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शनिवार, 30 नवंबर 2013

कुर्सी वाले साहब !


30/11/2013 को हरिभूमि में
 

कुर्सी पर बैठने वाले साहब ही होते हैं,यह तब और पक्का हो गया जब खबर आई कि वे जिस पर बैठे थे ,वह नीलामी की हक़दार हो गई ।इससे साहब के रुतबे को चार चाँद लग गए और वे बड़ी कुर्सी की ओर दो इंच और सरक गए।इस कुर्सी की कीमत तय करेगी कि साहब की मार्केट-वैल्यू क्या है ? उनके बन्दों ने फ़िलहाल उस सौभाग्यशाली कुर्सी के ऊपर पाँच लाख का दाँव लगा रखा है।यह कीमत साहब के ‘टाइम’ के ऑनलाइन सर्वे में नॉमिनेट होने से पहले की है,इस लिहाज़ से अब इसमें और बढ़ोत्तरी हो सकती है।नीलामीकर्ता अब उस कुर्सी पर ‘टाइम-इफेक्ट’ का टैग लगाकर मनचाही कीमत वसूल सकते हैं।फ़िलहाल,जिन लोगों की निष्ठा महज़ कुर्सी तक होती है,वे साहब के ‘कुर्सी-त्याग’ की कीमत से अपनी हैसियत का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

कीमत कुर्सी की नहीं उस पर बैठने वाले की होती है।यूँ तो कुर्सी पर मास्टर जी भी विराजते हैं पर उनकी कुर्सी की कीमत टका भर की नहीं है।न मास्टर जी के बच्चे और न ही सरकार उनकी कुर्सी के अवमूल्यन पर चिंतित है।इसकी सीधी वज़ह यही है कि मास्टर जी साहब नहीं हैं।उन्हें हर कोई घुड़क देता है।जो व्यक्ति अपनी इज्ज़त नहीं सुरक्षित रख सकता ,वो बेचारा कुर्सी को क्या खाक संभाल पायेगा ? कुर्सी-कुर्सी में भी तो फर्क होता है।मास्टर जी की कुर्सी का दायरा एक कक्षा तक सीमित है जबकि साहब की कुर्सी अपने लिए इच्छित स्पेस बना सकती है,उसके आगे खुला आसमान है।जहाँ मास्टर जी का सौभाग्य है कि वे कुर्सी पर बैठ पाते हैं,वहीँ कुर्सी का सौभाग्य है कि उसमें साहब विराजें और उसे सिंहासन में तब्दील कर बाज़ार के लायक बना दें।यह मामला दो कौड़ी बनाम लखटकिया ग्लैमर का है,जिसे समझना आम आदमी के बस का नहीं है

साहब कोई आम साहब नहीं हैं।पढ़-लिख के साहब बनने वालों को अब कोई पूछता भी  नहीं,इसलिए उनकी कुर्सी भी अपनी किस्मत पर रोती रहती है।साहब का संसर्ग पाने वाली कुर्सी धन्य है।पहली बार कोई ब्रांड और यूएसपी वाले साहब ने उसको कृतार्थ किया है।साहब की यूएसपी है कि उनको सुनने के लिए टिकट लगती है,स्पीच बिकती है।वे चलते-चलते रास्ते में अपना लालकिला बना लेते हैं,रोज नया इतिहास गढ़ते हैं।ऐसे जादूगर साहब अपने बन्दों की तालियाँ पाकर सातवें आसमान में हैं।इतने बड़े पैकेज के साथ वे जिस कुर्सी पर बैठेंगे,वह क्योंकर न इतराएगी ? उसी कुर्सी को नीलामी में हासिल कर साहब के बंदे भी अगली पीढ़ी का निर्माण आसानी से कर सकेंगे।

