पृष्ठ

बुधवार, 28 अगस्त 2013

एक हसरत भरी निगाह चाहिए !

28/08/2013 को जनसंदेश में !

 

देश की अधिकांश फाइलें नाराज़ हैं।इसकी वजह यह है कि कुछ फाइलों पर ज़रूरत से ज़्यादा रोशनी डाली जा रही है,जबकि वे युगों से धूल-धक्कड़ खा रही हैं।उन्हें उड़ते-उड़ते खबर मिली है कि कोयला-फाइलों पर टॉर्च मारी जा रही है । इसकी तात्कालिक वज़ह यह है कि वे अपने मूल स्थान से निकलकर अज्ञातवास को चली गई हैं।बची हुई फाइलें इस बात का शोक मना रही हैं कि वे सालों से बाबुओं और अफसरों की नाक के नीचे पड़ी हैं पर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।उन पर कोई टॉर्च तो क्या एक हसरत भरी निगाह भी डालने को तैयार नहीं है।उनकी बेचैनी इसलिए भी है कि वे अच्छी-खासी चिकनी-चुपड़ी हैं,पर सबकी नज़र से बची हुई हैं।उनके अंदर कई विकास-कार्यों की योजनाएं भरी-पड़ी हैं।अगर उन्हें भी बाहर निकलने का मौका दिया जाए तो देश कहाँ से कहाँ पहुँच जाए ! फ़िलहाल तो सारा देश उन कोयला-मुँही फाइलों के पीछे पड़ा है।

इन दबी हुई फाइलों के दर्द अलग-अलग हैं।कोई सीमा पर शहीद हुए उस युवा सैनिक की फ़ाइल है,जिसे सरकार ने पेट्रोल-पम्प आवंटित किया था तो कोई बेरोजगार युवा की है जो अब वृद्धावस्था-पेंशन की पात्रता पा चुका है।ऐसी फाइलें तो अनगिन हैं पर किसी बाबू की नज़र उस पर पड़ती ही नहीं।जिस फाइल पर रुपया गिरता है,वही चलायमान हो जाती है।जो फाइलें अभी ढूंढी जा रही हैं,उन पर तो कोयला गिरा है।उसे काला सोना भी कहते हैं।इस समय जब रोज रूपया गिर रहा है,सोना उछल रहा है,फाइलें भी कोयला-मुँही होना चाहती हैं,पर सभी का नसीब ऐसा कहाँ ?

विपक्ष इस बात पर संसद नहीं चलने दे रहा है कि गुम हुई फाइलों पर प्रधानमंत्री वक्तव्य दें।जिन फाइलों को बाबू तक भाव नहीं देते,उन पर प्रधानमंत्री अपना कीमती मुँह क्यों खोलें ?गुम हुई फाइलें साधारण नहीं हैं।पुरानी कहावत है कि ‘काजल की कोठरी में कैसो हू सयानो जाय,एक लीक काजल की लागि है पै लागि है’।ऐसा नहीं हो सकता कि प्रधानमंत्री के चतुर सलाहकारों ने इस कहावत को उन तक नहीं पहुँचाया हो।विपक्ष बिलावजह हल्ला मचाये हुए है।प्रधानमंत्री समझदार हैं इसलिए ‘एक चुप,हज़ार सुख’ पर अमल कर रहे हैं।  फ़ाइल ढूँढना वैसे भी सरकार का नहीं बाबुओं का काम है। वे बेचारे गिरे हुए रुपये को उठाने में व्यस्त हैं। इससे समय मिले तो फाइलें आगे बढ़ें !

अँधेरी कोठरी में बंद पड़ी फाइलें गुमसुम हैं पर आशावान भी। उन्हें लगता है कि गुम हुई फाइलों का एक न एक दिन पता चल जायेगा,तब उनको भी एक हसरत-भरी निगाह नसीब होगी।  

हिंदुस्तान में ०३/०९/२०१३ को

आओ,सब मिलकर खाते हैं !

28/08/2013 को जनवाणी में

 
 
खाना हर आदमी की ज़रूरत है ,इसे आखिरकार सरकार ने समझ लिया है इसीलिए उसने सबके खाने के लिए ‘खाद्य-सुरक्षा कानून ’पास होने को प्राथमिकता दी है।जल्द ही देश के सारे लोग खाते-पीते वर्ग में शुमार होने लगेंगे।वैसे यह योजना केवल गरीबों के लिए है क्योंकि सरकार को भी पता है कि बाकी लोग ख़ूब खा रहे हैं।ऐसे में समाज का कोई तबका खाने से वंचित रह जाय,यह जनता की सेवा के लिए मरी जा रही सरकार को कैसे सहन होता ?अपने नौ साल के कार्यकाल में पहली बार सरकार ने समाजवाद पर अमल किया है।अब सब मिलकर खायेंगे।
हमारे देश का विपक्ष किसी गैर-दुनिया में रहता है।उसे हर मुद्दे पर नाक-भौं सिकोड़ने की आदत हो गई है।उसे इस बात पर आपत्ति है कि यह ‘खाद्य-सुरक्षा’ नहीं बल्कि ‘वोट-सुरक्षा’ है।अब उसे कौन समझाए कि सरकार कोई भी काम बिना वोट के क्यों करेगी ? उसने कोई भंडारा थोड़ी ना खोल रखा है ! पेट तो सबके पास है,चाहे सरकार हो,नेता हो,पार्टी हो या आम आदमी।यह सरकार ज़्यादा समझदार है।वह पहले वोट खाएगी फ़िर और कुछ।विपक्ष चाह रहा है कि सरकार भूखी रहे ताकि उसका हिस्सा वो खा सके।सरकार अब इतनी अनुभवी तो हो चुकी है कि उसे यह काम स्वयं करना है।जनता को भी उसकी काबिलियत पर अब शक नहीं रहा।वह खाना ही नहीं कंकड-पत्थर,कोयला सब पचा सकती है।ऐसे हाजमे वाले की ही देश को ज़रूरत है।
हमारे देश में आज़ादी के बाद से सब खा रहे हैं।जहाँ नेता,माफिया,डीलर,अफ़सर,बाबू निर्विकार भाव से अपने पेट भर रहे हैं वहीँ गरीब आदमी लगातार लात खा रहा है।इस बात को सरकार ने गंभीरता से लिया है और इसीलिए यह योजना बनाई है।उसे यह घाटे का सौदा नहीं लगता।सरकार को पता है कि गरीब की थाली का खाना भी उसी का है।वह उसे अपनी जेब में डालने का जतन जानती है।विपक्ष को यही खटका है मगर वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है।सरकार के सहयोगी दल अभी से खाने की सुगंध पाकर पेट पर हाथ फेरने लगे हैं।गरीब आदमी भी दो-जून की रोटी के लिए अभी से सपने देखने लगा है।मगर इसके लिए उसे मतदान-केन्द्र तक आना होगा।आजकल सब कुछ वहीँ से तय होता है।
कुछ विशेषज्ञों को आशंका है कि इतने भूखों के लिए खाने का बजट कहाँ से आयेगा ? यह बिलकुल आधारहीन सवाल है।उन्होंने शायद वर्तमान हालात और मौसम का सही अध्ययन नहीं किया है।अबकी बारिश ख़ूब गिरी है और रुपया उससे भी तेजी से।अभी भी रुपया रोज़ गिर रहा है।सरकार रूपया बटोरकर उसका सदुपयोग करना चाहती है,इससे उसका और गरीबों,दोनों का भला होगा।आगे चुनावी-मौसम है,उसमें वोटों की बारिश की भरपूर सम्भावना है।सरकार मूर्ख नहीं है।वह सबको खिलाकर मुँह बंद करना चाहती है।भरे पेट मुँह खुलेगा ही नहीं।जब सत्ता-पक्ष और विपक्ष मिलकर अपने दाग और हिसाब साफ़ कर सकते हैं,तो मिलकर खा क्यों नहीं सकते ?हम तो यही आह्वान करते हैं कि आओ,अब हम सब मिलकर खाएं ! 

