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गुरुवार, 25 सितंबर 2014

मंगली होने की बधाई !

सर्वत्र मंगल ही मंगल की चर्चा है।लोग पहली बार एक-दूसरे को मंगली होने की बधाई दे रहे हैं।हमारे लिए सबसे बड़ी ख़ुशी की बात है क्योंकि हम स्वयं मंगली हैं,इस वजह से मंगल-मिशन से अपना गहरा जुड़ाव रहा ।हममें मंगल का हुनर अंदर तक व्याप्त है ,यह बात विवाह के समय पंडितजी ने कुंडली देखकर कही थी।हमें याद है,उस दिन हमारे घर में किसी ने खाना नहीं खाया था।कहाँ पूरी दावत का इन्तजाम चल रहा था और कहाँ आख़िरी समय में सारा गुड़-गोबर हो गया था।पंडिज्जी ने आखिरी फैसला सुनाते हुए चेताया था कि यह सम्बन्ध होने पर लड़की के प्राणों पर भारी संकट आ सकता है।इसकी जानकारी मिलते ही लड़की वाले दहेज़ के सामान सहित भाग खड़े हुए थे।आज चौबीस साल बाद अचानक उनका फोन आया...’सॉरी,हमसे मिस्टेक हो गई ! हमें इत्ती देर से पता चला कि ‘मंगली’ होना कितना शुभ होता है !’ जब तक हम उनको बताते कि भाई,असल बात क्या है तब तक फोन कट गया।बहरहाल ,हमारे पड़ोसी शर्मा जी इस मौके पर बड़े खुश थे.उनको पहली बार इतना चिंतामुक्त होते देखकर हमें तनिक चिंता हुई तो वे बोले,'यार क्या बताऊँ....आज मेरी बहुत बड़ी टेंशन खत्म हो गई है.अब जब मंगल हमें मिल गया है तो पाकिस्तान कश्मीर की माँग को छोड़ देगा.' हमने उनकी हाँ में हाँ मिलाना ठीक समझा क्योंकि उस वक्त हम टीवी पर प्रधानमंत्री का संबोधन सुन रहे थे.

प्रधानमंत्री कह रहे थे कि मंगल को उसकी ‘मॉम’ मिल गई है,यह सुनकर हमारी कामवाली बड़ी ख़ुश हुई.उसको अचानक दो साल से बिछड़े अपने बेटे राजू के मिलने की उम्मीद हो आई,जो तब पाँच साल का था.हम फिर भी मौन रहे.हम इसी बात से प्रसन्न थे इधर चीनी चुमार में टेंट ही तानते रह गए और हमने मंगल पर खूँटा गाड़ दिया. वैसे भी लाल-ग्रह को लेकर सबने अपने-अपने सपनों की अग्रिम बुकिंग कर रखी है।कुशल उद्यमियों को विज्ञान के अलावा साहित्य,राजनीति और प्रॉपर्टी के क्षेत्र में भी अपार संभावनाएं अभी से दिखने लगी हैं।वे अभी से दूरबीनें लेकर उन सभी को झाँकने में जुट गए हैं.

जब से दुनिया के देशों को पता चला है कि मंगल तक जाने में ‘राजकोट’ के एक पुर्जे का कमाल रहा है,उस पुर्जे की माँग बढ़ गई है।अमेरिका और रूस सबसे अधिक बेचैन हैं।खबर तो यह भी है कि ओबामा ने मोदी जी से वह ‘राजकोटी-पुरजा’ अपनी अमेरिकी-यात्रा में साथ लाने के लिए भी निवेदन किया है।


जो साहित्यकार धरती के प्रतीकों से ऊब चुके थे,उन्हें अब लाल-ग्रह में अनोखे बिम्बों की तलाश रहेगी ।केवल व्यंग्यकार ही बचे हैं जिन्हें अभी भी लगता है सारा निठल्लापन इसी धरती पर है।उम्मीद है कि देर-सबेर वे भी वहां पहुँच जाएँगे।हम प्रॉपर्टी वाले क्षेत्र से पूरी तरह निश्चिन्त हैं,सबसे पहले वे ही मंगल-ग्रह को गुलज़ार करेंगे।खबर मिली है कि कई महारथियों ने प्लॉट्स की ऑनलाइन बुकिंग शुरू भी कर दी है।सुनते तो यह भी हैं कि कुछ लोग लाल मिट्टी को यह कहते हुए बेच रहे हैं कि यह सीधे मंगल-ग्रह से आई हुई है.

