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बुधवार, 25 दिसंबर 2013

दो हज़ार तेरह का कमाल !

जनसन्देश में 25/12/2013 को

 
इस साल ने जाते जाते आम आदमी को निहाल कर दिया है।मंहगाई से खाली उसकी झोली तेजपाल,लोकपाल और केजरीवाल से भर दी है।अब आम आदमी को न इस साल से और न सरकार से कोई मलाल बचा है।कानून-व्यवस्था पर भरोसा रखने के लिए आम आदमी के जाल में पहले संत का चोला धारे महंत पर किरपा आनी शुरू हुई।उसके बाद आम आदमी को,बिना दसबंद दिए ही,किरपा मिलने लगी।इससे उसकी खुशियों का प्याला लगातार छलकने लगा।अब यह तो बाद में ही पता चलेगा कि उसके साथ हमेशा की तरह इसमें भी कोई छल तो नही हुआ।

मीडिया के तेजतर्रार नायक इसी साल अपना सारा तेज खो बैठे।उन पर समय की मार पड़ी या अच्छी उम्मीदों की हार हुई ,पर आम आदमी को इससे बड़ा सबक मिला।इस साल ने उसे अपने आदर्शों पर पुनर्विचार करने का पाठ पढ़ाया है।संत हो,महंत हो या कोई और,इस साल ने सबके ऊपर टॉर्च मारी और उनके अँधेरे भी नज़र आये ।मगर इस अँधेरे में भी रोशनी की एक बड़ी मशाल आम आदमी के हाथ में लगी है।अब वह कुछ समय के लिए अपने मन में इस बात का भरम रख सकता है कि आने वाला काल उसका है।

भ्रष्टाचार कोई इस साल की उपज नहीं है।उसकी फसल सालोंसाल से लहलहा रही है और आम आदमी से कभी कटी नहीं।अब इसी को काटने के लिए लोकपाल आ रहा है।आम आदमी को इसी साल ने यह हथियार पकड़ाया है।भ्रष्टाचार की फसल कटने की ख़ुशी अभी से मन रही है और हथियार लाने का श्रेय हर कोई लेना चाह रहा है,पर असल श्रेय तो इस साल को ही जाता है।उसने अपना काम कर दिया है ,आगे लोकपाल और नया साल जाने।

जाते-जाते इस साल ने आम आदमी को केजरीवाल के रूप में बड़ा गिफ्ट दिया है।ठीक क्रिसमस के मौके पर यह साल सेंटाक्लॉज़ बनकर आया है।ख़ास आदमी को किसी गिफ्ट की दरकार नहीं होती क्योंकि अबतक सरकार उसी की होती रही है ।ख़ास आदमी जहाँ अपने झोले-बोरे खाली रखने का आदी नहीं होता वहीँ मंहगाई व भ्रष्टाचार आम आदमी का झोला भरने नहीं देते,पर इस साल ने आम आदमी को भारी-भरकम उपहार दे दिया है।इसने सेंटाक्लॉज़ बनकर उसे पूरी सरकार ही दे दी है।अब आम आदमी को दो हजार तेरह से कोई कोई मलाल नहीं है।उसे भ्रष्टाचार की तेरहवीं करने को लोकपाल और उस पर लगाम लगाने को केजरीवाल मिल गए हैं।ख़ास आदमी चाहे तो अपने बाल नोच सकता है।

 

लोकपाल जी का स्वागत है !

जनवाणी में 25/12/2013 को



सचिवालय के बाहर सदाचारी लाल मिले तो बहुत बेचैन दिखाई दिए।छूटते ही हमने कहा,’अब तो आपकी सरकार आ गई है,मंत्रिपद की शपथ भी ले ली है ,फिर काहे को परेशान हैं ? जनता बेसब्री से आपकी सेवा का इंतजार कर रही है।अचानक आपकी पेशानी पर बल कैसे ?’सदाचारी लाल ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा,’बड़ा कठिन समय आ गया है।सुनते हैं,लोकपाल जी आ रहे हैं।वे किसी की भी नहीं सुनेंगे,अपने आप जाँच करके फैसला दे देंगे।ऐसे में कोई भी काम करना खतरे से खाली नहीं होगा।आप जनता की सेवा की बात कह रहे हो पर सोचता हूँ कि अब मेरा क्या होगा ?’

