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गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

हुँकारत्व से ही शांति पसरेगी !

जनवाणी में ३०/१०/२०१३ व जनसन्देश में ३१/१०//२०१३ को

 

उन्होंने हमें देखते ही हुँकार भरी।हम पहले से ही लुटे,अधमरे बैठे थे,और डर गए।वे एकदम पास आकर गुर्राकर बोले,’तुम्हें अब किसी और से डरने की ज़रूरत नहीं है।हम तुम्हारी ही रक्षा के लिए अवतरित हुए हैं।साठ सालों का तुम्हारा डर हम साठ दिनों में ही छू-मंतर कर देंगे।तुम्हारे ही उद्धार के लिए हम चाय बेचने के अच्छे-खासे व्यापार को छोड़कर सियासत में वादे बेच रहे हैं।हमारे ये वादे सामान्य वादे नहीं,इरादे भी हैं।हुँकार अब हमारा ब्रांड बन चुका है,हमारी यूएसपी है।इसके फ्लेवर से बने वादे खूब चलते हैं,यह हम आजमा चुके हैं।इसे अब हम व्यापक पैमाने पर लागू करने जा रहे हैं।’

हमने ज़रा-सी हिम्मत करके उनकी हुँकार के बीच अपने लिए थोड़ा स्पेस पैदा करने की कोशिश करते हुए सांस भरी,’मगर आप बिना हुँकार के भी हमारी सेवा कर सकते हैं,फिर यह ललकार ?’ वे अपनी हुँकार पर अटल होते हुए गरजे,’यह सब हम तुम्हारे लिए ही कर रहे हैं पर तुम सुन कहाँ रहे हो ? सालों से हम तुम्हारी सेवा करने को आतुर हैं पर तुम तो एक ही परिवार को वसीयत लिखे बैठे हो।न हमें आने देते हो और न ही ठीक से मुँह मारने ।अब हम इत्ता तो समझ ही चुके हैं कि केवल राम-राम की माला जपने से कुछ नहीं होने वाला।शिकार के लिए हुँकार पहली ज़रूरत होती है,हम तुम्हें बस यही समझा रहे हैं।जंगल का शासन सियार की हुआ-हुआ से नहीं शेर के गरजने से चलता है,इसलिए यह हुँकार ज़रूरी है।’

‘पर इस हुँकार से तो हमें डर लग रहा है।ऐसे में हम अपने दड़बे से बाहर नहीं निकले,तो आपको ‘भोट’ कैसे मिलेगा ? कहीं डर गहरे बैठ गया तो गलत बटन दब सकता है,इससे आपके हुँकारत्व की रेटिंग गिर जाएगी।हम तो अपने खाली पेट और खाली जेब को भरने के लिए आपका मुँह ताक रहे हैं,पर आप तो हमें ही...?’ उन्होंने पहले से अधिक हुँकार भरी,’तुम फ़िलहाल हमें भकोसने दो,हम तुम्हारे अवशेषों को राष्ट्रीय संग्रहालय में स्थापित करने का प्रयास करेंगे।हम हुँकार भरते हैं कि खाने-खिलाने की हमारी खुली डराऊ नीति होगी।इसीलिए डर ज़रूरी है।’

‘क्या मंहगाई और भ्रष्टाचार भी इस हुँकार से डर जायेंगे ?’ हमने डरते-डरते ही पूछा।’बस,इत्ता-सा काम? ये तो हमारी फुफकार से ही दूर भाग जायेंगे।जब तुम जैसे जिंदा प्राणी हमारी हुँकार का अर्थ समझते हैं तो फिर गड़े मुर्दे और मरे मुद्दे क्या चीज़ हैं ? बस,चारों तरफ डर और सिर्फ डर होगा !’इतना सुनते ही हम फिर से बेहोश हो गए।



बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

सच्चे वादे,झूठा सपना।

जनवाणी में 23/10/2013 को।
खजाने की आस लगाने वाले निराश होने लगे हैं। पहले ख़ूब हल्ला मचा;अख़बारों ने कई पन्नों में खजाने और सपने को ख़ूब परवान चढ़ाया और टीवी चैनलों ने विमर्श से अधिक विज्ञापन बटोरे । अब हल्ला ज़रा-सा शिफ्ट हुआ है। विमर्शकार लोग अब बाबा की आलोचना करने में जुट गए हैं,जो निहायत ज्यादती है।

