को ही ‘राष्ट्रीय’ घोषित कर दिया जाय,इससे किसी को उस पर उँगली उठाने का मौका भी नहीं मिलेगा।

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

काजू-बादाम और मंत्री जी।

सुबह जैसे ही अखबार पर नज़र गई,बड़ा अफ़सोस हुआ।एक राज्य के बहुत बड़े मंत्री जी जैसे ही गाड़ी से उतरे,उनकी जेब में पड़े काजू-बादाम तुरंत ज़मीन पर आकर लोट गए।किसी नासपीटे फोटोग्राफर ने इस हादसे की फोटो भी खींच ली।पर फोटो से इस बात का पता नहीं चल रहा था कि काजू-बादाम को जेब से निकलकर राहत मिली है या मंत्री जी के मुँह में ही उनको आराम मिलता।बहरहाल,हमें मंत्री जी की चिन्ता है कि बिना काजू-बादाम के उनका क्या होगा ?

मंत्री जी बुजुर्गवार हैं।उन्हें राज्य को चलाते रहने के लिए खुद का चलते रहना ज़रूरी लगता होगा।इसके लिए सबसे ज़रूरी है कि मुँह चलता रहना चाहिए।पागुर करने से जानवर भी लम्बे समय तक अपना जीवनकाल बढ़ा लेते हैं,फ़िर ये तो मंत्री जी ठहरे।कई मंत्री और नेता तो चलते ही बुढ़ापे में हैं।इस वक्त सबसे ज़्यादा सक्रिय होने की ज़रूरत होती है।हमारे देश में एक बुजुर्ग तो भरे बुढ़ापे में प्रधानमंत्री बन गए थे।उसके बाद तो हवाला,झामुमो कांड जैसे कई काम चल निकले।एक और बुजुर्ग नेता तो आखिरी दिनों में इतना चले कि पिता तक बन गए।चलते रहने के लिए ऊर्जा की ज़रूरत होती है और ऊर्जा के लिए भोजन की।काजू-बादाम ने खुद चलकर इस परम्परा का उल्लंघन किया है।अब अगर किसी प्रोजेक्ट के काम में मंत्री जी शिथिल पड़ गए तो इसकी पूरी जिम्मेदारी इन्हीं पर होगी।इन्हें गिरना नहीं चाहिए था।इस काम को काम मंत्री जी पर छोड़ देना चाहिए।

बड़ी चिन्ता का विषय यह नहीं है कि काजू-बादाम क्यों गिरे बल्कि चिन्ता इस बात की ज़्यादा है कि इस गिरने की वज़ह से यदि मंत्री जी गिर जाते तो क्या होता ? एक गिरा हुआ मंत्री पूरे राज्य या देश को गिरा सकता है।यही बड़ा संकट है।काजू-बादाम तो और आ जायेंगे।उनका मंत्री जी की जेब में होना या किसी व्यापारी की दुकान पर होना एक-सा ही मामला है।अन्ततोगत्वा उन्हें मंत्री जी के मुँह का प्रसाद ही बनना है।हाँ,यह ज़रूर बड़ी चिन्ता का विषय है कि बिना काजू-बादाम खाए अगर जनता की सेवा की जाती है तो वह कितनी कमजोर होगी ! काजू-बादाम को मंत्री जी की जेब और मुँह में रखने से ही उनकी वास्तविक कीमत मिलती है इसलिए भी उनको वहाँ से स्खलित होने या गिरने से बचना चाहिए था।

गिरे हुए काजू-बादाम को अगर मंत्री जी का संतरी उठा लेगा तो भी क्या होगा ? न तो वह उन्हें खाकर स्वयं मज़बूत होगा और न ही उनकी कीमत बढ़ा पायेगा ! इसलिए काजू-बादाम का मंत्री जी की जेब से गिरना घोर चिन्ता का विषय है।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

भरोसे काका और परसन ऑफ़ द इयर !

गाँव में कल भरोसे काका मिले,बड़े दुखी लग रहे थे।पिछली बार जब गाँव आया था,उस वक्त देश में नई सरकार आई थी।भरोसे काका के चेहरे पर खूब रौनक थी।छः महीने बाद ही सूरत का यह हाल देखकर मुझसे रहा न गया।मैंने पूछ ही लिया-काका,गेहूँ की फ़सल गड़बड़ा गई है क्या ? अभी तो ठण्ड की शुरुआत है,मौसम सुधरते ही फ़सल सुधर जायेगी।काहे चिन्ता करते हैं ?

काका ने तुरंत प्रतिवाद किया-नहीं बच्चा ! फसल तो मौसम बदलने पर सुधर लेगी,हमें उसकी चिंता नहीं है।छह महीने हो गए हैं पर अबतक सिर्फ़ गोलाबारी जारी है।उधर दुश्मन देश लगातार हमारे बन्दों को मार रहा है और इधर रेडियो और टीवी पर आतिशबाजी चल रही है।काला धन पाकिस्तान की तरह पहले से अधिक बेफिक्र हो गया है।हमारे सैनिक अपने ही देश में नक्सलियों के शिकार बन रहे हैं।क्या ख़ाक बदला है सरकार बदलने से ?

मैंने भरोसे काका की उम्मीद को बचाने की पूरी कोशिश की।उन्हें ताज़ा जानकारी दी कि हमारे देश में विदेशी पूंजीनिवेश की रिकॉर्ड आमद हुई है और अपने प्रधानमंत्री को ‘परसन ऑफ़ द इयर’ में सर्वाधिक वोट मिले हैं।बहुत कुछ बदल रहा है।अभी एक मंत्री ने गाली-गलौज करके बयान तक बदल लिया है और आप यूँ ही दिल को तपती हुई भट्टी बना बैठे हैं।थोड़ा समय दीजिये,अभी तो छह महीने ही हुए हैं।’

काका हमारे समझाने से और उखड़ गए।कहने लगे-हमने तो अपने देश के स्वाभिमान के लिए उनको वोट दिया था।वो इसमें भी विदेशी-निवेश ला रहे हैं।कह रहे हैं कि बाहर से पैसा आएगा तभी विकास होगा।रही बात ‘परसन ऑफ़ द इयर’ की,तो ये क्या बला है ? हमने तो उन्हें कब का वोट दे दिया था।अभी तक वो वोट ही माँग रहे हैं ? यह किस तरह की सरकार है ? हमें तो काम के बदले नाम का ही नगाड़ा ज्यादा सुनाई दे रहा है !’

‘काका,आप नहीं समझेंगे।हमारे प्रधानमंत्री को दूसरे मुलुक के लोग अब गौर से सुनते हैं।जल्द ही अमरीका वाले अंकल भी देश में आ रहे हैं।अब हम पहले से ज्यादा ताकतवर हो गए हैं’ मैंने पूरी  ताक़त से अपनी बात कह दी।

लगता है काका पहले से ही तैयार बैठे थे।उन्होंने कुछ पुरानी अखबारी-कतरनों को हमारे सामने बिखेर दिया।उस कतरन के सारे समाचार हमारे हाथ में आज के अख़बार में हूबहू चमक रहे थे।पन्नों पर सूरतें बदली हुई थीं,पर बयान और अपमान दोनों अपनी-अपनी जगह पर क़ायम थे।काका अपने भरोसे के साथ उठ गए पर हमारे पास तो वो भी नहीं बचा था ।

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

बीस हजार की थाली!

आज एक भ्रम और टूट गया।हम अब तक अपने को आम आदमी ही समझ रहे थे पर जैसे ही खबर मिली कि इसके लिए हमें अपने टेंट से बीस हज़ार रूपये ढीले करने पड़ेंगे,हमारे तेवर भी ढीले पड़ गए.आम आदमी बनने की पात्रता बीस हज़ार की थाली में भोजन करना हो गया है।यानी आम आदमी बनना भी अब हमारे अपने बस में नहीं रहा।पिछले दिनों जब पाँच और बारह रूपये की थाली मिल रही थी,तब भी अपन ताकते रह गए थे और दूसरे उस थाली के व्यंजन उड़ा ले गए।उस वक्त हमने जिस किसी से वैसी थाली की माँग की तो लोगों ने भंडारे का रास्ता दिखा दिया ।हम आम आदमी के स्टेटस को बरक़रार रखने के लिए वहाँ भी गए थे पर हमसे पहले ही वहाँ दूसरों ने हाथ साफ़ कर दिया।इस तरह उस समय भी हम बहुत थोड़े अंतर से आम आदमी बनने से वंचित रह गए थे।

अच्छे दिनों की आमद के बाद हमको यकीन था कि जल्द ही हमारी यह मुराद पूरी हो जाएगी पर अब उसमें भी पलीता लगता दिख रहा है।पहले मँहगा पेट्रोल और मँहगी सब्ज़ी खरीदते हुए लोगों ने हमारे आम आदमी होने पर शक किया,बाद में जब पेट्रोल पानी के भाव और सब्जी बिना मोलभाव के बिकने लगी तो लोगों ने मौसम पर शक करना शुरू कर दिया।अब ऐसे अच्छे मौसम में आम आदमी की थाली बीस हज़ार में मिले और हम उसे वहन न कर पाएँ तो भला किस लिहाज़ से आम आदमी हुए ?

पाँच और बारह रूपये की थाली एकदम से बीस हज़ार तक पहुँच जाय तो पता चलता है कि विकास की रफ़्तार कित्ती तेज़ है ! अख़बारों में विकास की खबरें मोटे-मोटे हर्फों में चमक रही हैं।दिन-दहाड़े एटीएम वैन से करोड़ों रूपये बटोरे जा रहे हैं तो किसी की गाड़ी से करोड़ों रूपये बरामद हो रहे हैं ।ऐसे में हमारी गाढ़ी कमाई स्वयं शर्मसार हो लेती है।वह जब भी अपनी जेब टटोलती है तो उसे बीस रूपये से अधिक नहीं मिलते हैं।इसका मतलब सारा झोल हमारे होने में ही है।गिरा हुआ भाव तो उठ लेता है पर हम जैसा आदमी कभी नहीं।

काले धन की चिर-पुकार लगाने का हक़ भी हमें किस तरह हासिल होगा,जब हम बीस हज़ार रूपये तक नहीं जुगाड़ सकते।जिनको असल चिंता है वे काली छतरी और काली शाल ओढ़े संसद में बैठे हैं।हमारी सबसे बड़ी चिंता आम आदमी बनने की है।पहले बीस हज़ार आएँ,हम आम आदमी बनें,तब कहीं जन्तर-मन्तर पर जाकर काले-धन को आवाज़ देने का हौसला जुटाएँ !