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गुरुवार, 27 नवंबर 2014

ज्योतिषी जी और हमारी गृहदशा !

जैसे ही घर से कार्यालय के लिए निकला कि पता नहीं कहाँ से मोटी-काली बिल्ली मेरा रास्ता काट गई।ऐसा लगा,जैसे वो बस मेरे ही इंतजार में बैठी थी।मेरे पड़ोसी गुप्ता जी दस मिनट पहले ही निकले थे,नासपीटी तभी अपने बाहर निकलने का मुहूर्त निकाल लेती ! उसका रंग तो काला था ही,आँखें भी गोल-गोल,बड़ी-सी।देखकर मैं तो जगह पर ही स्टेचू हो गया।सोच ही रहा था कि क्या करूँ,आगे जाऊँ या घर लौटकर पानी पीकर मुहूर्त दुरुस्त करूँ,तभी मोबाइल की घंटी बज गई।कार्यालय से शर्मा जी का फोन था।मैंने किसी आशंका के डर से फोन ही नहीं उठाया।घर वापिस लौट पड़ा।

इतनी जल्दी घर में मुझे फिर पाकर श्रीमती जी परेशान हो गईं।मैंने उनसे एक गिलास पानी माँगा तो वे चिंतित होकर कहने लगीं-क्या बात हो गई ? ब्लड-प्रेशर फिर से बढ़ गया क्या ? मैंने बिल्ली वाली बात उन्हें बताई तो लगा जैसे उन्हें दिल का दौरा आ गया हो।वे बड़बड़ाने लगीं-‘मैंने कई बार आपको कहा है कि हमारी गृहदशा इस समय ठीक नहीं चल रही है पर आप सुनते कहाँ हैं ? ज्योतिषी नत्थूलाल जी से पिछले सप्ताह ही बात हुई थी।वो कह रहे थे कि किसी ने हमारे परिवार पर कुछ कराया हुआ है,इसी से मुसीबतें हमारी ओर दौड़ी आ रही हैं।आज शाम को पंडित जी से मिलते आना।’
मैंने पानी का गिलास लेने के लिए उनकी ओर हाथ बढ़ाया पर यह क्या...वह सीधे धरती पर धड़ाम ! अब तो मुझे भी लगने लगा कि ज़रूर कोई प्रेतछाया हमारे परिवार के पीछे पड़ी है।मैं तुरंत ही पंडित जी के यहाँ भागा।पंडित जी पत्रा खोले बैठे जैसे मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे।मुझे देखते ही बोले-वत्स,तुमने बहुत देर कर दी।मैंने घबराते हुए पूछा –क्या अब कुछ नहीं हो सकता है ? पंडित नत्थूलाल ने चश्मे को ठीक करते हुए पत्रा पर नज़र गड़ाई और बोले-तुम हमारे पुराने जजमान हो,तुम्हारा तो कल्याण करना ही होगा।हाँ,जो बात पहले एक ताबीज़ पहनने से हो जाती,अब उसी के लिए घर में पूजा करवानी पड़ेगी।मुझे हर हाल में समाधान चाहिए था,इसलिए पूजा के लिए हाँ कर दी।पंडितजी ने इसके लिए मात्र दस हज़ार रूपये वहीँ रखवा लिए।

मैं उनसे मिलकर लौट ही रहा था कि कार्यालय से शर्मा जी का संदेश आया कि आज मंत्री जी का दौरा था और बिना सूचना के कार्यालय से अनुपस्थित रहने पर मुझे सस्पेंड कर दिया गया है।इतना सुनते ही मेरे तो होश उड़ गए।मुझे काली बिल्ली और पंडित नत्थूलाल फिर से याद आने लगे।क्या पता अब पूजा-पाठ के बाद मैं ही मंत्री बन जाऊँ !

समाजवाद बग्घी पर उतर आया है!