हमारे देश में आज़ादी के बाद से ही नेता आए दिन वादे करते रहे हैं। वे सब वादे खुली आँखों से और दिन-दहाड़े किए गए,पर उनमें से एक भी सच नहीं हुआ।हमने भी ज़्यादा उफ़ नहीं की ।फ़िर यह तो महज एक सपना था,जो एक बाबा ने बंद आँखों से देखा था। यदि यह सच नहीं भी निकलता है तो एक सामान्य बात होगी। बंद आँखों से देखे सपने का टूटना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। तुलसीदास बाबा ने पहले ही सचेत कर दिया था,’सपने होई भिखारि नृप,रंक नाकपति होय’,अब इसके बाद भी सरकार गैंती और फावड़ा लेकर कूद जाय तो उसका ही दोष है। उसे सब दोषों की तरह इस दोष को भी अपने मत्थे लेने पर कोई गुरेज नहीं है। सरकार ने इस बहाने सिद्ध कर दिया है कि वह बाबा और धर्म-विरोधी नहीं है।

हमारा देश सनातन काल से चमत्कारों और आस्थाओं में विश्वास रखने वाला रहा है। बीच में कुछ समय के लिए इसे सोने की चिड़िया भी कहा गया । बाद में कुछ बाहरी आक्रमणकारियों ने सारा सोना उड़ा दिया । आज़ादी के बाद लोगों के सपनों का भारत बना और हमारे रहनुमाओं ने अपने सपने सच्चे कर लिए। लोगों के सपने हवा में ही तैरते रहे ।इस तरह आम आदमी की धीरे-धीरे सपनों से आस्था डगमगाने लगी। नेताओं को लगा कि यदि ये लोग सपने देखना बंद कर देंगे तो उनका जीवन कठिन हो जायेगा। ऐसे में सपनों को पुनर्जीवित करने का मौका बाबा ने दे दिया और नेताओं ने उसे लपक लिया ।

गड़े खजाने की खुदाई से कुछ मिले या न मिले,कई लोगों के सपने ज़रूर पूरे हो गए हैं । बाबा अहर्निश चैनलों पर प्रकट हो रहे हैं । आर्थिक तंगी से जूझ रहे मीडिया को तगड़ा आर्थिक पैकेज मिल गया है  और जनता को भी कुछ समय के लिए मनहूसियत की खबरों से निजात। खुदाई वाली जगह में कई तरह के कुटीर-उद्योग भी विकसित हुए हैं,जिनमें ढेर सारा रोज़गार सृजित हुआ। इसमें विशेषकर जलेबी ,पकौड़े और समोसे वालों ने सक्रिय भागीदारी की।

जो लोग सपने के आधार पर की गई खुदाई की आलोचना कर रहे हैं,वे नादान हैं। अगर खुदाई में सोना निकलता है तो हम फ़िर से जादूगरों और बाबाओं वाले देश होने का गौरव पायेंगे और नहीं, तो हजारों वादों की तरह इस सपने को भी सब भूल जायेंगे । जनता नेताओं के वादे के साथ बाबा के सपने को भी भुला देगी और इस तरह नेता और बाबा सब बराबर हो जायेंगे ।

काश ,मुझे कोई सपना आए!

जनसंदेश में 23/10/2013 को।
सपने फ़िर से चर्चा में हैं। एक साधु ने हाल ही में सपना देखा कि फलां जगह सोने का खजाना गड़ा है । खजाना अभी हाथ नहीं लगा है पर उसको लेकर कई लोग सपने देखने लगे हैं। खजाना मिलने पर देश का बहुत सारा क़र्ज़ निपटने का सपना मीडिया भी दिखा रहा है। कुछ दिन पहले कुछ नेताओं के सपने भी चर्चा में छाये हुए थे। कोई सपनों में प्रधानमंत्री बन रहा था तो कोई अपने को इस स्थिति में बता रहा था कि वह सपने नहीं देखता,उन पर डायरेक्ट अमल करता है। कुछ बाबा लोग भी सपने देखते,दिखाते हुए धरे गए थे।

सपनों को लेकर की जा रही चर्चाओं ने मेरी बेचैनी फ़िर से बढ़ा दी। आखिर सपने मुझे क्यों नहीं आते ? क्या मुझे कोई बीमारी है यह सोचकर नुक्कड़ वाले डॉ. झोलाराम के यहाँ अपनी परेशानी लेकर पहुँच गया । वे आँखें मूँदे कुर्सी पर अधलेटी मुद्रा में पड़े हुए थे। हमारी आहट पाकर डॉक्टर साहब उठ बैठे और अपने आले को टटोलने लगे। मुझे प्रत्यक्ष पाकर कहने लगे,’मुझे अपने सपने पर पूरा भरोसा था और तुमने उसे सच कर दिखाया’। इतना सुनते ही मेरी धड़कन और बढ़ गई। अब यहाँ भी सपने की बात ? साधु,नेता,डॉक्टर सभी को सपने आ रहे हैं फ़िर मुझे क्यों नहीं ?