‘अच्छा तो क्या आपने भी अन्ना की तरह जूस पी लिया है ? इसमें घबड़ाने जैसी कोई बात नहीं है।वैसे भी सर्व-सहमति से लोकपाल जी आ रहे हैं,वो भला अपने लाने वालों का बुरा क्यों चाहेंगे ? सभी माननीयों ने उनके आने का स्वागत ऐसे ही नहीं किया है।सबने ठोक-बजाकर यह फैसला इसलिए नहीं लिया कि वे उन सबको ही ठोंक डालेंगे।फिर लोकपाल जी किसी दूसरी दुनिया से नहीं आयेंगे।इस कानून में कहीं यह नहीं लिखा कि लोकपाल बनने के लिए संत,महात्मा या विरागी होना चाहिए।इसलिए किसी भी तरह की आशंकाओं से आप निशाखातिर रहें !’हमने उनका ढाँढ़स बढ़ाने के लिए कई ताबड़तोड़ डोज़ दे डाले।

सदाचारी लाल लगातार टहल रहे थे।लग रहा था कि वो हमारी बातों से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो पाए थे।वे अब भी गंभीर चिन्तन में लग रहे थे और हमारे बिलकुल पास आकर फुसफुसाने लगे,’मैं उस वक्त की कल्पना करता हूँ,जब लोकपाल जी हमारे द्वारा कराये गए जनहित कार्यों को घोटाले का संज्ञान लेकर जवाबतलबी करेंगे।हम काम करना तो खूब जानते हैं पर अब तक जवाब देना नहीं सीख पाए हैं।जब कोई सरकार इस तरह जवाबदेही के लिए मजबूर की जाएगी तो वह काम कब करेगी ? जनता को सवाल-जवाब से मिलना भी क्या है ? हमने सुना है कि लोकपाल जी अपने साथ चलती-फिरती जेल भी रखेंगे,जिसमें हम कभी भी समा सकते हैं।’

अब हमने जान लिया था कि सदाचारी लाल की सबसे बड़ी चिंता जेल जाने को लेकर है।हमने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा,’अव्वल तो इससे चूहे भी नहीं डर रहे,आप तो शेर हैं;दूसरे,कारागार बड़ा पुण्य-स्थल है।यहाँ तक कि भगवान ने भी वहाँ पर जन्म लिया था।मैं तो कहता हूँ कि नेता होने की सार्थकता तभी है,जब वह जेल को अपना दूसरा घर बना ले।जितने भी सामान्य लोग जेल गए हैं,बाद में महापुरुष कहलाये हैं।आप तो आलरेडी महापुरुष हैं।अब आप खुद सोचिये,जहाँ जाकर छोटे-मोटे चोर बड़े नेता बन गए,फिर आप तो इलाके के छँटे हुए महापुरुष हैं,लोकपाल जी की सेवा के बाद आपकी रेटिंग तो आसमान छुएगी,इसलिए नाहक परेशान न हों।’

हमने देखा कि अब सदाचारी लाल एक जगह स्थिर हो गए थे।उनके चेहरे से गायब चमक दोबारा लौटने लगी थी और वे सामने खड़ी लालबत्ती गाड़ी में सवार होकर फुर्र हो गए।

रविवार, 22 दिसंबर 2013

लालबत्ती बिन सब सूना !!


         
रविवाणी,जनवाणी में 22/12/2013 को।
नेताजी बहुत सदमे में हैं।जब से न्यायालय के फरमान से उनकी गाड़ी लालबत्ती-विहीन हुई है,उनको लगता है कि विरोधी पार्टी के नेता ने उनकी मूँछें ही उखाड़ दी हैं।बिना लालबत्ती के, गाड़ी ने अपनी चमक और नेताजी ने अपनी धमक खो दी है।अब वे अपने लोगों के पास कौन-सा मुँह लेकर जाएँगे ? लोग भी क्या-क्या सोचेंगे कि जो बन्दा अपनी बत्ती नहीं बचा पाया ,वह उनको क्या रोशनी दिखायेगा ?लालबत्ती वाली गाड़ी नेताजी के समर्थकों में भरपूर जोश पैदा करती थी,वे समझ पाते थे कि उनके नेताजी का रुतबा औरों से अधिक है और अलग भी।अब क्या सत्ता और क्या विपक्ष वाले,क्या जीते और हारे,सभी बराबर हो गए हैं।एक बत्ती ने पहचान का संकट खड़ा कर दिया है।यह लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण नहीं है।आखिर लालबत्ती ने किसी का क्या बिगाड़ा था ?