मंगल पर पहुँचने का बड़ा फायदा राजनेताओं को भी होने वाला है।जिन्हें आपस में चुनावी-सीटें बाँटने में दिक्कतें पेश आ रही हैं,उनके सामने एक नया विकल्प आ गया है।इस लिहाज़ से मंगल की खोज ऐतिहासिक है जिससे ऐसे कर्मठ नेताओं का वहीँ पर हमेशा के लिए पुनर्वास किया जा सकता है।कुल मिलाकर मंगल सबके लिए मंगल लाया है।

बुधवार, 24 सितंबर 2014

इंच से मील हुए रिश्तों में कील !



पहले जापान हुआ,फिर चीन और अब अमेरिका होने जा रहा है।जापान के होने का तो ऐलान वहीँ से ढोल बजाकर किया गया था पर अमेरिका जाने से पहले ही नगाड़े सुनाई दे रहे हैं।जापान और अमेरिका की ढोलबाजी के बीच में चीन कहीं गुम न हो जाए,इसके लिए उसने युद्धस्तर पर तैयारी की है।वह दूर से ही सुहाने ढोल नहीं बजाना चाहता इसलिए इंच-दर-इंच खिसकने के बजाय सीमा पर मीलों आगे बढ़ आया है।कुछ नासमझ लोग इसे घुसपैठ करार दे रहे हैं,जबकि यह निहायत दोस्ताना ताल्लुकात का नतीज़ा है।अगर वैसी कोई बात होती तो हमारे प्रधानमंत्री जी स्वयं इस पर बोलते,जैसा सीएनएन के साथ इंटरव्यू पर बोले।चीनी राष्ट्रपति इसलिए नहीं बोलते क्योंकि वे मौन होकर भी ‘तिब्बत’ कर सकते हैं,फिर ताजे-ताजे ढोकले का स्वाद क्यों खराब करें ?

मामला यह है कि चीन के सौ बन्दों ने चुमार में पाँच किलोमीटर तक पहले चहलकदमी की,फिर हमारे ज़बरदस्त प्रतिरोध के बाद वे डेढ़ किलोमीटर पीछे हो लिए।थोड़ा और शोर हुआ तो चीन ने अपने पचास बन्दे वापस बुला लिए यह समझकर कि देखभाल के लिए पचास बन्दे ही पर्याप्त हैं।अब वे बन्दे विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के हैं सो ज्यादा देर तक खड़े नहीं रह सकते थे।इसके लिए उनने सात टेंट गाड़ लिए हैं।हमने भले ही अपना इतिहास ठीक से न पढ़ा हो पर हमसे मैत्री प्रगाढ़ करने के लिए चीन के बन्दों ने हमारे इतिहास का खूब अध्ययन किया है।उन्हें पता है कि हिन्दुस्तान को अपनाने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भी पहले-पहल हमारी धरती पर अपने तम्बू ही लगाये थे।उसके बाद जिस तरह हमारा विकास हुआ,इतिहास जानता है।हम इतिहास पढ़ने और उससे सबक लेने वाले दकियानूसी नहीं हैं।

विशेषज्ञों ने गणना करके बताया है कि चीन हमारे यहाँ सौ बिलियन डॉलर का निवेश करेगा।उसने अपनी ओर से निवेश की शुरुआत कर भी दी है।पहली किश्त में चीन ने सौ बन्दे इसी नीयत से भेजे थे पर विकास के विरोधियों की वज़ह से यह निवेश उसे आधा करना पड़ा।फ़िलहाल हिन्दुस्तानी सीमा पर उसने पचास बन्दे और सात टेंटों का निवेश किया हुआ है।किसी को यह घुसपैठ लगती हो तो यह उसकी समस्या है।हम अभी ढोल बजाने और डॉलर समेटने अमेरिका जा रहे हैं।चीन के साथ रिश्ते ‘इंच से मील’ हो गए हैं,इसलिए दो-चार मील में उसके तम्बू गड़ जाने भर से हमारे दिल में कील नहीं चुभनी चाहिए।

शनिवार, 20 सितंबर 2014

धरतीपकड़ जी और उनकी दीवाली!