डॉक्टर झोलाराम ने मेरी चिंतन-प्रक्रिया को भंग करते हुए पूछा,’क्या परेशानी है आपको ?’ ‘डॉ. साहब,बहुत दिन हुए ,मुझे कोई सपना नहीं दिखा। क्या यह कोई गंभीर बीमारी है ? मैंने डरते-डरते ही पूछा। डॉ. साहब ने मुझको ऐसे घूरा जैसे मुझे कोई बड़ी संक्रामक बीमारी हो। उन्होंने मेरी आँखों की पुतलियों को कई बार उलट-पुलटकर देखा। अंत में गंभीर होते हुए बोले,’आप को नींद बहुत आती है। आपकी आँखों से लगता है कि आप हमेशा घोड़े बेचकर सोते हैं,इसलिए ऐसी नींद में किसी सपने के लिए गुंजाइश नहीं है। इतना सोना स्वास्थ्य के लिए भले ही हितकर हो,पर सपनों के लिए ठीक नहीं। ’ 'मगर डॉ.साहब, क्या करें ? खुले आसमान में मच्छरों का संगीत सुनते हुए गहरी नींद आ जाती है। बस,यह ससुरा सपना ही नहीं आता। ’

डॉ. झोलाराम ने अब मेरे पेट पर हाथ फिराया। कहने लगे,’सपने न आना तुम्हारी वंशानुगत बीमारी है। मुझे  तो लगता है कि तुम्हारी कई पीढ़ियों ने कोई सपना ही नहीं देखा है। इसकी दवा मेरे पास नहीं है। आप चाहें तो सरपंच जी से मिलकर ‘मनरेगा’ का जॉब-कार्ड बनवा लें। सपने की गारंटी नहीं है, पर देह में पेट का एहसास जरूर हो जायेगा। ’यह सुनकर मैं निराश हो गया। लौटते-लौटते डॉ. साहब से पूछ ही लिया कि आखिर सपने देखने का कोई उपाय तो होगा ? डॉ. झोलाराम ने ज़ोर देकर कहा कहा,’उपाय तो है,पर यह गाँव में रहकर नहीं हो सकता। सपने देखने के लिए पहले जमीन तैयार करनी पड़ती है । बड़े शहर में जाओ। वहाँ सोने से पहले बड़े मॉल के चक्कर लगाओ। वहाँ की हर दुकान पर भरपूर नज़र डालो। बस,कीमत मत पूछना,नहीं तो सपना भी नहीं आएगा। किसी नेता के फार्म-हाउस या बाबा के आश्रम का फेरा भी नियमित रूप से लगाओ,तभी कुछ हो सकता है। ’

डॉ. साहब का यह नुस्खा लेकर घर लौट आया हूँ। तब से शहर जाने के इंतजाम में लगा हूँ। सोच रहा हूँ  कि अपने जीते-जी शहर जाने का सपना पूरा कर लूँ,ताकि नींद में सोने के खजाने जैसा कोई सपना मुझे भी इस जनम में नसीब हो जाय।
 
 
हरिभूमि में १२/११/२०१३ को

शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

सपने और सरकार ।

19/10/2013 को नईदुनिया में।
हमारी सरकार आम आदमी की तरह सोचती है और वैसा ही करती भी है। जो लोग यह कहते नहीं थकते कि सरकार की नीतियां आम आदमी के लिए नहीं बनती हैं,उन्हें अब अपनी धारणा बदलनी पड़ेगी। आम आदमी और उसमें एक बुनियादी फर्क है कि सरकार स्वयं सपने नहीं देखती वरन उसके सपनों को पूरा करती है। यही काम करने के लिए तो जनता उसे चुनती है और वह वही कर रही है। फ़िर कोई कैसे कह सकता है कि सरकार आम आदमी का ध्यान नहीं रखती। वह उसके जीते-जागते मुद्दों पर भले टालमटोल कर दे पर सपनों को पूरा करने के लिए बिलकुल कृतसंकल्प है।

हाल ही में एक बाबा को ज़मीन में गड़े हुए खजाने का सपना आया। उन्होंने सपने को सरकार तक पहुँचाया और सरकार फ़ौरन उसको पूरा करने में लग गई। वह युद्ध-स्तर पर खुदाई का कार्य करवा रही है,भले ही उसमें कुछ हासिल हो या नहीं पर उस पर यह इलज़ाम तो आयद न होगा कि उसे जनभावनाओं की फ़िक्र नहीं है। जो सरकार किसी सपने पर इतना सक्रिय हो जाये,वह दिन के उजाले में उठाये हुए जनांदोलनों की आवाज़ को वह क्यों नहीं सुनेगी ? बस ,ज़रूरत इस बात की है कि सपना कौन देखता है और आन्दोलन की अगुवाई कौन करता है ? अब कब और किस पर सरकार को अमल करना है ,इतना तो अधिकार उसको मिलना ही चाहिए।