कुर्सी मिलना बहुत बड़े पुण्यों का फल होता है।कई लोग अपना पूरा जीवन लगा देते हैं पर उस तक पहुँच नहीं पाते।कुछ निकट आते हैं तो दूसरे उसे सरका देते हैं।पुण्याई से कुर्सी पाने वालों की संख्या बहुत कम है।अधिकतर मामलों में बढ़िया मैनेजमेंट और शतरंजी चालों से ही कुर्सी हथियाई जाती है।इसमें ‘गन्दी-गन्दी-गन्दी बात’ जैसा कुछ भी नहीं होता।बड़ी और मार्के की बात यही है कि कुर्सी पर उसी का हक बनता है जो इस पर बैठकर इसकी कीमत बढ़ाये;और आज किसकी कीमत अधिक है,यह बाज़ार के हाथ में है।इसलिए जिस कुर्सी पर सबसे ज्यादा सट्टा या दाँव लगे,वही कीमती है।सभी लोग जहाँ पाने वाली कुर्सी की कीमत लगाते हैं,वहीँ साहब जिस कुर्सी पर विराजमान हो जाते हैं,उसी का बाज़ार-मूल्य बढ़ जाता है।इससे यह साबित होता है कि कीमत कुर्सी की नहीं,साहब की है।सोचिये,जिस कुर्सी पर बैठने के लिए देश की कई पुण्यात्माऐं व्यग्र हैं,उस पर साहब बैठ गए तो वह कितनी कीमती हो जाएगी ! ऐसी पायेदार बड़ी कुर्सी साहब की पकड़ के बिना कब तक दो कौड़ी की बनी रहती है,यही देखने वाली बात है !

एब्सोल्यूट इंडिया में १/१२/२०१३ को
 

बुधवार, 27 नवंबर 2013

मुझे भी प्रायश्चित्त करना है !

२७/११/२०१३ को जनसन्देश में


मैं बहुत खिन्न हूँ इसलिए प्रायश्चित्त करना चाहता हूँ।मेरी नैतिकता मुझे बार-बार उकसा रही  है कि इससे पहले कोई अनहोनी हो,तिहाड़ के दरवाजे खुलें,मुझे प्रायश्चित्त कर लेना चाहिए।मेरी तो इच्छा है कि मैं प्रायश्चित्त-दिवस या मास नहीं पूरा ‘प्रायश्चित्त-पर्व’ ही मना डालूँ।पर इसमें एक संकट भी है।प्रायश्चित्त करने के लिए पहले मुझे तहलका टाइप कुछ करना होगा,फिर इस्तीफ़ा देना होगा पर वह कहाँ से लाऊँ ? मेरे पास ऐसा कोई प्रभावशाली पद भी तो नहीं है।इसलिए मेरे प्रायश्चित्त का कोई जुगाड़ बनता नज़र नहीं आ रहा है।

मुझे गुनाह करने के मौके खूब मिले पर प्रायश्चित्त का ही अवसर नहीं मिल पाया।हाँ,प्रसिद्ध दार्शनिक रूसो के ‘कन्फेशन’ से ज़रूर मैंने प्रेरणा ली है और इसीलिए ‘कन्फेस’ करना चाहता हूँ।मैंने चर्च में भी ‘कन्फेशन’ करने की सोची पर वहां फेस टू फेस करने की वज़ह से थोड़ा पंगा है।जिस गुनाह को हम साफ़ करना चाहते हैं वह केवल गॉड या ईश्वर के आगे करने से कोई फायदा नहीं है।मैं चाहता हूँ कि भले ही मैंने गुनाह छुपकर और बलात किया हो पर प्रायश्चित्त सार्वजनिक होना ही चाहिए।इससे यह सन्देश जायेगा कि बंदे ने गलत हरकत भले ही की हो,पर उसकी नीयत बिलकुल पाक-साफ़ है ।अब यह उसकी भी गलती है, जो समय से मेरी नीयत नहीं भांप सका ,फिर भी मैं प्रायश्चित्त को तैयार हूँ।यह उच्च स्तर की नैतिकता नहीं तो क्या है ? वैसे भी एक अपराधी को सुधार का मौका मिलता है ।अगर कोई बलात्कारी अपने गुनाह को मानकर खुलेआम माफ़ी की मांग करता है तो उसे माफ़ कर देने से कानून और समाज का बड़ा भला होगा ।इससे स्वीकारोक्ति का चलन बढेगा और पुलिस को भी अपराधी ढूँढने में ‘लुक-आउट’ का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।लोग किसी भी तरह का तहलका करके अख़बारों में प्रायश्चित्त का एक प्रेसनोट भेज देंगे,इस तरह उनकी और समाज की इज्ज़त बची रहेगी।