धरतीपकड़ जी धूल-धक्कड़ झाड़कर फिर से खड़े हो गए हैं।बहुत दिनों से धूलि-धूसरित होकर वे किसी खोह में घुसे हुए थे।ढोल-नगाड़ों की आवाजें उन्हें दूर से ही चिढ़ा रही थीं,पर अचानक थाप रुकी तो उनकी जान में जान आई।हम भी उनकी बिगड़ती दशा को देखकर चिंतित हो उठे थे कि इनका तो चलो ठीक है पर देश का क्या होगा ? देश बचने के लिए उनका बचना ज़रूरी था और लो,अब तो वे बच भी गए।सही समय पर उन्हें संजीवनी मिल गई।

हमने उनके पुनर्जीवित होने पर बधाई दी और कारण पूछा,वे एकदम से फट पड़े,कहने लगे ‘हमें अपने से ज्यादा जनता पर विश्वास था।जो जनता चार महीने पहले मूरख बनी थी,वह अब काफ़ी समझदार लग रही है।यूँ कहूँ तो घणी बुद्धिमान हो ली।वह सही तरीके से हमारा समाजवाद समझ गई है।हमने भी देश-सेवा के लाने अपनी तीन पीढ़ियों को झोंक दिया है।’हमने पलटकर फिर सवाल किया,’जिन वजहों से उसने आपको ज़मीन पर पटका था,क्या अब वे वजहें खत्म हो गईं हैं ?’

‘नहीं जी,वजहें तो खत्म नहीं हुईं और न कभी हो सकती हैं।बस,वो अपना ठिकाना बदल लेती हैं।हम कल जिन वजहों से हारे थे,आज विरोधी के परास्त होने की वही वजहें हैं।’धरतीपकड़ जी ने चेहरे पर पूरा आत्मविश्वास लौटाते हुए कहा।

‘इन चुनावों से आपने क्या सबक लिया है ?’ हमने हिम्मत करके पूछ ही लिया।वे बोले,’सबक तो उनको मिला है जी,इसलिए सीखना भी उन्हें ही चाहिए।पिछली बार हमने सीखा था,अब उनकी बारी है ।’ ‘फिर तो ज़श्न बनता है’ हमने सवालिया नज़रों से जुबान लपलपाई।वे भी कब पीछे हटने वाले थे,बोले,’अपनी जीत पर दस किलो और उनकी हार पर दस कुंटल लड्डू का आर्डर दे दिया है।’

यह बातचीत जारी थी कि तभी अच्छे लाल जी आते दिखाई दिए।हमने उनको सांत्वना देने की कोशिश की पर वे बिफर उठे।कहने लगे,’यह उपचुनाव क्या होते हैं ? लव जिहाद क्या है ? अजी सौ दिन कुछ होते हैं क्या ?आप दस-बीस साल इंतज़ार नहीं कर सकते हैं ?’ कहकर उन्होंने हमें खा जाने वाली नजरों से देखा।हमसे देखा नहीं गया तो देह में बची पूरी ताकत बटोरकर पूछ ही बैठे ,’ छात्र संघ चुनावों में जमकर नृत्य करने वाले उपचुनावों में ‘मेंहदी रचे हाथ’ प्रतियोगिता में भाग लेने चले गए थे क्या ? इस प्रश्न को सहजता से झेलते हुए वे अंतिम समाधान की तरह बोले ,’जनता बड़ी जातिवादी और अधर्मी हो गई है।यह ज़रूर शोध का विषय है कि संत और महंत की मेहनत पर पानी कैसे फिर गया ,पार्टी इस पर विचार अवश्य करेगी।’

हमने देखा,तब तक धरतीपकड़ जी अपने कार्यकर्ताओं से घिर चुके थे।कुछ कार्यकर्ता अगली दीवाली का पूरा इंतजाम करके आए थे।उनके दिये में इतना तेल दिख रहा था कि जिससे एक आला रोशन हो सके।

बुधवार, 17 सितंबर 2014

बंगला बहुत उदास है!