ज़्यादा समय नहीं हुआ जब एक और बाबा ने सपना देखा था कि स्विस बैंक में इतनी रकम जमा है कि जिससे देश का सारा कर्जा उतर जायेगा। इस पर सरकार को बिलकुल यकीन नहीं हुआ क्योंकि यह सपना था ही नहीं,बाबा ने यह सब खुलेआम कहा था। सरकार इस पर व्यर्थ में खोजबीन कराकर जनता के ही पैसों को जाया नहीं करना चाहती थी । दूसरी वजह यह रही कि सरकार केवल जनता के सपनों को ही पूरा करने के लिए होती है। सरकार ने फ़िर भी बाबा की खैर-खबर लेने व खजाने के संबंध में आधी रात में उनका बयान दर्ज़ करना चाहा तो वे भेष बदल कर भाग खड़े हुए। उन्हें लगा कि खजाने के बजाय सरकार उन्हीं को समाधिस्थ करने पर आमादा है। अब बिना कोई जोखिम लिए खज़ाना तो क्या मीडिया का अटेंशन और इनकम टैक्स का नोटिस भी नहीं मिलता।

लोकतंत्र में सपने देखने से अधिक ज़रूरी है कि कौन उसे देखता है ? सपने बहुत सारे हैं पर पूरे वही होते हैं जो युवराज-टाइप के हों या आम आदमी-टाइप । आम आदमी के लिए ‘मनरेगा-कार्ड’ और ‘मुफ़्त-खाना’ वाले सपनों पर सरकार ने अमल करना शुरू भी कर दिया है। इससे सरकार का युवराज-टाइप का सपना भी पूरा हो जायेगा। सरकार को ऐसे ही सपने पूरे करने चाहिए जिसमें उसका और जनता ,दोनों का भला हो। यानी एक तीर से दो शिकार। अब ऐसे में कौन से बाबा को भगवान बनाना है और किसको ‘मैराथन-दौड़’ का अभ्यास कराना,यह सरकार ही सुनिश्चित करेगी। इसलिए सपने भले कोई देखे, उनके ऊपर कंट्रोल सरकार का ही रहेगा। अगली बार यदि आप कोई सपना देखना चाहें तो सरकार से उसकी पूर्व-स्वीकृति अवश्य ले लें !

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

लालटेन से बढ़ती लौ !

जनसंदेश में १७/१०/२०१३ को !
 

जो लोग यह समझ रहे थे कि नेताजी के जेल जाने के बाद लालटेन भकभकाकर बुझ जायेगी,वे गलत साबित हुए हैं। अब ऐसा इंतज़ाम हो गया है कि लालटेन कभी बुझेगी ही नहीं। पहले उसको बाहर से ही जलाया जाता था पर अब अंदर से भी रोशनी दी जा सकेगी। नेताजी जब तक बाहर थे,अकेले ही लालटेन में तेल डालते थे,माचिस लगाते थे;अब वो अंदर हैं तो तेल-कुप्पी लिए ‘भरे’ बैठे हैं,वहीँ से आग लगाएंगे। पत्नी,बेटा,बेटी आदि लालटेन की सुरक्षा बाहर से करेंगे और नेता जी अंदर से। हवा के थपेड़ों से लालटेन बुझने का डर भी नहीं है क्योंकि चारा-सानी खाए नेताजी ने उसको कसके घेर रखा है।

नेताजी की लालटेन कोई सामान्य नहीं है। उसमें पड़ने वाला तेल उच्च कोटि का है इसीलिए उसके बुझने की आशंका भी न्यूनतम है। एक लालटेन हमें भी मिली थी स्कूल में,जब हम दसवीं में फर्स्ट क्लास पास हुए थे। पर उसको जलाने के लाले पड़ते थे। लालटेन में पड़ने वाला तेल कई बार खत्म हो जाता था तो उसे खूँटी में यूँ ही टांग दिया करते थे। वह भले ही जलकर रोशनी न देती थी,पर उसे देखकर ख़ूब पढ़ने की प्रेरणा मिलती थी। नेताजी वाली लालटेन पढ़ने नहीं आगे बढ़ने के लिए है। इसमें ईंधन की कमी का भी कोई डर नहीं है। उसे समुचित मात्रा में पेट में ही स्टोर कर लिया गया है। इसीलिए यह जलते-जलते न भकभकाती है और न ही शीशे को काला करती है।

