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बुधवार, 31 दिसंबर 2014

ठंड में नहाना एक राष्ट्रीय समस्या है!

सामने आधी बाल्टी पानी था और मुझे बड़ी देर से ललकार रहा था।पिछले आठ दिनों से सफाई के बारे में श्रीमती जी की नसीहतें सुनने के बाद इतना हौसला जुटा पाया था कि उसे भर नज़र देख सकूँ।स्नानघर तक मैं ऐसे पहुँचा था,जैसे कसाई बकरे को जिबह के लिए पकड़कर ले जाता है।मामला केवल नहाने या सफाई भर का होता तो कोई न कोई तोड़ मैं निकाल ही लेता पर बात यहाँ तक पहुँच गई थी कि हमारे न नहाने से यदि कोई संक्रामक बीमारी फ़ैली तो उसका सीधा-सीधा जिम्मेदार मैं ही होऊँगा।यानी यह तय था कि पाला गिरे या बर्फ़,हमें अपनी क़ुर्बानी तो देनी ही पड़ेगी।

मैंने बाल्टी की ओर से नज़रें हटाकर एक बार फिर बाहर की ओर दौड़ाई।पर कोहरे की सफ़ेद चादर ने नज़र को वहीँ ठिठका दिया।बाहर की धुंध के बजाय मुझे बाल्टी के अंदर का खुलापन ज्यादा अच्छा लगा।इससे मुझे जो थोड़ी हिम्मत मिली,उसे साथ लिए मैं बाथरूम के अंदर कूद पड़ा।मैंने पानी से अध-भरा डिब्बा पहले अपनी हिम्मत पर ही उड़ेला,हिम्मत वहीँ जम गई।इतने में बाहर से श्रीमती जी की आवाज आई कि साबुन वहीँ रखा है,उसे भी आजमा लेना।इतना सुनते ही मेरी हिम्मत को थोड़ी गर्माहट मिली और मैंने झट से पानी का दूसरा डिब्बा साबुन पर न्यौछावर कर दिया।बचे हुए पानी में मुझे अपने अन्तःवस्त्र भी भिगोने थे,इसलिए मैंने इसका भी ख्याल रखा।एक भले समाजवादी की तरह मैंने यह कर्म पूरे मनोयोग से किया।जब बाथरूम में मेरे नहाने के सारे साक्ष्य मौजूद हो गए,मैं ‘अच्छे दिनों’ के रैपर में लिपटकर बाहर आ गया।

बाथरूम के बाहर जश्न का माहौल था।श्रीमती जी ने गोभी के गरम पकौड़ों के साथ गिलास भर चाय हमारे सामने पेश कर दी।बच्चे देशभक्ति के गाने गा रहे थे।मैं सोचने लगा कि हमारे बाथरूम जाते ही ऐसा क्या हो गया है ? देश में हमारे नहाने से भी ज्यादा ज़रूरी और काम हैं।ऐसी ठण्ड में कश्मीर में बाप-बेटी या बाप-बेटे की सरकार नहीं बन पा रही है,यह चिंता का विषय होना चाहिए पर श्रीमती जी को राजनीति से कोई दिलचस्पी नहीं।उन्हें लगता है कि सरकार बनाने से कहीं अधिक कठिन काम पकौड़े तलना है।पकौड़े बनाने के लिए हर बार एक ही फार्मूला मेनटेन करना पड़ता है जबकि सरकार तो कैसे भी बन जाती है।उसके बनने के सारे विकल्प खुले रहते हैं।काश,मेरे नहाने को लेकर भी सारे विकल्प खुले रहते पर लगता है कि इस समय नहाना ही सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या है ।

रविवार, 28 दिसंबर 2014

अपनी-अपनी घरवापसी!

कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी।कुल्हड़ में चाय छनकर आ गई थी पर घने कोहरे के कारण हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था।चाय कुल्हड़ में ही पड़ी-पड़ी जमने लगी थी।अचानक मिले इस जीवनदान से चाय का हौसला बढ़ गया।उसने कुल्हड़ को थोड़ी-सी कुहनी मारी और कहने लगी--‘मेरे मन की बात सुनोगे ?’ कुल्हड़ पहले तो थोड़ा कुनमुनाया फिर कोहरे को चेहरे से झाड़कर बोला-कोई फायदा ना है।तू सुनाकर करेगी भी क्या ? या तो अभी पेट के अंदर चली जाएगी या मेरे अंदर पूरी की पूरी जम जाएगी।ऐसे में तू कहना क्या चाहती है ?’

चाय भीषण ठण्ड में भी उबल पड़ी।कुल्हड़ का इस तरह का रवैया उसे बिलकुल पसंद नहीं आया।उसने मुँहतोड़ ज़वाब देते हुए कहा—मेरा जीवन भले ही अल्पकालिक है पर यह क्या बात हुई कि हमें अपने मन की बात कहने का भी अधिकार नहीं है।तुम्हें अभिमान का नशा है और नशा किसी भी चीज़ का हो,बुरा होता है।सबको अपनी-अपनी बात कहने का हक है।सुड़कने वाले की बातें मैं हमेशा सुनती आयी हूँ।आज भी मैं उसकी बातें सुन-सुनकर केतली में ही उबल रही थी।अब न जाने कहाँ चला गया है वो ?

चाय की बात सुनकर कुल्हड़ थोड़ा सेंटिया गया और कहने लगा—हाँ,तुम ठीक कह रही हो।शाम को ही चौपाल में घरवापसी की बातें हो रही थीं।अभी रेडियो में भी कुछ ऐसा ही सुनाई दे रहा था।पर मेरी समझ में कुछ आया नहीं।अगर तुम्हारी घरवापसी हुई तो तुम पहले केतली में,फिर चूल्हे में और फिर उसके बाद कहाँ-कहाँ पहुँचोगी ? चाय-बागान तक चली भी गई और फिर घरवापसी की बात उठ गई तो इसी ज़मीन में मिलना होगा।सब कुछ कितना गड्ड-मड्ड सा हो जायेगा ना ? ’

चाय अब तक गम्भीर हो चुकी थी।’मन की बात’ की रट लगाये उसे अंदाजा नहीं था कि बात उसके अस्तित्व तक पहुँच जायेगी।’हाँ,तुम भी अपनी घरवापसी के लिए तैयार हो जाओ।तुम्हें कुम्हार के यहाँ भी जाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि तुम्हें मिलना तो इसी मिटटी में है।घरवापसी का यह सबसे बढ़िया शॉर्टकट होगा।लेकिन क्या हमें सुड़क जाने वाले की भी कभी घरवापसी होगी ?’ चाय ने थोड़ा ठंढाते हुए पूछा।

कुल्हड़ ने कुछ याद करते हुए बताया-‘एक दिन कुम्हार अपने मन की बात कह रहा था।पहले तो वह घरवापसी की बात सुनते ही बहुत खुश हो जाता था,पर अब डरा-सा रहता है।पूछ रहा था कि उसके पुरखे सायबेरिया से आये थे,तो क्या उसे वहां जाना पड़ेगा ? मेरे कुम्हार को तो ठण्डी भी बहुत लगती है।रही बात सुड़कने वाले की,वो तो तुम्हें पीकर अपनी गर्माहट वापस पा लेता है।घरवापसी के लिए उसे आदिमयुग में जाने की ज़रूरत नहीं है।अब जंगल में बचा ही क्या है ? इसलिए भुगतना तो तुम्हें और हमें ही है।’

चाय और कुल्हड़ की यह वार्ता चल ही रही थी कि घने कोहरे से निकलकर दो हाथ कुल्हड़ की गरदन तक आ गए।ये दोनों अपनी ‘घरवापसी’ के लिए तैयार हो चुके थे और सुड़कने वाला अब पहले से बेहतर महसूस कर रहा था।ऐसी कड़ाके की ठण्ड में उसे भी अपने घर जाने की चिंता सता रही थी।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

आइये घरवापसी पर आपका स्वागत है !

‘सबका साथ,सबका विकास’ का उद्घोष करने वाले अब पूर्ण रूप से सक्रिय हो गए हैं।अभी तक दड़बों में घुसे देश-उद्धारक और समाज-सुधारक यक-ब-यक सामने आ गए हैं।आठ सौ सालों के बाद देश अब जाकर जागा है।खबर है कि दो हज़ार इक्कीस तक इसे किसी भी सूरत में सोने नहीं दिया जाएगा।लूटे गए माल की तुरंत ‘घरवापसी’ ज़रूरी है।कितने अच्छे दिन आ गए हैं कि इंसान अब माल बन गया है।जगह-जगह शिविर लग रहे हैं ताकि भूले-बिसरे लोग अपने घरों को सुरक्षित लौट सकें।समाज-सुधारकों द्वारा बनाये गए असली घरों में आते ही उन्हें भूख,बेकारी और छुआछूत से पूरी तरह निजात मिल जाएगी।यह नए हिन्दुस्तान का निर्माण है।

साहिबे-आलम चुप हैं।वैसे तो वे अकसर अपने मन की बात को जनता के पास रेडियो और टीवी द्वारा ‘फेंकते’ हैं पर उन्होंने घरवापसी पर गहन चुप्पी साध रखी है।कई लोग जब उन्हें सदन में ढूंढ रहे थे तब वे राज्यों में अपनी सत्ता ढूँढ रहे थे।ख़ास जगहों और मौकों से ख़ास का गायब हो जाना ही असली जादूगरी है।ठण्ड में घरवापसी भी आम की ही ज़रूरी है,ख़ास तो चलता-फिरता हीटर होता है।उसके बयान में धार और उसकी म्यान में तलवार दोनों बाय-डिफॉल्ट होते हैं।

धर्म के पुजारी मैदान में अपनी-अपनी कुदालें लेकर कूद पड़े हैं।धर्मयुद्ध करने का यही सही समय है।अब न अंग्रेजों के ज़ुल्म सहने की आशंका है और न ही नए देश को साधने की चुनौती।खाते-पीते और शांति से बढ़ते समाज में वैसे भी धर्म की पूछ-परख नहीं होती,ऐसे में उनके बाज़ार का क्या होगा ? लुटा हुआ माल दुकान पर आ जाये तो उसे मनमाने ढंग से फिर बेचकर लूटा जा सकता है।बाज़ार में इकलौती दुकान होगी तो ज़ाहिर है,टर्न-ओवर भी बढ़ेगा।बार-बार ‘अच्छे-दिन’ की माँग करने वाले अब खामोश हो गए हैं।उन्हें अब न मंहगाई दुखती है और न भ्रष्टाचार हलकान करता है।बड़े डर के आगे इस तरह भी छोटे डर दूर किये जा सकते हैं।यह तो बस ‘अच्छे दिनों’ का एक सैम्पल भर है.

पहले सफाई-अभियान को बुलंदी पर चढ़ाया गया और इसके लिए सड़कों और कार्यालयों की सफाई के बजाय सोशल मीडिया को ग्लैमरस फोटुओं से नहला दिया.इसके साथ गाँधी जी को भी जी भर के याद किया गया.अब सफाई वाली झाड़ू किसी कोने में पड़ी है और गाँधी जी फ्रेम में टांग दिए गए हैं.
फ़िलहाल मुक्ति का नया राग ईज़ाद हो गया है.सब इसे पंचम सुर में अलाप रहे हैं.मंहगाई-मुक्त,भ्रष्टाचार-मुक्त,कांग्रेस-मुक्त,परिवारवाद-मुक्त भारत अब मानवता,समानता और सौहार्द-मुक्त होने की दहलीज़ पर खड़ा है।आइए,इन अच्छे दिनों में आपका...नहीं नहीं, केवल घरवापसी करने वालों का स्वागत है !

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

लुटे हुए माल की वापसी!

बाहर बड़ी धुंध छाई थी।रजाई छोड़ने की हिम्मत न हो रही थी पर बजरंगी काका ने आज पार्क में बुलाया था,सो बेमन से उठ के चल दिया।पार्क में पहुंचा तो देखा कि काका पूरी तैयारी के साथ आये हुए थे।उनके साथ चार बंदे और थे।मेरा चेहरा मफलर से पूरा ढंका हुआ था,सो वे पहचान नहीं पाए।मुझे देखते ही बोले,’घरवापसी करने आये हो क्या ? कहो तो इन चारों के साथ तुम्हारा भी किरियाकरम कर डालें ?’ इतना सुनते ही सुन्न हो चुकी मेरी देह में पता नहीं कहाँ से ऊर्जा आ गई।मैंने मफलर को थोड़ा परे सरकाते हुए जवाब दिया,’ काका,मैं तो अभी घर से चला आ रहा हूँ।अभी जिन्दा भी हूँ और आप क्रियाकर्म की बात करते हो ?’

बजरंगी काका मेरे करीब आकर फुसफुसाए,’नहीं भाई ! तुम्हें घरवापसी करने की कउनो ज़रूरत नाहीं है।ये तो विधर्मियों के लिए है।तुम तो भरे-पूरे इंसान लगत हौ।ई जो दुसरे धरम मा हमरा माल फँसा पड़ा है,वो ही लाने वास्ते सब करना पड़ रहा है।’मैंने अनजान बनते हुए कड़ाके की सर्दी में भी गरम सवाल दाग़ दिया,’तो क्या अब आपको मंहगाई,भ्रष्टाचार और कालाधन परेशान नहीं कर रहा ? चुनाव के पहले हमने तो यही सब सुना था ?’

बजरंगी काका अब अपनी पर आ गए,’देखो बचुआ ! पुरानी मसल है कि कहने और करने में फर्क होवे है ।हम ठहरे पुरनिया मनई इसलिए पुरानी बात ही हमरे लिए पत्थर की लकीर हवै।वो ही हमारे लाने गीता और रामायन है।हम लोगन ने बहुत बुरा टैम देखा है।अब हमरे अच्छे दिन आये हैं तो काहे न पूरा मजा लियें ? जल्दी ही अपन देश में सनातन धर्म का झंडा लहराएगा और हम विश्व-गुरु बन जइहैं।फिर बाकी देश हमरी ही पूजा-पाठ करैंगे।’

'तो  क्या इसीलिए ‘घरवापसी’ की अलख जगाये फिर रहे हो ? फिर तो आप को वनवासी होना पड़ेगा ?मैंने आख़िरी तीर मारते हुए पूछा।काका ने सारी आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा,’घरवापसी का मतलब औरों का हमारे साथ समा जाना है.मतलब जइसे समन्दर मा नदी-नाला मिल जात हैं।हम वनवासी थोड़े बनेंगे।माना कि हमरे पूर्वज पेड़न पर उछलत-कूदत रहे पर अब हम पूँछ कहाँ ढूँढ़त फिरेंगे ?असल बात तो या है कि जो हमरे धर्म को मानत हैं उनको बेकारी,भूख और छुआछूत से जिल्लत नाहीं होत है।बस सारी गड़बड़ उनके अधरम होने में ही है।इसलिये पूरे देश में अब हमरा ही झंडा और डंडा चलेगा।‘


इतना सुनते ही मुझे अपनी गरम रजाई का ख्याल आया और मैं घर की ओर चल पड़ा।काका अपने साथ लाए हुए माल की वापसी में व्यस्त हो गए।

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

गायब होते देश में।

उधर फाइल से दो पन्ने गायब हुए और इधर कोहराम मच गया।देश भर में इस पर गहन चिन्तन शुरू हो गया है कि आखिर वे पन्ने गए कहाँ ? ऐसा भी हो सकता है कि फाइल पर पड़े-पड़े वे ऊब गए हों और हवा-पानी के लिए बाहर चले गए हों।इसका मतलब उनके पाँव आ गए हैं पर कुछ लोग कह रहे हैं कि इसमें किसी का हाथ है।यानी सारा मसला पाँव के आने में हाथ का है।अब जांच एजेंसियां इसी बात पर हाथ-पाँव मार रही हैं।सरकार भी शुक्र मना रही है कि अच्छा हुआ कि पूरी फाइल को पाँव नहीं आये, नहीं तो वह पूरी की पूरी अदृश्य हो जाती।तब वह क्या करती ? बहरहाल,सरकार इस बड़े संकट से बच गई है।

पन्नों के गायब होने पर शोर मचना बहुत बचकाना टाइप का मामला लगता है।जहाँ प्लॉट के प्लॉट ,खेत के खेत और कम्पनी की कम्पनी मिनटों में गायब हो जाने का रिकॉर्ड क़ायम हो चुका हो,वहाँ एक फाइल से दो-चार पन्ने गायब होने से कौन-सा पहाड़ टूट गया ?उल्टे यह तो प्रशासन की साख बढ़ाने वाला कृत्य है।अब कार्यालय के अफसरों और बाबुओं के इतने बुरे दिन आ गए हैं कि वे ऐसी छोटी-मोटी गुमशुदगी करने में इतना टाइम ले रहे हैं।सरकार कहती है कि इस तरह के टुटपुंजिये काम में उसका कोई हाथ नहीं है।यह काम तो हाथ वाली सरकार ही कर सकती है।जाते-जाते उसी ने अपने हाथों का सदुपयोग किया होगा।हम तो बस इस पर जांच बिठा सकते हैं और अगर अगले पाँच साल में पन्ने मिल गए तो केस आगे तक भी ले जायेंगे।हम किसी को छोड़ेंगे नहीं।

जांच समिति पूरे मनोयोग से जांच में जुट गई है।उसे बड़ी-बड़ी फाइलों और दस्तावेजों के गुम होने की जांच करने का तगड़ा अनुभव है।इन पन्नों की खोज-खबर मीडिया और जांच समिति के गायब हो जाने तक जारी रहेगी।वैसे भी दो पन्ने गायब हो जाने से अधिक फर्क नहीं पड़ता है।दिन भर में कितने कार्यालयों से कितनी फाइलें गायब हो जाती हैं,क्या इससे कभी कुछ फर्क पड़ा है ?इससे कम से कम यह तो पता चलता है कि हमारे कार्यालयों में फाइलें धूल ही नहीं खाती हैं ,कभी-कभार टहलने भी निकल जाती हैं।ऐसे ही कभी कोयला फाइलें भी टहलने निकल गई थीं,जो आज तक पर्यटन पर ही हैं।हाँ,उनको टहलाने वाले ज़रूर सड़क पर आ गए हैं।

दरअसल,गायब होते समय में इतना कुछ गायब हो रहा है कि किसी फाइल का या कुछ पन्नों का गायब होना मायने नहीं रखता।गायब होते देश में इनका गायब हो जाना बेहद मामूली बात है। जहाँ रोजाना हजारों बच्चे खेल के मैदान और स्कूल से गायब होते जा रहे हों,चुनाव बाद मुद्दे हवा हो गए हों,लोगों के बीच से भरोसा और सरकार से सरोकार गायब होने लगा हो,वहाँ दो-चार पन्नों का गायब होना खबरों में कितनी देर तक टिक पायेगा,सोचना मुश्किल नहीं है।हमें तो उस दिन का इंतजार है,जिस दिन लिखी हुई इबारत से स्याही और दस्तावेज से तहरीर गायब हो जाएगी।

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

धरती का आँचल उड़ गया !