बंगला बिलकुल सन्न रह गया है।अपने अतीत को देखते हुए उसे उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी वह उजाड़ हो जाएगा।कल तक जहाँ हर कोना रोशन था,आज वहीँ घुप्प अँधेरा है और माहौल में चिर शांति।बंगले के मालिक को ज़बरिया बेदखल कर दिया गया है जिससे वह फ़िलहाल अनाथ हो गया है।बंगले से उसके मालिक का गहरा लगाव था,जिसने उन्हें ‘बंगला-पकड़’ बनने की ज़ोरदार प्रेरणा दी।जो लोग फ्लैट्स में थे,उन्हें बंगले को देखकर चिढ़ उठती थी।आखिर उनको पाने की अर्हता वो भी रखते थे पर ‘बंगला-पकड़’ के रहते यह कार्य दुष्कर था,पर वे अब ठहाके लगा रहे हैं ।

जिस प्रकार हारिल पक्षी लकड़ी को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ता,उसी प्रकार वे भी बंगले को न छोड़ने को लेकर प्रतिबद्ध थे,पर बिजली-पानी ने सारी योजनाएँ पटरी से उतार दीं।उन्हें अपनी चिंता कतई नहीं है।अब उनके बिना बंगले की कौन वैसी संभाल कर पाएगा,अपनापन दे पाएगा ? सम्मान कायर था,सो उस बंगले से पहले ही भाग गया था,पर सामान अंत तक डटा रहा,प्रतिरोध करता रहा।आखिरकार बिजली-पानी के भी मैदान छोड़ जाने के बाद उसे सड़क पर आना पड़ा।अपने प्यारे बंगले को छोड़ पाना,फर्श से गलीचों और कालीनों को समेट पाना ,यह सब कितना मुश्किल था;यह दर्द वो नहीं जान सकते जो नोटिस मिलने के पहले ही भाग खड़े होते हैं।वे कायर तो हैं ही,संवेदनहीन भी हैं जो अपनों को अकेला छोड़ जाते हैं।

‘बंगला-पकड़’ जी की यूएसपी ही ‘पकड़ना’ रही है।उन्होंने हमेशा से सत्ता को पकड़ना ही अपना उद्देश्य बनाया हुआ था पर पिछले चुनावों में जनता ने उन्हें जमीन पकड़ा दी।इसके लिए वे बिलकुल भी तैयार नहीं थे,पर होनी को कौन टाल सकता है भला ? ज़मीन पकड़ने के बाद बंगले पर उनकी पकड़ बरक़रार रही पर कुछ जलकुक्कुड़ों को उनका यह ‘पकड़ानुराग’ पसंद नहीं आया।उन्होंने इसका विकल्प ढूँढना शुरू किया और उनको नोटिस पर नोटिस पकड़ाने लगे ।वो भी ठहरे ‘धरतीपकड़’ की तरह मज़बूत कलेजे वाले।जिस तरह चुनाव-दर-चुनाव ‘धरतीपकड़’ की जमानत जब्त होती रही,’बंगलापकड़’ ने नोटिस-दर-नोटिस अपनी इज्ज़त उछलने की परवाह नहीं की।बिजली-पानी ने आखिर दम तक यदि उनके साथ वफ़ा निभाई होती तो वे आज भी हरे-हरे लॉन पर अपने डॉगी को टहलाते होते।