प्रायश्चित्त मनाने की बात कोई नई नहीं है।हमारे देश में प्राचीन काल में ऐसी व्यवस्था थी कि राजा और ऋषि लोग अपराध होने पर ‘प्रायश्चित्त-मोड’ में चले जाते थे और बकायदा ‘प्रायश्चित्त-पर्व’ मनाते थे।यह बात और है कि तब अनजाने में हुई गलतियों के लिए यह कदम उठाया जाता था।कहते हैं कि इंद्र ने अहिल्या के साथ छल-कपट से काम-क्रीड़ा की थी पर दोनों को इसका प्रायश्चित्त भोगना पड़ा था।इंद्र कुछ समय के प्रायश्चित्त के बाद पुनः इन्द्रासन पर बैठ गए थे लेकिन अहिल्या को वर्षों तक पत्थर बनना पड़ा था।और भी कई उदाहरण हैं जब राजाओं ने सिंहासन त्यागकर कंदराओं में विचरण किया था। इससे यह तो साबित होता है कि तब भी अपराधी को प्रायश्चित्त करने की सुविधा मिली हुई थी।अब तो तब से लेकर हम काफी प्रगति कर चुके हैं।ऐसे में प्रायश्चित्त करने का साहस दिखाने वालों का सार्वजनिक अभिनन्दन होना चाहिए पर मेरे सामने मुख्य समस्या यही है कि न मेरे पास कोई सिंहासन है और न ही कोई बड़ा पद।फिर मैं कैसे और कहाँ से इस्तीफ़ा दूं ?

मैं बिलकुल प्रायश्चित्त के मूड में हूँ पर इसे करने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है।एक पद-विहीन लेखक यदि लेखन से भी इस्तीफ़ा दे देगा तो उसके प्रायश्चित्त की सूचना भी कैसे होगी ? लगता है मुझे अपने पापों और गुनाहों की मुक्ति के लिए कोई रास्ता नहीं मिलेगा।मुक्ति पाने के लिए पहले बड़ा बनना होगा तभी मुक्ति का सक्षम अधिकारी बन सकूँगा।

दैनिक ट्रिब्यून में ०२/१२/१३ को व नेशनल दुनिया में ५/१२/२०१३ को
 

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

चाय वाले साहब ही ठीक हैं !


Welcome To Jansandesh  Times: Daily Hindi News Paper
जनसंदेश में २१/११/२०१३ को

आखिर इस देश के लोगों को क्या हो गया है ? अगर एक चाय वाला साहब बनकर लाल किले पर चढ़ना चाहता है,तो क्यों कुछ लोग आसमान-पाताल एक किये हैं ? बड़े-बूढ़ों को धकेलकर यदि वह मंचासीन होना चाहता है तो इसमें गलत क्या है ? हमारे देश में ऐसे लोग बड़ी संख्या में हैं,जिन्हें किसी गरीब का सुख देखा नहीं जाता।ऐसे ही लोगों को परसंतापीकहा जाता है।हमारे लिए तो बड़े फख्र की बात होगी,जिस दिन चाय वाला देश का साहब बन जायेगा ।इससे खाली बैठे कारिंदों और पुलिस वालों को भी ढंग का काम मिल जायेगा और वे आम आदमी की सुरक्षा के लिए दिन-रात उसके पीछे लगे रहेंगे ।ऐसे में साहब और उसके बंदे की नीयत पर शक करना कतई मुनासिब नहीं है ।सीधी बात है कि एक चाय वाले का साहब बनना कइयों को नागवार गुजर रहा है।