पहला दृश्य

स्कूल की घंटी उदास है।आज उससे मिलने न कोई हथौड़ा आया और न ही कोई बजानेवाला।उसे लगता नहीं कि फिर कभी वह पहले जैसा बज पायेगी।पहले उसे अपने बजने पर बहुत दर्द होता था,पर अब तो कोई दर्द ही महसूस नहीं होता।उसे लगता है कि कोई उसे जोर से बजाये ताकि वह अपने होने का अहसास कर सके पर हथौड़ा भी तो उसके पास नहीं आ रहा है।वह दूर कहीं चुपचाप पड़ा सुबक रहा है।हथौड़े को लगता है कि वह वार करना ही भूल गया है।उसका सारा जोर एकदम से कमजोर पड़ गया है।उसे उठाने वाले नन्हें हाथ कहीं बिला गए हैं।वह भारी बोझ तले दबा जा रहा है।

दूसरा दृश्य

कक्षा में चिर शांति है।दरवाजे खुले हैं पर कोई हलचल नहीं नज़र आती।जो शोर कभी तमाम प्रयासों के बाद भी काबू में नहीं आता था,आज बिलकुल नदारद है।बेंच सपाट पड़े हैं।उनने दरवाजे की तरफ से आँखें फेर ली हैं।वैसे उन पर मक्खियों के बैठने की भी जगह नहीं बची है।डेस्क उखड़े हुए हैं और उनकी गोद पथराई हुई है।ब्लैकबोर्ड रंगीन होकर पूरी कक्षा में छितर गया है।रोशनदान में एक उल्लू बार-बार फड़फड़ा रहा है।

तीसरा दृश्य

आँगन टकटकी लगाये ताक रहा है।अरसा हुआ नन्हें पांवों से उसे ठोकर खाए हुए।उसके सन्नाटे को चीरने के लिए उसके आर-पार कोई नहीं आ-जा रहा।गेंद दालान में बल्ले से चिपटी हुई पड़ी है।सामने खूँटी पर बस्ता टंगा है,जिस पर एक बदरंग टाई लटक रही है।किताबें बस्ते से झाँक रही हैं पर उनका मुँह बंद है।वे बस्ते के अंदर से छटपटा रही हैं पर निकल नहीं पा रहीं।किताबों के पन्ने हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं और ड्राइंग कॉपी के सारे रंग उड़ गए हैं।

चौथा दृश्य

आले पर रखा दिया टिमटिमा रहा है।चूल्हा खामोश है और आग पहले से अधिक सर्द हो गई है।दूध की कटोरी बताशे के बिना बिन पिए ही पड़ी है।अम्मा का अंजन डिबिया में ही सूख गया है और बाबा की छड़ी टांड़ पर हमेशा के लिए पसर गई है।घर की डेहरी पर दो आँखें अभी भी टंगी हुई हैं और उनका रुख बाहर की ओर है।ऐसा लगता है जैसे स्थाई रूप से वे वहीँ गड़ गई हों।घर के दरवाजे कभी न बंद होने के लिए खुले पड़े हैं पर वहाँ किसी भी मौसम के आने के आसार नहीं दिखते।लगता है,बयार ने भी रास्ता बदल लिया है।

इन चार दृश्यों को देखने के बाद किसी और दृश्य को देखने की ताक़त हममें नहीं बची है।आखिरी बार देखता हूँ कि धरती ने अपने आँचल को हवा में जोर से उछाल दिया है और आसमान ने अपना कद झुकाकर खूँटी पर टंगे बस्ते को अपने कंधे पर लाद लिया है।धीरे-धीरे वह क्षितिज में कहीं विलीन हो गया है।दूर कहीं सियारों के रोने की आवाजें आ रही हैं।इससे इतना तो ज़रूर पता चलता है कि धरती पर कुछ बचा हुआ है।

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

नशे की बात और चिलम !



संतू महराज कल शाम को अपनी चौपाल पर अलाव सुलगाते ही मिल गए।वे बहुत भड़के हुए थे।हमने सोचा सर्दियों में सरकार ने अपनी तरफ से अलाव न जलवाकर उनका तापक्रम बढ़ा दिया होगा पर बात कुछ और ही निकली।हमने उन्हें फुल इज्ज़त बख्शते हुए ऐसी कड़ाके की ठण्ड में भी उनका यूँ शोले-सा भड़क जाने का सबब पूछा।वे भरे बैठे थे और मौक़ा मिलते ही फट पड़े।कहने लगे-‘एक बार बयान देने के बदले में एक बार की माफ़ी पर्याप्त क्यों नहीं मानी जाती ? इतनी ठण्ड में भी हमसे तीन-तीन बार माफ़ी मंगवा ली गई ! यह कहाँ का लोकतंत्र है और कैसा न्याय है ?हमारे बयान की न सही,हमारे चोले की तो इज्ज़त की जाती !’

हमने उनकी पीड़ा की गहराई को समझा और उतने ही गहरे उतर कर बोले-महराज ! आप अधिक कुपित न हों।सफ़ाई-अभियान के दौर में जितना भी कूड़ा-कचरा है,बहकर निकल जाये,अच्छा है।आप वैसे भी विरागी हैं,कुछ असर होगा नहीं।आपके बयान ने इत्ती ठण्ड में गर्माहट पैदा कर दी,यह क्या कम है ? लोग नादान हैं,आपके योगदान को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं’

संतू महराज ने पलटकर जवाबी हमला किया,’हमें अपने बयान देने का दुःख नहीं है।हमारी जेब से एक साथ तीन-तीन माफियाँ सरका ली गईं जो बेहद आपत्तिजनक है।बयान तो हमारे पास ख़ूब भरे पड़े हैं या यूँ कहिये कि हम बयानों के रंग में ही रंगे हुए हैं।इस रंगीन माहौल में माफ़ी हमें पैबंद-सा लगती है।सबसे अखरने वाली बात है कि इसका स्टॉक भी हमारे पास पर्याप्त मात्रा में नहीं है।ऐसे में हम कुपित न हों तो क्या करें ?’


‘पर अब तो रामराज्य है,आपको किसी से डरने की क्या जरूरत ? रही बात लोकतंतर की,सो वो तो पहले ही सठिया गया है।उसकी बातों को अब कोई गंभीरता से लेता भी नहीं है।अब उसके वानप्रस्थ का समय आ गया है,आपकी किरपा रही तो जल्द ही उसका वनगमन हो जायेगा।’हमने उन्हें दिलासा देते हुए पुचकारा।


संतू महराज ने घने कोहरे में मुक्केबाजी करते हुए चिलम की ओर हाथ बढ़ाया तो हमने उन्हें ‘मन की बात’ याद दिलाई।वे बोले-‘वत्स ! हम नशे के लिए चिलमबाजी नहीं करते।हम तो आलरेडी नशे में हैं।चिलम तो ज्ञान-चक्षु खोलती है।आप भी आजमायें और ‘राष्ट्रीय-ज्ञान’ पाएँ ।’हमने उनके इस ज्ञानी-बयान को सर पर लपेटा और सुरक्षित घरवापसी के लिए नई योजना बनाने लगा।उधर संतू महराज की चिलम धू-धू कर जलने लगी थी.

रविवार, 14 दिसंबर 2014

सरकार को ही 'राष्ट्रीय' घोषित कर देना चाहिए।

देश में इस समय सब कुछ राष्ट्रमय हो गया है।सरकार भी समझ रही है कि सारे लोग उसकी थाप पर राष्ट्रवादी मूड में नाच रहे हैं।राष्ट्रवादियों ने बड़ा दिमाग लगाया और पाया कि विभिन्नता में एकता वाले राष्ट्र से बड़ा कन्फ्यूजन क्रिएट हो रहा है।इसलिए राष्ट्र की अलग-अलग पहचान घोषित कर दी जाए,जिससे आने वाली पीढ़ी अपने बीच में से गैर-राष्ट्रीय को छाँटकर अलग कर सके।निश्चय यह किया गया कि जितने प्रतीकों पर ‘राष्ट्रीय’ का लेबल लगाया जा सके,जल्द लगाया जाय।यह काम खुलेआम अच्छा-सा बयान फेंककर किया जा सकता है।इससे पारदर्शिता के लिए सरकार की प्रतिबद्धता पर किसी को कोई शक भी न होगा।

राष्ट्रहित में गंभीर चिंतन करते हुए ऐसे बयान आने भी लगे हैं।सबसे पहले गीता को ‘राष्ट्रीय ग्रन्थ’ का दर्जा देने की बात की गई।बयान के साथ ही कुछ वजहें भी नत्थी की गईं,जिससे ऐसा करना निहायत ज़रूरी हो गया था।कहा गया कि देश में ग्रन्थों को लेकर बड़ी सुस्ती बरती जा रही है।लोग आधुनिक संचार साधनों के जंजाल से इतना चिपटे रहते हैं कि उन्हें धर्म की बातें पढने-सुनने का मौका ही नहीं मिलता।इन्हीं वजहों से लोग बाबाओं के आश्रमों और डेरों की ओर पलायन कर रहे हैं।यही सही समय है कि उन्हें ‘राष्ट्रीय ग्रन्थ’ की उपयोगिता से अवगत कराया जाय।

गीता को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने के पीछे इसका सूत्र-वाक्य है,’कर्म किये जा,फल की इच्छा मत कर तू इंसान,ये है गीता का ज्ञान’।अब इसको ढंग से समझने की ज़रूरत है,पर कुछ लोग केवल गीता का नाम सुनकर ही उछल पड़े हैं।अरे भाई ! ज़रा सेकुलर-खाँचे से निकलकर सोचिये,अर्थ स्पष्ट हो जायेगा।गीता कहती है कि तुम्हारा काम केवल कर्म करना है।फल की चिंता तुम मत करो।उसे तो हम हासिल कर ही लेंगे।तुम्हें मिलेगा भी तो किसी काम का नहीं।आजकल फल पाने से ज्यादा उसको बचा या पचा पाना बहुत मुश्किल हो गया है।इसे राष्ट्रीय घोषित करने से इसका संरक्षण स्वतः हो जायेगा और हमारी राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी पूरी हो जाएगी।लोग तो केवल इसका जाप करें,किसी तरह की उम्मीद न करें।अगले चुनावों से पहले हम उसकी उम्मीदों को जगा देंगे और याद दिला देंगे कि उसका काम केवल वोट देना है ,बस।

सरकार की इस ‘राष्ट्रीय नीति’ में हमें भी दम लगता है।लगे हाथों इस विषय में कुछ सुझाव हमारी ओर से भी पेश हैं।सरकार को चाहिए कि वह योग सिखाने वाले बाबा को राष्ट्रीय संत घोषित कर दे,इससे उन्हें पूर्ण संरक्षण प्राप्त होगा और वो बेखटके अपना धंधा-पानी बढ़ा सकते हैं।कालेधन को ‘राष्ट्रीय शर्म’ घोषित कर देने से उसका नाम लेना भी शर्म का विषय हो जायेगा।ऐसे में मारे शर्म के कोई भी उस मुद्दे को उठाने से बचेगा।सरकार को भी अपना काम करने का समय मिलेगा।

सरकार को सबसे बड़ी राहत बयानबाजी के क्षेत्र में मिलेगी।आये दिन कोई न कोई मंत्री ऐसा बयान दे देता है,जिससे तूफ़ान आ जाता है।इसकी काट के लिए एक अचूक उपाय है।जिस बयान पर भी हंगामा शुरू हो जाय ,उसे तुरंत ‘राष्ट्रीय बयान’ घोषित कर दिया जाय।इससे उस बयान और सम्बंन्धित मंत्री को स्वतः संरक्षण प्राप्त हो जायेगा।संसद में इस बहाने कुछ काम-धाम भी हो लेगा।

आये दिन स्त्री-सुरक्षा को लेकर सरकार लाचार दिखती है ।इस फार्मूले से इसका भी निदान हो जायेगा।क्यों नहीं स्त्री को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ घोषित कर दिया जाय ! इससे वो अपने-आप संरक्षण पा लेगी और सरकार भी अपने दायित्व से मुक्ति।’राष्ट्रीय धरोहर’ के लिए किसी दिवालिया होती विमानन कम्पनी से बेहतर कुछ नहीं होगा।इससे नए साल के आकर्षक कलेंडर छपना भी सुनिश्चित हो जायेगा और बेरोजगार मॉडलों को काम भी मिल सकेगा।

लोग कहते हैं कि कुछ बदल नहीं रहा है।जब ‘राष्ट्रीय’ तमगा मिलने पर ही सब कुछ चकाचक और दुरुस्त हो जाने की उम्मीद है तो सरकार को पहाड़ खोदने की क्या ज़रुरत है ? फिर भी किसी को सरकार से शिकायत रहती है तो सरकार को ही ‘राष्ट्रीय’ घोषित कर दिया जाय,इससे किसी को उस पर उँगली उठाने का मौका भी नहीं मिलेगा।

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

काजू-बादाम और मंत्री जी।

सुबह जैसे ही अखबार पर नज़र गई,बड़ा अफ़सोस हुआ।एक राज्य के बहुत बड़े मंत्री जी जैसे ही गाड़ी से उतरे,उनकी जेब में पड़े काजू-बादाम तुरंत ज़मीन पर आकर लोट गए।किसी नासपीटे फोटोग्राफर ने इस हादसे की फोटो भी खींच ली।पर फोटो से इस बात का पता नहीं चल रहा था कि काजू-बादाम को जेब से निकलकर राहत मिली है या मंत्री जी के मुँह में ही उनको आराम मिलता।बहरहाल,हमें मंत्री जी की चिन्ता है कि बिना काजू-बादाम के उनका क्या होगा ?

मंत्री जी बुजुर्गवार हैं।उन्हें राज्य को चलाते रहने के लिए खुद का चलते रहना ज़रूरी लगता होगा।इसके लिए सबसे ज़रूरी है कि मुँह चलता रहना चाहिए।पागुर करने से जानवर भी लम्बे समय तक अपना जीवनकाल बढ़ा लेते हैं,फ़िर ये तो मंत्री जी ठहरे।कई मंत्री और नेता तो चलते ही बुढ़ापे में हैं।इस वक्त सबसे ज़्यादा सक्रिय होने की ज़रूरत होती है।हमारे देश में एक बुजुर्ग तो भरे बुढ़ापे में प्रधानमंत्री बन गए थे।उसके बाद तो हवाला,झामुमो कांड जैसे कई काम चल निकले।एक और बुजुर्ग नेता तो आखिरी दिनों में इतना चले कि पिता तक बन गए।चलते रहने के लिए ऊर्जा की ज़रूरत होती है और ऊर्जा के लिए भोजन की।काजू-बादाम ने खुद चलकर इस परम्परा का उल्लंघन किया है।अब अगर किसी प्रोजेक्ट के काम में मंत्री जी शिथिल पड़ गए तो इसकी पूरी जिम्मेदारी इन्हीं पर होगी।इन्हें गिरना नहीं चाहिए था।इस काम को काम मंत्री जी पर छोड़ देना चाहिए।

बड़ी चिन्ता का विषय यह नहीं है कि काजू-बादाम क्यों गिरे बल्कि चिन्ता इस बात की ज़्यादा है कि इस गिरने की वज़ह से यदि मंत्री जी गिर जाते तो क्या होता ? एक गिरा हुआ मंत्री पूरे राज्य या देश को गिरा सकता है।यही बड़ा संकट है।काजू-बादाम तो और आ जायेंगे।उनका मंत्री जी की जेब में होना या किसी व्यापारी की दुकान पर होना एक-सा ही मामला है।अन्ततोगत्वा उन्हें मंत्री जी के मुँह का प्रसाद ही बनना है।हाँ,यह ज़रूर बड़ी चिन्ता का विषय है कि बिना काजू-बादाम खाए अगर जनता की सेवा की जाती है तो वह कितनी कमजोर होगी ! काजू-बादाम को मंत्री जी की जेब और मुँह में रखने से ही उनकी वास्तविक कीमत मिलती है इसलिए भी उनको वहाँ से स्खलित होने या गिरने से बचना चाहिए था।

गिरे हुए काजू-बादाम को अगर मंत्री जी का संतरी उठा लेगा तो भी क्या होगा ? न तो वह उन्हें खाकर स्वयं मज़बूत होगा और न ही उनकी कीमत बढ़ा पायेगा ! इसलिए काजू-बादाम का मंत्री जी की जेब से गिरना घोर चिन्ता का विषय है।

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

भरोसे काका और परसन ऑफ़ द इयर !