बहरहाल,बंगला बिलकुल सूना है।उसकी व्यथा को खुले आसमान में रहने वाला या गंदी बस्ती में झुग्गी बनाकर उसे अपनी ज़िन्दगी समझने वाला क्या जानेगा ?बंगलों का मिजाज़ भी उनके रहने वालों जैसा ही हो जाता है।वे एक दिन की भी मनहूसियत नहीं झेल सकते।मालिक ठाठदार हो तो यह दर्द और बढ़ जाता है।’बंगलापकड़’ को इस बात की चिन्ता कम थी कि बंगला छोड़ने पर उनका क्या होगा,वे तो कोई और ‘ठिया’ पकड़ लेंगे;पर उन्हें फ़िक्र तो उस बंगले की ज्यादा थी,जो उनके बिना बिलकुल वीरान हो गया।नहीं लगता है कि बंगले को किसी और से वह असीम प्यार मिल पाएगा,जिससे ताज़ा-ताज़ा वह महरूम हुआ है।कोई है जो एक बंगले के पक्ष में इतनी मजबूती से खड़ा हो और अपने दुःख को भूलकर खुद को उसके दुःख में शामिल कर ले ?


©संतोष त्रिवेदी
नईदुनिया में प्रकाशित 

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

इस प्यार को क्या नाम दें!

नैतिकता जी बड़ी तेजी से राजभवन की ओर भागी जा रही थीं।हम बड़ी मुश्किल से उनसे बचे नहीं तो टकरा ही जाते।इस भगदड़ का कारण पूछने पर नैतिकता जी ने बताया कि अचानक उनकी माँग बढ़ गई है और वे अपने प्रति इस अप्रत्याशित अनुराग के लिए तैयार नहीं थीं।वे आगे कहने लगीं,’अभी अभी राजभवन से सूचना आई है कि जनहित जी की बिगड़ती हालत के लिए दोषी सिर्फ मैं हूँ और अब आगे ऐसी स्थिति कतई स्वीकार नहीं की जा सकती है।वे महीनों से अनाथ पड़े हैं और हमारी तरफ़ टुकुर-टुकुर निहार रहे हैं।’

हम उनके इस कथन से भौंचक रह गए।जब समझ में कुछ नहीं आया तो उनकी ओर सवालिया नज़रों से देखने लगे।वे मामले को बिलकुल साफ़ करने के मूड में दिख रही थीं।उन्होंने हमें अपने पीछे-पीछे आने का संकेत दिया।हम मंत्रमुग्ध हो उनका अनुसरण करने लगे।वे अब तक अपने को सामान्य कर चुकी थीं इसलिए उनकी आवाज़ में अब कोई थरथराहट भी नहीं थी।हमारी जिज्ञासा को शांत करते हुए वे बताने लगीं,’ मैंने इस बीच बहुत अकेलापन भोगा है,जनहित जी को भी हमने बहुत मानसिक संताप दिया है।मुझसे उनका तड़पना अब देखा नहीं जाता।राजभवन भी चाहता है कि मैं अब कोई ना-नुकुर न करूँ,इसी में उसका भी हित निहित है।इसलिए लोक-लाज के दिखावटी बंधन तोड़कर,मैं जनहित जी को अपनाने जा रही हूँ।आप इस सम्बन्ध से सहमत हैं ?’

‘हाँ,हाँ क्यों नहीं ? अगर आपने न्योता दिया है तो हम अस्वीकार नहीं कर सकते।अगर आपने दावत क़ुबूल की है तो हम भी उसमें शरीक़ होंगे।हम आपसे अलग थोड़े ही हैं।राज्य के आमन्त्रण को न स्वीकारना घोर अशिष्टता होगी और कम से कम हमसे तो अब यह नहीं हो पायेगा।आपको इस पवित्र बंधन की बधाई पर हमारे एक सवाल का जवाब दोगी क्या ?’

‘बिलकुल जी।हम तो आत्मा की पुकार के साथ हैं और उसको अपने साथ कर चुके हैं सो अब किसी भी प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं।पूछिए जो पूछना है।’ नैतिकता जी ने बिना रुके,ठिठके जवाब दिया।

’इतने दिनों तक आपने जनहित जी को कष्ट क्यों दिया,वे तो आपसे गले मिलने को कब से आतुर बैठे थे ?’ हमने भी तपाक से पूछ ही डाला।

‘दरअसल,हमारे पास डेट्स की समस्या थी।उस समय हम किसी और के साथ डेटिंग पर थे।अब हम भी खाली हैं और जनहित जी भी;सो कोई समस्या नहीं रही।हनीमून-पीरियड के लिए भी हमें अच्छा–खासा पैकेज मिल रहा है तो क्यों मना करें ?’ इतना कहकर नैतिकता जी ने खुला हुआ घूँघट पूरी तरह उघाड़ दिया और राजभवन में प्रविष्ट हो गई।

रविवार, 7 सितंबर 2014

पान की दुकान पर मास्टर जी !