नेताजी भले अंदर चले गए हों,कारागार के अंधकार में हों,पर उन्होंने बाहर बैठी जनता के लिए रोशनी का भरपूर इंतजाम कर दिया है। उनका कुनबा लालटेन को न छोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। यही वजह है कि जनसेवा के खातिर ही नेताजी ने अपने कुनबे को पहले से ही ख़ूब विस्तार दे रखा है। कभी कोई अंदर-बाहर हो जाये और जनता उनकी सेवाओं से महरूम न हो जाये ,इसलिए उनके पास विकल्पों की लंबी फेहरिस्त है। लालटेन को भी आत्म-विश्वास है कि वह कभी अनाथ नहीं होगी,उसे कोई न कोई हाथ ज़रूर उठाये रहेगा।

लालटेन खुश है कि उसकी रोशनी सलामत रहेगी। गंगा-जमना में पानी बचे या न बचे,सूरज और चाँद रहें या न रहें,नेताजी की लालटेन उनके कुनबे को रोशन करती रहेगी। इसकी रोशनी कोई अध्यादेश भी नहीं है कि जिसे कोई फाड़ सके। लालटेन की सलामती से गाय-भैंसों को भी फख्र है कि आखिर उनके चारे से ईंधन ही तो बन रहा है,चाहे वह उनके द्वारा खाकर बने या नेताजी द्वारा। चारे का इससे उत्तम प्रबंध और क्या हो सकता है ?चारे और गोबर को इस मुकाम तक पहुँचाने वाले नेताजी को भला जनता भी कैसे बिसरा देगी ? लगता है इसीलिए आत्म-विश्वास से भरी लालटेन की लौ और तेज हो गई है।

 

बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

नेताजी और उनका संन्यास।


नेशनल दुनिया में 25/10/2013 को व जनवाणी में 16/10/2013 को प्रकाशित

 कहते हैं कि काम करने वाले के लिए कभी आराम का समय नहीं होता है। वह एक काम से छूटता है तो दूसरा पकड़ लेता है या यूँ कहिये,काम ही उसको पकड़ लेता है। अभी हाल में क्रिकेट के भगवान ने खेल से रिटायर होने का ऐलान किया,जिसका सबने स्वागत किया। पहले उनके खेल को और अब रिटायरमेंट –प्लान को ख़ूब मीडिया कवरेज मिली। इससे उत्साहित होकर कुछ लोगों ने नेता जी से भी अपना रिटायरमेंट-प्लान घोषित करने की माँग शुरू कर दी। नेता जी ने भी साफ़ कर दिया है कि वे जब तक जीते रहेंगे,देश-सेवा करते रहेंगे। उनकी इस बात में काफ़ी दम है।

आखिर ,देश-सेवा करना कोई साधारण खेल नहीं है। क्रिकेट या अन्य खेल में जहाँ शरीर का चुस्त होना ज़रूरी है वहीँ राजनीति में दिमाग का। शरीर के बूढ़े होने के प्रमाण तो मिलते हैं पर दिमाग के सठियाने के नहीं। ख़ासकर नेता जी का रोबोटिक-दिमाग आजीवन सक्रिय रहता है। वे आखिर दम तक अपनी सेवाएं देने के लिए उपलब्ध रहते हैं। नेता जी जीते-जी अपना रिटायरमेंट-प्लान किसी को नहीं बताते। पता नहीं,कब लॉटरी लग जाये ?देश में ऐसा एक कारनामा पहले हो चुका है, जब एक नेता ने चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया था पर बाद में प्रधानमंत्री बनकर उसने देश की ख़ूब सेवा की। इसलिए नेता जी को रिटायरमेंट लेने में कोई समझदारी नहीं दिखती।

जो लोग नेता जी के रिटायरमेंट को आवश्यक मानते हैं,वे भूल जाते हैं कि इसमें जनता का ही नुकसान है। यदि नेता जी के आराम करने के लिए कोई मियाद फिक्स कर दी गई तो इससे उनकी सेवा-भावना आहत होगी तथा वह और तीव्र-गति से काम करेगी। इसके असर में नेता जी कम समय में ही अपना कोटा पूरा करने का जतन करेंगे। इसके लिए वे दिन-रात हाड़-तोड़ सेवा करने में जुट जायेंगे। इससे उनकी जान का और हमारे माल का ज़्यादा नुकसान होने की आशंका पैदा हो जायेगी । इसलिए देश की सेवा के लिए नेता जी का आजीवन-संकल्प लेना बिलकुल उचित और तार्किक लगता है।