गाँव में कल भरोसे काका मिले,बड़े दुखी लग रहे थे।पिछली बार जब गाँव आया था,उस वक्त देश में नई सरकार आई थी।भरोसे काका के चेहरे पर खूब रौनक थी।छः महीने बाद ही सूरत का यह हाल देखकर मुझसे रहा न गया।मैंने पूछ ही लिया-काका,गेहूँ की फ़सल गड़बड़ा गई है क्या ? अभी तो ठण्ड की शुरुआत है,मौसम सुधरते ही फ़सल सुधर जायेगी।काहे चिन्ता करते हैं ?

काका ने तुरंत प्रतिवाद किया-नहीं बच्चा ! फसल तो मौसम बदलने पर सुधर लेगी,हमें उसकी चिंता नहीं है।छह महीने हो गए हैं पर अबतक सिर्फ़ गोलाबारी जारी है।उधर दुश्मन देश लगातार हमारे बन्दों को मार रहा है और इधर रेडियो और टीवी पर आतिशबाजी चल रही है।काला धन पाकिस्तान की तरह पहले से अधिक बेफिक्र हो गया है।हमारे सैनिक अपने ही देश में नक्सलियों के शिकार बन रहे हैं।क्या ख़ाक बदला है सरकार बदलने से ?

मैंने भरोसे काका की उम्मीद को बचाने की पूरी कोशिश की।उन्हें ताज़ा जानकारी दी कि हमारे देश में विदेशी पूंजीनिवेश की रिकॉर्ड आमद हुई है और अपने प्रधानमंत्री को ‘परसन ऑफ़ द इयर’ में सर्वाधिक वोट मिले हैं।बहुत कुछ बदल रहा है।अभी एक मंत्री ने गाली-गलौज करके बयान तक बदल लिया है और आप यूँ ही दिल को तपती हुई भट्टी बना बैठे हैं।थोड़ा समय दीजिये,अभी तो छह महीने ही हुए हैं।’

काका हमारे समझाने से और उखड़ गए।कहने लगे-हमने तो अपने देश के स्वाभिमान के लिए उनको वोट दिया था।वो इसमें भी विदेशी-निवेश ला रहे हैं।कह रहे हैं कि बाहर से पैसा आएगा तभी विकास होगा।रही बात ‘परसन ऑफ़ द इयर’ की,तो ये क्या बला है ? हमने तो उन्हें कब का वोट दे दिया था।अभी तक वो वोट ही माँग रहे हैं ? यह किस तरह की सरकार है ? हमें तो काम के बदले नाम का ही नगाड़ा ज्यादा सुनाई दे रहा है !’

‘काका,आप नहीं समझेंगे।हमारे प्रधानमंत्री को दूसरे मुलुक के लोग अब गौर से सुनते हैं।जल्द ही अमरीका वाले अंकल भी देश में आ रहे हैं।अब हम पहले से ज्यादा ताकतवर हो गए हैं’ मैंने पूरी  ताक़त से अपनी बात कह दी।

लगता है काका पहले से ही तैयार बैठे थे।उन्होंने कुछ पुरानी अखबारी-कतरनों को हमारे सामने बिखेर दिया।उस कतरन के सारे समाचार हमारे हाथ में आज के अख़बार में हूबहू चमक रहे थे।पन्नों पर सूरतें बदली हुई थीं,पर बयान और अपमान दोनों अपनी-अपनी जगह पर क़ायम थे।काका अपने भरोसे के साथ उठ गए पर हमारे पास तो वो भी नहीं बचा था ।

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

बीस हजार की थाली!

आज एक भ्रम और टूट गया।हम अब तक अपने को आम आदमी ही समझ रहे थे पर जैसे ही खबर मिली कि इसके लिए हमें अपने टेंट से बीस हज़ार रूपये ढीले करने पड़ेंगे,हमारे तेवर भी ढीले पड़ गए.आम आदमी बनने की पात्रता बीस हज़ार की थाली में भोजन करना हो गया है।यानी आम आदमी बनना भी अब हमारे अपने बस में नहीं रहा।पिछले दिनों जब पाँच और बारह रूपये की थाली मिल रही थी,तब भी अपन ताकते रह गए थे और दूसरे उस थाली के व्यंजन उड़ा ले गए।उस वक्त हमने जिस किसी से वैसी थाली की माँग की तो लोगों ने भंडारे का रास्ता दिखा दिया ।हम आम आदमी के स्टेटस को बरक़रार रखने के लिए वहाँ भी गए थे पर हमसे पहले ही वहाँ दूसरों ने हाथ साफ़ कर दिया।इस तरह उस समय भी हम बहुत थोड़े अंतर से आम आदमी बनने से वंचित रह गए थे।

अच्छे दिनों की आमद के बाद हमको यकीन था कि जल्द ही हमारी यह मुराद पूरी हो जाएगी पर अब उसमें भी पलीता लगता दिख रहा है।पहले मँहगा पेट्रोल और मँहगी सब्ज़ी खरीदते हुए लोगों ने हमारे आम आदमी होने पर शक किया,बाद में जब पेट्रोल पानी के भाव और सब्जी बिना मोलभाव के बिकने लगी तो लोगों ने मौसम पर शक करना शुरू कर दिया।अब ऐसे अच्छे मौसम में आम आदमी की थाली बीस हज़ार में मिले और हम उसे वहन न कर पाएँ तो भला किस लिहाज़ से आम आदमी हुए ?

पाँच और बारह रूपये की थाली एकदम से बीस हज़ार तक पहुँच जाय तो पता चलता है कि विकास की रफ़्तार कित्ती तेज़ है ! अख़बारों में विकास की खबरें मोटे-मोटे हर्फों में चमक रही हैं।दिन-दहाड़े एटीएम वैन से करोड़ों रूपये बटोरे जा रहे हैं तो किसी की गाड़ी से करोड़ों रूपये बरामद हो रहे हैं ।ऐसे में हमारी गाढ़ी कमाई स्वयं शर्मसार हो लेती है।वह जब भी अपनी जेब टटोलती है तो उसे बीस रूपये से अधिक नहीं मिलते हैं।इसका मतलब सारा झोल हमारे होने में ही है।गिरा हुआ भाव तो उठ लेता है पर हम जैसा आदमी कभी नहीं।

काले धन की चिर-पुकार लगाने का हक़ भी हमें किस तरह हासिल होगा,जब हम बीस हज़ार रूपये तक नहीं जुगाड़ सकते।जिनको असल चिंता है वे काली छतरी और काली शाल ओढ़े संसद में बैठे हैं।हमारी सबसे बड़ी चिंता आम आदमी बनने की है।पहले बीस हज़ार आएँ,हम आम आदमी बनें,तब कहीं जन्तर-मन्तर पर जाकर काले-धन को आवाज़ देने का हौसला जुटाएँ !

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

ज्योतिषी जी और हमारी गृहदशा !

जैसे ही घर से कार्यालय के लिए निकला कि पता नहीं कहाँ से मोटी-काली बिल्ली मेरा रास्ता काट गई।ऐसा लगा,जैसे वो बस मेरे ही इंतजार में बैठी थी।मेरे पड़ोसी गुप्ता जी दस मिनट पहले ही निकले थे,नासपीटी तभी अपने बाहर निकलने का मुहूर्त निकाल लेती ! उसका रंग तो काला था ही,आँखें भी गोल-गोल,बड़ी-सी।देखकर मैं तो जगह पर ही स्टेचू हो गया।सोच ही रहा था कि क्या करूँ,आगे जाऊँ या घर लौटकर पानी पीकर मुहूर्त दुरुस्त करूँ,तभी मोबाइल की घंटी बज गई।कार्यालय से शर्मा जी का फोन था।मैंने किसी आशंका के डर से फोन ही नहीं उठाया।घर वापिस लौट पड़ा।

इतनी जल्दी घर में मुझे फिर पाकर श्रीमती जी परेशान हो गईं।मैंने उनसे एक गिलास पानी माँगा तो वे चिंतित होकर कहने लगीं-क्या बात हो गई ? ब्लड-प्रेशर फिर से बढ़ गया क्या ? मैंने बिल्ली वाली बात उन्हें बताई तो लगा जैसे उन्हें दिल का दौरा आ गया हो।वे बड़बड़ाने लगीं-‘मैंने कई बार आपको कहा है कि हमारी गृहदशा इस समय ठीक नहीं चल रही है पर आप सुनते कहाँ हैं ? ज्योतिषी नत्थूलाल जी से पिछले सप्ताह ही बात हुई थी।वो कह रहे थे कि किसी ने हमारे परिवार पर कुछ कराया हुआ है,इसी से मुसीबतें हमारी ओर दौड़ी आ रही हैं।आज शाम को पंडित जी से मिलते आना।’
मैंने पानी का गिलास लेने के लिए उनकी ओर हाथ बढ़ाया पर यह क्या...वह सीधे धरती पर धड़ाम ! अब तो मुझे भी लगने लगा कि ज़रूर कोई प्रेतछाया हमारे परिवार के पीछे पड़ी है।मैं तुरंत ही पंडित जी के यहाँ भागा।पंडित जी पत्रा खोले बैठे जैसे मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे।मुझे देखते ही बोले-वत्स,तुमने बहुत देर कर दी।मैंने घबराते हुए पूछा –क्या अब कुछ नहीं हो सकता है ? पंडित नत्थूलाल ने चश्मे को ठीक करते हुए पत्रा पर नज़र गड़ाई और बोले-तुम हमारे पुराने जजमान हो,तुम्हारा तो कल्याण करना ही होगा।हाँ,जो बात पहले एक ताबीज़ पहनने से हो जाती,अब उसी के लिए घर में पूजा करवानी पड़ेगी।मुझे हर हाल में समाधान चाहिए था,इसलिए पूजा के लिए हाँ कर दी।पंडितजी ने इसके लिए मात्र दस हज़ार रूपये वहीँ रखवा लिए।

मैं उनसे मिलकर लौट ही रहा था कि कार्यालय से शर्मा जी का संदेश आया कि आज मंत्री जी का दौरा था और बिना सूचना के कार्यालय से अनुपस्थित रहने पर मुझे सस्पेंड कर दिया गया है।इतना सुनते ही मेरे तो होश उड़ गए।मुझे काली बिल्ली और पंडित नत्थूलाल फिर से याद आने लगे।क्या पता अब पूजा-पाठ के बाद मैं ही मंत्री बन जाऊँ !

समाजवाद बग्घी पर उतर आया है!

पूँजीवाद से टक्कर लेने के लिए समाजवाद आखिर सड़क पर आ ही गया।पिछले कुछ समय से पूँजीवाद लगातार हवाई हमले करके समाजवाद को सीधी चुनौती दे रहा था,सो उसने भी बग्घी पर उतरने की ठान ली।उत्तम प्रदेश में उत्तम साज-सज्जा के साथ समाजवाद ने ऐतिहासिक बग्घी पर सवार होकर अपनी प्रजा को कृतकृत्य कर दिया।नेता जी ने नवाब साहब के साथ मिलकर समाजवाद को प्रजा के हवाले कर दिया।अब यह प्रजा पर निर्भर है कि वह पिटे हुए मोहरे को लेकर अपना सिर पीटे या नेताजी का प्रसाद समझकर उसे कंठस्थ कर ले।उल्लेखनीय है कि पचहत्तर पार की संन्यास-गमन की अवस्था से भी नेता जी विचलित नहीं हुए।उन्होंने जनहित को देखते हुए स्वयं के बजाय समाजवाद को ही संन्यास पर भेज दिया।अब भी किसी को नेता जी की समाजवाद के प्रति गहरी आस्था पर शंका हो तो समाजवादी-केक को चट कर चुके नवाबों पर एक नज़र डाल ले,बेचारे कितने दुबले हो गए हैं !

समाजवाद के यूँ खुल्लमखुल्ला सड़क पर आने से गाँधीवाद को भी चैन मिला है।उसे लग रहा था कि लोकतंत्र की गठरी उसे अकेले ही ढोनी पड़ेगी पर अब उसे मज़बूत साथी मिल गया है।बदलते दौर में गाँधीवाद पूँजीवाद के साथ कदमताल नहीं मिला पा रहा था।अच्छा हुआ कि समय रहते समाजवाद ने अपना नैनो संस्करण ‘परिवारवाद’ लाकर नवीनीकरण कर लिया है।अब अपना परिवार ही समाज है और अपने नेता जी ही सबके नेता।बीच में कुछ समय के लिए पूँजीवाद से लोहा लेने के लिए लोहियावाद ने अपने हाथ-पाँव मारे थे,पर ‘परिवारवाद’ के लोकप्रिय संस्करण के आगे जल्द ही वह समाजवादी अखाड़े में चित्त हो गया।ऐसे में समाजवाद को धूमधाम से बग्घी पर बिठाकर उसका एहतराम किया जाना लाजमी था।

उत्तम प्रदेश में एक ही तम्बू के नीचे कम्बल और कफ़न वितरित होने लगे हैं,इससे बढ़िया समाजवाद की स्थापना और क्या हो सकती है ? इससे नेता जी खुश हैं कि उनका जलवा अभी तक कायम है;नवाब खुश हैं कि बिना ताज के ही वे वास्तविक नवाब हैं और प्रजा खुश है कि उसे मरने का उचित मुआवजा मिल रहा है।सच्चा समाजवाद यही है कि सब अपना-अपना हिस्सा लेकर खुश रहें और गाँधीवाद की तरह बात-बात पर चिल्ल-पों न मचाएं।निरा समाजवाद से न तो जेब भरती है और न ही पेट,इसलिए इसका अपडेट होना भी आवश्यक है.पूँजीवाद के बजते ढोल के बीच समाजवादी-बग्घी की सवारी निकल रही है.इससे गाँधीवाद का सपना भी पूरा होगा और समाज से विलुप्त हो रहे परिवारवाद को भी संजीवनी मिलती रहेगी ।

शनिवार, 22 नवंबर 2014

सम्मानित होने का सुख !