सरकार ने कामकाज के सौ दिन पूरे कर लिए हैं पर लगता है कि कर्मचारियों के दिन भी पूरे हो गए है।पब्लिक के अच्छे दिन आएं हों या नहीं,पर सरकारी कर्मचारियों के बुरे दिन ज़रूर आ गए हैं।केंद्र सरकार के दफ्तरों में दो-चार छापे क्या पड़े,सुबह नौ बजे से लेकर शाम छः बजे तक कर्मचारी अपने बीवी-बच्चों के मुँह देखने को तरसने लगे हैं ।हद तो तब हो गई जब खबर आई कि स्कूलों से गायब होकर समाज-सेवा करने वाले मास्टर जी की लोकेशन अब पब्लिक और अफ़सरों की निगाह में होगी।सरकार कुछ ऐसा इंतजाम करने जा रही है जिससे बच्चों के अभिभावक केवल एक एसएमएस देकर मास्टर जी का ताजा हाल जान लेंगे।वे स्कूल की कक्षा के बजाय अपनी कक्षा कहाँ चला रहे हैं,यह रहस्य अब खुलकर रहेगा।
कुछ जानकार बता रहे हैं कि मास्टर जी की वास्तविक लोकेशन उनके मोबाइल से पता की जाएगी  तो कुछ अनुभवी कह रहे हैं कि इस योजना में झोल हो सकता है।मास्टर जी ऐसी परिस्थिति में मोबाइल का अपनी देह से त्याग कर सकते हैं।इसलिए ज़रूरी है कि उनकी बाजू में ही एक चिप परमानेंटली फिक्स कर दी जाय।इससे उनकी कार्यालयी ही नहीं पारिवारिक समस्या भी काफ़ी हद तक हल हो जाएगी।घरवाले भी मास्टर जी की तरफ़ से बेफिक्र हो जाएँगे।अगर यह योजना ठीक से सिरे चढ़ती है तो मास्टर जी का सिरदर्द बढ़ने वाला है।उनकी सबसे बड़ी परेशानी तो यह होगी कि ऐसे में वह प्रिंसिपल साहब की सेवा-संभाल कैसे कर पाएंगे ? अभी तक मास्टर जी प्रिंसिपल साहब की,मॉनिटर बच्चों की और प्रिंसिपल साहब मास्टर जी की सालाना गोपनीय रिपोर्ट की अच्छी तरह से संभाल कर रहे थे ।
कल्पना कीजिए,जब स्कूल में मास्टर जी फेसबुक में अपनी नई फोटो ठेल रहे होंगे या नया स्टेटस अपडेट कर रहे होंगे,उनका अपना सार्वजनिक अपडेट हो जायेगा।पैरेंट्स को यह जानने में दिलचस्पी होगी कि मास्टर जी स्कूल आए हैं या आकर भी नहीं आए हैं ।हो सकता है कि मास्टर जी पान,पुड़िया और खैनी के लिए जैसे ही स्कूल चौहद्दी के बाहर निकलें,इस बारे में अभिभावकों के पास मैसेज पहुँच जाए।मास्टर जी की तरह यदि कोई अभिभावक भी निठल्ला हुआ तो वह उनसे कल्लू पानवाले की दुकान में ही मुलाक़ात कर लेगा।इस दुर्लभ भेंट से जो रिजल्ट निकलकर आएगा, अफसरों के बड़े काम का होगा.
जिसने भी सरकार को इस तरह का आइडिया दिया है,वह निश्चित ही कोई बाबू होगा।माना यही जाता है कि बाबू हमेशा मास्टरों के खिलाफ़ रहे हैं।इसका कारण है कि उनकी तुलना में मास्टरों को मोटा वेतन मिलता है ।यह क्या बात हुई कि ऑफिस में आठ-नौ घंटे तो बाबू खटे और महज़ पाँच-छः घंटे में मास्टर जी उनसे ज्यादा पगार झटक ले जाएँ ! वैसे भी पढ़ाना कोई काम नहीं है।पढाई से न तो प्रोडक्टिविटी बढ़ती है और न देश की जीडीपी।राष्ट्र निर्माता कहे जाने वाले मास्टर जी के रहते देश की यह हालत ! समाज के लिए खतरनाक बन चुके ऐसे प्राणी को सबक सिखाने के लिए सरकार को  कोई न कोई अरेंजमेंट तो करना ही था।