बुधवार, 21 अगस्त 2013

मंत्रजाप करें, टारगेट पूरा होगा !




                                                           21/08/2013 को जनसंदेश में !
 

वे बड़ी जल्दी में हैं.उन्होंने समय का इंतजार करने से बेहतर यह समझा कि लोग उनका ही इंतजार करने लगें.इसके लिए भले ही उनको लाल किला न मिला हो पर उन्होंने अपना भाषण लालन कॉलेज से देकर देश चलाने की अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया है.उन्होंने बोलने से पहले ही कह दिया था कि लोग दिल्ली और गुजरात की तुलना करेंगे.उन्होंने लोगों को समझा दिया है कि गुजरात का शेष भारत से सिर्फ तुलनात्मक महत्त्व है, गोया वह इस देश का हिस्सा न हो !

उनके भाषण पर खूब तालियाँ मिलीं .उनके ही बुजुर्ग नसीहत की छींक उनके लालकिला-अभियान को रोक पाने में असफल दिख रही है.इसीलिए जल्दी में ही एक सम्मिलित बैठक भी आयोजित कर ली गई ताकि टोकाटाकी करने वाले सावधान हो जांय .देश को बदहाली और मंहगाई से मुक्ति दिलाने के नाम पर जो लोग इकठ्ठा हुए थे वे जब बैठक से बाहर निकले तो सबके पास एक टारगेट था.उन्होंने अपने टारगेट को तो आज़ादी के दिन ही सबके सामने प्रकट कर दिया था पर बाकियों के लिए 272 का मन्त्र-जाप था.इसे हर सदस्य और कार्यकर्त्ता को चुनावों तक जपना है ताकि वे गिरते हुए देश को अपनी गोदी में उठा सकें .

कहते हैं कि किसी बात को यदि बार-बार कहा जाय तो वह सच हो जाती है,भले ही वह झूठ क्यों न हो.यही मान्यता मन्त्रों को लेकर चली आ रही है.भारतीय संस्कृति और धर्म के मानने वाले सबसे बड़े समर्थक उनके ही लोग हैं .ऐसे में नए मन्त्र ईजाद करना,पुरानों को झाड-पोंछकर जपने लायक बनाना इन सबकी कुशलता है.वे अपने दल के नए नायक हैं सो मन्त्र भी नए बनेंगे.मंदिर का मन्त्र अब निष्प्रभावी हो चुका है इसलिए राष्ट्रवाद का शंख सुनाई दे रहा है.आम चर्चा यही है कि वो आएंगे और जादू की छड़ी घुमाते ही पाकिस्तान और डॉन ,मंहगाई और भ्रष्टाचार सब उनके चरणों में लोटने लगेंगे.इस बात को उनके ही वरिष्ठ साथी नहीं मानते पर जनता यदि यह मंत्रजाप शुरू कर दे तो वे यह सब पलक झपकते ही कर डालेंगे.

अब इस देश और उसके रहने वालों को सोचना है कि उन्हें क्या चाहिए ?उन्होंने देश के सामने अपना एजेंडा तय कर दिया है.देश में विकास करने का वादा उन्होंने इसीलिए नहीं लिया है क्योंकि ऐसा तो कई लोग कर चुके हैं और उनका हो भी गया है.जनता यदि देश बचाना चाहती है तो उसे 272 की गिनती याद रखनी चाहिए.मंहगाई या भ्रष्टाचार दूर करना उनके टारगेट में नहीं है.वे तो बस चाहते हैं कि जनता उनके खीसे में 272 का नजराना डाल दे और वे देश-सेवा शुरू कर दें.उनकी इस सेवाभक्ति की आतुरता से जनता पूरी तरह ओत-प्रोत हो चुकी है और इस इंतजार में है कि कब चुनाव आयें और वह अपना काम कर सके.

अब वे करोड़ों की जनता का टारगेट बन चुके हैं और उनका टारगेट महज़ 272 है.यह बात अगर किसी को समझ नहीं आ रही है तो उनका मन्त्र-जाप करके देखे ,तुरंत काम करता है.


 

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

गरीबी जी अब मन से खुश हैं !

 
२०/०८/२०१३ को नेशनल दुनिया में !
 

नुक्कड़ पर अचानक गरीबी जी अमीरी जी से टकरा गईं । गरीबी जी रोज फुटपाथों और गलियों में टहला करती थीं पर अमीरी जी का सातवें तल्ले से नीचे उतरना कभी-कभार ही हो पाता था। इसलिए दोनों का जब आमना-सामना हुआ तो एकबारगी गरीबी जी भौंचक रह गईं । अमीरी जी ने गरीबी जी को दूर से ही पहचान लिया। वह ज़मीन पर धड़ाम हुए रूपये को उठा रही थीं,यह सोचकर कि ये ऊपर रहती हैं,इन्हीं का होगा। पर अमीरी जी ने गिरे हुए रूपये की ओर निहारा तक नहीं। उन्होंने पास खड़ी सकुचाती हुई गरीबी जी से मुखातिब होते हुए कहा,’कहो बहन ! आजकल तो सब जगह तुम्हारे ही चर्चे हैं। सरकारी योजनाओं और बड़े-बड़े अख़बारों में तुम खूब गिरी और बिखरी पड़ी हो ! जिसको देखो वही तुम्हारे ऊपर बयान झाड़ रहा है। हमारी तो खबर भी तभी आती है जब गलती से कहीं छापा पड़ता है या स्कैम खुलता है। दुखद यह है कि किसी भी खबर में हमारे साथ कोई नहीं है ;और तो और हमारा सगा भाई रुपया भी मुँह के बल गिरा पड़ा है। ’