वे लेखक हैं पर लोग मानने को तैयार नहीं हैं।उन्होंने लिखने में टनों कागज़ काम पर लगा दिया पर वह फिर से लुगदी बनने को मजबूर है।कोई पढ़ने वाला ही नहीं है।जैसे ही वे किसी लेखक के सम्मानित होने का समाचार पढ़ते हैं,उनके अंदर का साहित्यकार फड़फड़ा उठता है।हर दिन नए संकल्प के साथ वे रचना-कर्म में जुट जाते हैं पर लाइमलाइट में नहीं आ पाते।वे इन दिनों नई जुगत में भिड़े हैं।किसी ने उनके कान में फूँक दिया है कि जब तक वे सम्मानित नहीं हो जाते लेखक नहीं कहलाएंगे।सो आजकल वे किसी सम्मानित करने वाले को ताक रहे हैं।फूल-माला लिए आते हर शख्स पर उन्हें सम्मानकर्ता होने का संदेह होने लगता है।पर मुश्किल है कि अभी किसी को उन पर लेखक होने का संदेह तक नहीं हो पाया।इसलिए वे बेचैन हैं।

लेखक होने का दर्द उनको साल रहा है।लेखक न होते तो कोई बात नहीं,पर होकर भी न होना बड़ा अपमानजनक है।लिखे हुए का सम्मानित होना आवश्यक है,अन्यथा लिखना ही वृथा।इस नाते सम्मानित होना मौलिक अधिकार बनता है।उनका वश चले तो इसे अगले कानून-संशोधन में प्रस्तावित करवा दें।अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो लिखने पर ही पाबंदी लगा दे।इससे उन्हें संतोष तो होगा कि लिखने का श्रम व्यर्थ नहीं हुआ।सार्थक लेखन तभी है जब वह सम्मानित होकर लेखक को भी कुछ दे जाय।वे तो बस एक छोटे श्री फल,सस्ते शाल और पान-सुपाड़ी पर ही संतोष कर लेंगे।बंद लिफ़ाफा मिल जाय,भले ही खाली हो,तो वे एकदम से बड़े लेखक बन सकते हैं।ताम्रपत्र की जगह ए-फोर साइज़ की घटिया शीट पर भी वे अपना प्रशस्ति-पत्र छपवाने को बुरा नहीं समझेंगे।इस सादगी और मितव्ययिता से लगे हाथों वे गाँधीवादी लेखक भी बन जायेंगे।

वे बड़े सम्वेदनशील हैं।लेखक को होना भी चाहिए।समाज में सम्मानरहित जीवन उन्हें कतई रास नहीं आ रहा।वे लिखने-पढ़ने के बजाय इसकी जुगत में लगे हैं।कुछ सम्मानित हों,तो प्रेरणा मिले।फिर लेखन भी हो।सम्मानोपरान्त लेखन की अपनी आभा होती है।लेख के बाद कैप्शन में दिया जा सकता है;लेखक फलाँ,फलाँ पुरस्कार से सम्मानित।इससे दूसरे सम्मानकर्ताओं को प्रेरणा मिलेगी।वे भी उनको सम्मानित करने दौड़ पड़ेंगे।सम्मान की फोटो सहित खबर जब सोशल मीडिया और अख़बारों पर छपेगी,वे लहालोट हो जायेंगे।उनकी बिरादरी के दूसरे लोग जितना जल-भुन कर राख होंगे,उनके सम्मान में उत्ती ही तीव्र गति से वृद्धि होगी।वरिष्ठता ऐसे ही आती है।जितने ज्यादा सम्मान के पुलिंदे ग्रहण कर पाएंगे,उत्ते ही वरिष्ठ कहलायेंगे।इसलिए सम्मान पाने पर उनका ज्यादा फोकस है।

वे लिखने से समझौता कर सकते हैं पर सम्मान से नहीं।बचपन में कहीं गलती से पढ़ लिया था,’अकीर्तिं चापि भूतानि,मरणादतिरिच्यते’।अब वही पाठ उन्हें जीने नहीं दे रहा।यश से रहित जीवन मृत्यु से भी अधिक है।यश न होना उनके लिए अपयश है।लेखक होकर कोई आपको न जाने,न सम्माने,ये तो मरने वाली बात है।उनका लेखन अब सम्मान के अभाव में दम तोड़ने की कगार पर है।उनको सम्मान मिले तो लेखन को प्रेरणा मिले।उनका लेखन प्रेरित होगा तो समाज को भी प्रेरणा मिलेगी।सम्मान के बिना यदि वे इस दुनिया से कूच कर गए तो पूरा साहित्यजगत इस हिंसा और अन्याय का जिम्मेदार होगा।इसके पहले कि कोई अनहोनी हो;सभी सरकारी,असरकारी संस्थाओं से निवेदन है कि साहित्य को होने वाली संभावित अपूरणीय क्षति से बचा लें।टैक्स-चोरी और धतकर्मों में संलिप्त संस्थाएं भी लेखक के सम्मान के लिए आगे आ सकती हैं।सम्मान ये सब भेदभाव नहीं देखता,इसलिए वे बस टकटकी लगाये सम्मानित करने वाले की राह देख रहे हैं।

बुधवार, 19 नवंबर 2014

जेड प्लस वाले बाबा जी !

ताज़ा ताज़ा जेड प्लस सुरक्षा पाए बाबा जी से मुलाक़ात हो गई।बाबा जी विकट प्रसन्न दिख रहे थे।उनके इर्द-गिर्द बीस-तीस कमांडो दिखाई पड़े।हमें नजदीक आते देखकर उन्होंने अपनी पोजीशन संभाल ली।बाबा जी के आशीर्वादी-हाथ के बजाय कमांडो की बंदूकें हमारी ओर तन गईं तो तनिक देर के लिए हम भी डर गए।तब तक बाबा जी ने हमारे चेहरे पर आये डर के भाव पढ़ लिए।उन्होंने अपने गनमैनों को शांत रहने का संकेत दिया।हमने बाबा जी को पहले से संचित आदर में और वृद्धि करते हुए प्रणाम किया।बाबा बोल पड़े-पूछो वत्स,जो भी पूछना है।मुझे राजधानी में योग-शिविर का उद्घाटन करने जाना है।

हमारा पहला सवाल था-बाबा जी,अचानक आपको सुरक्षा की ज़रूरत कैसे पड़ गई ? आप तो संत हैं,योगी हैं।आपको किससे खतरा है ?

बाबा एक आँख जमीन पर और दूसरी शून्य में गाड़ते हुए उवाचे-वत्स,समय बदल गया है।बुरे दिनों में तो सब सतर्क रहते हैं।पेटीकोट-धोती आदि से भी रक्षा की जा सकती है पर अच्छे दिनों में पता नहीं कौन अच्छे हथियार से आक्रमण कर दे ? हमारे दुश्मन इसलिए भी बढ़ गए हैं क्योंकि कई लोगों को लगता है कि काले धन की पहली खेप हमारे पास ही आएगी।इसलिए सुरक्षा ज़रूरी है।

हमने अगला सवाल किया-पर यह सुरक्षा जेड प्लस ही क्यों ? यह सरकारी खर्च का अपव्यय नहीं होगा ?

बाबा ने एक दृष्टि सभी कमाण्डोज पर डाली और आश्वस्त होकर बोले-देखिये ,’ए टू जेड’ सुरक्षा भेदी जा सकती है इसलिए जेड के आगे की सारी आशंकाएं इसमें शामिल कर ली गई हैं।पिछली सरकार ने हम योगियों और संतों पर बड़ा अत्याचार किया था।हम तो योगी हैं।किसी से क्या मतलब,पर हमें अपना काम-धंधा भी चैन से नहीं करने दिया जाता।देखिए,एक संत हरियाणा में अपनी सुरक्षा खुद कर रहे हैं।वो इस मामले में आत्मनिर्भर हो गए हैं।सरकार को चाहिए कि संत की रक्षा के लिए पूरी पलटन भेज दे और हमें ख़ुशी है कि वहां की सरकार ऐसा ही कर रही है।

‘मगर उन पर तो हत्या का आरोप है।वे क्यों बचाए जा रहे हैं ?’ हमने आखिर पूछ ही लिया।

बाबा जी ने शीर्षासन करते हुए कहा-संत कभी गलत नहीं होता।सारे आरोप मिथ्या हैं।कल तक पुलिस हमारे पीछे पड़ी रहती थी,आज देखिये आगे-पीछे घूम रही है।सब करने से होता है।हमने चुनाव में सरकार के लिए किया,अब सरकार हमारे लिए कर रही है।वत्स,तुम अभी नादान हो।पुराने चैनल से त्यागपत्र दे दो,तुम्हारे भी अच्छे दिन आ जाएँगे।

हमने अपना कैमरा समेटा और बाबा जी के साथ शीर्षासन में जुट गए।

संतई सुरक्षा चाहती है !

संत हमारे समाज के नायक होते हैं,ठीक वैसे ही जैसे नेता।जाहिर है कि इनके गुणधर्मों में भी समानता होगी।पहले संत प्रवचनकर्ता थे,अब नेता उनसे प्रवचन में इक्कीस सिद्ध हो रहे हैं।विकसित हो रहे आधुनिक युग में संत किसी तरह प्रतियोगिता में नेताओं से पिछड़ न जाएँ ,सो इन्होंने उनका हावभाव-स्वभाव पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया है।नेताओं की अपनी भीड़ होती है और उनके भक्त भी।उनके बीच वो निर्भय होते हैं और दिखते भी हैं ताकि उनके भक्त बाकी दुनिया से निर्भय रहें।संत भी इसी परिपाटी को आगे बढ़ा रहे हैं।उनको लगता है कि वे भक्तों की रक्षा तभी कर सकते हैं जब बाहरी दुनिया से भक्त उनकी रक्षा कर सकें।इसलिए संत विश्रामगृह में अमन-चैन से हैं और बाहर कानून पानी माँग रहा है।

दरअसल,नेता और संत को आम समझने की भूल ही समाज में सबसे बड़े दुःख का कारण है।दुनिया के तारणहार कहे जाने वाले किसी भी संविधान से ऊपर होते हैं।वे स्वयं नियंता हैं,नीति-निर्धारक हैं इसलिए उन पर कोई नियम लागू नहीं होता।वे अपने प्रवचनों में शांति,अहिंसा,संयम की घुट्टी तो भक्तों को पिलाने के लिए तैयार करते हैं,खुद थोड़ी पीते हैं ! ऐसे परमार्थ में रत संत को राज्य भी दंडवत करता है और समाज भी।इनसे प्रवचन-प्रसाद पाकर भक्त भी संत-गति को प्राप्त हो जाते हैं।इसलिए वे निराहार रह सकते हैं,घर-बार छोड़ सकते हैं पर अपनी सीख पर कालिख नहीं पुतने दे सकते।वे इसके लिए लट्ठ भी उठा सकते हैं और अपना कानून भी बना सकते हैं।यही परमसंत की उनको सीख है और वे उन्हें बस गुरुदक्षिणा के रूप में वापस कर रहे हैं।

चाहे संत हो या नेता;मूल रूप से ये दोनों उपदेशक होते हैं।इनकी अपनी जनता और अपना संविधान होता है।बाहरी दुनिया के लोग इनके लिए एलियन-टाइप होते हैं।एक आम आदमी को खेत से ककड़ी चुराने के जुर्म में जहाँ जेल की सलाखें मिलती हैं,वहीँ संत को करबद्ध अपीलें नसीब होती हैं।कानून के आगे उसकी हाजिरी लगाने के लिए हजारों जवानों को कई दिनों तक रणनीतियाँ बनानी पड़ती हैं ।राज्य उसके घुटने में होता है और कानून ठेंगे पर।

सबसे बड़ी कमी हमारे ही अंदर है।हम उपदेशकों से वैसी ही अपेक्षा करने लगते हैं,जैसा वो बोलते हैं।उपदेशक या प्रवचन देने वाले को उन बातों पर अमल करने की ज़रूरत ही नहीं है।वे उपदेश देकर अपना काम कर रहे हैं और हमें आँख मूँदकर उस पर अमल कर लेना चाहिए।इसलिए नेता या संत से जवाब माँगने वाले या उन्हें कानून की किताब दिखाने वाले निरा अल्पज्ञानी हैं।ऐसे पहुँचे हुए संत स्वयं में जवाब हैं।खबरदार,यदि किसी ने उन पर उँगली उठाने की हिमाक़त की !

बुधवार, 12 नवंबर 2014

समर्थन प्रसाद का तौलिया !

समर्थन प्रसाद बहुत गुस्से में हैं।उन्होंने आख़िरी से पहली वाली धमकी दी है कि असली राष्ट्रवादी को छोड़कर अगर वे नये-नवेले राष्ट्रवादी की शरण में गए तो वे विपक्ष की कुर्सी पकड़ लेंगे।वे सुबह समर्थन देते हैं,दोपहर में वापस लेते हैं और शाम को पुनर्विचार करते हैं।एक बंदे को वे जहाज में बिठाकर राजधानी रवाना करते हैं पर उसको एयरपोर्ट पर ही टहलाते रहते हैं।इस तरह एक उत्साही बंदे को देश-सेवा करने से रोक दिया जाता है।समर्थन प्रसाद को यह नहीं पता कि उन्होंने देश के साथ कित्ता बड़ा गुनाह किया है।दूसरे सज्जन थोड़ा समझदार निकले।वह सुबह सत्ता-पार्टी में ऑनलाइन दाख़िला लेते हैं और दोपहर बाद शपथ-ग्रहण कर लेते हैं।काश,शपथ-ग्रहण भी ऑनलाइन होता तो देश को एक सेवक से वंचित न होना पड़ता।

उनका समर्थन खूँटी पर टंगा हुआ तौलिया है।यह उन पर निर्भर है कि तौलिये को कब और कैसे उपयोग में लाना है।जिसको अपना सम्मान ढांपना हो,वह इनके तौलिये को ओढ़ ले।ऐसे तौलिये के अपने साइड इफेक्ट हैं पर ओढ़ने वालों को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।इधर समर्थन प्रसाद तब तक चुप नहीं बैठने वाले जब तक उनको समुचित प्रसाद नहीं मिल जाता।ऐसे ही समर्थन लेने-देने की बैठक में वो मिल गए तो हमने पूछ ही लिया-फाइनली आपका क्या निर्णय है ?

‘देखिए,राजनीति में फ़ाइनली कुछ नहीं होता।हम इसे बिलकुल सिनेमाई तरीके से डील करते हैं।जैसा सीन होता है,वैसा मसाला डाल देते हैं।स्टोरी में बदलाव अंतिम समय तक के लिए सुरक्षित रखा जाता है,इससे गज़ब सस्पेंस क्रिएट होता है।फिल्म में कितने कट करने हैं,कहाँ पर आइटम-सॉंग डालना है,यह विकट विमर्श का विषय है।एक्टर को कितने टेक-रीटेक करने है,यह हमारा विशेषाधिकार है।अगर हमारी शर्तों पर शूटिंग न हुई तो हम फिल्म ही रिलीज़ नहीं होने देंगे।’ समर्थन प्रसाद कहते-कहते उखड़ लिए।


‘यानी अब आप विपक्ष में ही बैठेंगे ? यह जनता के साथ अन्याय नहीं होगा ?’हमने आख़िरी तीर मारा।वे अब फफक पड़े-‘जनता ने कौन-सा हमारे साथ न्याय किया है ? हमने उसके लिए इतनी पिचें खोदीं,राज्य से बाहरी लोगों की सफ़ाई की,पर जानबूझकर सफ़ाई-अभियान का अग्रदूत हमें ही बना दिया गया। अब अजीब मुसीबत है।वो हमीं को साफ़ कर रहे हैं और हमीं से इसका अनुमोदन चाहते हैं।’


तभी खबर आई कि समर्थन प्रसाद का तौलिया खूँटी से कोई उड़ा ले गया है।वे अब उसी को खोजने में लगे हैं।

मंत्रिमण्डल का अपडेट वर्ज़न !

लो जी ,केन्द्रीय मंत्रिमंडल का अपडेट वर्जन भी आ गया।आधुनिक समय में लगातार अपडेट रहना अब नितांत आवश्यक है।इसके बिना कोई भी तकनीक या कम्पनी अधिक दिनों तक टिकी नहीं रह सकती।नोकिया का उदाहरण हमारे सामने है।उसने बाज़ार की ज़रूरतों के मुताबिक अपना बदलाव नहीं किया और आखिर में बिक गई।वहीँ गूगल को देखिए,हर छह महीने में एंड्रॉइड के नए वर्ज़न लाकर वह बाज़ार का सिरमौर बन बैठा है।उसका लेटेस्ट वर्ज़न लॉलीपॉप आ गया है।इसी तरह सरकारों को भी हर छह महीने में नए-नए लॉलीपॉप-वर्ज़न लाते रहने चाहिए।इससे पकड़ मज़बूत बनी रहती है और भविष्य भी सुरक्षित रहता है।

नए वर्ज़न में समाज और क्षेत्र के हर तबके का ध्यान दिया गया है।जो दूसरे दलों में रहते हुए देश-सेवा नहीं कर पाए थे,उन्हें भी मौक़ा दिया गया है।इस चाल से दो शिकार किए गए हैं।एक तो इनके आने से अपना जनाधार मज़बूत होगा और ऐसे नेताओं को कुर्सी पर बिठाकर उनके पूर्व-आकाओं को अच्छे से टिलीलिली की जा सकती है।इधर ये शपथ-ग्रहण कर रहे थे,उधर उनके कलेजे में साँप लोट रहे थे।शपथ लेने वालों को पहली बार व्यक्तिनिष्ठा और सत्यनिष्ठा में अंतर साफ़ समझ में आ गया होगा।

इधर शपथ दिलाई जा रही थी,उधर खबर आ रही थी कि एक नेता को एयरपोर्ट पर ही रोक लिया गया है।वे बेचारे देश-सेवा की शपथ लेने को कसमसाए जा रहे थे पर उन्हें वहां से बाहर नहीं निकलने दिया गया।गोया उनके शपथ लेते ही देश का बड़ा नुकसान हो जाएगा।बुरा हो मोबाइल के आविष्कार करने वाले का,अगर आज यह न होता,वे कब के समारोह में पहुँच चुके होते।उनका नया कुरता और जैकेट कंधे के बजाय खुद को खूँटी पर टंगा महसूस कर रहे थे।ऐसे उत्सवी माहौल में इस मनहूसियत भरे कदम की अपेक्षा कौन कर सकता है ? प्रभु,उन्हें यह अनहोनी सहने की क्षमता प्रदान करें।

शपथ-ग्रहण समारोह में राज्य मंत्री बनाए गए कई लोगों ने कैबिनेट या स्वतंत्र प्रभार न पाकर भी हिम्मत नहीं हारी।उन्होंने शपथ के दौरान अपने नाम से पहले प्रोफेसर,डॉक्टर या कर्नल लगाकर यह संकेत दे दिया कि उन्हें हल्के में न लिया जाय।भले ही वे राज्य मंत्री बने हों,पर वे सुपरहिट प्लेयर साबित होंगे।वो ये जानते हैं कि उन्हें उनके परिवार या उनके बयान के आधार पर नहीं बल्कि उनमें मौजूद देश-सेवा के हुनर को पहचान कर उन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई है।जो लोग फ़िर भी वंचित रह गए हैं,वे अगले वर्ज़न में अपडेट किए जा सकते हैं।

खादी के कलफ़ लगे जिन कुरतों और जैकेटों की शान बढ़ी,उन्हें दिली-मुबारक और जो किसी कारणवश खूँटी में टंगे रह गए हैं,उनके लिए शुभकामनाएँ कि ईश्वर उन्हें भी अगले वर्ज़न में अपने हिस्से का लॉलीपॉप ग्रहण करने की क्षमता प्रदान करे।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

सौ करोड़ी लात!