नेताजी को जनता की सेवा करनी होती है,इसके लिए सबसे पहले जनता में उनकी पहचान स्थापित होना ज़रूरी है।यह बात कितनी गलत होगी जब जनता के बीच पहुँचकर,गाड़ी से उतरकर नेताजी को खुद बताना पड़ेगा कि वे ही उनके नेता और सेवक हैं।यह काम गाड़ी में लगी लालबत्ती बिना बोले कर देती थी।बड़ी दूर से आम आदमी सतर्क हो जाता था और अपने चेहरे पर नेताजी के प्रति उमड़ा हुआ श्रद्धाभाव भी इकठ्ठा कर लेता था,पर अब इसके लिए कोई समय ही नहीं मिल पायेगा।जब नेताजी स्वयं आम आदमी के पास जाकर अपने सेवक होने की गुहार लगायेंगे तो उस आदमी के लिए नेताजी के लिए ज़रूरी भाव पैदा करना बड़ा दुष्कर होगा।चलो,आम आदमी को तो इसका देर-सबेर अभ्यास हो भी जायेगा पर नेताजी की कितनी फजीहत होगी,विरोधी मुँह के सामने ही हँसेगे,ऐसा सोचा है किसी ने ?

आम और ख़ास होने में जो अंतर है,उसको लेकर किसी को कोई ऐतराज़ नहीं है तो दिखने में क्यों है ? आम आदमी की पहचान केवल मतदान केंद्र पर ही होती है,जबकि नेताजी की हर गली,बाज़ार और नुक्कड़ पर।इसलिए पहचान की सबसे ज्यादा ज़रूरत नेताजी को ही है।इस काम के लिए अगर उनकी गाड़ी हूटर वाली लालबत्ती के साथ नेताजी की पहचान ज़ाहिर करती है तो गलत क्या है ?लालबत्ती-धारी होने से फायदा यह भी है कि बिना कुछ कहे उनके सारे काम हो जायेंगे।उनके काम से यहाँ मतलब जनता के ही काम से है क्योंकि नेता बनने के बाद जो भी काम होते हैं,सब जनता के ही नाम से जाने जाते हैं।

लालबत्ती किसी निशान का प्रतीक नहीं वरन एक सामाजिक पहचान है।समाज में आम को पहचानने में कोई दिक्कत नहीं है और न यह चर्चा का विषय है।ख़ास को पहचान की सख्त ज़रूरत है क्योंकि उसी से उसकी कीमत तय होती है।गाड़ी पर लगी लालबत्ती उसे यही पहचान देती है।आम आदमी के घर में बत्ती आये न आये,नेताजी की गाड़ी में लालबत्ती चमकने से जो मानसिक प्रभाव उत्पन्न होगा,आवश्यकता उसी की है।इसी की रोशनी में नेताजी आम आदमी का अँधेरा देख पाएंगे,इसलिए उनसे लालबत्ती छीनना आम आदमी से उसकी पहचान छीनने जैसा है।

'नेशनल दुनिया' में 24/12/2013 को !

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

समर्थन लेने की शर्तें !

18/12/2013 को जन संदेश में !


 
आम आदमी पर प्रेम बरसाने वाले प्रिय बंधु  !
 
बिना माँगे ही अपना हाथ हमारे गले में डालने से हम बहुत अभिभूत हैं।इस बिना शर्त समर्पण के बदले हम भी कुछ देना चाहते हैं।रिटर्न गिफ्ट के रैपर में लिपटी हुई हमारी शर्तें ये रहीं :
 
आप के विधायक रोज पैदल ही विधान सभा आयेंगे।इससे सड़कों में जाम नहीं होगा,ईंधन की बचत होगी,पर्यावरण स्वच्छ होगा और उनका स्वास्थ्य भी दुरुस्त रहेगा।कोई भी विधायक विधान सभा की कार्यवाही के दौरान बिना हमसे पूछे राजधानी नहीं छोड़ेगा,क्योंकि पता नहीं कब उसके हाथ की ज़रूरत हमें पड़ जाए ! अगर आपका समर्थन है तो लगना भी चाहिए कि आप पूरी तरह हमारे साथ हैं।आपके किसी नेता को सरकार की नीतियों के खिलाफ़ सड़क पर मजमा लगाने की इज़ाज़त नहीं होगी।जो भी बात करनी होगी,गुप्त बैठक से तय कर ली जाएगी।इससे जनता में सन्देश जायेगा कि सरकार मजबूती से अपना काम कर रही है।कोई भी विधायक यदि अपने परिवार के साथ बाहर निकलता है तो खाने-पीने का खर्च वह नहीं देगा,ताकि लगे कि  विधायक आम आदमी से ही ताल्लुक रखता है।बिजली के दामों में पचास फीसद कटौती लागू करने के लिए होली या दीवाली में बिजली कंपनियों से मिलने वाले उपहारों पर पूरी तरह रोक होगी।घर में की गई हर खरीदारी को ऑनलाइन डालना होगा ताकि जनता जान सके कि आम आदमी की सरकार चलाने वालों का हिसाब बिलकुल पारदर्शी है। 
 