गरीबी जी को पहली बार अपने होने पर गर्व हुआ। उनकी इतनी चर्चा है और वे इससे अनजान हैं। नरम लहजे में वे अमीरी जी से बोलीं,’ बड़ी बहन ! हम तो पहले से ही ज़मीन पर हैं । अब इससे नीचे तो जा नहीं सकते। आप ऊपरवालों को यह सहूलियत रहती है कि जितना चाहें ,नीचे गिर सकते हैं। आपको थामने के लिए रूपये की नहीं डॉलर की ज़रूरत पड़ती है। शुक्र है कि आपको डॉलर सँभाल लेता है,वर्ना गिरा हुआ रुपया भी हमें नसीब न हो। रही बात खबर में रहने की,सही बात तो ये है कि बड़े पन्नों में भले हमारी फोटू छपे पर हमारी खबर हाशिए में ही होती है। आप दिल छोटा न करें। हमारे चर्चे करके ही सरकार आपके लिए खर्चे का प्रबंध करती है। सुना है कि मनरेगा में हमारी दिहाड़ी बढ़ा दी गई है,अब आप ज्यादा खुशहाल होंगी। हमारा क्या है ,हम तो पाँच और बारह रूपये में अपना पेट भर लेते हैं पर आपकी तो पाँच-सितारा चाय भी सौ रूपये की बैठती है। इसलिए हमारे चर्चे से ज्यादा ज़रूरी आपका खर्चा है। ’’

‘पर तुम्हें तो अब ‘डाइरेक्ट-कैश’ दिए जाने की तैयारी है। ऐसे में हमारा जुगाड़ कैसे होगा ?’अमीरी जी अभी भी अपने भविष्य के प्रति आशंकित लग रही थीं। गरीबी जी ने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया ,’बहन ! अब आपको परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। हमारे हाकिम ने कहा है कि गरीबी केवल एक मानसिक दशा है। इसलिए हम भी निश्चिन्त हैं। आगे से जेब में पाँच रुपये होंगे तो मन में हम यह बैठा लेंगे कि पाँच सौ हैं। इस तरह ढाबे पर बैठकर हम पाँच-सितारा भोजन का मजा ले पाएंगे। यह सब आपकी कृपा से संभव हुआ है। ’ इतना सुनते ही अमीरी जी मुस्कराते हुए निकल गईं।
 

असली गिरावट यहाँ है !


हिंदुस्तान में २०/०८/२०१३ को

जब हर जगह उनके गिरने की खबर गर्म थी,शेयर बाज़ार और रूपये ने औंधे मुँह गिरकर उनकी लाज बचा ली। आम आदमी के लिए तीन सौ पैंसठ दिन ‘ब्लैक-डे‘ होता है पर बाज़ार ने उनके लिए एक दिन ‘ब्लैक फ्राइडे’ मना लिया तो हंगामा मच गया। देश में जिस समय लाल-किले में दिए प्रधानमंत्री के भाषण पर बहस होनी चाहिए थी ,वहाँ दलाल-पथ के भालू ने कब्ज़ा कर लिया। सारे विशेषज्ञ देश और दामाद को छोड़कर बाज़ार को बचाने में व्यस्त हो गए। उन्होंने अचानक आई इस गिरावट से राहत की साँस ली और वे फिर से गिरने की तैयारी में जुट गए।
एक तरफ जहाँ टमाटर और प्याज अपनी ऊँचाई के पिछले रिकॉर्ड सुधार रहे हैं,वहीँ रुपया सतह से भी नीचे जाने पर आमादा है। अख़बारों में इस बात की खबरें आ रही हैं कि निवेशकों का लाखों-करोड़ रुपया डूब गया। भोला-भाला आम आदमी इस खबर पर यकीन कर लेता है। वह भरी बारिश में नदी,नाले,गड्ढे में डूबे हुए रूपये को खोजता है पर खाली हाथ लौटता है। उसे तो तब धक्का लगता है जब पता चलता है कि इस खोजबीन में उसके टेंट में बंधा पाँच रूपये का नोट भी कहीं खिसक गया। रूपये को उठाना सबको आता भी नहीं,यह काम बड़ी कुशलता से किया जाता है।
आम आदमी भले अपना पाँच रुपया नहीं सँभाल पाता हो,पर उनको अपनी गठरी बचाने का पूरा अनुभव है। शेयर बाज़ार के विमुख होते ही वह सोने की शरण में चले जाते हैं। उन्हें गिरते हुए रूपये को सोने और डॉलर में तब्दील करने की कला खूब आती है। इसीलिए उनका हमेशा से यही मानना है कि रुपया उसी के पास होना चाहिए जो उसे सँभाल सके। यह भी हो सकता है कि इसी बात को आम आदमी को समझाने के लिए रुपया गिर रहा हो ! आखिर उबारना तो उनको ही है और उठाना भी। अगर भूलचूक से या सरकारी सब्सिडी या डायरेक्ट-कैश के ज़रिये रुपया किसी तरह आम आदमी के खीसे में पहुँच भी गया तो उसे भी ‘वो’ अपने बोरे में भर लेते हैं।
ऐसा नहीं है कि सब जगह गिरावट का ही बोलबाला है। इस बात को वे समझते हैं; तभी सब्जी,दाल और पेट्रोल-डीजल को हिदायत है कि वे बराबर बढ़ते रहें। गिरने के लिए देश में चरित्र ,ईमान और नैतिकता की कोई कमी नहीं है। उन्होंने उसे बाज़ार की गिरावट के बराबर कर दिया है। रुपया इसीलिए नहीं उठ पा रहा है क्योंकि उसने ईमान से होड़ ले रखी है। वे इस बात का ज़रूर ख्याल रख रहे हैं कि इस मुकाबले में उनका ईमान रूपये से पीछे न रह जाए। आने वाले समय में यदि रुपया और गिरता है तो उसकी चिंता न करें बल्कि यह सोचें कि इसके लिए बेचारे ईमान को कितना गिरना पड़ा होगा !
 

 जागरण आई नेक्स्ट में २०/०८/२०१३ को !

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

हम कर सकते हैं !


 
15/08/2013 को कल्पतरु में !
विपक्ष के संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नेता ने हाल ही में एक बड़ी रैली में आह्वान किया है कि ‘यस वी कैन’ यानी ‘हम कर सकते हैं’। इस नारे पर पूरा देश झूम गया है। ऐसा नहीं है कि यह नारा उन नेता ने इजाद किया हो,पर आज वो जो भी कहते हैं,खबर बन जाती है। इसी तरह का आह्वान करके ओबामा ने अमेरिकी चुनाव जीत लिया। उन्होंने चुनाव जीतने के बाद पाकिस्तान के अंदर घुसकर ओसामा को मारकर वाकई करके दिखा दिया । अमेरिकियों को अभी भी उन पर भरोसा है कि उसको मारने के बाद वे उनकी बेरोज़गारी और आर्थिक बदहाली की भी सुध लेंगे। उनका इंतज़ार अभी ज्यादा लंबा नहीं हुआ है पर अब वह नारा अमेरिका के लिए अप्रासंगिक हो गया है।

हमारे देश के लिए यह नारा तो नया है पर इस पर अमल बहुत पहले से हो रहा है। आज़ादी के बाद से ही सत्तारूढ़ दल और उसके नेता जी-जान से देश के लिए करने में जुटे हुए हैं। न जाने कितनी पनडुब्बियाँ,हेलीकॉप्टर,तोपें इस काम में लगाई गईं पर विरोधियों ने इसे घोटाले और स्कैम का नाम दे दिया। सत्ता चलाना आसान काम नहीं है। बेचारों ने खेल,कोयला,पत्थर,ज़मीन यानी जल,थल और नभ हर जगह किया। इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं बरता गया,बालू और कफन को भी बराबर सम्मान मिला। यह काम इतनी व्यापकता से हुआ कि दफ्तर का हर बाबू,अफसर,चपरासी तक इसमें निपुण हो गया। ऐसे सनातन-काल से चले आ रहे फार्मूले को आज नारा बनाना हास्यास्पद नहीं तो क्या है ?