मैंने जबसे सुना है कि राज्यसभा की एक सीट के बदले मिल रहे सौ करोड़ रूपयों पर किसी ने लात मार दी है,उस लात को खोज रहा हूँ।मैं कित्ता अभागा हूँ कि न जेब में दो कौड़ी हैं और न कायदे की लात ही।लात हो तो ऐसी जो सीधे सौ करोड़ पर पड़े।मेरी तुच्छ लात दिन भर म्युनिसिपल्टी की नालियों से टकराती रहती है और शाम तक महज डब्बे-भर कूड़ा जुटा पाती है।सोचिये उनके क्या जलवे होंगे,जिनकी लात करोड़ों-करोड़ स्पर्श करके सही-सलामत अपने मूल स्थान पर लौट आती है।

मुझे जहाँ उस लात पर गर्व और खुशी का अनुभव हो रहा है,वहीँ ‘सौ करोड़’ की हुई मानहानि पर चिन्ता और दुःख भी ।अगर यह बात सौ-करोड़ी फिल्म वालों को पता चल गई तो उन्हें अपनी रेटिंग हज़ार-करोड़ तक बढ़ानी पड़ सकती है।यह सरासर भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन और अपमान भी है।लात की ऐसी हिम्मत कि अपने को खड़ा करने वाले का ही तिरस्कार करे ! लात के इस तरह बढ़ते प्रभाव पर गहन मंथन होना चाहिए अन्यथा भविष्य में लात खाने को लेकर कई नई सम्भावनाएं जन्म ले सकती हैं।जिनके पास सौ करोड़ नहीं होंगे,वे लात खाकर ही मुक्ति पा सकते हैं और जिनके पास इससे ज़्यादा बजट होगा,वे ही लात की जद से बाहर होंगे।

सौ करोड़ पर लात मारना खरीदारों के लिए खुलेआम चेतावनी है।वे अपनी जेब को इस हिसाब से भरकर लाएँ कि बदले में लात नसीब न हो।लातों के भूत बातों से नहीं मानते,ऐसा सुना था पर अब तो करोड़ों रुपयों से भी नहीं मान रहे हैं।वे टिकट पाकर ‘लातत्व’ को भूल सकते हैं,भले ही इसका अनुभव उन्हें सार्वजनिक रूप से हो।कुर्सी पाकर खुद की लात में अपने आप गुरुता आ जाती है,सो इस भारीपन को पाने के लिए सौ-दो-सौ करोड़ क्या चीज़ हैं ! अभी तक आदमी वीआईपी होता था पर अब से वह बजरिये लात जाना जाएगा।जिसकी जितनी टिकाऊ और कीमती लात,उसकी उतनी बड़ी औकात।

उस गौरवशाली लात को बार-बार नमन है जो पल भर में ही करोड़ों रुपयों से ऊँचे तुल गई।इससे सदन की गरिमा और टिकट की अस्मिता की रक्षा की है।करोड़-दो-करोड़ रूपये जेब में लेकर चलने वाले धन्नासेठ अब टिकट पाने के बजाय अपनी कोई कम्पनी खोल लें,जिसमें ‘लात से कैसे बचें’ का बेहतर ढंग से प्रशिक्षण दिया जाय।इससे उनका व्यापार-घाटा तो कम होगा ही,भविष्य में बनने वाले लतखोर भी कुशल और दक्ष हो सकेंगे।ऐसे में उनको भी लाभ होगा,जो लात मारने के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं।फ़िर वे सरेआम लतियाकर पीठ पीछे ‘समर्पित कार्यकर्त्ता’ का प्रमाण-पत्र निर्गत कर सकेंगे,जिससे दोनों पक्ष अधिकतम लाभ उठा पाने में समर्थ होंगे।

सौ करोड़ तो मेरे पास नहीं हैं पर सोच रहा हूँ कि एक बार उस ‘दैवीय-लात’ का प्रहार सह लूँ,ताकि मुझे भी जीने की वजह मिल जाये।टिकट लेने का शौक तो सिनेमा से भी पूरा कर सकता हूँ पर ऐसी दिव्य-लात दुर्लभ है।इस समय मन में विकट अंतर्द्वंद्व मचा हुआ है कि उच्च सदन का टिकट पाकर अपने को धन्य समझूँ या लात खाकर? 

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

यह आकाशवाणी की मासिक प्रसारण सेवा है!

हम अपना वादा हर हाल में निभाएंगे।अगर काला धन अभी वापस नहीं ला पाए हैं तो वादा भी हमने वापस नहीं लिया है।हम आकाशवाणी करते हैं कि पाई-पाई वापस लायेंगे।यदि हमसे काले धन की पाई न पाई गई तो रत्ती-माशा जो भी मिल पायेगा,हम लायेंगे।हम पर भरोसा रखें और हर बार अपने भरोसे को रीचार्ज करते रहें।यह आकाशवाणी की मासिक प्रसारण सेवा है।दूर से ही हमारे प्रवचनों का आनंद उठाएँ और सुखी जीवन बिताएँ।

कुछ लोग काले धन को लेकर ज्यादा ही संवेदनशील हो गए हैं।हमारे लिए यह आस्था का प्रश्न है।आस्था भरोसे और विश्वास की चीज़ होती है।आपकी ईश्वर पर आस्था है,भले ही वह अदृश्य होता है,पर आप मानते हैं कि नहीं ? ईश्वर के होने और न होने के विषय में प्रश्न उठते रहते हैं क्योंकि वह कोई तर्क का नहीं आस्था का विषय है।काले धन को लेकर हमारी भी यही सोच है।आस्था में हिसाब-किताब का प्रश्न कहाँ उठता है ?

लोगों को काले धन के प्रति हमारी निष्ठा पर संदेह नहीं करना चाहिए।जो लोग ऐसा सोचते हैं,उनके लिए बता दूँ कि इसीलिए हमने पूरा वित्त विभाग ही रक्षा के सुपुर्द कर दिया है।वित्त वाले उसकी बखूबी रक्षा कर रहे हैं।वे उस धन को,धनिक को और हमारे एग्रीमेंट को बड़ी कुशलता से बचा रहे हैं।हमें ऐसे सिपहसालारों पर गर्व है।एक दिन आपको भी होगा।

हम आकाशवाणी करते रहेंगे।प्राचीन समय से ही लोगों में आकाशवाणी की विश्वसनीयता पर कोई संदेह नहीं है।तब भी किसी विशेष घटना के घटित होने पर आकाशवाणी होती थी और वो सच निकलती थी।सबसे बड़ी बात यह थी कि उससे कोई सवाल-जवाब भी नहीं कर सकता था।उसका बोला फरमान की तरह था।लोग अपनी संस्कृति और सभ्यता भूल रहे हैं।हम संकल्प लेते हैं कि हम देश के अतीत को फिर से जगायेंगे।पाई-पाई वापस लाने से हमारे इतिहास का गौरव बढेगा।उनके ‘इंच-इंच कश्मीर’ का जवाब हम ‘पाई-पाई पैसा’ से देंगे।विज्ञान,भूगोल के साथ-साथ हम गणित भी दुरुस्त करेंगे।अब यही काम तो बचा है करने को।

जिनको हमारे कहे पर आस्था है,वे अगले पाँच साल तक अपने सुझाव-सलाह देते रहें।हम बात करते रहेंगे।विदेशी मुद्रा के स्टॉक की तरह हमारे पास बात का भी अकूत स्टॉक है।डायरी में दूध-सब्जी-फल का हिसाब लिखने के बजाय अगले महीने होने वाले समागम की तारीख नोट कर लें और घर बैठे आनंद उठायें।हम पर भरोसा रखें।हम पाई-पाई नहीं छोड़ेंगे।आपका समय शुभ हो !

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

सेल्फी यानी सर्दी में भी गर्मी का एहसास !

समय बड़ी तेजी से बदल रहा है या यूँ कहिए कि गुलाटी मार रहा है।और कोई हो न हो,समय हमेशा आत्मनिर्भर होता है।बड़े-बुजुर्ग पहले ही बता गए हैं कि समय होत बलवान इसलिए चतुर-सुजान उसके साथ हो लेते हैं।कलम तलवार की धार से झाड़ू की बुहार में बदल गई है और पत्रकारिता परमार्थ से ‘सेल्फी’ मोड में अवतरित हो चुकी है।नए नायक का जन्म हुआ है तो मानक भी नए बन रहे हैं।जिनके लिए कभी कुर्सी बिछती थी,वे आज स्वयं बिछ रहे हैं।समय ने दाग़-धब्बों को रेड-कारपेट में बदल दिया है और आत्माएँ नित्य नए वस्त्र ग्रहण कर रही हैं।कुल मिलाकर सबका पुनर्निर्माण हो रहा है।

अश्वमेध का रथ आगे बढ़ रहा है।रथ में पहले के ही आजमाए घोड़े जुते हुए हैं।गाँधी,नेहरु और पटेल  को लगता होगा कि अभी भी देश को आगे ले जाना उनके बिना सम्भव नहीं है,सो वे पहले की ही तरह मौन हैं और बढ़े जा रहे हैं।अगर वे कुछ कह भी रहे होंगे,तो गाजे-बाजे के शोर में किसी को सुनाई नहीं दे रहा है।लोग भी मन की बात सुनने में व्यस्त हैं।

सबके अपने-अपने लक्ष्य हैं और उनको पूरा करने के लिए अलग-अलग निशाने।जब से सबका लक्ष्य विकास बना है,सबके सब प्रगति-पथ पर चलने को आतुर हैं।इसलिए मिशन से कमीशन तक की यात्रा बड़ी सुगम हो गई है।जब आपके सामने मखमली कालीन बिछी हो,उस वक्त पथरीली-ज़मीन पर पाँव रखना सादगी नहीं मूर्खता की निशानी है।सही समय पर सही निर्णय लेना बुद्धिमानों का काम है,पोंगा-पंडितों का नहीं।

अभी भी जिन्हें पार्थ के पांचजन्य का उद्घोष नहीं सुनाई दे रहा है,वे निरा ढपोरशंख हैं।कभी दूसरों को अपनी आँखों में क़ैद करने वाले आज स्वयं को ‘सेल्फी’ में समाहित करके प्रगतिशीलता का परिचय दे रहे हैं।यह मात्र सेल्फी से सेल्फिश होने तक का सफ़र नहीं है बल्कि पत्रकारिता की नई पहचान स्थापित हो रही है।पत्रकारिता में फ़िलहाल दो कैटेगरी हैं;या तो आप सेल्फी-पत्रकार हैं या नॉन-सेल्फी।यह पहचान ठीक उसी तरह की है जैसे अमेरिका वाले किसी को ग्रीनकार्ड से नवाज़ते हैं।जिनको यह कार्ड मिलता है,वे विशेषाधिकारी और अजूबे होते हैं।बगैर ग्रीनकार्ड के,अमेरिका छोड़िये, गली-मोहल्ले में ही आपकी धेले-भर की इज्ज़त नहीं रहेगी।

पत्रकारिता नए दौर में पहुँच चुकी है।मामला स्टिंग,पोल-खोल और ब्रेकिंग न्यूज़ से आगे बढ़ रहा है।दूसरे की खबर लेने वाले खुद खबर बनने को उतावले हैं।सोशल मीडिया पर सेल्फी डालने भर से यदि बड़ी खबर बन सकती है तो सत्ता और व्यवस्था की निकटता कतई बुरी नहीं है।इसलिए सेल्फी की बढ़ती उपयोगिता और इसकी माँग को देखते हुए पत्रकारों को भेजे जाने वाले निमंत्रण-पत्र में ही इसका ज़िक्र किया जा सकता है।साथ ही,सेल्फी के समय झाड़ू की जगह कलम खोंस दी जाय ताकि उन्हें सर्दी में भी गर्मी का एहसास हो सके।


© संतोष त्रिवेदी

ज्यों ज्यों बूड़ै श्याम रंग !

आखिर काफ़ी मशक्कत के बाद काला धन बाहर निकल ही आया।ऐसा कारनामा करने वालों को उस समय ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के’ टाइप फीलिंग हो रही थी।जिस तरह पूरे देश को काले धन का इंतज़ार था,उसे देखने की ललक थी,उसी तरह सफ़ेद धन भी बड़ा आकुल हो रहा था।कोई कुछ भी कहे,सगा न सही,वह उसका सौतेला भाई जो ठहरा।काले धन ने भी सबसे पहले सफ़ेद धन से मिलने की इच्छा व्यक्त की।स्विस बैंक से भी बेहद गोपनीय जगह पर दोनों का संवाद हुआ,पर हमारे सेल्फी-पत्रकार ने उन दोनों की बातचीत रिकॉर्ड कर ली।जनहित में उसके मुख्य अंश यहाँ पेश हैं :

सफ़ेद धन: अपनी धरती पर तुम्हारा स्वागत है।यहाँ आकर कैसा लग रहा है ?

काला धन : मेरे लिए धरती का कोई हिस्सा पराया नहीं है।मैं जहाँ जाता हूँ,मेरा हो जाता है।तुम अपनी बताओ।दाल-रोटी का जुगाड़ चल रहा है कि नहीं ?

सफ़ेद धन : सरकार मेरा भी पुनर्वास करने को प्रतिबद्ध है।अभी ‘जन-धन’ के माध्यम से करोड़ों घरों में पहुँच गया हूँ।तुम्हारी घुसपैठ तो उँगलियों में गिनने लायक है अभी।सर्वव्यापी तो मैं ही हूँ।

काला धन: सर्वव्यापी ? माय फुट।जिन करोड़ों खातों में तुम्हारा ठिकाना है,कभी झाँक कर देखना।ओढ़ने-बिछाने के लिए जीरो बैलेंस से अधिक कुछ नहीं मिलेगा।हम एलीट टाइप के रहवासी हैं।सबके मुँह नहीं लगते।हमारी तो गिनती ही करोड़ों से शुरू होती है।बात करते हो !

सफ़ेद धन : पर तुम्हारा नाम कित्ता खराब है,यह कभी सोचा है ?

काला धन : तुम्हें ख़ाक पता है।हाशिये की खबरों के अलावा कभी साहित्य के पन्ने भी पलट लिया करो।तुमने पढ़ा नहीं है ‘ज्यों ज्यों बूड़ै श्याम रंग,त्यों त्यों उज्ज्वल होय’।माफ़ करना,क्या अब इसका अर्थ भी बताना पड़ेगा ? जो जितना हममें डूबता है,वह उतना ही उजला और सफ़ेद यानी तुम-सा हो जाता है।इससे सिद्ध होता है कि सफ़ेद होने के लिए पहले काला होना ज़रूरी है।

सफ़ेद धन : बड़ी दूर की कौड़ी लाए हो फिर भी दो कौड़ी का उदाहरण है।असल साहित्य तो हमने ही पढ़ा है।तुमने वह भजन अवश्य सुना होगा,’पायो जी मैंने राम रतन धन पायो‘।इसमें जिस रतन धन की बात की गई है,वह मैं ही हूँ।खाते में अदृश्य होकर भी मैं उसमें उपस्थित रहता हूँ।कभी खर्च नहीं होता क्योंकि मैं शून्य होता हूँ।

काला धन : तुम्हारे अध्यात्म और साहित्य की पूछ वैसे भी नहीं है।इस समय सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में बस राजनीति का बोलबाला है और मैं उसकी पतवार हूँ।तुम तो किसी छोटी-मोटी लहर की तरह हो,क्षण भर में ही लुप्त हो जाते हो।मेरे आगे तुम्हारी क्या बिसात ?

सफ़ेद धन : तुम्हारा कितना भी नाम हो पर है तो बदनाम ही।अभी तुमने ही कहा है कि काला धन अंततः सफ़ेद हो जाता है,इसका मतलब साफ़ है कि धन का अंतिम रूप मुझमें ही निहित है।तुम्हें भी मजबूरन हमारा रूप धारण करना पड़ता है।रही बात लहर की,तो मत भूलो कि लहरें बड़ी बड़ी नौकाओं को पतवार सहित डुबो देती हैं।इसलिए बाहर निकल आये हो तो मुझ जैसा बनकर रहो !

काला धन : ऐसा कभी नहीं हो सकता।मेरा रूप ही मेरी पहचान है।बड़ी कुर्सी और बड़े पद का रास्ता मुझसे ही होकर जाता है।मेरी बैलेंस-शीट जितनी दिखती है,उससे भी कई गुना ज्यादा छिपी रहती है।पूरी दुनिया का कारोबार मेरे कन्धों पर है।तुम्हारी ‘जन-धन टाइप’ फीलिंग से देश को केवल अनुदान मिल सकता है,फ़ोर्ब्स की अमीर सूची में नाम नहीं।

सफ़ेद धन : इतना सब होते हुए भी समाज में तुम्हें भली निगाह से नहीं देखा जाता है।आज भी तुम बड़ी मुश्किल से बाहर निकले हो ।

काला धन : यह तुम्हारी ग़लतफ़हमी है।समाज के हर क्षेत्र में मेरा नाम है,तुम्हारी तो कोई पूछ ही नहीं है।काले कारनामे और काली करतूत से लेकर मुँह काला करने तक सर्वत्र हमारी ही प्रतिभा है।ले-देकर एक सफेदपोश नाम है,उसके अंदर भी मैं ही रहता हूँ।तुम हो कहाँ मित्र ?