सरकार की तरफ से विधान सभा में जब भी कोई प्रस्ताव लाया जायेगा,आपके लोग दोनों हाथों को समुचित ढंग से पीटकर तालियाँ बजाने का उपक्रम करेंगे।इस तरह विपक्ष को हमला करने से हतोत्साहित किया जा सकेगा।लोगों में सफाई के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए झाड़ू पर अनुदान दिया जायेगा,इससे हाथ और झाड़ू में बेहतर तालमेल होगा। हमारे विधायक टोपी लगायेंगे पर आपके विधायकों को यह अधिकार नहीं होगा।इससे जनता को टोपी पहनाने में आसानी होगी और हमें अनुभव भी मिलेगा।
ये सभी शर्तें खुली हुई हैं और इनका घटना-बढ़ना हमारे ही हाथ में रहेगा।अगर इन शर्तों पर आप राजी हैं तो लगे हाथ इस बात का हलफनामा भी दे दें ताकि हम जनता से आपके बिना शर्त समर्थन की मंजूरी ले सकें ! बस ,सरकार बनाने की यही हमारी शर्त है।
 
आपके बिना शर्त समर्थन से सरकार बनाने की  उम्मीद में एक आम आदमी।

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

घोड़ों के गधे बनने का समय !

हिन्दुस्तान में 17/12/2013 को। 


ख़ास आदमी पहली बार भौचक है।उसे सूझ नहीं रहा कि क्या किया जाए ? अदने से आदमी ने उसे हलकान कर दिया है।अभी तक ख़ास के पास ही यह जिम्मेदारी रहती थी कि वह आपस में अदल-बदल करके आम को अपने शतरंजी चालों से चित्त करता रहे,पर इस बार बाज़ी बिलकुल पलट गई है।आम आदमी ने पासा फेंकना कब सीख लिया,ख़ास को पता ही न चला।उसमें भारी कसमसाहट है।वह आम आदमी को लोटा बता रहा है।उसे यह याद नहीं है कि उसने कई बार घोड़ा-मंडी लगाकर आम आदमी को अंगूठा दिखाया है।उसे यह बात पच नहीं पा रही है कि जिस आदमी को कंडीशंस अप्लाई के साथ जीने की मोहलत दी थी ,वही उस पर भारी शर्तें लाद रहा है।घोड़े आज गधे बनने पर मजबूर हैं,यह कैसा समय आ गया है ?

राम लीला मैदान में भूखों मरने वाला और लाल किले पर लाठी-गोली खाने वाला आम आदमी राजपथ पर सीना तानकर चले,यह बात ख़ास आदमी को नागवार गुजर रही है।वह चाहता है कि ख़ास व्यंजनों पर वह हाथ साफ़ करता रहे और आम आदमी बस टुकुर-टुकुर निहारता रहे। इस आम आदमी की जुर्रत तो देखिये।उसने साफा-पगड़ी बांधकर मंच पर माइक सम्भाल लिया है और ख़ास आदमी महज़ श्रोता बन गया है।उसे अब भी यकीन नहीं हो रहा है कि आम आदमी उसे निर्देश दे सकता है।सड़क पर मजमा लगाने वाला आदमी संसद की दहलीज़ तक आ जायेगा,यह देश के लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए नुकसानदेह है।संसद के अंदर होने वाले नाटकों का यदि सड़कों पर खुलेआम मंचन होने लगेगा तो देश की संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा का क्या होगा,जिसे अब तक ख़ास आदमी ने बड़े जतन से बचा रखा है।

आम आदमी अब भार लादने की हैसियत में आ गया है,पर घोड़े इतनी आसानी से गधे की तरह रेंकने लगेंगे,ऐसा नहीं लगता है।

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

आम आदमी की सरकार !