विपक्ष के लोग तो केवल कहने भर के हैं,उनकी सुनता कोई नहीं है। कुछ समय पहले विपक्ष के ही नेता द्वारा नारा दिया गया था,’सबको देखा बार-बार,हमको परखो एक बार’ और जनता ने उनके नारे को सही मान लिया। वे एक बार के लिए ही आ पाए क्योंकि जनता ने उनकी ही बात पर अमल किया। अब वे उस नारे को फिर कभी दुहरा नहीं पा रहे हैं। यहाँ तक कि अब नारे के साथ उनकी उम्मीदवारी भी हवा हो गई है। यानी आज के नारे के हिसाब से ‘वो नहीं कर सकते’।

यह भी हो सकता है कि ‘हम कर सकते हैं’ का नारा जनता को यह विश्वास दिलाने के लिया दिया गया हो कि जो दूसरे कर सकते हैं,वो भी कर सकते हैं। यह बात इसलिए भी तर्कसंगत लगती है क्योंकि जनता कई सालों से ऐसी ‘करनी’ पसंद करती आ रही है। अपनी रैली में टिकट लगाकर उस नेता ने कार्यकर्ताओं  को यह सन्देश दे दिया है कि उनका भविष्य सुरक्षित है,वे अपने कैरियर को लेकर चिंतित न हों।

‘हम कर सकते हैं’ एक नारे के बजाय सूत्रवाक्य अधिक है। इस देश में सब अपना-अपना काम चुपचाप कर रहे हैं। जनता ने भी जिस दिन इसे नारे की तरह न लेकर अपना सूत्रवाक्य बना लिया,समझिए वह भी कर सकती है। हमारे यहाँ सबसे समझदार नेता ही हैं। अपने काम की हर बात वो बखूबी समझते हैं। इस समझ के मुताबिक ज़रूरी हुआ तो संसद चलती है और ज़रूरी हुआ तो ठप्प हो जाती है। जो भी कानून उनकी राह में रोड़ा बनता है उसे बदल सकते हैं। इस सबके पीछे ‘हम कर सकते हैं’ का ही सूत्रवाक्य काम करता है। अब एक नेता को जज बदलने की बहुत दरकार थी,पर अभी इसमें सफलता नहीं मिली है। वह दिन दूर नहीं जब नेता कानून ही नहीं,जज भी बदल सकेंगे। वही दिन वास्तव में ‘हम कर सकते हैं’ को चरितार्थ करेगा।

बुधवार, 14 अगस्त 2013

प्याज से परहेज करिये !

जनवाणी में १४/०८/२०१३ को !
१४/०८/२०१३ को जनसंदेश में.

 
टमाटर आज खस्ताहाल है। प्याज बल्लियों उछल रहा है। थोड़े दिन पहले जब लाल टमाटर अपनी कीमतों से लोगों को फटेहाल कर रहा था तब भी प्याज दुखी नहीं था। उसे अपनी कीमत और प्रतिभा पर पूरा भरोसा था। वह जानता था कि टमाटर का उछलना केवल मौसमी होता है। बाकी समय तो उसे नाकारा नेताओं और फूहड़ शायरों पर ही फेंका जाता है। प्याज इस मामले में भाग्यशाली है। जब भी उसकी कीमत घटने लगती है या वह सड़ने लगता है,साँप के केंचुल की तरह अपना छिलका उतारकर नए भेष में आ जाता है। लोगों को लगता है। टमाटर ऐसा नहीं कर सकता। वह सड़ने पर सड़क पर ही जाता है। प्याज हमेशा ताज़ा और टिकाऊ होता है । इस तरह वह अपने मनमाने दाम वसूलता है जबकि टमाटर निर्दलीय की तरह एक कोने में पड़ा सही मौके की तलाश में लगा रहता है।

प्याज का भाव बढ़ाने में सरकार विशेष ध्यान रखती है। खासकर चुनावों के समय उसे पता होता है कि जनता पिछले पाँच साल से रो रही है और उसके पास और कुछ हो न हो,आँसुओं का असीमित भंडारण होता है। यही जनता अगर चुनावों के समय रोती रहेगी तो फिर सरकार को रोना आ जायेगा। सरकार के अनुसार जनता की आँखों में आँसू लाने का जिम्मेदार यह प्याज है,इसलिए ऐसे मौके पर इसकी कीमत इतनी बढ़ जाती है कि कोई रो भी न सके। प्याज के अलावा सरकार की इस योजना का किसी को नहीं पता रहता है।

आखिर प्याज पर ही मँहगाई क्यों मेहरबान रहती है,इसका भी सीधा-सादा हिसाब है। दूसरी सब्जियाँ भले ही सरकार को बिना माँगे अपना समर्थन देती हों,पर जब बारिश जैसी आपदा आती है,उस वक्त केवल प्याज ही अपना छिलका उतारकर सुरक्षित रखता है और मँहगाई से रोती जनता को अपना कंधा देता है। प्याज ने कई बार अपनी उपयोगिता सिद्ध की है। इसकी उछल-कूद से सरकार तक बदल जाती है। इसलिए टमाटर का रोना सरकार के लिए सिरदर्द नहीं है। जनता द्वारा नेताओं,मंत्रियों पर वार करने के लिए इससे नरम हथियार अभी तक मिल नहीं पाया है। सोचिये,अगर चुनावी-मौसम में प्याज सस्ता हो जाए तो कितनों के सर फूटेंगे ?