इतना सुनते ही सफ़ेद धन का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।वह जल्द से जल्द अपने असल ठिकाने ‘जन-धन’ की तलाश में जुट गया।


©संतोष त्रिवेदी
नवभारत टाइम्स में प्रकाशित।

रविवार, 26 अक्तूबर 2014

दीवाली पर दो लघुकथाएँ !


ग़लतफ़हमी !
आले पर रखा दीया जल कम इतरा ज़्यादा रहा था।बाती को यह बात नागवार गुजर रही थी।उसने दीये के कान में धीरे से कहा-रोशनी का सारा श्रेय तुम ले रहे हो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हीं रोशनी दे रहे हो।मैं लगातार जल रही हूँ,अँधेरा इसलिये भाग गया है।मेरे बिना तुम केवल माटी के पुतले हो और कुछ नहीं।दीया कुछ कहता,इसके पहले तेल तपाक से बोल पड़ा-जल तो मैं रहा हूँ।तुम दोनों मेरे समाप्त होते ही कूड़े के ढेर में डाल दिए जाओगे।रोशनी का सारा खेल तभी तक है जब तक हम सबमें नेह है और वह मैं हूँ।
तेल की बात सुनकर दीया और बाती सन्न रह गए पर रोशनी से न रहा गया।वह बोली--तुम सब को ग़लतफ़हमी है।दरअसल,हम सबके पीछे अँधेरे का हाथ है।सोचिए,अँधेरा न आता तो हम सभी की ज़रूरत ही क्या थी ? शुक्र मनाओ कि वह अभी तक क़ायम है।वह आता भी तभी है जब हम सब अलग-थलग पड़ जाते हैं।
इतना सुनते ही बाती दीये से नेह के साथ लिपट गई और अँधेरा दूर किसी कोने में पसर गया।
अमावस और पूनम !
अमावस ने पूनम से चुहल करते हुए कहा-तुम पूरा चाँद लेकर भी फीकी और उजाड़-सी दिखती हो।मुझे देखो,मेरा कितना श्रृंगार किया गया है।आतिशबाजियों से लोग जश्न मना रहे हैं।क्या ऐसा तुम्हें कभी नसीब होता है ?
पूनम ने लजाते,सकुचाते हुए जवाब दिया-मैं हमेशा यकसा रहती हूँ।मेरा उजाला अमीर-गरीब में भेद नहीं करता।कृत्रिमता से मेरा रंचमात्र लगाव नहीं है।मुझे पाकर प्रेमी चहक उठते हैं,शीतलता बरस-बरस उठती है,जबकि चोर-उचक्के तुम्हारा इंतज़ार करते हैं,अतरे-कोने ढूँढ़ते हैं।
अमावस ने फिर भी हार नहीं मानी।कहने लगी--लेकिन अँधेरा मेरा भाई है।उसका विस्तार बहुत व्यापक है।तुम तो केवल बाहर के अँधेरे को दूर करती हो पर अंदर के अँधेरे...?
पूनम ने उसकी जिज्ञासा शांत करते हुए कहा-अँधेरा हमेशा डरा-डरा रहता है।वह काले कारनामों को मौका देता है।अँधेरा कभी भी दिल खोलकर सबके सामने नहीं आता,जबकि उजाले को किसी से छुपने की ज़रूरत नहीं रहती।यहाँ तक कि तुम भी उजाले के आने पर अँधेरे को बचा नहीं पाती।
अमावस निरुत्तर हो गई।वह आतिशबाजी के शोर में डूबती इसके पहले ही पूनम आगे बढ़ गई थी।

गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

उल्लू-पूजन का संकल्प !

दीवाली है और मुझे उल्लुओं की बहुत याद आ रही है।सुनते हैं कि इस समय लोग लक्ष्मी जी को खूब याद करते हैं।उनका सबसे बड़ा भगत वही माना जाता है जो दीवाली पर बड़ी खरीदारी करता है।इससे लक्ष्मी बहुत प्रसन्न होती हैं।दो दिन पहले धनतेरस पर भी लोग बाज़ारों में टूट पड़े थे।उस दिन बर्तन लेना शुभ माना गया है पर जो लोग सोना लेते हैं,उन पर पूरे बरस धन बरसता है।इस तरह लक्ष्मी का असली पूजन वही कर पाता है जिस पर उनकी अकूत कृपा हो।

लक्ष्मी जी कभी भी मेरे काबू में नहीं आईं।जिस काम में हाथ डालता हूँ,नुकसान ही उठाता हूँ।श्रीमती जी के कहने पर कई ज्योतिषियों को भी अपना हाथ दिखाया पर सबकी मिली-जुली राय यही रही कि पैसा टिकने का संयोग मेरी हथेली में नहीं है।इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मुझे  देखने को तब मिला,जब मेरी जेब में बचा दस रूपये का आखिरी नोट तोते के द्वारा भविष्य बताने वाले सर्वज्ञ ने धरा लिया।इसलिए लक्ष्मी जी को अपने प्रतिकूल पाकर मैं उनकी सवारी उल्लू को साधने में जुट गया हूँ।सोचता हूँ कि यदि मुझ पर एक बार लक्ष्मी जी के वाहन से किरपा आनी शुरू हो गई तो देर-सबेर लक्ष्मी जी भी बड़े अफसर की तरह मुझ पर निहाल हो जाएँगी।मेरे लिए उल्लू जी का पूजन कहीं अधिक सुगम होगा क्योंकि अभी इस सेक्टर में कम्पटीशन ज़्यादा नहीं है।
जिस समय मैं उल्लू-पूजन का मंसूबा बना रहा हूँ,ठीक तभी टीवी पर विज्ञापन प्रकट होता है,’नो उल्लू बनाविंग’।ऐसे में वह विज्ञापन मेरा मन फिर से भरमाने लगता है।उल्लुओं के खिलाफ़ यह कैसी साज़िश हो रही है और कौन कर रहा है ? ले-देकर उल्लू बनने का एक संयोग बनता दिख रहा था,वह भी अधर में लटकता दीखता है,वैसे ही जैसे उल्लू लटका रहता है।कहते हैं कि उल्लू को दिन में नहीं रात में दिखाई देता है।शायद इसीलिए रात की कालिमा के बीच अधिकतर घरों में लक्ष्मी-प्रवेश होता है।कुछ नादान इस कथा पर पूर्ण आस्था के साथ भरोसा करते हैं और दीवाली की रात अपने घरों के दरवाजे बंद नहीं करते।ऐसे में खुले दरवाज़े पाकर लक्ष्मी जी के बजाय लक्ष्मी-सेवक घर की सफाई कर जाते हैं पर लक्ष्मी जी को पाने के लिए इतना जोखिम तो बनता है।
दुनिया भले ही लक्ष्मी-पूजन में व्यस्त हो पर मुझ जैसे की पहुँच सीधे लक्ष्मी जी तक नहीं है।इसलिए अपन उल्लू-पूजन की विधि ढूँढने में लगे हुए हैं।मुझे पूरा विश्वास है कि यदि पूरे विधि-विधान से उल्लू-पूजन किया जाय तो बड़ी संख्या में घूम रहे उल्लुओं को भी इस दीवाली में उनका असली भगत मिल जाय।

शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

असल सफाई तो कहीं और है !

सफाई अभियान अपने चरम पर पहुँच चुका है।पहले चरण में सरकार ने अपने हाथ में डिज़ाइनर झाड़ू पकड़ कर सड़कों की सफाई की थी,वहीँ अब दूसरे चरण में वह विपक्षी नेताओं के हाथ में झाड़ू पकड़ाकर दलों की सफाई करने में जुट गई है।सड़क का कूड़ा सफाई के दिन टेलीविज़न कैमरों और अखबार के पन्नों पर चमका और अगले दिन से फिर वहीँ स्थाई रूप से जम गया।कूड़ा इसीलिए कूड़ा है क्योंकि वह विकास में यकीन नहीं करता,आगे नहीं बढ़ता पर सरकार तो गतिमान है और विकास के प्रति समर्पित भी।सो अगले दिन उसने झाड़ू का मुँह सड़कों की ओर से दलों की ओर मोड़ दिया।

विपक्ष के जिन नेताओं के हाथ में झाड़ू थमाई गई है,वे अब सफाई के दूत बन गए हैं।उन्हें अपने ही दल के साथ-साथ स्वयं के भी साफ़ हो जाने का अंदेशा था,इसलिए समय रहते उन्होंने सरकार की झाड़ू पकड़ ली ।जिनके हाथ में आज झाड़ू है,उन्हें पूरी उम्मीद है कि कल यही सरकार उन्हें कुर्सी भी पकड़ा देगी।झाड़ू से कुर्सी तक का रास्ता वैसे भी विशुद्ध गाँधीवादी है और इस पर कोई प्रगतिशील उँगली भी नहीं उठा सकता।इससे सरकार ने उन्हें शर्मसार होने से भी बचा लिया है।वैसे भी अब नाम के बचे विपक्ष में वे उसमें बचे भी रहते तो क्या कर लेते ?

सरकार ने गाँधी के सफाई-मन्त्र को बखूबी समझा है,यह आने वाले दिनों में और साफ़ हो जायेगा।उसने एक तीर से कई निशाने साधे हैं।जनता के मन में यह बात साफ़ हो गई है कि सरकार सफाई-पसंद है और विपक्ष बेवजह इसे अपनी सफाई समझ रहा है।सरकार को ऐसी ही सादगी पसंद है जिसमें उसके सद्प्रयासों से कूड़े को रि-साइकिल किया जा रहा है ।इससे सामाजिक जीवन में कूड़े की कमी तो होगी ही,सरकार के टिके रहने को और आधार मिल जायेगा।इस नाते झाड़ू जादू की छड़ी जैसा काम कर रही है।देखते ही देखते वह कूड़े-कचरे को उपयोगी बना रही है।विपक्ष घबराया हुआ है कि पता नहीं उसका कौन-सा नेता कब झाड़ू पकड़ ले ?

चुनावों में जनता की झाड़ू से साफ़ हो चुके लोग अब सरकार की झाड़ू से मार खा रहे हैं।चुके हुए और कुर्सी से चूके नेताओं के लिए यह स्वर्णिम अवसर की तरह है।वे आज सफाई के नवरत्न बन रहे हैं तो कल सत्ता के रत्न भी बनेंगे।इस लिहाज़ से सरकार का सफाई-अभियान अपने लक्ष्य को पूरा करने में कामयाब होता दिख रहा है।किसी को सफाई के उद्देश्यों पर संदेह हो तो होता रहे।सड़कें जस की तस कचरे से भरी हों तो हों,कहीं तो सफ़ाई हो रही है !

शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

ऑनलाइन शॉपिंग और हम!

दीवाली से पहले ही ऑनलाइन बाज़ार गुलज़ार है।कुछ कम्पनियों ने खरीदारों में ऐसा क्रेज़ पैदा कर दिया है कि लगता है कि अगर वो यह मौका मिस कर गए तो बड़े नुकसान में रहने वाले हैं।मेगा-सेल,दीवाली-बम्पर,लूट सको तो लूट,सेल-धमाका,लूट-वीकली औरबिग बिलियन डेजैसे ऑफर पढ़ते ही दिमाग झनझना रहा है।पर जो मजाडेकी सेल में आता है,वीकली सेल में नहीं।एक दिन के लिए सेल में आने वाली चीजें ऐसा इम्प्रेशन देती हैं कि यदि उनके साथ थोड़ी भी ढिलाई बरती गई तो वे आउट ऑफ़ स्टॉक का माला पहन लेंगी।सो चतुर कस्टमर ऐसे आइटम बिना ज्यादा वक्त गंवाए हथिया लेते हैं ।

अखबार में एक दिनी-सेल को देखकर हमारी श्रीमती जी ने हमें भी उकसाया-प्रधानमंत्री जी ने भी कहा है कि हम माउस-माउस खेलने वाले देश हैं पर आप हैं कि निठल्ले बने साँप-सीढ़ी खेलते रहते हैं।दीवाली का कुछ तो ख़याल करो,पड़ोसी भी क्या सोचेंगे? हमारी सहेली ने कल ही फेसबुक में बताया कि उसने डेढ़ सौ रूपये में एक बढ़िया डिनर-सेट खरीदा है।न चाहते हुए भी उसकी पोस्ट को लाइक करना पड़ा।हम श्रीमती जी की बातों से थोड़ा उत्तेजित हुए और कम्प्यूटर के सामने जाकर दंडवत हो गए।जब तक हम कुछ सोचते-समझते,एक रूपये वाला मोबाइल आउट ऑफ़ स्टॉक हो गया।हमने दूसरे आइटम पर नज़रें जमानी शुरू की।सामने छह सौ वाला पेन-ड्राइव केवल ९९ रूपये में मिल रहा था।हमने बिना अतिरिक्त सोचा-बिचारी के उस आइटम पर माउस क्लिक कर दिया।अचानक सर्वर-एरर का सन्देश दिखाई देने लगा।बगल में खड़े बच्चे ताना मारने लगे- क्या पापा,आपसे ९९ रूपये की एक पेन-ड्राइव भी नहीं खरीदी जाती!’ यह सुनकर मेरा मुँह सुस्त इंटरनेट-कनेक्शन की तरह लटक गया।

अगले दिन पार्क में गुप्ता जी मिले,बड़े खुश दिख रहे थे।कहने लगे-कल बड़े सस्ते जूते मार दिए ।शुरू में तो लग रहा था कि तत्काल-टिकट की तरह जूते भी हाथ से निकल जाएंगे,पर दो घंटे की मशक्कत के बाद तीन हज़ार रूपये बचा लिए ।हमने उनसे जूतों का ब्रांड और उनका किफ़ायती रेट पूछा तो उन्होंने बताया कि ग्यारह हज़ार के जूते केवल आठ हज़ार में,डिलीवरी चार्ज फ्री है सो अलग।जब मैंने उन्हें बताया कि इन्हीं जूतों को एक दिन पहले यही कम्पनी सात हज़ार में बेच रही थी,गुप्ता जी ने जूतों की डिलीवरी का इंतजार किये बिना ही माथा पीट लिया।

पहले बचत-प्रेमी लोग त्यौहारी-सीज़न में बाज़ार ही नहीं जाते थे,मारे डर के घर में घुसे रहते थे।बाज़ार से सामान लाने में पैसे खर्चने का जोखिम तो रहता ही था,खतरा रुतबे के कम होने का भी था।झोले का साइज़ देखकर सारी पोल-पट्टी खुल जाती थी ।ऑनलाइन शॉपिंग की खूबी है कि कोई जान ही नहीं पाता कि अगले ने कितने का आर्डर दिया है ।शॉपिंग के बाद यदि कोई सोशल मीडिया पर अपडेट करता है तो उसकी स्मार्टनेस पर दूसरे रश्क करते हैं और ढेरों लाइक्स और कमेंट्स मिलते हैं सो अलग ।

हम भी अब श्रीमती जी के नए बाजारी-गुर से सहमत लगते हैं।बस एक मौके की तलाश में हूँ ।अगली बार जब भी कोईबिग बिलियन डेयासुपर सेल डेजैसा अवसर हाथ आया,केवल माउस पकड़े ही नहीं बैठा रहूँगा ।वह माल चाइनीज़ हो या अमेरिकन,उसकी हमें ज़रूरत हो या नहीं,दीवाली-शॉपिंग में जो भी मिल जाएगा,भागते भूत की लँगोटी समझकर रख लूँगा।आखिर अपन की भी कोई इज्ज़त है कि नहीं !




गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

अब कक्षाओं से ही ‘किरपा’ बरसेगी !


यह कक्षाओं में पहुँचने का मौसम है।शिक्षक-दिवस पर देश के सभी बच्चों की कक्षा ली गई ,गाँधी-जयंती पर सफ़ाई की क्लास लगी.इसके बाद दूरदर्शन की कक्षा से भागवत-कथा सुनाई गई।खेत में काम करता हुआ किसान तो उस समय बिलकुल बौरा ही गया जब उससे प्रधानमंत्री जी ने रेडियो से अपने ‘मन की बात’ कही ।अब तो हर दूसरे-तीसरे दिन इतनी कक्षाएं लग रही हैं कि आम आदमी और कर्मचारी अगली कक्षा की तैयारी में ही लगे हुए हैं । उन्हें इस सबके बीच मंहगाई और भ्रष्टाचार कहीं नज़र नहीं आ रहे,गोया ‘स्वच्छ भारत’ अभियान से घबराकर वे भी कहीं लुक गए हों !