पूँजीवाद से टक्कर लेने के लिए समाजवाद आखिर सड़क पर आ ही गया।पिछले कुछ समय से पूँजीवाद लगातार हवाई हमले करके समाजवाद को सीधी चुनौती दे रहा था,सो उसने भी बग्घी पर उतरने की ठान ली।उत्तम प्रदेश में उत्तम साज-सज्जा के साथ समाजवाद ने ऐतिहासिक बग्घी पर सवार होकर अपनी प्रजा को कृतकृत्य कर दिया।नेता जी ने नवाब साहब के साथ मिलकर समाजवाद को प्रजा के हवाले कर दिया।अब यह प्रजा पर निर्भर है कि वह पिटे हुए मोहरे को लेकर अपना सिर पीटे या नेताजी का प्रसाद समझकर उसे कंठस्थ कर ले।उल्लेखनीय है कि पचहत्तर पार की संन्यास-गमन की अवस्था से भी नेता जी विचलित नहीं हुए।उन्होंने जनहित को देखते हुए स्वयं के बजाय समाजवाद को ही संन्यास पर भेज दिया।अब भी किसी को नेता जी की समाजवाद के प्रति गहरी आस्था पर शंका हो तो समाजवादी-केक को चट कर चुके नवाबों पर एक नज़र डाल ले,बेचारे कितने दुबले हो गए हैं !

समाजवाद के यूँ खुल्लमखुल्ला सड़क पर आने से गाँधीवाद को भी चैन मिला है।उसे लग रहा था कि लोकतंत्र की गठरी उसे अकेले ही ढोनी पड़ेगी पर अब उसे मज़बूत साथी मिल गया है।बदलते दौर में गाँधीवाद पूँजीवाद के साथ कदमताल नहीं मिला पा रहा था।अच्छा हुआ कि समय रहते समाजवाद ने अपना नैनो संस्करण ‘परिवारवाद’ लाकर नवीनीकरण कर लिया है।अब अपना परिवार ही समाज है और अपने नेता जी ही सबके नेता।बीच में कुछ समय के लिए पूँजीवाद से लोहा लेने के लिए लोहियावाद ने अपने हाथ-पाँव मारे थे,पर ‘परिवारवाद’ के लोकप्रिय संस्करण के आगे जल्द ही वह समाजवादी अखाड़े में चित्त हो गया।ऐसे में समाजवाद को धूमधाम से बग्घी पर बिठाकर उसका एहतराम किया जाना लाजमी था।

उत्तम प्रदेश में एक ही तम्बू के नीचे कम्बल और कफ़न वितरित होने लगे हैं,इससे बढ़िया समाजवाद की स्थापना और क्या हो सकती है ? इससे नेता जी खुश हैं कि उनका जलवा अभी तक कायम है;नवाब खुश हैं कि बिना ताज के ही वे वास्तविक नवाब हैं और प्रजा खुश है कि उसे मरने का उचित मुआवजा मिल रहा है।सच्चा समाजवाद यही है कि सब अपना-अपना हिस्सा लेकर खुश रहें और गाँधीवाद की तरह बात-बात पर चिल्ल-पों न मचाएं।निरा समाजवाद से न तो जेब भरती है और न ही पेट,इसलिए इसका अपडेट होना भी आवश्यक है.पूँजीवाद के बजते ढोल के बीच समाजवादी-बग्घी की सवारी निकल रही है.इससे गाँधीवाद का सपना भी पूरा होगा और समाज से विलुप्त हो रहे परिवारवाद को भी संजीवनी मिलती रहेगी ।

शनिवार, 22 नवंबर 2014

सम्मानित होने का सुख !

वे लेखक हैं पर लोग मानने को तैयार नहीं हैं।उन्होंने लिखने में टनों कागज़ काम पर लगा दिया पर वह फिर से लुगदी बनने को मजबूर है।कोई पढ़ने वाला ही नहीं है।जैसे ही वे किसी लेखक के सम्मानित होने का समाचार पढ़ते हैं,उनके अंदर का साहित्यकार फड़फड़ा उठता है।हर दिन नए संकल्प के साथ वे रचना-कर्म में जुट जाते हैं पर लाइमलाइट में नहीं आ पाते।वे इन दिनों नई जुगत में भिड़े हैं।किसी ने उनके कान में फूँक दिया है कि जब तक वे सम्मानित नहीं हो जाते लेखक नहीं कहलाएंगे।सो आजकल वे किसी सम्मानित करने वाले को ताक रहे हैं।फूल-माला लिए आते हर शख्स पर उन्हें सम्मानकर्ता होने का संदेह होने लगता है।पर मुश्किल है कि अभी किसी को उन पर लेखक होने का संदेह तक नहीं हो पाया।इसलिए वे बेचैन हैं।