Welcome To Jansandesh  Times: Daily Hindi News Paper
11/12/2013 को जनसन्देश में
 

शाम को जैसे ही घर पहुँचा,माना चाचा गाँव से आये हुए थे।अचानक उनके दिल्ली आने से मुझे ख़ुशी भी हुई और कुछ खटका भी लगा।वे गाँव में हमारे पिताजी के करीबी दोस्त हैं और जब भी मैं गाँव जाता हूँ,उनसे भेंट हो जाती है।गाँव में ही वे एक छोटी-सी दुकान चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं।उनके आने की कोई खबर नहीं थी,इसलिए घर में उनको पाकर मैं चौंक गया।सबसे पहले माना चाचा से मैंने यही सवाल पूछा कि गाँव-घर में सब ठीक-ठाक है तो उन्होंने बताया कि वहां तो सब ठीक है,पर दिल्ली की खबर सुनकर उनसे रहा नहीं गया।आगे मैंने पूछा ,’आपने दिल्ली के बारे में ऐसा क्या सुन लिया है कि इसके लिए आपको यहाँ आना पड़ा ?’
माना चाचा गंभीर होते हुए बोले,’ हम दिल्ली ख़ास मकसद से आये हैं।जब से रेडियो में खबर सुनी कि आम आदमी पार्टी दिल्ली में चुनाव जीत गई है पर सरकार बनाने से बच रही है,मन में बेचैनी-सी है ।पता चला है कि उसके पास आम आदमी की कुछ कमी रह गई है ।दूसरी पार्टी भाजपा भी कुर्सी से दूर रहना चाहती है।ऐसे में सरकार की कुर्सी वीरान पड़ी है।मैंने सोचा मैं भी आम आदमी हूँ इसलिए सरकार बनाने के लिए हमें भी योगदान करना चाहिए।आपकी चाची के लाख मना करने के बावजूद यहाँ आ गया हूँ।’मैंने आश्चर्य जताते हुए उनसे पूछा,’मगर आप को पता कैसे लगा कि आप आम आदमी हैं ?चाचा ने बड़े ही भोलेपन से बताया कि पिछले दिनों ही प्रधान जी ने ‘मनरेगा’ का जॉब-कार्ड बना के उनके हाथ में धरते हुए बताया था कि वे आम आदमी हैं ।इसके अलावा गरीबी रेखा से नीचे वाला बीपीएल कार्ड भी मेरे पास है और झाड़ू से मैं अपने घर-दुवार की सफाई भी बढ़िया तरीके से कर लेता हूँ, सो मैंने सोचा कि सबसे योग्य आम आदमी मैं ही हूँ।इसलिए दिल्ली आ गया।

अब गंभीर होने की बारी मेरी थी।दिल्ली में रहते हुए यह बात मुझे क्यों नहीं सूझी ? चाचा जी ने तो हमारी आँखें खोल दीं।वे आम आदमी की जगह भरने के लिए इतनी दूर से यहाँ तक आ गए और मैं समाचार चैनलों के भरोसे ही बैठा रहा।रही बात आम आदमी बनने की,सो उसकी पात्रता मेरी भी तो है।मुझे याद नहीं पड़ता कि पिछली बार घर में बाज़ार से थैला भरकर सब्जी कब लाया था ?आने-जाने के लिए हमेशा पैदल ही रास्ता तय करता हूँ।इससे जेब भारी और शरीर हल्का होने का गुमान भी रहता है।इस हैसियत से तो आम आदमी बनने की पहली दावेदारी हमारी बनती थी, पर अब कुछ नहीं हो सकता है।वे गाँव से आये हैं,इसलिए मैं उनका समर्थन करने को मजबूर हूँ।मैंने इस बावत चाचा जी को आश्वस्त कर दिया है कि उनकी सरकार बनने पर मैं विरोध नहीं करूँगा।वे अब सरकार बनाने के लिए राज्यपाल के बुलावे के इंतजार में बैठे हैं।

झाड़ू,तूने क्या किया ?