कक्षाओं की इस श्रृंखला में सबसे उल्लेखनीय ‘मन की बात’ वाली कक्षा है।जो लोग यह सोचकर दुखी हो रहे थे कि ये कक्षाएं बस थोड़े दिनों के लिए हैं,उसके बाद उनका वक्त कैसे गुजरेगा,उनके लिए खुशखबरी है।प्रधानमंत्री जी ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘मन की बात’ को वह नियमित रूप से कहते-बताते रहेंगे।इससे बहुत सारे फायदे हैं।अगर वो ‘प्रेस से मिलिए’ के ज़रिये अपनी बात रखें तो उन्हें अपनी बात के लिए कम मौका मिलेगा।कुछ सिरफिरे पत्रकार बात को कहीं और मोड़ सकते हैं,इससे विषयान्तर होने का अंदेशा बना रहेगा।दूसरी बात, वे जनता से होने वाले वाद-संवाद को विवाद का विषय नहीं बनाना चाहते।सबसे बड़ा कारण तो यह कि यदि जनता के पास प्रवचनों से ही नियमित रूप से ‘किरपा’ आने लग रही है,तो क्यों उन्हें उनके भौतिक दु:खों को याद करने दिया जाए।शायद इसीलिए जनता की सुविधा का ख्याल रखते हुए टीवी और रेडियो का भरपूर उपयोग किया जा रहा है।

खबर तो यह भी है कि गाँव के किसान रेडियो के इर्द-गिर्द ही बैठे रहते हैं।पता नहीं कब प्रधानमंत्री जी उनसे अपने ‘मन की बात’ करने लगें।वे भले अपने गाँव के सरपंच या इलाके के विधायक और सांसद के दर्शन-लाभ से वंचित हों,पर प्रधानमंत्री जी लगातार इसकी कमी पूरा कर रहे हैं.यह उनके लिए बहुत बड़ी बात है।किसानों को यह भी उम्मीद है कि आज नहीं तो कल प्रधानमंत्री जी उनके भी मन की बात सुनेंगे।फ़िलहाल,इत्ते कम समय में इतना कुछ हो पा रहा है,इसी से सब मुदित हैं।

इन कक्षाओं पर शोर मचाने वाले भी कुछ लोग हैं।उन्हें यह नहीं दिख रहा है कि जब नैतिक,आध्यात्मिक सत्संग से ही सारी समस्याएँ हल हो रही हैं,टीवी चैनल और रेडियो ज़मीनी काम करने में जुटे हैं,तो सरकार क्योंकर और कुछ करे ?चुपचाप काम करते रहने में वह ग्लैमर–युक्त आनंद कहाँ ! आखिर,करने से ज़्यादा काम करते हुए और मौन रहने से ज़्यादा बोलते हुए दिखना ही तो सर्वोत्तम अभीष्ट है।

लड्डू दुखी हैं !

लड्डू दुखी हैं।उनका घोर अपमान हुआ है।पेट में उतरने से पहले ही हलक में फँस गए।जीभ ने मिठास का पूरा स्वाद लिया भी न था कि कसैलापन हावी हो गया।नेता जी को जमानत मिलते-मिलते रह गई।यह वही बात हुई कि सामने छप्पन व्यंजनों की थाली रखी हो और उस पर अचानक छिपकली गिर जाय।भक्तों के दुःख से लड्डुओं का दुःख कहीं बड़ा है।वे बड़ी शान और आन से तुला पर तौलकर आये थे पर मुँह और पेट के रास्ते में ही कहीं अटक गए।उन्हें इस पर भी संतोष नहीं हो रहा है कि वे बिक कर भी बचे रह गए।अब उनके सुख की जमानत कौन लेगा ?

नेता कोई हल्का-फुल्का नहीं है,अपने हल्के का मुखिया रहा है।जनसेवा के नाम उसका पूरा जीवन समर्पित है,इस बात की गवाही उसके पास हजारों जोड़ी जूते-चप्पल देते हैं।वे लिए इसीलिए गए हैं कि समाजसेवा में घिस सकें,पर उन्हें इस पुनीत कार्य के लिए भी रोक दिया गया ।कपड़ों से ठंसी अलमारियां उदास हैं।उन्हें हवा-पानी के लिए भी खोलना गुनाह है इस वक्त।कपड़ों का हाल उससे भी बुरा है।वे अपने मालिक की तरह कारागार में बंद हैं।लगता यही है कि अगर कपड़ों को जल्द ही पैरोल पर नहीं छोड़ा गया तो वे पहने जाने का अपना गुण ही छोड़ देंगे।

सबसे बुरा हाल भक्तों का है।वे तो ठीक से जी भी नहीं पा रहे हैं।वे अपने बाल-बच्चों की सुध भुलाकर नेता जी के प्यार में अपनी जिंदगी हार रहे हैं।बड़ी मुश्किल से पेट में कुछ जाने की सम्भावना बनी थी पर वो भी नसीब नहीं हुआ।नेता जी के कारागार को पवित्र करने के बाद उस पवित्र-आत्मा से मिलने का दुर्लभ संयोग भी हाथ से छिटक गया।भक्त दिशाहीन और बहके हुए हैं। वे नेता-नशा के चंगुल में फंसकर भी आनंदित हैं।उनका सुख गिरवी पड़ा है।उसे कौन छुड़ाएगा ?

नेता जी भले ही कारागार में हैं पर उनका मन अपने सिंहासन के ही इर्द-गिर्द मंडरा रहा है।वे गिद्धों से उसको बचाना चाह रहे हैं।उनके रहते कोई और सिंहासन पर मंडराए,यह कैसे हो सकता है ? कारागार जाकर भी नेता जी सौ-टंच सोने के बने रहते हैं,यह उनको ईश्वरीय देन है।कोई भी दाग़ उनसे लिपटने को तैयार नहीं है।नेता जी पर धब्बा लगने के बजाय वह खुद को ही दागी बना लेता है।इत्ते कम का दाग़ होने पर वह स्वयं शर्मसार है।आइन्दा किसी नेता के पल्ले नहीं पड़ेगा।दाग़-धब्बे छोट-मोटे चोरों और उठाईगीरों के लिए ही मुफ़ीद होते हैं।इसकी गारंटी आम आदमी लेता है।

© संतोष त्रिवेदी
डेली न्यूज, जयपुर में।

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

हमको मौका नहीं मिला वरना....!


जिंदगी में कई बार ख़ूबसूरत मौके मिलते हैं पर वे प्रायः देर से पकड़ में आते हैं।जब तक हम इन मौकों को समझ पाते हैं ,तब तक बाज़ी हमारे हाथ से निकल चुकी होती है या पलट जाती है ।मौके की मार की वजह से ही दूसरे लोग आज जिस मुकाम पर खड़े हैं,हमें वहां होना चाहिए था।मौके पर चौका न मार पाने के कारण हम अपनी सही जगह पर कभी पहुँच नहीं पाए।कुछ ऐसे नसीब वाले हैं जो पैदा हुए तो सीधे मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर,जबकि हमें आज तलक सलीके से स्टील का चम्मच तक पकड़ना नहीं आ पाया।इस दशा में हमारा भाग्य भी कितना संघर्ष करता ऐसे मौकेबाज़ों के सामने ?हमारी जिंदगी की शुरुआत ही सही मौका न मिलने से हुई।


क्रिकेट के खेल में जब भी रोमांच चरम पर पहुँचता है और हमारे बल्लेबाज एक-दो रन बनाने में चूक जाते हैं,ऐसे में हमें फिर मौके की मार याद आती है।उस समय हमें यही लगता है कि यदि बल्लेबाज की जगह हम होते तो दो गेंदों में पाँच क्या बारह रन बना डालते।बस उन्हें दो बार ही तो सीमारेखा के पार भेजना होता,पर क्या करें,हमें स्कूल की टीम में ही कभी मौका नहीं मिला।इसका सारा दोष हमारे गाँव के ही खेल अध्यापक बिंदाचरन जी का रहा,जो नहीं चाहते थे कि उनके गाँव से एक और प्रतिभा दुनिया के सामने आए।सोचिये,उस समय हमें मौका मिला होता तो आज अतिरिक्त खिलाड़ी की तरह हम ड्रेसिंग रूम में न बैठे होते।


मौक़ा तो हमें तब भी नहीं मिल पाया था ,जब छात्र संघ के चुनाव में हम मात्र पाँच हज़ार वोटों से हार गए थे।उन पाँच हज़ार लोगों ने यदि हमें मौका दिया होता तो आज हम भी देश सेवा कर रहे होते |उस चुनाव में हमारे विरुद्ध जीतने वाले रमई पहलवान जी आज खेल मंत्रालय को भलीभाँति संभाल रहे हैं।वे खुद खिलाड़ी नहीं बन पाए तो क्या, उन्हें चुन रहे हैं।काश,हम भी आज अगली ओलम्पिक टीम तैयार कर रहे होते।हम देश को कुश्ती में एक ओलम्पिक स्वर्ण पदक और दिला सकते थे क्योंकि हमारी बुआ का लड़का,जो गाँव के दंगल में झूरी पहलवान को कई बार पटकनी दे चुका है ,कुश्ती में देश का प्रतिनिधित्व कर रहा होता ।पर जब हमारा ही मौका काट दिया गया तो उसे क्योंकर मिलता !


जब किसी फिल्म को सौ-करोड़ी होते देखता हूँ तब भी हमारा मन हुलस कर रह जाता है।अगर सिने-स्टार खोज प्रतियोगिता हमारे ज़माने में शुरू हुई होती तो आज हम भी आमिर खान की तरह ‘पीके’ पड़े होते और हमारी फ़िल्में कभी भी बॉक्स-ऑफिस में औंधे मुँह न गिरतीं।कुसूर सिर्फ़ इतना रहा कि किसी लायक डायरेक्टर की मुई नज़र ही हम पर न पड़ी और हम बस सिनेमा की टिकटें ही ब्लैक करते रह गए।


मौकों का हमारे प्रति यह असहयोगपूर्ण रवैया यहीं खत्म नहीं हुआ।स्कूली पढ़ाई के दौरान हम जिस साँवली लड़की को अपना दिल दे बैठे थे उसे कभी एक कागज़ का छोटा-सा पुर्जा न थमा पाए।हर बार कोई न कोई हम दोनों के बीच बाधा बनकर खड़ा हो गया।स्कूल में हमारे ही साथियों ने कई मौकों को ध्वस्त किया तो स्कूल के बाहर हमारे अपनों ने।एक बार हम अपनी खिड़की से अपने प्रेम को कागज के गोले में लपेटकर उस तक पहुँचाने में कामयाब होने ही वाले थे कि तभी न जाने कहाँ से पिताजी आ गए।कागज का गोला सीधा उनकी नाक को निशाना बनाता हुआ धराशायी हो गया और इसके बाद पिता जी ने हमारे संग जमकर अभ्यास मैच खेला था।उस दिन के बाद से हमने ड्रोन के द्वारा प्रेम-पत्र भेजने की मुराद हमेशा के लिए मुल्तवी कर दी।थोड़ा होश सम्भालने पर वही प्रेम शायरी बनकर निकल पड़ा।हाँ,इस प्रक्रिया में कई टन कागज जरूर शहीद हुआ ।इस सबका जिम्मेदार यही इकलौता मौका है।सुनते हैं कि हमारे स्कूल वाली वो लड़की आज एक अफ़सर की बीवी बन गई है और हम अभी भी किसी मौके की तलाश में पन्द्रह अगस्त के अलावा भी पतंग उड़ाने छत पर चले जाते हैं।


हमने भले ही कई मौकों को अपनी जिंदगी में खोया हो,पर यह बात भी उतनी ही सही है कि उन नामुराद मौकों ने भी हमें खोया है।अगर एक भी मौका हमें मिलता तो आज वह भी कितना ख़ूबसूरत होता !




रविवार, 5 अक्तूबर 2014

सफाई -अभियान

1)


नेता जी :कल की तैयारी हो गई है?


चेला :जी पक्की। दस ठो झाड़ू और बीस ठो कैमरों का इंतजाम हो गया है।

नेता :गुड।और मीडिया का क्या खबर है? यह इवेंट सुपरहिट होना चाहिए।

चेला :खबर तो आपही ना बनाएँगे ! यहिके बरे चंदू चौरसिया और फोकट शर्मा अपना-अपना टीम लेके साँझै से जुट गए हैं। कूड़ा-करकट को ढूंढ ढूँढकर उसका इंटरभू ले रहे हैं। कल के लिए प्रैक्टिस भी तो करनी है।

नेता :पर देखना, झाडू देर तक पकड़ने की आदत नहीं है।कचरा ज्यादा तो नहीं है?

चेला :इसका भी चौचक इंतजाम हो गया है। तीन दिन से मार सफाई की जा रही है। आपके आने से पहिले दो-चार कागज वहीं छोड़ दिया जाएगा।जइसे ही आपका भीडियो तैयार हुआ , हमारे बंदे झाड़ू थाम लेंगे।


2)


सफाई को देखते ही कचरा भाग खड़ा हुआ। बगल में खड़ा भ्रष्टाचार भी रास्ता ढूँढ़ने लगा,तभी सफाई ने प्यार से उसका कंधा थपथपाया और बोली, 'यार, तुमने तो सीरियसली ले लिया। हमारा, तुम्हारा तो जनम-जनम का साथ है। तुम कचरा थोड़ी हो,हमारे सरताज हो।तुम्हारी जगह डस्टबिन में नहीं ,फाइलों में है प्राणनाथ ।'


गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

बुद्धिजीवी होने के ख़तरे!

इस देश को यदि कोई खतरा है तो वह बुद्धिजीवियों से ही है। अकल'मंद' इस मामले में पूरी तरह से निर्दोष ठहरते हैं।वे तुलसीदास बाबा की चौपाई ‘कोउ नृप होय हमहिं का हानी’ का स्थायी जाप करके कई फ़ौरी संकटों से निजात पा सकते हैं ।बुद्धिजीवी को सामने दिखती हुई चीज़ भी नहीं दिखाई देती,जबकि अकल 'मंद' इस मामले में भी उनसे आगे होते हैं। वे इस सबके आर-पार देख लेते है।बुद्धिजीवी आस-पास के ध्वनि-संकेत नहीं पकड़ पाते जबकि इसके उलट वे सात समंदर पार से भी वास्तविक सन्देश ग्रहण करने में दक्ष होते हैं।


पिछले दिनों देश के अंदर और बाहर क्या-कुछ नहीं हुआ,फिर भी नकचढ़े बुद्धिजीवियों को न कुछ दिखता है न सुनता है।उन्हें न तो जापान से बजाई गई ढोल सुनाई देती है और न ही अमरीका से ‘रॉक-स्टार’ की स्टार-परफोर्मेंस।उन्हें मैडीसन स्क्वायर पर ‘मैड’ हो रही जनता भी नहीं दिखती और न ही अपने चैनल-वीरों का कदमताल करता डांडिया-नृत्य।ये रतौंधी के शिकार वे लोग हैं जिन्हें मंगलयान का ‘अच्छे दिनों’ में अपनी कक्षा में प्रवेश भी नहीं दिखता ।उन्हें तब भी यही दिख रहा था कि देश के हजारों स्कूलों में मास्टर अपनी कक्षा में नहीं पहुँच पा रहे हैं और यह भी कि विद्यार्थी अपनी-अपनी कक्षा छोड़कर भाग रहे हैं।यह निहायत ग़लत नम्बर का चश्मा है,जिसे बुद्धिजीवियों ने खामखाँ अपनी बड़ी नाक पर चढ़ा रखा है।


देश को आगे बढ़ाने में गाँधी जी का हाथ माना जाता रहा है पर यह सब इत्ती आसानी से मुमकिन नहीं हुआ।इसके लिए उनके अनुयायियों को स्वयं दल-बल सहित आगे बढ़ना पड़ा।इतना बढ़ जाने के बाद अभी भी गाँधी जी में इतना कुछ बचा है जिसके सहारे कई पीढ़ियाँ अपना मुस्तकबिल सँवार सकती हैं।अब गाँधी जी के असली विचारों को धरातल पर उतारने के लिए उनके धुर-विरोधी भी कृत-संकल्प हैं।इसके लिए पूरी सरकार सड़क पर झाडू लेकर उतर आई है पर यहाँ भी बुद्धिजीवी टाँग अड़ा रहे हैं।उनको केवल कैमरे के फ़्लैश दिख रहे हैं,ज़मीन का कचरा नहीं । उनसे उस झाड़ू का गौरव भी सहन नहीं होता ,जो मंत्री जी के कर-कमलों में पहुँचकर धन्य हो रही है;वरना किसे नहीं पता कि बिना झाड़ू लिए ही देश के खजाने को कितनी सफाई से साफ़ किया जा सकता है।गाँधी जी का जोर सत्य और अहिंसा के ऊपर भी था पर विकास बलिदान चाहता है,इसलिए उन दोनों को शहीद होना पड़ा। उनके जन्मदिन को सफाई के बहाने बड़ी सफाई से हथियाकर गाँधी की अंतिम पूँजी बचाई जा रही है पर बुद्धिजीवी इसे भी पाखंड समझ रहे हैं।पापी कहीं के !