लोग बहुत नादान हैं।उन्हें सोना खोदने और सपने बेचने वालों पर तो भरोसा है लेकिन एक  चाय बेचने वाले की क्षमताओं पर संदेह हैं।मयूर-तख़्तपर उसका दावा सामने आते ही स्वयंभू शहजादे का भविष्य डगमगाने लगा है ।दिक्कततलब  बात तो यह है कि परसंतापीलोग अब उस तख़्त में नुकीले बयानों की कील चुभो रहे हैं।भले ही देश की बागडोर थामने के लिए इतिहासकार होना ज़रूरी न हो पर चाय के इतिहास का अध्ययन करने पर तो रोक नहीं है।कहते हैं कि नामालूम-सा यह कड़क उत्पाद इंग्लैंड से अंग्रेज़ अपने साथ लाए थे।इस तरह चाय का कारोबार अंतरराष्ट्रीय ब्रांड से जुड़ा हुआ है।आज बाज़ार में उसी चाय की डिमांड है,जिसका ब्रांड दमदार और ग्लोबल हो ।यह आप पर निर्भर है कि आप टाटा की जागो रेपसंद करते हैं या बाघ-बकरी जैसी एक घाट पर लाने वाली समाजवादी चाय ?यदि कोई ग्रीन-टीपीने की कसम ही खा चुका है तो अलग बात है,पर ऐसों की संख्या कितनी है ?फ़िलहाल,तुलसी,अदरक,वंजारा और साहिब जैसे नए-नए फ्लेवर की चाय परोसी जा रही है ।मीडिया और कार्पोरेट ने भी सबको आश्वस्त किया है कि यही चाय मुर्दनी वाले चेहरों पर ताजगी ला सकती है।

भूले-बिसरे नायकों पर टॉर्च मारी जा रही है।महापुरुष चुनाव के समय उधारी पर चल रहे हैं।लौहपुरुष को उबारने के लिए लोहा लिया जा रहा है तो बापू को मोहन लाल के रूप में गढ़ा जा रहा है।देश के इतिहास में यह पहली बार होगा कि सत्ता के लिए नया  इतिहास लिखने की होड़ मची है ।इस इतिहास का अवलोकन किसी विश्वविद्यालय या स्कूल के पाठ्यक्रम में नहीं,बल्कि विशेष शाखाओं में किया जा सकता है । सभाओं और रैलियों में लोगों को चाय की ताजगी और भविष्य की बानगी दिख रही है।चाय बेचने वाले का दावा देश पर तब और पुख्ता हो जाता है,जब यह तथ्य सामने आता है कि उसने तो चाय ही बेच रखी है,जबकि दूसरे लोग देश बेचने में लगे हैं।जब बिना किसी अनुभव के कोयला,स्पेक्ट्रम,तोप,सब कुछ बेचा जा सकता है तो चाय बेचकर और बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है। इससे साहब और उनके बन्दों को तगड़ी स्फूर्ति मिलेगी,इसलिए हमारी नज़र में देश-सेवा के लिए चाय और बन्दे वाले साहब की प्रोफाइल ज्यादा दमदार है।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

हम आभारी हैं सरकार !