कुछ खिलाड़ी हैं जो देश के लिए खेलते हैं पर नेता जी देश से खेलते हैं। इसके लिए बहुत बड़ा हुनर होना चाहिए । वैसे भी,कोई हुनरमंद खिलाड़ी कभी खाली नहीं बैठता। खेल से संन्यास लेने से पहले और बाद में वह जनता को बताता फिरता है कि कौन-सा तेल, साबुन या बनियान उसके लिए अच्छी है,भले ही उसने कभी इनका प्रयोग न किया हो। फ़िर नेता जी तो विशुद्ध परोपकारी हैं .वे नित-प्रति टीवी के आगे बयान देते हैं ,वह भी फ़ोकट में। राजनीति के ऐसे खिलाड़ी की तुलना किसी और क्षेत्र के खिलाड़ी से कैसे की जा सकती है ?नेता जी एक कुशल खिलाड़ी हैं,फ़िर उनका ‘स्ट्राइक-रेट’ भी औरों से ज़्यादा है.अभी हालिया दंगे ने ये साबित भी कर दिया है.

नेता जी से संन्यास की माँग गैर-वाजिब है।ये पहले ही उस दशा को प्राप्त हैं,तभी इनके ऊपर अवस्था या व्यवस्था का कोई असर नहीं होता है। जहाँ बाबा और संत संन्यास को भरपूर एन्जॉय कर रहे हैं,ऐसे में नेता जी के संन्यास न लेने का निर्णय त्याग का उच्चतम उदाहरण है।

बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

टोपी और बुरके का मौसम !


 

कुर्ता और धोती बहुत बेचैनी महसूस कर रहे थे। खूँटी पर टँगे हुए उन्हें कई रोज हो गए थे पर वहाँ से उन्हें उतारने की सुध किसी को नहीं आई । उनकी यह दशा पास में टंगे पाजामे से न देखी गई । उसने दोनों से सहानुभूति जताते हुए उनके दुःख का कारण पूछा। कुर्ते ने इधर-उधर झाँकते हुए कहा,’हम अभी तक सदुपयोगी रहे हैं। एक के बाद एक हमने देह के सारे दाग छिपाए,अपनी सफेदी में कालिख पुतवाई पर अब अचानक हमें ही भुला दिया गया । सुना है कि लोग अब दाग की चिंता से मुक्त हो गए हैं। उन्हें अब दागों से किसी बात का डर नहीं लग रहा है,जबकि सामने चुनाव हैं। पहले जब चुनाव आते थे तो हमारा बोलबाला रहता था। हम पर चरक करके रोज़ हवाई सैर की जाती थी ,पर अबकी बार न जाने क्या हुआ;जिसे देखो वही टोपी लगाकर निकल पड़ता है। देह ढंकने के लिए हमारे विकल्प में वह कुछ भी पहन लेता है,पर टोपी लगाना नहीं भूलता। ’

हवा में हिलते हुए पाजामा थोड़ा कुर्ते के करीब आया और समझाने के अंदाज़ में बोला,’बंधु ! आपकी मुख्य समस्या यह है कि आप एक निश्चित नाप के हैं,इसलिए सब पर फिट नहीं हो सकते। अब हमें ही देखो,हमने अपनी देह को इस तरह बना रखा है कि जैसी जिसकी तोंद हो,उसके मुताबिक ढीला हो जाता  हूँ। बिगड़ा काम बनाने के लिए हम किसी के भी पैर में समा सकते हैं। इसलिए हमारी कीमत हर समय रहती है और हमारी माँग भी। ’इतना कहकर पाजामा धोती की तरफ थोड़ा लहराया। धोती उसका मंतव्य समझते हुए बोली,’पर हम तो बिना नाप के हैं,फ़िर हमें क्यों इस खूँटी पर सूली की तरह टांग दिया गया है। हम देह और पैर दोनों को ढंकते हैं और इज्ज़त भी। हम किसी की कालिमा या कुरूपता को घूँघट से ढंकते हैं और कुछ शर्म भी बचाकर रखते हैं। ऐसे में हमें खूँटी पर टांगकर हमारे साथ अन्याय किया गया है। अब जब लग रहा था कि इस चुनाव में हमारी कदर होगी,हमें अनिश्चितकाल के लिए भुला दिया गया है। ’