प्याज से टमाटर का कोई जोड़ नहीं है। प्याज के मँहगे होने पर सीधी-सादी जनता इसे खाने से ही परहेज शुरू कर देती है। नवरात्र के दिनों में वैसे भी प्याज नहीं खाया जाता,सो बाकी दिनों को भी देवी के नाम पर कुर्बान करने में क्या हर्ज है ?प्याज न खाने के फायदे और भी हैं। इससे मुँह की दुर्गन्ध से मुक्ति मिलती है और जेब के हल्के होने की आशंका भी नहीं रहती। इसलिए प्याज अगर मँहगा होता है तो सरकार को जनता के आँसुओं से राहत मिलती है और जनता की कमाई सलामत रहती है। इसलिए प्याज के कीमती होने पर जनता के लिए जश्न का मौका है। सरकार भी इस बहाने अपने ठेलों से प्याज बेचती नज़र आएगी ताकि सबको यह लगे कि सरकार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है,वह काम भी करती है।

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

देश में गंभीर टोपी-चिंतन


 


रहमान मियाँ के घर से ईद की दावत खाकर जैसे ही घर पहुंचा,श्रीमती जी मुझे देखकर घबड़ा गईं। वे एकदम से बोल पड़ीं,’यह क्या गज़ब कर दिया ? आपने भी टोपी पहन ली ?’मैंने विस्मित होते हुए पूछा,’क्यों ,क्या हुआ ? रहमान भाई ने ईद-मिलन के मौके पर यह खूबसूरत टोपी पहनाई है। इसमें हर्ज ही क्या है ? होली पर जब वो हमारे यहाँ आते हैं तो हम भी उन्हें अबीर-गुलाल लगाते हैं। वो तो कभी बुरा नहीं मानते।

श्रीमती जी ने अपनी चिंता का खुलासा करते हुए कहा,’ टीवी में गंभीर टोपी-चिंतन चल रहा है। लोग इस बात को लेकर भिड़े हुए हैं कि एक नेता ने टोपी पहन ली। मुझे लगा कि टोपी पहनना कोई बड़ी समस्या है। उससे कोई आफत या बड़ी मुसीबत आने वाली है। क्या सचमुच में ऐसा है ?’। बात पूरी तरह मेरी समझ में अभी भी नहीं आई थी। मैंने अपनी टोपी उतारकर श्रीमती जी को पकड़ाई और सीधे जाकर टीवी के सामने बैठ गया।

सब जगह टोपी-विमर्श हावी था। सबसे आगे रहने  वाले समाचार चैनल पर दो नेता गंभीर टोपी-विमर्श में व्यस्त थे। एक तरफ हमेशा टोपी लगाने वाले नेता थे तो उनके सामने वे नेता थे जिन्होंने आज ही टोपी लगाई थी। हमेशा टोपी लगाने वाले नेता जी ने सवाल किया,’अजी ,आपने आज ही टोपी क्यों लगाई ? पिछले नौ सालों से आप क्या कर रहे थे ? अब जब चुनाव आ रहे हैं तो झट से टोपी पहन ली । ऐसे में सवाल तो उठेगा ही। अचानक टोपी लगाकर सुर्ख़ियों में आये नेता जी बोले,’देखिये ,आप आज़ादी के बाद से टोपी लगा रहे हैं,हमें बुरा नहीं लगा। हमने एक दिन लगा ली तो आपको परेशानी हो रही है। हम तो अब टोपी लगाकर ही रहेंगे। आप जितना चिल्लायेंगे,यह टोपी उतनी ही कामयाब होगी

अनुभवी टोपी-धारक नेता जी फिर भी मानने को तैयार न थे। वे कहने लगे,’आप जिसे प्रधानमंत्री बनाने के लिए तैयार हैं,वो तो टोपी से डरते हैं। टोपी लगने की आशंका से ही साफा पहन लेते हैं। ऐसा व्यक्ति जो टोपी लगाना नहीं चाहता,क्या खाक देश चला पाएगा ? टोपी लगाने का पेटेंट हमारे नाम है और इसका आप सीधा-सीधा उल्लंघन कर रहे हैं। ताज़ा टोपी लगाने वाले नेता जी अब जोश में आ गए थे,कहने लगे,’हम टोपी लगाने को लेकर दोनों विकल्प खुले रखते हैं। जब जैसी ज़रूरत होती है,वही अपना लेते हैं।  हम टोपी लगाने और न लगाने वाले दोनों के साथ हैं। जैसे ही हमें जानकारी मिली कि टोपी लगाने वाला ही टॉप रहता है तो लगा ली। अब ये भी गुनाह है ?’

टोपी वाले नेता ने मेज पर मुक्का मारते हुए कहा,’फिर आप लोगों ने थोड़े दिन पहले टोपी पहनने वाले नेता से नाता क्यों तोड़ लिया ?वह तो टीका लगाने को भी तैयार था। एकदिनी टोपी वाले नेता जी ने आवाज़ में सख्ती लाते हुए कहा ,’हम बगैर टोपी लगाये बहुत रह लिए ,अब लगाने का अनुभव लेंगे। टोपी लगाने पर आपका एकाधिकार नहीं है

विमर्श लम्बा खिंच रहा था। श्रीमती जी ने तभी आवाज़ दी,’अजी,कुछ पता चला ?’मैंने टीवी ऑफ करते हुए कहा,’तुम चिंता न करो,उनकी टोपी सियासी है ,जबकि हमारी वाली आपसी भाई-चारे की। इससे किसी का नुकसान या फ़ायदा नहीं होगा।

 
राष्ट्रीय सहारा में १३/०८/२०१३ को प्रकाशित

अपनी-अपनी गंध !



१३ /०८/२०१३ को नई दुनिया में !
 

चुनाव सिर पर सवार थे और नेता जी गाड़ी पर। वे अपने क्षेत्र का ताबड़तोड़ दौरा करने में जुटे थे ।दिन शुरू होते ही उनकी गाड़ी सरपट भागने लगी ।गाँव में गाड़ी के इर्द-गिर्द वोटर कम बच्चे ज़्यादा दिखे तो नेता जी ने विश्वस्त कारिंदे से इसका कारण पूछा उसने बताया कि अधिकतर बड़े-बूढ़े ‘मनरेगा’ में लगे हैं पर वोट देने ज़रूर आएँगे।नेता जी की हार्दिक इच्छा थी कि वे अपने मतदाताओं से जी भरकर मिल लें ,पता नहीं दुबारा कब भेंट हो ? कारिंदे ने ज्ञानवृद्धि की ,’आपके पिछले जन्मदिन पर सरपंच जी ने जो थैली चढ़ाई थी,वह ‘मनरेगा’ द्वारा ही प्रायोजित थी।इस वक्त सरपंच जी अपने खेत में धान की बेढ़ लगवाकर उसी की क्षतिपूर्ति कर रहे हैं।‘ नेता जी समझदार थे,उन्होंने गाड़ी को दूसरी तरफ मोड़ने के लिए कह दिया।

गाड़ी अब कच्चे रस्ते की ओर चल पड़ी।थोड़ी दूर ही चली होगी कि ड्राईवर ने फरमान सुना दिया कि अब यह आगे नहीं जा सकती।नेता जी ने जैसे ही वातानुकूलित गाड़ी का दरवाजा खोलकर अपने चरण धरती पर धरे,नथुनों ने साँस लेने से इंकार कर दिया।यह क्या ?सामने कूड़े का बजबजाता हुआ ढेर था,जिसमें  कुत्ते खाने का सामान तलाश रहे थे।नेता जी ने कारिंदे की ओर निहारा, ’यह कहाँ ले आए हमें ? अगर दो मिनट भी यहाँ रुके तो बेहोशी आ जायेगी। चलो यहाँ से,दम घुट रहा है।’