बुधवार, 3 सितंबर 2014

सौ दिन अफवाह के !

सरकार ने बड़ी हँसी-ख़ुशी सौ दिन पूरा कर लिए हैं।ये दिन उपलब्धियों भरे रहे हैं, पर कुछ मोतियाबिंद के मरीजों को ‘अच्छे दिन’ फिर भी नहीं दिखाई दे रहे हैं सो उनके लिए एक फ़िल्म बनाई गई है।सरकार को तो शुरू से ही पता था कि वह सौ दिन अवश्य पूरा करेगी,इसलिए सभी मंत्रियों को समुचित मन्त्र दे दिए गए थे।पहले वाली सरकार नादान थी.वह मंत्रियों को एजेंडा देती थी, जो कभी भी पूरा नहीं हो सकता था।इससे जनता यही समझती कि सरकार निकम्मी है।नई सरकार बेहद चतुर और सतर्क है,इसलिए उसने काम के बजाय शासन के मन्त्र बाँटे हैं ।इन मन्त्रों का जाप करके सौ दिन क्या पूरे पाँच साल बिताये जा सकते हैं।
जनता की याददाश्त बहुत कमज़ोर होती है,यह बात सरकार अच्छी तरह से जानती है।चुनावों से पहले  लगता था कि मंहगाई,भ्रष्टाचार और बलात्कार जैसी समस्याएँ देश को ख़त्म करके रख देंगी।लेकिन देखिये,’अच्छे दिनों’ की छाँव तले जब सौ दिन पूरे हुए हैं,देश बचा हुआ है पर समस्याएँ छूमंतर हो गई हैं।इतने कम दिनों में जब इतना बदलाव महसूस किया जा सकता है तो पूरे पाँच साल में और उसके बाद अगले पाँच साल में देश का पूरा इतिहास ही बदल जायेगा।
अब टीवी और अख़बार में शिक्षा,बेरोजगारी और कुशासन पर ज्यादा चर्चा सुनने को नहीं मिलती।इससे सिद्ध होता है कि देश के लिए ये समस्याएँ रही नहीं।अब धर्म,संप्रदाय,जिहाद पर फोकस किया जा रहा है क्योंकि यदि बदलाव होना है तो सभ्यता और संस्कृति का हो। जब सारी समस्याएँ इन्हीं से जुड़ी हैं तो जाहिर है,इसमें समय लगेगा।सरकार जनता से वह समय स्वयं ले लेगी।इतना तो उसका भी हक़ बनता है।।इसलिए सरकार का ढोल बज रहा है और आपको नहीं अच्छा लगता है तो आप अपने कान बंद कर लीजिये।
इतनी सारी उपलब्धियाँ इतने कम समय में मिलना एक दुर्लभ घटना की तरह है।सरकार की शुरुआत में ही कुछ विद्वेषीजन छींकने लगे थे,तभी उसने स्पष्ट रूप से कह दिया था कि उसे हनीमून पीरियड के लिए कम से कम सौ दिन चाहिए।सब यही समझ भी रहे थे कि सरकार का हनीमून पीरियड चल रहा है मगर सौ दिन आते-आते अंदर से अफवाह निकल आई ।अभी तक यह नहीं पता चल पाया है कि यह अफवाह ‘अच्छे दिनों’ को लेकर है या हनीमून के बारे में।कुछ लोग इसे बुजुर्गों का शाप बता रहे हैं तो कुछ कह रहे हैं कि यह महज़ अफवाह है।