अब पाजामा थोड़ा गम्भीर हो गया। उसने समस्या की गाँठ खोलते हुए कहा,’बहन,समय की बहुत कमी है। लोग इस वक्त बेहद जल्दी में हैं। वे लालकिले पर चढ़ने के लिए केवल धोती के भरोसे नहीं रह सकते। अगर रास्ते में धोती फँस गई तो बचे हुए भाषण सड़क पर खड़े होकर ही पढ़ने पढेंगे। दूसरी बात यह कि जितनी देर में वे आपको सम्हालेंगे मतलब लपेटेंगे,उतनी देर में दसठो बुरका पहन लेंगे। आप रंग-बिरंगी और टाइम खोटा करने वाली हैं,जबकि बुर्के के मामले में ऐसी कोई च्वाइस ही नहीं है। इससे काम में दस-गुना तेजी आ जाती है। इसीलिए इस समय बाज़ार में बुर्के की माँग बढ़ गई है। चुनाव निपट जाने दो;बुरका और टोपी दोनों निपट जायेंगे। ’

इन तीनों में खुसर-पुसर चल ही रही थी कि सामने के दरवाजे से टोपी और बुरका दिखाई दिए। वे मजे से  सज-धजकर नई रैली की तरफ जा रहे थे और इधर कुर्ता और धोती खूँटी पर टँगे-टँगे ही हवा में हिलने लगे।वे मन ही मन कह रहे थे ,’हाय ,हम टोपी न हुए,बुरका न हुए !’ 


जनसंदेश टाइम्स में ०९/१०/२०१३ को प्रकाशित
 

शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

दागियों पर रहम की अपील।

नेशनल दुनिया में 4/10/2013 को।
कुछ नेताओं को चारा हजम करने के मामले में दोषी पाया गया है,इससे हमें बेहद दुःख पहुँचा है।ये नेता केवल दोषी होते तो कोई बात नहीं थी।इसके पहले न जाने कितने माननीय दोषी पाए गए हैं पर उन्हें दागी बनने का अभिशाप नहीं झेलना पड़ा।चारा घोटकर खा जाने वाले दोषी नए टाइप के दागी बन गए हैं क्योंकि अब वे जनसेवा ही नहीं पशुसेवा भी नहीं कर पाएँगे।उनके चुनाव लड़ने पर न्यायालय ने अड़ंगा लगा दिया है,यही तकलीफदेह बात है।इसी का अंदेशा हमारी सरकार को भी था लेकिन कुछ लोगों ने बनता खेल बिगाड़ दिया है .

ये वाले दागी बड़े निरीह और कमजोर किस्म के निकले।बड़े-बड़े पुल,लंबी सड़कें और कोयला खदानें डकारने वाले मजे में हैं जबकि घास-फूस से गुजारा करने वालों को राजनीति यानी जनसेवा से निर्वासन दिया जा रहा है। यह कहाँ का न्याय है ? जैसे मनुष्य के आगे पशु निरीह और बेबस होते हैं,उनका चारा पचाकर ये बेचारे दागी अब गोबर भी नहीं कर पा रहे हैं। जब जमाना टूजी,हेलिकॉप्टर,पनडुब्बी और कोयले के युग में प्रवेश कर गया हो,ऐसे में घास-फूस खाने को घोटाला कहना निहायत मूर्खता और नादानी है।

सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे जनसेवकों,पशुसेवकों को यदि दागी करार देकर बाहर बैठा दिया गया तो फ़िर राजनीति कौन करेगा ? हम पड़ोसी देशों से भी ऐसे उत्पाद को आयातित नहीं कर सकते क्योंकि उनकी क्वालिटी यहाँ से भी घटिया है।इसलिए राजनीति को जीवंत और हंसोड़ बनाये रखने के लिए ऐसे दाग-प्रूफ नियम होने चाहिए कि किसी तरह के घपले-घोटालों के छींटे राजनेताओं तक न पड़ें ।इस तरह के किसी प्रस्ताव पर सभी दलों की सहमति भी है पर यह सब इतनी जल्दी होगा,अंदेशा नहीं था.सच्चा लोकतंत्र यही है कि जनसेवा करने वालों के हाथ और मुँह बिलकुल खुल्ले रखे जांय,ताकि वे बेखटके अपनी सेवाएं जनता को दे सकें.।कोई दागी है या नहीं ,इस बात का फैसला भी जनता के हाथ में होना चाहिए न कि कानून के। आखिर लोकतंत्र में जनता ही तो असली निर्णायक होती है। उसके एक बार के अंगूठे से राजनेताओं को पाँच साल तक अंगूठा दिखाने का अधिकार मिल जाता है।अब जब दागियों को न्यायालय ने अँगूठा दिखाया है,यह बात उनके बिरादर-भाइयों को हजम कैसे हो सकती है ?

हमारी सभी दागियों के प्रति सहानुभूति है।हमेशा की तरह हमें प्रबल उम्मीद है कि इनके दिन फ़िर से बहुरेंगे।हम पशुओं से भी आत्मीय अपील करते हैं कि वे मानवीय-स्वभाव से ऊपर उठकर पशुता का परिचय दें और अपने चारे के एवज में इन सबकी रोजी-रोटी न छीनें। दूसरी अपील सरकार से है कि वह इन ‘बे-चारों’ के लिए कम से कम मनरेगा के जॉब-कार्ड ही बनवा दे !