 
जनसन्देश और जनवाणी में १३/११/२०१३ को

हम तो बाल-बाल बच गए ! हमारे घर के चौकीदार ने जब इसकी औपचारिक घोषणा की तो पहले हम कुछ समझ ही नहीं पाए।बाद में उसने बड़ी ख़ुशी से यह खुलासा किया कि हम उसके बचाने से नहीं बचे हुए हैं बल्कि जो हमला करते हैं,वे ही हमें मारना नहीं चाह रहे।अगर उसके वश में हो तो वह आये दिन हमारे ऊपर गोले फिकवाए।इतनी संवेदनशील जानकारी पाकर हम चौकन्ने हो गए और जिस चौकीदार को हम केवल अपना रक्षक समझ रहे थे,उसकी ओर कातर नेत्रों से देखने लगे।हमें उसमें साक्षात् प्रभु के दर्शन दिखाई देने लगे।वह सरकार,पालनहार ही नहीं,संहारक भी है।ऐसे व्यक्ति को चौकीदार या सेवक समझना हमारी निरा मूर्खता थी।’मन बावड़ो हो गयो’ जैसी स्थिति में हम गंभीर चिन्तन करने लगे. 

उस पालनहार की बात हमें सोलहों आने सच्ची लगी।अपनी खाली होती जेब और हल्के होते सब्जी के झोले के बीच भी अगर हम इस नश्वर दुनिया में बने और बचे हुए हैं तो यह उसी का प्रताप है।जो आदमी काजू,बादाम और च्यवनप्राश का स्वाद न ले सके,वह मूँगफली और देसी ठर्रे के दम पर पूरी सर्दी काट लेता है,यह सरकार की ही रहमत का कमाल है।खाने की थाली में  आलू,प्याज़ और टमाटर का जुगाड़ न कर पाने वाला यदि अभी भी जिंदा है तो यह उसकी निर्लज्ज सहनशीलता का द्योतक है।सरकार के हाथ में फ़िलहाल जो हथियार हैं,उनसे वह हमारे ऊपर भरपूर वार करने में जुटी है पर हमारी सूखी चमड़ी पर कुछ असर ही नहीं होता।ऐसी सुनहरी मंहगाई और उछाल लेते भ्रष्टाचार के शिकार होने से तो हम बच गए पर आतंकी गोलों से बिलकुल नहीं बच सकते हैं।फ़िलहाल,आतंकियों की ओर से हमें कोई खतरा इसलिए नहीं है क्योंकि अभी तक उनके गोलों पर हमारे चौकीदार या सरकार का नियंत्रण नहीं है।

हम तभी से सोच रहे हैं कि वही सरकार हमारे लिए सबसे मुफ़ीद है,जिसका न मंहगाई पर,न भ्रष्टाचार पर और न ही आतंक पर नियंत्रण हो ।ये तीनों चीज़ें आम आदमी की जान की दुश्मन हैं।अगर कोई सरकार इन सब पर नियंत्रण कर लेती है,फिर हमारा बचना नामुमकिन है।हम अपने चौकीदार का शुक्रिया अदा करते हैं,जिसने हमारे जीवित रहने का रहस्य उजागर कर दिया है।यह धमकी नहीं बल्कि परामर्शी-नुस्खा है,जिसे हमें समझना है।कोई कितना भी इतिहास या भूगोल बदल ले,राजनीति और अर्थशास्त्र चौपट कर दे, पर हमारा गणित यही कहता है कि हमें मज़बूत नहीं मजबूर सरकार ही चाहिए।अपनी जान बची रहेगी तभी इस काया का मतलब है।इसलिए यह सरकार हममें इतनी जान तो बचाए रखेगी कि हम उसे बचाने के लिए मतदान-केंद्र तक जा सकें ! इसके लिए हम अपने चौकीदार और सरकार के आभारी हैं।

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

ओपिनियन पर बैन ज़रूरी !

06/11/2013 को नईदुनिया में

 
देश में इस समय दो ही चीज़ें चर्चा में हैं;ओनियन और ओपिनियन।जहाँ ओनियन आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है,वहीँ ओपिनियन सत्ताधारी दल पर।दोनों चीजों का सम्बन्ध कहीं न कहीं खाने से जुड़ा है।आम आदमी ओनियन को नहीं खा पा रहा है और ओपिनियन-पोल कुर्सी पर बैठे नेताओं को खाने में लगा है।इसलिए ज़रूरी हो गया है कि इन दोनों को बैन कर दिया जाय।इससे आम आदमी और सरकार दोनों को राहत मिलेगी।यह मांग कोई नई नहीं है।पहले भी ओनियन के मंहगे होने पर उसके निर्यात पर बैन लग चुका है और अब यदि कोई ओपिनियन सरकार पर मंहगी पड़ रही है तो इस पर भी बैन लगना निहायत ज़रूरी है।

सरकार कई सालों से आम आदमी को नचा रही है पर यह उसका विशेषाधिकार है।कोई ओपिनियन इस हद तक लोकतान्त्रिक नहीं हो सकती कि वह किसी सरकार को पोल-डांस करवाना शुरू कर दे।टीवी चैनलों पर समाचारों के नाम पर डरावने और क्राइम एपिसोड तथा हास्य के नाम पर फूहड़ और अश्लील कॉमेडी सरकार का सिरदर्द नहीं है क्योंकि इन सबमें आम आदमी रीझा रहता है।सरकार को ये कार्यक्रम इसलिए भी मुफ़ीद लगते हैं क्योंकि आम आदमी इन सबको देख-देखकर मंहगाई और भ्रष्टाचार जैसे दकियानूसी और सनातनी मुद्दों से थोड़ी देर के लिए अपना दिमागी-चैनल बदल लेता है।इसलिए उन चैनलों और कार्यक्रमों पर बैन लगाना जनहित में नहीं होगा।

ओपिनियन पोल पर बैन इसलिए भी ज़रूरी है कि इससे सरकार को बचे हुए समय को पूरा करना मुश्किल हो जाता है।वह शासन सँभालने के बजाय अपने सहयोगियों को साधने में ही जुट जाती है।जनता की ओपिनियन चुनाव के पहले जाहिर होने से सरकार को चंदे का टोटा भी पड़ जाता है और काफी बड़ा निवेश उसके हाथ से निकल जाता है।इस तरह ओपिनियन पोल से सरकार की पोल खुलने से बड़े अफसर भी आँखें दिखाना शुरू कर देते हैं।वैसे भी जबसे बड़े कोर्ट ने अफसरों को नेताओं और मंत्रियों के मौखिक आदेश लेने से मना कर दिया है,सरकार चलाना बहुत रिस्की हो गया है।इसलिए ऐसे विपरीत समय में सरकार को पोल-डांस के लिए मजबूर करना ‘चुनावी आचार-संहिता’ के उल्लंघन के दायरे में तो आता है ही,गैर-मानवीय कृत्य भी है।महत्वपूर्ण बात यह है कि मरणासन्न की निंदा हमारे शास्त्रों तक में वर्जित है।शायद इसी दिन के लिए कहा गया है कि ‘अकीर्तिम चापि भूतानि,मरणादतिरिच्यते’,अर्थात किसी का जीते-जी अपयश ,उसके मरने से अधिक है।

सरकार को पोल-डांस पर इसलिए भी एतराज है क्योंकि इस पर पहला और आखिरी अधिकार आम आदमी का ही है।जब वह भूखे पेट और नंगे बदन होकर सुपरहिट परफोर्मेंस दे रहा है तो मोटे पेट और भरी जेब वाली सरकार फ्लॉप होने का रिस्क क्यों ले ? ओपिनियन वही सटीक और ठीक होती है जो सरकारी-धुन में बजे,अन्यथा वह सिवाय शोर के कुछ नहीं है।विपरीत ओपिनियन-पोल का सरकार के धंधों और उसके कारिंदों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।कोई भी सरकार ऐसे में आर्थिक और राजनैतिक नुकसान उठाने का जोखिम नहीं ले सकती,इसलिए जनता की बेहतरी के लिए ओनियन की तरह ओपिनियन पर बैन आवश्यक हो गया है।

 

बुधवार, 6 नवंबर 2013

आलू-प्याज और लौहपुरुष !

जनसंदेश में 8/11/2013 को।

उधर वे खजाने की खोज में लगे हुए थे और इधर आलू के लाले पड़ गए।खजाने में टूटा-फूटा चूल्हा और कुछ चूड़ियों के अवशेष ज़रूर मिले मगर जिस सोने पर नज़र थी ,वह दूर-दूर तक नज़र नहीं आया।इस खुदाई से उन्हें बड़ी उम्मीदें थीं कि सारी मुफलिसी दूर हो जाएगी,पर बुरा हो सपने का,वही गच्चा दे गया।सोना तो मिला नहीं,रसोई में आग और लग गई।खजाने को खोदने के चक्कर में आलू भी नहीं जमा कर पाए।प्याज़ को आसमानी होते देखकर वे अच्छे-खासे वैष्णव बन गए थे।पिछले दो महीनों से इस बहाने उन्होंने प्याज़ को हाथ न लगाया था पर अब आलू के बिना कैसे चलेगा ? इसे भी अपने सब्जी के झोले में न डाल पाए तो दुनिया को क्या मुँह दिखायेंगे ? यही सोच-सोचकर वे हलकान हुए जा रहे थे।

हमें देखते ही उन्होंने अपने झोले को समेटकर अपनी खाली जेब में धर लिया।हमने आज उनसे खजाने का हाल न पूछा क्योंकि वे बिना खुदे ही धरती में गड़े जा रहे थे।हमने भी अपनी तरफ से उनके ज़ख्मों पर फावड़ा चलाना उचित न समझा। वे ही उबल पड़े,’क्या ज़माना आ गया है ? पहले प्याज़,टमाटर और अब आलू भी ? कितना अजीब समय है,जिसको भी भाव न दो,अपने भाव बढ़ा देता है।ये वो दिन भूल गया ,जब इसे खाने से ज्यादा इसके ठप्पे बनाकर लोगों की पीठ पर छापते थे।अब यह हमारी ही पीठ पर सवार हो गया है।’वे बिलकुल भुने हुए आलू हुए जा रहे थे।

हमने उनके जेब में पड़े खाली झोले को देखते हुए सांत्वना दी,’अब आप आम आदमी नहीं रहे ।आपको आलू-प्याज़ पर चिंतन करने की ज़रूरत नहीं है।सोना न मिला न सही ,अब लोहे पर ध्यान केन्द्रित करो।हाड़-मांस के बने पुतलों से लोहे का पुतला कहीं अधिक कीमती है।आलू-प्याज़ की सोचकर अपनी दैहिक भूख शांत कर सकते हो जबकि लोहा इकठ्ठा करोगे तो सात पीढियों के खाने का इंतजाम हो जायेगा।’

‘पर यह सब होगा कैसे ? हम तो अभी तक भूख से ही लोहा ले रहे थे,अब क्या सच्ची-मुच्ची वाला लोहा लेना होगा ? वे जेब से खाली झोले को बाहर निकालते हुए बोले।

‘हाँ,अब बदले समय को पहचानो।आलू-प्याज़ उगाने और खाने के लिए पूरी जिंदगी पड़ी है।फ़िलहाल कहीं से एकठो महापुरुष का इंतजाम कर लो और उसमें लोहे का लेप लगाकर चौराहे पर खड़ा कर दो।इससे खाली जेब और पेट दोनों भर जायेंगे।और हाँ,यह काम जितनी जल्दी हो, कर डालो क्योंकि कहीं आलू-प्याज़ की तरह महापुरुषों का भी टोटा पड़ गया तो फिर कुदाल लेकर गड़े हुए खजाने की तरह उन्हें भी खोदना पड़ेगा !

 'जनवाणी' में ०६/११/२०१३ को प्रकाशित