उसने नेताजी के कान में मंतर फूँका,’यह यहाँ की मशहूर दलित बस्ती है।पिछली बार आप यहीं से मिले वोटों से जीते थे।अगर यहाँ न गए तो चुनाव फँस जायेगा।मेरी माने तो थोड़ी देर के लिए यह गंध सहन कर लें,पूरे पाँच साल तक सुवासित रहेंगे ।’

‘मगर पिछली बार के वादे के बारे में क्या कहूँगा ? हमें याद आ रहा है कि तब हमने यहाँ एक स्कूल की बात की थी।’नेताजी तनिक सकुचाते हुए बोले।

‘आप उसे भूल जाइए।ये लोग उसे कब का भूल गए ।इस कूड़े के ढेर को हटाने का वादा अबकी बार कर लें,यह बिलकुल सामयिक है।’ कारिंदे ने चमचत्व की प्रखर प्रतिभा का परिचय देते हुए समाधान सुझाया।नेताजी को उसकी बात में दम दिखा और वे उसके साथ आगे बढ़ गए।

दलित-बस्ती में अचानक शोर मच गया।सभी मतदाता अपने दड़बेनुमा आश्रय-स्थल से निकल आए।सबके इकठ्ठा हो जाने पर कारिंदे ने ऐलान किया कि नेताजी उनके लिए खुशखबरी लाये हैं।इससे पहले कि कोई कुछ पूछता,नेताजी ने माइक अपने हाथ में लिया और शुरू हो गए,’हमारे पास इस कूड़ेदान को हटाने की बड़ी योजना है।हम यहाँ एक बैंक खोलने जा रहे हैं जिसमें ’मनरेगा’ सहित अन्य योजनाओं का पैसा हमारे हाथ से सीधे अब आपके खाते में आएगा।‘ तभी एक बुजुर्ग बोल पड़ा ,’मगर सरकार ! हमें ताज़ी हवा और पीने का साफ़ पानी मिल जाता तो...!’ बात को बीच में ही काटकर नेताजी ने कहा,’पहले खातों में पैसा आने दें,हमारी सरकार फ़िर से बनने दें, हवा और पानी भी मिल जायेगा ।‘ बुजुर्ग ने इतना सुनते ही ‘नेताजी जिंदाबाद’ का नारा लगाया और सारा माहौल नेतामय हो गया।कूड़ाघर वाली सड़ांध कहीं गुम-सी हो गई थी। यह एक नई प्रकार की गंध थी,जिसे महसूसकर नेताजी बिना फूले ही कुप्पा हुए जा रहे थे।

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

हम बहुत लोकप्रिय हैं !

08/08/2013 को हरिभूमि में !


देखिये जी ,हमारे पास एसएमएस आ रहे हैं कि हमारी लोकप्रियता उतार पर है,इस बात को हम अफ़वाह मानकर रद्द कर रहे हैं।हम ‘इंडियन आइडल’ की तरह एसएमएस भेजकर मुख्यमंत्री नहीं बने हैं।हमारी जनता ने हमें पाँच साल के लिए चुना है और यह चुनाव के द्वारा ही साबित होगा कि हम कैसे हैं।हमें एसएमएस भेजकर या मीडिया(प्रिंट,सोशल,इलेक्ट्रॉनिक)के द्वारा अलोकप्रिय सिद्ध करना केवल विरोधियों की साजिश है।कुछ लोगों को युवा मुख्यमंत्री की प्रगति से जलन हो रही है इसलिए आये दिन अपनी ताक में लगे रहते हैं।जब देश चलाने वालों को कोई रोक-टोक नहीं है तो हम प्रदेश वाले ही क्यों रुकें ?

अपने अफसरों को कसना हम अच्छी तरह से जानते हैं।हम आईएएस ना हुए तो क्या ,इन पर नकेल लगाने की हमारी पुश्तैनी ट्रेनिंग होती है।वैसे तो सरकार के सारे पुर्जे बाई-डिफॉल्ट उसी के साथ होते हैं,फिर भी एकाध पीस अगर खराब निकल जाता है तो उसकी मरम्मत का इंतजाम भी हमारे पास है। हम तो कहते हैं कि बड़े अफसरों की उत्तम प्रदेश को ज़रूरत ही नहीं है।हमारी पार्टी के कार्यकर्त्ता बेहद उत्साही हैं।वे कानून-व्यवस्था का सारा काम स्वयं अपने हाथ में ले सकते हैं।जनता की सेवा में कहीं खोट न रह जाए इसके लिए हमने चाक-चौबंद व्यवस्था की हुई है।जहाँ हमारी युवा टीम में नवाब व राजा सरीखे बेहद अनुभवी लोग हैं,वहीँ शासन को घर-परिवार का अहसास दिलाने के लिए दो-दो चाचा हर समय सेवा के लिए तत्पर रहते हैं।इन सबसे ऊपर हमारे नेताजी हैं जो हमें बराबर मार्गदर्शन देते रहते हैं।हम प्रदेश की इतनी सेवा करना चाहते हैं कि नेता जी देश की सेवा करने लायक बन जांय।बस यही हमारा मिशन है।

हम पर घटिया आरोप लगाये जा रहे हैं कि हम रेत से पैसा बनाने वालों के साथ हैं।यह इलज़ाम हास्यास्पद है।हमें रेत से तेल निकालने की क्या ज़रूरत जब पूरी घानी ही हमारे पास है।सबसे बड़ी बात यह है कि जनता ने हमें इसलिए चुना है कि हम उसे लैपटॉप और साइकिल बाँटें,तो हम घानी तो पेरेंगे ही।अब इस पिसाई के बीच में कोई अफसर आये या आम आदमी,उसकी गलती है।जनता हमें चुनती है और हम जनता के पैसे को।इसलिए अगली बार दाना डालने के लिए तैयारी अभी से जारी है।हमें कोई अफसर थोड़ी ना वोट देता है,फिर हम अपने लक्ष्य को पाने के लिए उसकी फ़िक्र क्यों करें ?

अफसर तो हमारे चाकर होते हैं।अमूमन वे हमारे सामने साष्टांग या दंडवत की मुद्रा में आते हैं पर अगर किसी को ईमानदारी की बीमारी हुई तो हम झाड़-फूँक से उसका इलाज़ करवा देते हैं।इस क्रिया में हमारे कार्यकर्त्ता सभा में ताल ठोंककर ललकारते हैं और उस अफसर को शांति–सौहार्द बनाए रखने का पाठ भी पढ़ाते हैं।साथ ही,हमारे मंत्री और सहयोगी बयान दे-देकर कई नए सच उजागर करते हैं।

हम बता दें कि हमारे प्रदेश के मसले निजी मसले हैं।अगर केन्द्र को ज्यादा तकलीफ है तो वह अपने अफसर अपने पास तोता बनाकर रख ले।हम तो उसके प्रधानमंत्री के बिना भी अपना काम चला सकते हैं,हमारे पास अपने नेता जी हैं।इस सब की वज़ह यह है कि हम घने लोकप्रिय हैं।

 

बुधवार, 7 अगस्त 2013

दल हिसाब रखते हैं,देते नहीं !