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

चारे ने बेचारा किया !

जनसंदेश में 3/10/2013 को।

ऐसा जुलुम पहली बार हुआ है। जो काम आम आदमी के वश का नहीं था,उसे नामुराद चारे ने कर दिया। राजनीति को ओढ़ने-बिछाने और उस पर सवारी करने वाले को चारे ने दुलत्ती मार दी है। यह बिलकुल हजम होने वाली बात नहीं लगती कि चारा हजम करने वाले को उसी चारे ने हजम कर लिया। हालाँकि उन्हें कारागार पहुँचने पर परेशान होने की कतई ज़रूरत नहीं है क्योंकि उनके आराध्य की जन्मस्थली भी वही है।

लोग बुढ़बक हैं जो समझते हैं कि उन्होंने अपराध-टाइप का कुछ किया है। राजनीति केवल अवसरों का खेल है,जिसके सामने जो आएगा,उसी से तो वह काम चलाएगा। तब पुराना जमाना था,ज़्यादा समझदार और पढ़े-लिखे लोग थे नहीं। टूजी,पनडुब्बी,कोयला,हेलीकाप्टर इनका नाम नहीं सुने थे। सामने चारा दिखा,चर लिया। अब ये थोड़ी ना पता था कि भ्रष्टाचार की वैतरणी में यह पार भी न लगा पायेगा। लोग तो डूबते में तिनके का सहारा ढूँढते हैं,उनके पास तो चारा था। उन्हें क्या पता था कि बुढ़ौती में यही बेसहारा कर देगा ! अब वे कारागार में चारा-चालीसा का पाठ करेंगे।

कहते हैं कि योद्धा कभी हार नहीं मानता। उसके पास कोई न कोई दाँव मौजूद रहता है। फ़िर वे तो राजनैतिक योद्धा ठहरे। उनके पास कई गुप्त दाँव होते हैं। वे कारागार भी गए हैं तो जनसेवा के लिए ही। यह सेवा उनसे कोई नहीं छीन सकता है। जो लोग ऐसा सोचकर उछल रहे हैं,वे नादान हैं। अब उनके पास चारा न सही,रबड़ी तो है ,उसी से काम चलाएंगे। इसलिए उनके प्रशंसकों को दुखी होने की ज़रूरत नहीं है। जब माँ-बेटे मिलकर देश चला सकते हैं तो वह अपनी राजनीति क्यों नहीं ? फ़िर अभी तो वह जिंदा भी हैं !

राजनीति भी कैसे-कैसे मजाक कर लेती है ? जिस व्यक्ति ने राजनीति के कुटिल-खेलों को हँस-हँसकर खेला,मंहगाई और भ्रष्टाचार से दुखी जनता का भरपूर मनोरंजन किया,आज उसी राजनीति ने उसके साथ उल्टा मजाक किया है। कभी किंग-मेकर की भूमिका में रह चुके व्यक्ति को एक जेलर के रहमोकरम पर छोड़ दिया गया है। यह बात चारे के हाजमे से भी कठिन लगती है। यह अकेले भैंस और गायों की साज़िश मात्र नहीं है। इसमें हाथी और शेर जैसे बड़े खिलाड़ी शामिल हैं। उन्हें खुद तो पूरा जंगल साफ़ करना आता है लेकिन अगर कोई घास-फूस जैसा चारा खा ले तो उन्हें  तकलीफ होती है। जनता यह सब समझ रही है,जानवर भी समझ जायेंगे।

चारे ने उनको कितना ही बेचारा कर दिया हो,राजनीति कोई न कोई चारा ढूँढ लेगी। यह संकट एक अकेले उनका नहीं है। जनसेवा करने में ऐसे हाजमा वालों की बहुत ज़रूरत है। चारा हजम करने के बाद आज भले ही गोबर दिख रहा हो,मगर यहीं गोबर आगे चलकर प्रचंड ईंधन का काम करेगा। एक सबक इस मामले से और मिलता है कि राजनीति में मजबूत हाजमे वालों की ही पूछ रहेगी। गाय की पूँछ पकड़कर वैतरणी पार करने वाले कभी भी चूक सकते हैं।

फ़िलहाल, जानवर अपने चारे को गोबर बनता देख रहे हैं और आम आदमी उस गोबर से बनते अपने भविष्य को, जो बहुत दिनों से कारागार में कैद है।

हरिभूमि में 4/10/2013 को प्रकाशित।