11/12/13 को जनवाणी में
 

घर-बाहर की सफाई करते-करते झाड़ू कब सत्ता की कुर्सी तक आ गई,पता ही न चला।कुर्सी सामने रखी है,पर उस पर बैठ नहीं सकते । टनों लड्डू तुलकर अपने हजम होने की राह तक रहे हैं,पर झाड़ू ने सबके अरमानों को बुहार दिया है।जीतकर भी हारने का अहसास हो रहा है।हार की जीत तो कई बार सुना होगा पर आज जीत को हार महसूस हो रही है।बड़ी मिन्नतों के बाद,बाप-दादों का वास्ता देकर टिकट मिली,गली-गली ख़ाक छानी,विजयश्री की मालाएं भी पहन लीं,पर नामुराद झाड़ू ने कहीं का न छोड़ा।बीच रास्ते में अड़ गई।न आगे बढ़ रही है न बढ़ने दे रही है।इससे भले तो वे थे,जो खेत रहे।सामने लड्डुओं का थाल सजा रखा है पर चखने का मन नहीं कर रहा।दोस्तों और कार्यकर्ताओं की दुआएँ सुई की तरह बदन में चुभ रही हैं।कैसी मुसीबत है कि बधाई भी भरे मन से ली जा रही है,जो झाड़ू के मारे न उगलते बन रही है,न निगलते।

झाड़ू की मार चौतरफ़ा पड़ी है।जिस हाथ ने उसे नाचीज़ और नाकुछ समझा था,उसी ने उसकी हड्डी-पसली तोड़ दी।हाथ पर सीधा हमला हुआ और वह आईसीयू में पहुँच गया है ।अंदर से बार-बार विज्ञप्ति आ रही है कि जल्द ही वह स्वस्थ होकर आएगा।तब तक खपच्चियों और टांकों से वह पूरी तरह उबर लेगा।वह झाड़ू से सीख लेकर अपनी मानसिक दशा भी बदलने को तैयार है।हाथ की चोट गहरी है।वो पहले तो फूल से अधमरा हुआ,बाद में झाड़ू की मार से हिलना-डुलना भी बंद हो गया ।वैसे जानकारों ने छह महीने बेड-रेस्ट की सलाह दी है पर जनसेवा का आदी रहा हाथ हार मानने को तैयार नहीं है।

झाड़ू की मार फूल पर भी पड़ी है।वह जीत के हार को पहनने ही वाला था कि झाड़ू ने रास्ता छेंक लिया।फूल को अचानक ऐसी झाड़ूगीरी की उम्मीद नहीं थी।पंद्रह सालों के वनवास के बाद फिर से पुनर्वास का इंतजार करना कितना दुखदायी होता है,यह दर्द झाड़ू क्या जाने ? वो तो कल की आई हुई नव-विवाहिता जैसी है।फूल को अब तक यही जानकारी थी कि झाड़ू को हाथ ने थाम रखा है पर उसकी मार ऐसी अदृश्य होगी,सोचा न था।फूल खिला मगर कुर्सी तक शूल बिछ गए और वह फूल कर कुप्पा भी न हो पाया।ऐसे में जीत का हर्ष कैसे मनाया जाए,उसे समझ नहीं आ रहा है ।

झाड़ू स्वयं हतप्रभ है।वह घर-आँगन से सबको बुहारकर खुद भी घर के बाहर खड़ी है।हाथ को चोट पहुँचाकर वह गर्वित तो है पर फूल से काँटे का मुकाबला करके वह खुद रुक गई है।इतनी ज्यादा सफाई की उम्मीद खुद झाड़ू को नहीं थी।कुर्सी थोड़ी दूर पर दिख रही है पर उस तक उसे पहुँचाने वाला कोई हाथ नहीं है।उसे बिखरना मंज़ूर है पर फूल का सहारा नहीं स्वीकार है।यही हाल फूल का है।उसे इस बात की कसक है कि हवा थोड़ा और तेज़ होती तो वह कुर्सी तक आसानी से पहुँच जाता।ऐसे में वह पड़े-पड़े मुरझा सकता है पर झाड़ू के हाथ नहीं लगने वाला ।तब से दोनों घर के बाहर ही खड़े हैं।मुश्किल यह है कि यदि इस बीच फिर कूड़ा-करकट इकठ्ठा हो गया तो झाड़ने-बुहारने और खिलने-फूलने का मौका दुबारा मिलेगा भी या नहीं ? यह सारा ‘टंटा’ झाड़ू की वज़ह से ही खड़ा हुआ है,इसलिए जिम्मेदार भी वही है।ईश्वर, झाड़ू की ऐसी मार से सबको बचाए !