Welcome To Jansandesh  Times: Daily Hindi News Paper
 'जनसंदेश टाइम्स' में ०७/०८/२०१३ को प्रकाशित

बहुत लोगों के पेट में इस बात पर मरोड़ उठ रहा है कि राजनैतिक दल अपनी सूचना क्यों छिपा रहे हैं ? उन्हें इतनी सी बात समझ नहीं आती कि राजनैतिक दल तो आम जनता की सेवा के लिए गठित होते हैं। उनके पास अपना कुछ नहीं होता। जो होता है,सब जनता का ही होता है। अब जनता अपने ही पैसे का हिसाब मांगे,यह न तो तार्किक है और न उचित। यह क्या कम है कि गरीब जनता से मिले थोड़े से धन से वे बेचारे देश-सेवा कर लेते हैं वर्ना इतनी मंहगाई में तो आम आदमी का खुद का गुजारा नहीं चल पा रहा है।

सभी दल विचारधारा के नाम पर भले ही अलग हों पर आचार के मामले में वे भारत की विभिन्नता में एकता के ही परिपोषक हैं। किसी दल की कितनी आय,कितना व्यय है,इससे आम आदमी को क्या मतलब ?उसे सत्ता-दल द्वारा तेंतीस या सत्ताईस रूपये में अमीर बनाने की जादुई कला भी नहीं सीखनी । यह उसके बस की बात भी नहीं है। सभी दलों के रोज़ाना के कितने खर्चे होते हैं,यह हिसाब रखना आसान काम नहीं है। उनके दफ्तरों के एक दिन की चाय-पानी का बजट ही आम आदमी की वार्षिक आय के बराबर होता है। गौरतलब बात है कि यह खर्चा भी आम आदमी के नाम ही लिखा जाता है।

आलोचना करने वालों को केवल आलोचना करनी है। उन्हें यदि कभी चुनाव लड़ना पड़े तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जायेगा। उनकी सात पुश्त की कमाई भी जायेगी और जमानत भी। वैसे भी चुनावों में सफ़ेद धन कभी फलता नहीं। हमारे नेता केवल जनसेवा के लिए धन की कालिख को अपने मुँह पर चुपड़ते हैं तब कहीं जाकर बाकी जिंदगी को रंगीन बना पाते हैं। क्या आम आदमी ऐसा जोखिम उठा सकता है ? चुनाव में जनता की पाई-पाई, थोक में जनता को ही वापस की जाती है। अगर वो सब चाह लें तो चुनावों के समय भी जनता को ठेंगा दिखा सकते हैं पर उन्हें जनता से बेहद लगाव है। सभी दल हर चुनाव के समय अपनी गाढ़ी कमाई को पाँच साल के लिए फिक्स-डिपॉजिट में डालते हैं। इसमें जितना बड़ा फ़ायदा है,उतना ही जोखिम भी। जहाँ कई बार उनकी रकम डूब जाती है तो वहीँ कई बार अथाह धनराशि में वे खुद डूब जाते हैं।

सभी दलों का आरटीआई के मामले में एक सुर में बोलना इस लिहाज़ से भी बड़ी उपलब्धि है कि हमारे यहाँ लोकतंत्र और राजनीति का भविष्य उज्ज्वल है। हमेशा एक-दूसरे की टांग खींचने वाले जब यकायक मौन हों जाएँ तो समझिए देश को कहीं और से खतरा नहीं है। यह चुप्पी बताती है कि हमारे नेता केवल बयान-बहादुर ही नहीं,गज़ब के मौन-साधक भी हैं। संसद को पवित्र मंदिर समझने वालों की निष्ठा और आस्था पर हमें तनिक भी संदेह नहीं होना चाहिए। वे उसकी पवित्रता को बनाए रखने के लिए कृत-संकल्प हैं। सत्ता-पक्ष और विपक्ष की यह जुगलबंदी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अब ये साथ मिलकर जुगाली करेंगे। वे जो भी खाते हैं,जनता के लिए ही ,इसलिए खाते का या खाने का हिसाब मांगना निहायत असंगत और अन्यायपूर्ण है। आम जनता को मुफ्त के मोबाइल और खाना परोसने वालों से हिसाब-किताब करना ऐसा ही है जैसे कोई भक्त अपने भगवान से उसको चढ़ाये हुए प्रसाद का ब्यौरा माँगे। इस बात को सभी दल समझते हैं सिवाय नादान जनता के। खुशी इस बात की है कि नेता अपना हर काम पवित्र मंदिर से ही अंजाम देते हैं,इसलिए उनको कोई पाप भी नहीं लगता।

'जनवाणी' में  ०७/०८/२०१३ को प्रकाशित

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

हम दागियों के साथ हैं !


इस समय ‘लागा चुनरी में दाग छुटाऊँ कैसे’ गाना रह-रहकर याद आ रहा है ,साथ ही उसकी निरर्थकता भी। कभी दाग लगने को लेकर बड़ी चिंताएं और आशंकाएँ व्यक्त की जाती थीं,दागियों का जीवन नर्क  बन जाता था । आज़ादी के बाद हमारे देश ने और क्षेत्रों की तरह दाग छुटाने के मामले में भी  उल्लेखनीय प्रगति की है। पहले दागी अपने दामन से मुँह को छिपाने का असफल प्रयास करते थे,पर नए दौर में  छाती-ठोंक कर टैटू की तरह दाग दिखाते हैं। दरअसल,जब से दागी होना कला और कुशलता में शुमार हुआ है,हमारे समाज में मुँह छिपाने वालों की संख्या बेहद कम हुई है। ऐसे में अल्पसंख्यक हो रही बेदाग-प्रजाति से कभी-कभार सत्ता और राजनीति को खतरा हो जाता है पर हमारा लोकतंत्र बहुत परिपक्व और मज़बूत हो चुका है । वह अब सत्ता और राजनीति के दाग भी इस विलुप्त हो रही प्रजाति के मत्थे मढ़कर अपनी उजास बढ़ा लेता है।

हाल में देश के बड़े न्यायालय ने दो साल की सजा पाए माननीयों को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया,साथ ही ताकीद भी की कि यदि ऐसा कोई सांसद या विधायक है तो उसकी सदस्यता समाप्त समझी जायेगी। न्यायालय ने हमारे लोकतंत्र को समझने में ज़रा सी चूक कर दी। उसे यह समझना चाहिए कि यदि ऐसा हुआ तो फिर देश को कौन संभालेगा,उसकी संसद तो वीरान हो जायेगी। जब माननीय ही संसद में नहीं घुस पाएंगे तो कानून कौन बनाएगा ?बिना कानून के न्यायालय भी क्या करेगा ? माननीयों का संसद-प्रवेश वैसे ही है जैसे पुजारियों का मंदिर जाना। अब भला बताओ,बिना पुजारी के पूजा कैसे होगी ? भक्तों के लिए प्रसाद कौन बाँटेगा ?