इन सबसे भले तो वे अकल'मंद' हैं,जो मंदी का शिकार होकर भी तेज सोचते हैं।बुद्धिजीवियों को रेहड़ीवाले की ‘आसमानी-आलू’ की आवाज़ तो सुनाई दे रही है पर मैडीसन स्क्वायर से आती गड़गड़ाहट नहीं।वे न तो स्वयं मस्त रहते हैं और न ही खाए-अघाए लोगों को रहने देते हैं।ऐसे लोगों की जगह मैडीसन स्क्वायर नहीं जंतर-मंतर है,जहाँ पर वे लोकतंत्र के नाम पर रोज़ एक मोमबत्ती जला सकते हैं।इससे उनके दिल को भी गहरा सुकून मिलेगा ।


गुरुवार, 25 सितंबर 2014

मंगली होने की बधाई !

सर्वत्र मंगल ही मंगल की चर्चा है।लोग पहली बार एक-दूसरे को मंगली होने की बधाई दे रहे हैं।हमारे लिए सबसे बड़ी ख़ुशी की बात है क्योंकि हम स्वयं मंगली हैं,इस वजह से मंगल-मिशन से अपना गहरा जुड़ाव रहा ।हममें मंगल का हुनर अंदर तक व्याप्त है ,यह बात विवाह के समय पंडितजी ने कुंडली देखकर कही थी।हमें याद है,उस दिन हमारे घर में किसी ने खाना नहीं खाया था।कहाँ पूरी दावत का इन्तजाम चल रहा था और कहाँ आख़िरी समय में सारा गुड़-गोबर हो गया था।पंडिज्जी ने आखिरी फैसला सुनाते हुए चेताया था कि यह सम्बन्ध होने पर लड़की के प्राणों पर भारी संकट आ सकता है।इसकी जानकारी मिलते ही लड़की वाले दहेज़ के सामान सहित भाग खड़े हुए थे।आज चौबीस साल बाद अचानक उनका फोन आया...’सॉरी,हमसे मिस्टेक हो गई ! हमें इत्ती देर से पता चला कि ‘मंगली’ होना कितना शुभ होता है !’ जब तक हम उनको बताते कि भाई,असल बात क्या है तब तक फोन कट गया।बहरहाल ,हमारे पड़ोसी शर्मा जी इस मौके पर बड़े खुश थे.उनको पहली बार इतना चिंतामुक्त होते देखकर हमें तनिक चिंता हुई तो वे बोले,'यार क्या बताऊँ....आज मेरी बहुत बड़ी टेंशन खत्म हो गई है.अब जब मंगल हमें मिल गया है तो पाकिस्तान कश्मीर की माँग को छोड़ देगा.' हमने उनकी हाँ में हाँ मिलाना ठीक समझा क्योंकि उस वक्त हम टीवी पर प्रधानमंत्री का संबोधन सुन रहे थे.

प्रधानमंत्री कह रहे थे कि मंगल को उसकी ‘मॉम’ मिल गई है,यह सुनकर हमारी कामवाली बड़ी ख़ुश हुई.उसको अचानक दो साल से बिछड़े अपने बेटे राजू के मिलने की उम्मीद हो आई,जो तब पाँच साल का था.हम फिर भी मौन रहे.हम इसी बात से प्रसन्न थे इधर चीनी चुमार में टेंट ही तानते रह गए और हमने मंगल पर खूँटा गाड़ दिया. वैसे भी लाल-ग्रह को लेकर सबने अपने-अपने सपनों की अग्रिम बुकिंग कर रखी है।कुशल उद्यमियों को विज्ञान के अलावा साहित्य,राजनीति और प्रॉपर्टी के क्षेत्र में भी अपार संभावनाएं अभी से दिखने लगी हैं।वे अभी से दूरबीनें लेकर उन सभी को झाँकने में जुट गए हैं.

जब से दुनिया के देशों को पता चला है कि मंगल तक जाने में ‘राजकोट’ के एक पुर्जे का कमाल रहा है,उस पुर्जे की माँग बढ़ गई है।अमेरिका और रूस सबसे अधिक बेचैन हैं।खबर तो यह भी है कि ओबामा ने मोदी जी से वह ‘राजकोटी-पुरजा’ अपनी अमेरिकी-यात्रा में साथ लाने के लिए भी निवेदन किया है।


जो साहित्यकार धरती के प्रतीकों से ऊब चुके थे,उन्हें अब लाल-ग्रह में अनोखे बिम्बों की तलाश रहेगी ।केवल व्यंग्यकार ही बचे हैं जिन्हें अभी भी लगता है सारा निठल्लापन इसी धरती पर है।उम्मीद है कि देर-सबेर वे भी वहां पहुँच जाएँगे।हम प्रॉपर्टी वाले क्षेत्र से पूरी तरह निश्चिन्त हैं,सबसे पहले वे ही मंगल-ग्रह को गुलज़ार करेंगे।खबर मिली है कि कई महारथियों ने प्लॉट्स की ऑनलाइन बुकिंग शुरू भी कर दी है।सुनते तो यह भी हैं कि कुछ लोग लाल मिट्टी को यह कहते हुए बेच रहे हैं कि यह सीधे मंगल-ग्रह से आई हुई है.

मंगल पर पहुँचने का बड़ा फायदा राजनेताओं को भी होने वाला है।जिन्हें आपस में चुनावी-सीटें बाँटने में दिक्कतें पेश आ रही हैं,उनके सामने एक नया विकल्प आ गया है।इस लिहाज़ से मंगल की खोज ऐतिहासिक है जिससे ऐसे कर्मठ नेताओं का वहीँ पर हमेशा के लिए पुनर्वास किया जा सकता है।कुल मिलाकर मंगल सबके लिए मंगल लाया है।

बुधवार, 24 सितंबर 2014

इंच से मील हुए रिश्तों में कील !



पहले जापान हुआ,फिर चीन और अब अमेरिका होने जा रहा है।जापान के होने का तो ऐलान वहीँ से ढोल बजाकर किया गया था पर अमेरिका जाने से पहले ही नगाड़े सुनाई दे रहे हैं।जापान और अमेरिका की ढोलबाजी के बीच में चीन कहीं गुम न हो जाए,इसके लिए उसने युद्धस्तर पर तैयारी की है।वह दूर से ही सुहाने ढोल नहीं बजाना चाहता इसलिए इंच-दर-इंच खिसकने के बजाय सीमा पर मीलों आगे बढ़ आया है।कुछ नासमझ लोग इसे घुसपैठ करार दे रहे हैं,जबकि यह निहायत दोस्ताना ताल्लुकात का नतीज़ा है।अगर वैसी कोई बात होती तो हमारे प्रधानमंत्री जी स्वयं इस पर बोलते,जैसा सीएनएन के साथ इंटरव्यू पर बोले।चीनी राष्ट्रपति इसलिए नहीं बोलते क्योंकि वे मौन होकर भी ‘तिब्बत’ कर सकते हैं,फिर ताजे-ताजे ढोकले का स्वाद क्यों खराब करें ?

मामला यह है कि चीन के सौ बन्दों ने चुमार में पाँच किलोमीटर तक पहले चहलकदमी की,फिर हमारे ज़बरदस्त प्रतिरोध के बाद वे डेढ़ किलोमीटर पीछे हो लिए।थोड़ा और शोर हुआ तो चीन ने अपने पचास बन्दे वापस बुला लिए यह समझकर कि देखभाल के लिए पचास बन्दे ही पर्याप्त हैं।अब वे बन्दे विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के हैं सो ज्यादा देर तक खड़े नहीं रह सकते थे।इसके लिए उनने सात टेंट गाड़ लिए हैं।हमने भले ही अपना इतिहास ठीक से न पढ़ा हो पर हमसे मैत्री प्रगाढ़ करने के लिए चीन के बन्दों ने हमारे इतिहास का खूब अध्ययन किया है।उन्हें पता है कि हिन्दुस्तान को अपनाने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भी पहले-पहल हमारी धरती पर अपने तम्बू ही लगाये थे।उसके बाद जिस तरह हमारा विकास हुआ,इतिहास जानता है।हम इतिहास पढ़ने और उससे सबक लेने वाले दकियानूसी नहीं हैं।

विशेषज्ञों ने गणना करके बताया है कि चीन हमारे यहाँ सौ बिलियन डॉलर का निवेश करेगा।उसने अपनी ओर से निवेश की शुरुआत कर भी दी है।पहली किश्त में चीन ने सौ बन्दे इसी नीयत से भेजे थे पर विकास के विरोधियों की वज़ह से यह निवेश उसे आधा करना पड़ा।फ़िलहाल हिन्दुस्तानी सीमा पर उसने पचास बन्दे और सात टेंटों का निवेश किया हुआ है।किसी को यह घुसपैठ लगती हो तो यह उसकी समस्या है।हम अभी ढोल बजाने और डॉलर समेटने अमेरिका जा रहे हैं।चीन के साथ रिश्ते ‘इंच से मील’ हो गए हैं,इसलिए दो-चार मील में उसके तम्बू गड़ जाने भर से हमारे दिल में कील नहीं चुभनी चाहिए।

शनिवार, 20 सितंबर 2014

धरतीपकड़ जी और उनकी दीवाली!

धरतीपकड़ जी धूल-धक्कड़ झाड़कर फिर से खड़े हो गए हैं।बहुत दिनों से धूलि-धूसरित होकर वे किसी खोह में घुसे हुए थे।ढोल-नगाड़ों की आवाजें उन्हें दूर से ही चिढ़ा रही थीं,पर अचानक थाप रुकी तो उनकी जान में जान आई।हम भी उनकी बिगड़ती दशा को देखकर चिंतित हो उठे थे कि इनका तो चलो ठीक है पर देश का क्या होगा ? देश बचने के लिए उनका बचना ज़रूरी था और लो,अब तो वे बच भी गए।सही समय पर उन्हें संजीवनी मिल गई।

हमने उनके पुनर्जीवित होने पर बधाई दी और कारण पूछा,वे एकदम से फट पड़े,कहने लगे ‘हमें अपने से ज्यादा जनता पर विश्वास था।जो जनता चार महीने पहले मूरख बनी थी,वह अब काफ़ी समझदार लग रही है।यूँ कहूँ तो घणी बुद्धिमान हो ली।वह सही तरीके से हमारा समाजवाद समझ गई है।हमने भी देश-सेवा के लाने अपनी तीन पीढ़ियों को झोंक दिया है।’हमने पलटकर फिर सवाल किया,’जिन वजहों से उसने आपको ज़मीन पर पटका था,क्या अब वे वजहें खत्म हो गईं हैं ?’

‘नहीं जी,वजहें तो खत्म नहीं हुईं और न कभी हो सकती हैं।बस,वो अपना ठिकाना बदल लेती हैं।हम कल जिन वजहों से हारे थे,आज विरोधी के परास्त होने की वही वजहें हैं।’धरतीपकड़ जी ने चेहरे पर पूरा आत्मविश्वास लौटाते हुए कहा।

‘इन चुनावों से आपने क्या सबक लिया है ?’ हमने हिम्मत करके पूछ ही लिया।वे बोले,’सबक तो उनको मिला है जी,इसलिए सीखना भी उन्हें ही चाहिए।पिछली बार हमने सीखा था,अब उनकी बारी है ।’ ‘फिर तो ज़श्न बनता है’ हमने सवालिया नज़रों से जुबान लपलपाई।वे भी कब पीछे हटने वाले थे,बोले,’अपनी जीत पर दस किलो और उनकी हार पर दस कुंटल लड्डू का आर्डर दे दिया है।’

यह बातचीत जारी थी कि तभी अच्छे लाल जी आते दिखाई दिए।हमने उनको सांत्वना देने की कोशिश की पर वे बिफर उठे।कहने लगे,’यह उपचुनाव क्या होते हैं ? लव जिहाद क्या है ? अजी सौ दिन कुछ होते हैं क्या ?आप दस-बीस साल इंतज़ार नहीं कर सकते हैं ?’ कहकर उन्होंने हमें खा जाने वाली नजरों से देखा।हमसे देखा नहीं गया तो देह में बची पूरी ताकत बटोरकर पूछ ही बैठे ,’ छात्र संघ चुनावों में जमकर नृत्य करने वाले उपचुनावों में ‘मेंहदी रचे हाथ’ प्रतियोगिता में भाग लेने चले गए थे क्या ? इस प्रश्न को सहजता से झेलते हुए वे अंतिम समाधान की तरह बोले ,’जनता बड़ी जातिवादी और अधर्मी हो गई है।यह ज़रूर शोध का विषय है कि संत और महंत की मेहनत पर पानी कैसे फिर गया ,पार्टी इस पर विचार अवश्य करेगी।’

हमने देखा,तब तक धरतीपकड़ जी अपने कार्यकर्ताओं से घिर चुके थे।कुछ कार्यकर्ता अगली दीवाली का पूरा इंतजाम करके आए थे।उनके दिये में इतना तेल दिख रहा था कि जिससे एक आला रोशन हो सके।

बुधवार, 17 सितंबर 2014

बंगला बहुत उदास है!

बंगला बिलकुल सन्न रह गया है।अपने अतीत को देखते हुए उसे उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी वह उजाड़ हो जाएगा।कल तक जहाँ हर कोना रोशन था,आज वहीँ घुप्प अँधेरा है और माहौल में चिर शांति।बंगले के मालिक को ज़बरिया बेदखल कर दिया गया है जिससे वह फ़िलहाल अनाथ हो गया है।बंगले से उसके मालिक का गहरा लगाव था,जिसने उन्हें ‘बंगला-पकड़’ बनने की ज़ोरदार प्रेरणा दी।जो लोग फ्लैट्स में थे,उन्हें बंगले को देखकर चिढ़ उठती थी।आखिर उनको पाने की अर्हता वो भी रखते थे पर ‘बंगला-पकड़’ के रहते यह कार्य दुष्कर था,पर वे अब ठहाके लगा रहे हैं ।

जिस प्रकार हारिल पक्षी लकड़ी को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ता,उसी प्रकार वे भी बंगले को न छोड़ने को लेकर प्रतिबद्ध थे,पर बिजली-पानी ने सारी योजनाएँ पटरी से उतार दीं।उन्हें अपनी चिंता कतई नहीं है।अब उनके बिना बंगले की कौन वैसी संभाल कर पाएगा,अपनापन दे पाएगा ? सम्मान कायर था,सो उस बंगले से पहले ही भाग गया था,पर सामान अंत तक डटा रहा,प्रतिरोध करता रहा।आखिरकार बिजली-पानी के भी मैदान छोड़ जाने के बाद उसे सड़क पर आना पड़ा।अपने प्यारे बंगले को छोड़ पाना,फर्श से गलीचों और कालीनों को समेट पाना ,यह सब कितना मुश्किल था;यह दर्द वो नहीं जान सकते जो नोटिस मिलने के पहले ही भाग खड़े होते हैं।वे कायर तो हैं ही,संवेदनहीन भी हैं जो अपनों को अकेला छोड़ जाते हैं।

‘बंगला-पकड़’ जी की यूएसपी ही ‘पकड़ना’ रही है।उन्होंने हमेशा से सत्ता को पकड़ना ही अपना उद्देश्य बनाया हुआ था पर पिछले चुनावों में जनता ने उन्हें जमीन पकड़ा दी।इसके लिए वे बिलकुल भी तैयार नहीं थे,पर होनी को कौन टाल सकता है भला ? ज़मीन पकड़ने के बाद बंगले पर उनकी पकड़ बरक़रार रही पर कुछ जलकुक्कुड़ों को उनका यह ‘पकड़ानुराग’ पसंद नहीं आया।उन्होंने इसका विकल्प ढूँढना शुरू किया और उनको नोटिस पर नोटिस पकड़ाने लगे ।वो भी ठहरे ‘धरतीपकड़’ की तरह मज़बूत कलेजे वाले।जिस तरह चुनाव-दर-चुनाव ‘धरतीपकड़’ की जमानत जब्त होती रही,’बंगलापकड़’ ने नोटिस-दर-नोटिस अपनी इज्ज़त उछलने की परवाह नहीं की।बिजली-पानी ने आखिर दम तक यदि उनके साथ वफ़ा निभाई होती तो वे आज भी हरे-हरे लॉन पर अपने डॉगी को टहलाते होते।

बहरहाल,बंगला बिलकुल सूना है।उसकी व्यथा को खुले आसमान में रहने वाला या गंदी बस्ती में झुग्गी बनाकर उसे अपनी ज़िन्दगी समझने वाला क्या जानेगा ?बंगलों का मिजाज़ भी उनके रहने वालों जैसा ही हो जाता है।वे एक दिन की भी मनहूसियत नहीं झेल सकते।मालिक ठाठदार हो तो यह दर्द और बढ़ जाता है।’बंगलापकड़’ को इस बात की चिन्ता कम थी कि बंगला छोड़ने पर उनका क्या होगा,वे तो कोई और ‘ठिया’ पकड़ लेंगे;पर उन्हें फ़िक्र तो उस बंगले की ज्यादा थी,जो उनके बिना बिलकुल वीरान हो गया।नहीं लगता है कि बंगले को किसी और से वह असीम प्यार मिल पाएगा,जिससे ताज़ा-ताज़ा वह महरूम हुआ है।कोई है जो एक बंगले के पक्ष में इतनी मजबूती से खड़ा हो और अपने दुःख को भूलकर खुद को उसके दुःख में शामिल कर ले ?


©संतोष त्रिवेदी
नईदुनिया में प्रकाशित