लेखक होने का दर्द उनको साल रहा है।लेखक न होते तो कोई बात नहीं,पर होकर भी न होना बड़ा अपमानजनक है।लिखे हुए का सम्मानित होना आवश्यक है,अन्यथा लिखना ही वृथा।इस नाते सम्मानित होना मौलिक अधिकार बनता है।उनका वश चले तो इसे अगले कानून-संशोधन में प्रस्तावित करवा दें।अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो लिखने पर ही पाबंदी लगा दे।इससे उन्हें संतोष तो होगा कि लिखने का श्रम व्यर्थ नहीं हुआ।सार्थक लेखन तभी है जब वह सम्मानित होकर लेखक को भी कुछ दे जाय।वे तो बस एक छोटे श्री फल,सस्ते शाल और पान-सुपाड़ी पर ही संतोष कर लेंगे।बंद लिफ़ाफा मिल जाय,भले ही खाली हो,तो वे एकदम से बड़े लेखक बन सकते हैं।ताम्रपत्र की जगह ए-फोर साइज़ की घटिया शीट पर भी वे अपना प्रशस्ति-पत्र छपवाने को बुरा नहीं समझेंगे।इस सादगी और मितव्ययिता से लगे हाथों वे गाँधीवादी लेखक भी बन जायेंगे।

वे बड़े सम्वेदनशील हैं।लेखक को होना भी चाहिए।समाज में सम्मानरहित जीवन उन्हें कतई रास नहीं आ रहा।वे लिखने-पढ़ने के बजाय इसकी जुगत में लगे हैं।कुछ सम्मानित हों,तो प्रेरणा मिले।फिर लेखन भी हो।सम्मानोपरान्त लेखन की अपनी आभा होती है।लेख के बाद कैप्शन में दिया जा सकता है;लेखक फलाँ,फलाँ पुरस्कार से सम्मानित।इससे दूसरे सम्मानकर्ताओं को प्रेरणा मिलेगी।वे भी उनको सम्मानित करने दौड़ पड़ेंगे।सम्मान की फोटो सहित खबर जब सोशल मीडिया और अख़बारों पर छपेगी,वे लहालोट हो जायेंगे।उनकी बिरादरी के दूसरे लोग जितना जल-भुन कर राख होंगे,उनके सम्मान में उत्ती ही तीव्र गति से वृद्धि होगी।वरिष्ठता ऐसे ही आती है।जितने ज्यादा सम्मान के पुलिंदे ग्रहण कर पाएंगे,उत्ते ही वरिष्ठ कहलायेंगे।इसलिए सम्मान पाने पर उनका ज्यादा फोकस है।

वे लिखने से समझौता कर सकते हैं पर सम्मान से नहीं।बचपन में कहीं गलती से पढ़ लिया था,’अकीर्तिं चापि भूतानि,मरणादतिरिच्यते’।अब वही पाठ उन्हें जीने नहीं दे रहा।यश से रहित जीवन मृत्यु से भी अधिक है।यश न होना उनके लिए अपयश है।लेखक होकर कोई आपको न जाने,न सम्माने,ये तो मरने वाली बात है।उनका लेखन अब सम्मान के अभाव में दम तोड़ने की कगार पर है।उनको सम्मान मिले तो लेखन को प्रेरणा मिले।उनका लेखन प्रेरित होगा तो समाज को भी प्रेरणा मिलेगी।सम्मान के बिना यदि वे इस दुनिया से कूच कर गए तो पूरा साहित्यजगत इस हिंसा और अन्याय का जिम्मेदार होगा।इसके पहले कि कोई अनहोनी हो;सभी सरकारी,असरकारी संस्थाओं से निवेदन है कि साहित्य को होने वाली संभावित अपूरणीय क्षति से बचा लें।टैक्स-चोरी और धतकर्मों में संलिप्त संस्थाएं भी लेखक के सम्मान के लिए आगे आ सकती हैं।सम्मान ये सब भेदभाव नहीं देखता,इसलिए वे बस टकटकी लगाये सम्मानित करने वाले की राह देख रहे हैं।

बुधवार, 19 नवंबर 2014

जेड प्लस वाले बाबा जी !

ताज़ा ताज़ा जेड प्लस सुरक्षा पाए बाबा जी से मुलाक़ात हो गई।बाबा जी विकट प्रसन्न दिख रहे थे।उनके इर्द-गिर्द बीस-तीस कमांडो दिखाई पड़े।हमें नजदीक आते देखकर उन्होंने अपनी पोजीशन संभाल ली।बाबा जी के आशीर्वादी-हाथ के बजाय कमांडो की बंदूकें हमारी ओर तन गईं तो तनिक देर के लिए हम भी डर गए।तब तक बाबा जी ने हमारे चेहरे पर आये डर के भाव पढ़ लिए।उन्होंने अपने गनमैनों को शांत रहने का संकेत दिया।हमने बाबा जी को पहले से संचित आदर में और वृद्धि करते हुए प्रणाम किया।बाबा बोल पड़े-पूछो वत्स,जो भी पूछना है।मुझे राजधानी में योग-शिविर का उद्घाटन करने जाना है।

हमारा पहला सवाल था-बाबा जी,अचानक आपको सुरक्षा की ज़रूरत कैसे पड़ गई ? आप तो संत हैं,योगी हैं।आपको किससे खतरा है ?

बाबा एक आँख जमीन पर और दूसरी शून्य में गाड़ते हुए उवाचे-वत्स,समय बदल गया है।बुरे दिनों में तो सब सतर्क रहते हैं।पेटीकोट-धोती आदि से भी रक्षा की जा सकती है पर अच्छे दिनों में पता नहीं कौन अच्छे हथियार से आक्रमण कर दे ? हमारे दुश्मन इसलिए भी बढ़ गए हैं क्योंकि कई लोगों को लगता है कि काले धन की पहली खेप हमारे पास ही आएगी।इसलिए सुरक्षा ज़रूरी है।

हमने अगला सवाल किया-पर यह सुरक्षा जेड प्लस ही क्यों ? यह सरकारी खर्च का अपव्यय नहीं होगा ?

बाबा ने एक दृष्टि सभी कमाण्डोज पर डाली और आश्वस्त होकर बोले-देखिये ,’ए टू जेड’ सुरक्षा भेदी जा सकती है इसलिए जेड के आगे की सारी आशंकाएं इसमें शामिल कर ली गई हैं।पिछली सरकार ने हम योगियों और संतों पर बड़ा अत्याचार किया था।हम तो योगी हैं।किसी से क्या मतलब,पर हमें अपना काम-धंधा भी चैन से नहीं करने दिया जाता।देखिए,एक संत हरियाणा में अपनी सुरक्षा खुद कर रहे हैं।वो इस मामले में आत्मनिर्भर हो गए हैं।सरकार को चाहिए कि संत की रक्षा के लिए पूरी पलटन भेज दे और हमें ख़ुशी है कि वहां की सरकार ऐसा ही कर रही है।

‘मगर उन पर तो हत्या का आरोप है।वे क्यों बचाए जा रहे हैं ?’ हमने आखिर पूछ ही लिया।

बाबा जी ने शीर्षासन करते हुए कहा-संत कभी गलत नहीं होता।सारे आरोप मिथ्या हैं।कल तक पुलिस हमारे पीछे पड़ी रहती थी,आज देखिये आगे-पीछे घूम रही है।सब करने से होता है।हमने चुनाव में सरकार के लिए किया,अब सरकार हमारे लिए कर रही है।वत्स,तुम अभी नादान हो।पुराने चैनल से त्यागपत्र दे दो,तुम्हारे भी अच्छे दिन आ जाएँगे।

हमने अपना कैमरा समेटा और बाबा जी के साथ शीर्षासन में जुट गए।

संतई सुरक्षा चाहती है !

संत हमारे समाज के नायक होते हैं,ठीक वैसे ही जैसे नेता।जाहिर है कि इनके गुणधर्मों में भी समानता होगी।पहले संत प्रवचनकर्ता थे,अब नेता उनसे प्रवचन में इक्कीस सिद्ध हो रहे हैं।विकसित हो रहे आधुनिक युग में संत किसी तरह प्रतियोगिता में नेताओं से पिछड़ न जाएँ ,सो इन्होंने उनका हावभाव-स्वभाव पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया है।नेताओं की अपनी भीड़ होती है और उनके भक्त भी।उनके बीच वो निर्भय होते हैं और दिखते भी हैं ताकि उनके भक्त बाकी दुनिया से निर्भय रहें।संत भी इसी परिपाटी को आगे बढ़ा रहे हैं।उनको लगता है कि वे भक्तों की रक्षा तभी कर सकते हैं जब बाहरी दुनिया से भक्त उनकी रक्षा कर सकें।इसलिए संत विश्रामगृह में अमन-चैन से हैं और बाहर कानून पानी माँग रहा है।

दरअसल,नेता और संत को आम समझने की भूल ही समाज में सबसे बड़े दुःख का कारण है।दुनिया के तारणहार कहे जाने वाले किसी भी संविधान से ऊपर होते हैं।वे स्वयं नियंता हैं,नीति-निर्धारक हैं इसलिए उन पर कोई नियम लागू नहीं होता।वे अपने प्रवचनों में शांति,अहिंसा,संयम की घुट्टी तो भक्तों को पिलाने के लिए तैयार करते हैं,खुद थोड़ी पीते हैं ! ऐसे परमार्थ में रत संत को राज्य भी दंडवत करता है और समाज भी।इनसे प्रवचन-प्रसाद पाकर भक्त भी संत-गति को प्राप्त हो जाते हैं।इसलिए वे निराहार रह सकते हैं,घर-बार छोड़ सकते हैं पर अपनी सीख पर कालिख नहीं पुतने दे सकते।वे इसके लिए लट्ठ भी उठा सकते हैं और अपना कानून भी बना सकते हैं।यही परमसंत की उनको सीख है और वे उन्हें बस गुरुदक्षिणा के रूप में वापस कर रहे हैं।

चाहे संत हो या नेता;मूल रूप से ये दोनों उपदेशक होते हैं।इनकी अपनी जनता और अपना संविधान होता है।बाहरी दुनिया के लोग इनके लिए एलियन-टाइप होते हैं।एक आम आदमी को खेत से ककड़ी चुराने के जुर्म में जहाँ जेल की सलाखें मिलती हैं,वहीँ संत को करबद्ध अपीलें नसीब होती हैं।कानून के आगे उसकी हाजिरी लगाने के लिए हजारों जवानों को कई दिनों तक रणनीतियाँ बनानी पड़ती हैं ।राज्य उसके घुटने में होता है और कानून ठेंगे पर।

सबसे बड़ी कमी हमारे ही अंदर है।हम उपदेशकों से वैसी ही अपेक्षा करने लगते हैं,जैसा वो बोलते हैं।उपदेशक या प्रवचन देने वाले को उन बातों पर अमल करने की ज़रूरत ही नहीं है।वे उपदेश देकर अपना काम कर रहे हैं और हमें आँख मूँदकर उस पर अमल कर लेना चाहिए।इसलिए नेता या संत से जवाब माँगने वाले या उन्हें कानून की किताब दिखाने वाले निरा अल्पज्ञानी हैं।ऐसे पहुँचे हुए संत स्वयं में जवाब हैं।खबरदार,यदि किसी ने उन पर उँगली उठाने की हिमाक़त की !

बुधवार, 12 नवंबर 2014

समर्थन प्रसाद का तौलिया !

समर्थन प्रसाद बहुत गुस्से में हैं।उन्होंने आख़िरी से पहली वाली धमकी दी है कि असली राष्ट्रवादी को छोड़कर अगर वे नये-नवेले राष्ट्रवादी की शरण में गए तो वे विपक्ष की कुर्सी पकड़ लेंगे।वे सुबह समर्थन देते हैं,दोपहर में वापस लेते हैं और शाम को पुनर्विचार करते हैं।एक बंदे को वे जहाज में बिठाकर राजधानी रवाना करते हैं पर उसको एयरपोर्ट पर ही टहलाते रहते हैं।इस तरह एक उत्साही बंदे को देश-सेवा करने से रोक दिया जाता है।समर्थन प्रसाद को यह नहीं पता कि उन्होंने देश के साथ कित्ता बड़ा गुनाह किया है।दूसरे सज्जन थोड़ा समझदार निकले।वह सुबह सत्ता-पार्टी में ऑनलाइन दाख़िला लेते हैं और दोपहर बाद शपथ-ग्रहण कर लेते हैं।काश,शपथ-ग्रहण भी ऑनलाइन होता तो देश को एक सेवक से वंचित न होना पड़ता।

उनका समर्थन खूँटी पर टंगा हुआ तौलिया है।यह उन पर निर्भर है कि तौलिये को कब और कैसे उपयोग में लाना है।जिसको अपना सम्मान ढांपना हो,वह इनके तौलिये को ओढ़ ले।ऐसे तौलिये के अपने साइड इफेक्ट हैं पर ओढ़ने वालों को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।इधर समर्थन प्रसाद तब तक चुप नहीं बैठने वाले जब तक उनको समुचित प्रसाद नहीं मिल जाता।ऐसे ही समर्थन लेने-देने की बैठक में वो मिल गए तो हमने पूछ ही लिया-फाइनली आपका क्या निर्णय है ?

‘देखिए,राजनीति में फ़ाइनली कुछ नहीं होता।हम इसे बिलकुल सिनेमाई तरीके से डील करते हैं।जैसा सीन होता है,वैसा मसाला डाल देते हैं।स्टोरी में बदलाव अंतिम समय तक के लिए सुरक्षित रखा जाता है,इससे गज़ब सस्पेंस क्रिएट होता है।फिल्म में कितने कट करने हैं,कहाँ पर आइटम-सॉंग डालना है,यह विकट विमर्श का विषय है।एक्टर को कितने टेक-रीटेक करने है,यह हमारा विशेषाधिकार है।अगर हमारी शर्तों पर शूटिंग न हुई तो हम फिल्म ही रिलीज़ नहीं होने देंगे।’ समर्थन प्रसाद कहते-कहते उखड़ लिए।


‘यानी अब आप विपक्ष में ही बैठेंगे ? यह जनता के साथ अन्याय नहीं होगा ?’हमने आख़िरी तीर मारा।वे अब फफक पड़े-‘जनता ने कौन-सा हमारे साथ न्याय किया है ? हमने उसके लिए इतनी पिचें खोदीं,राज्य से बाहरी लोगों की सफ़ाई की,पर जानबूझकर सफ़ाई-अभियान का अग्रदूत हमें ही बना दिया गया। अब अजीब मुसीबत है।वो हमीं को साफ़ कर रहे हैं और हमीं से इसका अनुमोदन चाहते हैं।’


तभी खबर आई कि समर्थन प्रसाद का तौलिया खूँटी से कोई उड़ा ले गया है।वे अब उसी को खोजने में लगे हैं।

मंत्रिमण्डल का अपडेट वर्ज़न !

लो जी ,केन्द्रीय मंत्रिमंडल का अपडेट वर्जन भी आ गया।आधुनिक समय में लगातार अपडेट रहना अब नितांत आवश्यक है।इसके बिना कोई भी तकनीक या कम्पनी अधिक दिनों तक टिकी नहीं रह सकती।नोकिया का उदाहरण हमारे सामने है।उसने बाज़ार की ज़रूरतों के मुताबिक अपना बदलाव नहीं किया और आखिर में बिक गई।वहीँ गूगल को देखिए,हर छह महीने में एंड्रॉइड के नए वर्ज़न लाकर वह बाज़ार का सिरमौर बन बैठा है।उसका लेटेस्ट वर्ज़न लॉलीपॉप आ गया है।इसी तरह सरकारों को भी हर छह महीने में नए-नए लॉलीपॉप-वर्ज़न लाते रहने चाहिए।इससे पकड़ मज़बूत बनी रहती है और भविष्य भी सुरक्षित रहता है।

नए वर्ज़न में समाज और क्षेत्र के हर तबके का ध्यान दिया गया है।जो दूसरे दलों में रहते हुए देश-सेवा नहीं कर पाए थे,उन्हें भी मौक़ा दिया गया है।इस चाल से दो शिकार किए गए हैं।एक तो इनके आने से अपना जनाधार मज़बूत होगा और ऐसे नेताओं को कुर्सी पर बिठाकर उनके पूर्व-आकाओं को अच्छे से टिलीलिली की जा सकती है।इधर ये शपथ-ग्रहण कर रहे थे,उधर उनके कलेजे में साँप लोट रहे थे।शपथ लेने वालों को पहली बार व्यक्तिनिष्ठा और सत्यनिष्ठा में अंतर साफ़ समझ में आ गया होगा।

इधर शपथ दिलाई जा रही थी,उधर खबर आ रही थी कि एक नेता को एयरपोर्ट पर ही रोक लिया गया है।वे बेचारे देश-सेवा की शपथ लेने को कसमसाए जा रहे थे पर उन्हें वहां से बाहर नहीं निकलने दिया गया।गोया उनके शपथ लेते ही देश का बड़ा नुकसान हो जाएगा।बुरा हो मोबाइल के आविष्कार करने वाले का,अगर आज यह न होता,वे कब के समारोह में पहुँच चुके होते।उनका नया कुरता और जैकेट कंधे के बजाय खुद को खूँटी पर टंगा महसूस कर रहे थे।ऐसे उत्सवी माहौल में इस मनहूसियत भरे कदम की अपेक्षा कौन कर सकता है ? प्रभु,उन्हें यह अनहोनी सहने की क्षमता प्रदान करें।

शपथ-ग्रहण समारोह में राज्य मंत्री बनाए गए कई लोगों ने कैबिनेट या स्वतंत्र प्रभार न पाकर भी हिम्मत नहीं हारी।उन्होंने शपथ के दौरान अपने नाम से पहले प्रोफेसर,डॉक्टर या कर्नल लगाकर यह संकेत दे दिया कि उन्हें हल्के में न लिया जाय।भले ही वे राज्य मंत्री बने हों,पर वे सुपरहिट प्लेयर साबित होंगे।वो ये जानते हैं कि उन्हें उनके परिवार या उनके बयान के आधार पर नहीं बल्कि उनमें मौजूद देश-सेवा के हुनर को पहचान कर उन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई है।जो लोग फ़िर भी वंचित रह गए हैं,वे अगले वर्ज़न में अपडेट किए जा सकते हैं।

खादी के कलफ़ लगे जिन कुरतों और जैकेटों की शान बढ़ी,उन्हें दिली-मुबारक और जो किसी कारणवश खूँटी में टंगे रह गए हैं,उनके लिए शुभकामनाएँ कि ईश्वर उन्हें भी अगले वर्ज़न में अपने हिस्से का लॉलीपॉप ग्रहण करने की क्षमता प्रदान करे।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

सौ करोड़ी लात!

मैंने जबसे सुना है कि राज्यसभा की एक सीट के बदले मिल रहे सौ करोड़ रूपयों पर किसी ने लात मार दी है,उस लात को खोज रहा हूँ।मैं कित्ता अभागा हूँ कि न जेब में दो कौड़ी हैं और न कायदे की लात ही।लात हो तो ऐसी जो सीधे सौ करोड़ पर पड़े।मेरी तुच्छ लात दिन भर म्युनिसिपल्टी की नालियों से टकराती रहती है और शाम तक महज डब्बे-भर कूड़ा जुटा पाती है।सोचिये उनके क्या जलवे होंगे,जिनकी लात करोड़ों-करोड़ स्पर्श करके सही-सलामत अपने मूल स्थान पर लौट आती है।

मुझे जहाँ उस लात पर गर्व और खुशी का अनुभव हो रहा है,वहीँ ‘सौ करोड़’ की हुई मानहानि पर चिन्ता और दुःख भी ।अगर यह बात सौ-करोड़ी फिल्म वालों को पता चल गई तो उन्हें अपनी रेटिंग हज़ार-करोड़ तक बढ़ानी पड़ सकती है।यह सरासर भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन और अपमान भी है।लात की ऐसी हिम्मत कि अपने को खड़ा करने वाले का ही तिरस्कार करे ! लात के इस तरह बढ़ते प्रभाव पर गहन मंथन होना चाहिए अन्यथा भविष्य में लात खाने को लेकर कई नई सम्भावनाएं जन्म ले सकती हैं।जिनके पास सौ करोड़ नहीं होंगे,वे लात खाकर ही मुक्ति पा सकते हैं और जिनके पास इससे ज़्यादा बजट होगा,वे ही लात की जद से बाहर होंगे।

सौ करोड़ पर लात मारना खरीदारों के लिए खुलेआम चेतावनी है।वे अपनी जेब को इस हिसाब से भरकर लाएँ कि बदले में लात नसीब न हो।लातों के भूत बातों से नहीं मानते,ऐसा सुना था पर अब तो करोड़ों रुपयों से भी नहीं मान रहे हैं।वे टिकट पाकर ‘लातत्व’ को भूल सकते हैं,भले ही इसका अनुभव उन्हें सार्वजनिक रूप से हो।कुर्सी पाकर खुद की लात में अपने आप गुरुता आ जाती है,सो इस भारीपन को पाने के लिए सौ-दो-सौ करोड़ क्या चीज़ हैं ! अभी तक आदमी वीआईपी होता था पर अब से वह बजरिये लात जाना जाएगा।जिसकी जितनी टिकाऊ और कीमती लात,उसकी उतनी बड़ी औकात।

उस गौरवशाली लात को बार-बार नमन है जो पल भर में ही करोड़ों रुपयों से ऊँचे तुल गई।इससे सदन की गरिमा और टिकट की अस्मिता की रक्षा की है।करोड़-दो-करोड़ रूपये जेब में लेकर चलने वाले धन्नासेठ अब टिकट पाने के बजाय अपनी कोई कम्पनी खोल लें,जिसमें ‘लात से कैसे बचें’ का बेहतर ढंग से प्रशिक्षण दिया जाय।इससे उनका व्यापार-घाटा तो कम होगा ही,भविष्य में बनने वाले लतखोर भी कुशल और दक्ष हो सकेंगे।ऐसे में उनको भी लाभ होगा,जो लात मारने के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं।फ़िर वे सरेआम लतियाकर पीठ पीछे ‘समर्पित कार्यकर्त्ता’ का प्रमाण-पत्र निर्गत कर सकेंगे,जिससे दोनों पक्ष अधिकतम लाभ उठा पाने में समर्थ होंगे।

सौ करोड़ तो मेरे पास नहीं हैं पर सोच रहा हूँ कि एक बार उस ‘दैवीय-लात’ का प्रहार सह लूँ,ताकि मुझे भी जीने की वजह मिल जाये।टिकट लेने का शौक तो सिनेमा से भी पूरा कर सकता हूँ पर ऐसी दिव्य-लात दुर्लभ है।इस समय मन में विकट अंतर्द्वंद्व मचा हुआ है कि उच्च सदन का टिकट पाकर अपने को धन्य समझूँ या लात खाकर? 

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

यह आकाशवाणी की मासिक प्रसारण सेवा है!

हम अपना वादा हर हाल में निभाएंगे।अगर काला धन अभी वापस नहीं ला पाए हैं तो वादा भी हमने वापस नहीं लिया है।हम आकाशवाणी करते हैं कि पाई-पाई वापस लायेंगे।यदि हमसे काले धन की पाई न पाई गई तो रत्ती-माशा जो भी मिल पायेगा,हम लायेंगे।हम पर भरोसा रखें और हर बार अपने भरोसे को रीचार्ज करते रहें।यह आकाशवाणी की मासिक प्रसारण सेवा है।दूर से ही हमारे प्रवचनों का आनंद उठाएँ और सुखी जीवन बिताएँ।

कुछ लोग काले धन को लेकर ज्यादा ही संवेदनशील हो गए हैं।हमारे लिए यह आस्था का प्रश्न है।आस्था भरोसे और विश्वास की चीज़ होती है।आपकी ईश्वर पर आस्था है,भले ही वह अदृश्य होता है,पर आप मानते हैं कि नहीं ? ईश्वर के होने और न होने के विषय में प्रश्न उठते रहते हैं क्योंकि वह कोई तर्क का नहीं आस्था का विषय है।काले धन को लेकर हमारी भी यही सोच है।आस्था में हिसाब-किताब का प्रश्न कहाँ उठता है ?

लोगों को काले धन के प्रति हमारी निष्ठा पर संदेह नहीं करना चाहिए।जो लोग ऐसा सोचते हैं,उनके लिए बता दूँ कि इसीलिए हमने पूरा वित्त विभाग ही रक्षा के सुपुर्द कर दिया है।वित्त वाले उसकी बखूबी रक्षा कर रहे हैं।वे उस धन को,धनिक को और हमारे एग्रीमेंट को बड़ी कुशलता से बचा रहे हैं।हमें ऐसे सिपहसालारों पर गर्व है।एक दिन आपको भी होगा।

हम आकाशवाणी करते रहेंगे।प्राचीन समय से ही लोगों में आकाशवाणी की विश्वसनीयता पर कोई संदेह नहीं है।तब भी किसी विशेष घटना के घटित होने पर आकाशवाणी होती थी और वो सच निकलती थी।सबसे बड़ी बात यह थी कि उससे कोई सवाल-जवाब भी नहीं कर सकता था।उसका बोला फरमान की तरह था।लोग अपनी संस्कृति और सभ्यता भूल रहे हैं।हम संकल्प लेते हैं कि हम देश के अतीत को फिर से जगायेंगे।पाई-पाई वापस लाने से हमारे इतिहास का गौरव बढेगा।उनके ‘इंच-इंच कश्मीर’ का जवाब हम ‘पाई-पाई पैसा’ से देंगे।विज्ञान,भूगोल के साथ-साथ हम गणित भी दुरुस्त करेंगे।अब यही काम तो बचा है करने को।

जिनको हमारे कहे पर आस्था है,वे अगले पाँच साल तक अपने सुझाव-सलाह देते रहें।हम बात करते रहेंगे।विदेशी मुद्रा के स्टॉक की तरह हमारे पास बात का भी अकूत स्टॉक है।डायरी में दूध-सब्जी-फल का हिसाब लिखने के बजाय अगले महीने होने वाले समागम की तारीख नोट कर लें और घर बैठे आनंद उठायें।हम पर भरोसा रखें।हम पाई-पाई नहीं छोड़ेंगे।आपका समय शुभ हो !