ऐसी आपात-स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने यह तय किया है कि देशहित और जनहित में वह कानून सुधारेगी। प्रसन्नता की बात यह है कि इसमें भयंकर सर्वानुमति है। हर दल देश-सेवा करने को आतुर है और इस काम में जो भी बाधक बनेगा,उसको ठीक कर दिया जायेगा। यदि कोई अपराध क्षेत्र से राजनीति में आया है तो उसका पुनर्वास करना सरकार की प्राथमिकता है। यदि वह ऐसा नहीं करती है तो सोचो,गरीबों के लिए योजनायें कौन बनाएगा,उनकी सब्सिडी का क्या होगा ?सरकार की सोच है कि जो सेवा करता है,दाग उसी पर लगता है,ठीक उसी तरह जैसे होम करते हाथ जलते हैं।

हम तो सरकार को यह सुझाव देते हैं कि वह संसद और विधानसभाओं की पात्रता में भी लगे हाथों संशोधन कर दे। इसमें वे ही लोग चुनकर आएँ जो चुन-चुनकर खाने और मारने में कुशलता रखते हों। आम आदमी एकठो रूमाल तो सहेज नहीं पा रहा ,बड़े-बड़े दाग क्या ख़ाक धोएगा ?विधायिका की सदस्यता तो पारसमणि के समान है,जिसे छूकर पत्थर भी कंचन हो जाता है। ऐसे में दागी नेता भी तपे-तपाये होते हैं और हमें इनकी शुद्धता पर प्रश्नचिह्न लगाने का कोई अधिकार नहीं है ।  


'जागरण आई नेक्स्ट ' में 'खूब-कही '6/08/2013 को
 
 

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

देश-सेवा के लिए टेंडर !

2/8/2013 को हरिभूमि में !
कल्पतरु एक्सप्रेस में 01/08/2013  को

जनवाणी की रविवाणी  में ०४/०८/२०१३ को Photo: जनवाणी में आज की रविवाणी .....सूचना दी निर्मल गुप्त जी ने।


देश-सेवा को ठेके पर देने का आयोजन चल रहा था। हाईकमान जी इस नाते बहुत व्यस्त थे फ़िर भी  वे चौकन्ने और सक्रिय दिख रहे थे। अपने मातहतों से वे पल-पल का अपडेट ले रहे थे। ऐसा आयोजन पाँच या छः साल में एक बार आता है इसलिए गहमागहमी ज़्यादा थी। यह आयोजन कई लोगों की मुरादें पूरी करने वाला होता है। हाईकमान ने किसी भी अव्यवस्था से बचने के लिए काफ़ी-कुछ पहले से ही तय कर रखा था पर ठेके का अंतिम सूचीपत्र यहीं तैयार होना था। सबको अपना-अपना वज़न साबित करने का बराबर मौका मिल सके,इसके लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। इसका फौरी फायदा यह था कि हर बन्दा अपना वजन बेझिझक दिखा सके। सारा आयोजन हाईकमान जी के विशेष कक्ष में नियत समय पर शुरू हुआ।

विशेष कक्ष के बाहर एक बड़ा-सा तम्बू लगा था,जिसके नीचे सारे संभावित जनसेवक इकठ्ठा थे। हाईकमान के भरोसेमंद लोग उनसे दसबंद-जैसा कुछ लेकर कक्ष में जाने की पात्रता प्रदान कर रहे थे। अंदर हाईकमान जी के अलावा दो सहयोगी भी थे,जो इस चयन-प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग दे रहे थे। साक्षात्कार की शुरुआत एक मोटे जनसेवक से हुई। उनकी आँखों से देश-सेवा की ललक टपककर बाहर आने को आतुर थी। हाईकमान जी ने सहयोगी से उनकी समर्पण-भावना का मूल्यांकन जानना चाहा। सहयोगी ने निवेदन किया,’ये हमारे बड़े पुराने कार्यकर्त्ता हैं। पिछली बार के चुनाव में इन्होंने पार्टी के सेवकों पर पचास करोड़ खर्च कर दिए थे। अब जब इनके ही हाथों देश-सेवा करने की बात है,सौ करोड़ तो आराम से निछावर कर देंगे। ’हाईकमान जी ने उनको ऊपर से नीचे तक निहारा। जब उनको लगा कि वाकई उनकी देह देश-सेवा का बोझ उठा लेगी तो सवाल किया कि वे कितना गिर सकते हैं ?संभावित जनसेवक ने पूरी सहजता से उत्तर दिया,’जितना आप कयास लगा सकते हैं उससे भी दो इंच ज़्यादा । ’ ‘पर आप यह सब कैसे करेंगे ? हाईकमान जी ने शंकित नजरों से उनकी ओर देखते हुए पूछा।

अब संभावित जनसेवक खुलकर बोलने लगे। उन्हें हर हाल में देश-सेवा करनी थी । यह मौका गंवाने का जोखिम वे नहीं उठा सकते थे। उन्होंने अपनी बात को साफ़ किया,’ मैं गिरने –गिराने के खेल का माहिर खिलाड़ी हूँ। बचपन में कबड्डी खेलते हुए मैंने कई बार साथियों को टंगड़ी मारकर गिराया था । थोड़ा समझदार होने पर सड़कों की ठेकेदारी पाने के लिए विरोधियों को गिराया। कोतवाल से मिलकर कई दुश्मनों को एनकाउंटर में गिराया। दरअसल ,मैं पैदाइशी गिरा हुआ हूँ। जब से सुना है कि रुपया बहुत गिर गया है तो उसे उठाने को बेचैन हूँ। इस काम के के लिए मुझ गिरे हुए से ज़्यादा उपयुक्त कौन होगा ?’ हाईकमान जी होने वाले जनसेवक को पहचान चुके थे। उन्होंने सुझाया ,’ आप अभी से सरकार में शामिल होकर देश-सेवा शुरू कर सकते हैं। हमें इस समय रूपये को उठाने वाले की बड़ी दरकार है। इसके लिए आप दो सौ करोड़ के अनुदान का और शाम को होने वाले शपथ-ग्रहण के लिए नए सूट का इंतजाम कर लें। ’

चयनित जनसेवक ने हाईकमान जी को साष्टांग प्रणाम कर अपने गिरने का ताज़ा सबूत दिया और वे देश-सेवा का अवसर पा खुशी-खुशी कक्ष से बाहर आ गए।

इस बीच सहयोगी ने अगले जनसेवक को कक्ष में बुला लिया और बाकी अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे।