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बुधवार, 31 जुलाई 2013

व्हाइट सीमेंट वाले प्रभुजी !



जनसंदेश टाइम्स में ३१/०७/२०१३ को !
 
आखिरकार उन लोगों के मुँह पर अब ताला लग गया है जो क्रिकेट के प्रभुजी का मुँह काला करने पर उतारू थे।राजनीति की तरह क्रिकेट के ये आधुनिक प्रभु पूरी तरह निर्दोष और पाक-साफ़ निकले ।यह तथ्य प्रभुओं द्वारा गठित जाँच-कमेटी ने उजागर किया है।वे तो ऐसी किसी जाँच के पक्ष में ही नहीं थे क्योंकि जानते थे कि इसके लिए बिला-वजह धनराशि खर्चनी पड़ेगी।वे जनता के पैसों के वैसे ही संरक्षक हैं ,जैसे राजनेता।मीडिया और कुछ सिरफिरों की चिल्ल-पों का नतीजा सिफ़र निकला और प्रभुजी अपने दामाद,बंधु-बांधवों सहित बेदाग निकले।

क्रिकेट के प्रमुख प्रभु जी का चरित्र उनके बनाये सीमेंट से भी मज़बूत और उजला है।इस सीमेंट की मजबूती तो तभी साबित हो गई थी,जब ‘कुर्सी-छोड़ो’ के सामूहिक रुदन के बाद भी वे जमे रहे और अब जाँच के बाद व्हाइट सीमेंट की तरह उजले निकल आए।उनके मुख-मंडल पर ’रिन’ जैसी चमकार आने के बाद अब कहीं से कोई ललकार नहीं आ रही है।क्रिकेट के खेल में बैट-बाल किसी के भी हाथ में हो पर असली खेल पर प्रभुजी का ही नियंत्रण रहता है।जनता के पास जिस तरह राजनीति के प्रभुओं से बचने का कोई चारा नहीं है,वैसे ही खेल में इनसे।इसलिए जनता अब ऐसे प्रभुओं का माला जप रही है और बदले में प्रभुजी अपने परम भक्तों को अँजुरी भर हलवा नहीं,हवाला से मालामाल कर रहे हैं।

कई लोग स्वाभाविक रूप से सिरफिरे होते हैं।उन्हें सामाजिक कार्य करने वालों से पैदाइशी खुन्नस होती है।उन्हें राजनीति के माध्यम से देश-सेवा का कार्य स्व-रोजगार सृजित करने जैसा लगता है।राजनेता कितने बड़े जोखिम लेकर,मुँह में कोयले की कालिख पुतवाकर भी जनता की ,आम आदमी की सेवा करने को उद्यत रहते हैं,पर नादान लोग उन पर उँगली उठाते हैं,जाँच बिठवाते हैं।बताइए भला,आज़ादी के बाद ऐसी कितनी जांचें हुईं,घपलों से ज़्यादा घोटाला इनने किया और बदले में क्या हुआ ? जनता का ही पैसा अकारथ गया।राजनेता किसी जाँच से नहीं डरते क्योंकि साँच और जाँच का कभी सामना ही नहीं होता।यही सीख अब क्रिकेट के भी काम आ रही है।भले राजनेता सच्चे खिलाड़ी होते हैं और इस समय खेलने के लिए क्रिकेट से बड़ा प्लेटफॉर्म और कोई है भी नहीं।इसलिए ये दोनों मौसेरे नहीं सगे भाई हैं।

अब जब सीमेंट की मजबूती और सफेदी पहले से बेहतर हुई है,निकट भविष्य में इस खेल में और निखार आएगा।कई लोग जो त्यागपत्र देकर इस खेल से बाहर आना चाहते थे,पता चला कि वे व्हाइट सीमेंट के चंगुल से कभी निकले ही नहीं और न निकल सकते हैं ।इसका जोड़ ही ऐसा होता है कि जो चिपक गया वो सनातन काल के लिए फिक्स हो जाता है।ऐसे लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी सेवाएं जनता को देने के लिए समर्पित रहते हैं।हमें ऐसी समर्पण भावना का सम्मान करना चाहिए न कि इनकी पगड़ी उछालना।वैसे भी प्रभुजी की पगड़ी सीमेंट की पकड़ से छूटकर उछल भी नहीं सकती इसलिए इन सबकी माला लेकर जाप शुरू कर देने में ही भलाई है।हाँ,यह ध्यान रहे; प्रभुजी एक नहीं अनंत हैं,उनके कई रूप हैं ।

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

हम तो अमीर हैं जी !

30/07/2013 को 'नेशनल दुनिया' में !


‘सुनो जी,आज का अखबार पढ़ा क्या ?’ सुबह-सुबह श्रीमती जी ने हुलसते हुए आवाज़ दी।मैंने सोचा ,ऐसा क्या गजब हो गया ? अभी तो पूरा अखबार पढ़ा है और श्रीमती जी को ऐसा क्या मिल गया है ,जो मुझे दिखा भी नहीं।मैंने कहा,’हाँ पढ़ तो लिया है पर आप क्यों चहक रही हैं ?’श्रीमती जी उलाहना देने लगीं,’आप जानबूझकर अच्छी खबरें मुझे नहीं बताते।वो तो अच्छा हुआ कि मेरी निगाह हेडलाइन पर चली गई,वर्ना आप तो खुशी की बात छुपाये रखते।मैंने पढ़ लिया है कि सत्ताइस रूपये कमाने वाला अब गरीब नहीं रहा।आप तो एक दिन के तीन सौ पाते हो,दस गुने से भी ज़्यादा।इस नाते तो हम अमीर हुए ना ?’

पूरा मामला जानकर मैंने माथा पीट लिया।तो इसलिए श्रीमती आनंदित हो रही थीं।मैंने उनकी क्षणिक खुशी को काफूर करते हुए कहा,भागवान ! यह सब सरकारी बाबुओं और अफसरों के चोंचले हैं।वो अभी तक गरीबों के बने रहने के खिलाफ थे पर अब तो कागजी रूप से भी उनका यह हक छीनना चाहते हैं।सरकार चाहती है कि गरीबों का इस धरती पर अस्तित्व ही न हो।यदि गरीब ही न रहेंगे तो गरीबी को ठिकाना नहीं मिलेगा।इसलिए सरकार की नज़र में हम अमीर हो गए हैं।यह सब कागजी बाते हैं।’

श्रीमतीजी अभी भी मानने को तैयार नहीं थीं।उन्होंने चुनौती स्वीकारते हुए कहा,’आप हमें सत्ताइस रूपये दो,मैं साबित कर दूँगी कि अमीर हूँ।’मैंने उन्हें सौ का नोट थमाते हुए आशीर्वाद दिया कि वे अब तीन दिन तक अमीर बनी रहें।इतना कहकर मैं अपने कार्यालय चला गया।

शाम को जब मैं घर वापिस आया तो सुबह की चुनौती भूल चुका था।वो घर पर नहीं थीं।बच्चों से उनके बारे में तहकीकात कर ही रहा था कि श्रीमती जी घर में दाखिल हुईं।उनके एक हाथ में आधा-किलो दाल का पैकेट और दूसरे में दो टमाटर और दो प्याज थे।हमें देखते ही सकुचा-सी गईं।मुझे अचानक सुबह वाली बात याद आ गई।मैंने कहा,’अमीर लोग ऐसे हाथ में सामान लेकर नहीं चलते।कम से कम एक बैग तो ले लेतीं,ताकि घर का सामान उसमें आ जाता।’

श्रीमती जी अचानक बिफर पड़ीं,’अजी काहे के अमीर ?पूरी बाजार छान मारी, सौ रूपये में बस इत्ता हो पाया है।ऊपर से मोलभाव भी नहीं किया कि कहीं अमीरी में दाग न लग जाए।’पर इसमें से तो एक दिन का भी राशन नहीं हुआ ?’मुझे अब शरारत  सूझी।श्रीमती जी ने कहा,’ सब्जी न सही ,आज टमाटर और प्याज से बनी सलाद से ही काम चला लीजिए।कल से मैं भी कुछ काम शुरू कर दूँगी,जिससे कम से कम  रोटी-दाल तो खा सकें।’

‘तो क्या अमीर बनना फ़िलहाल मुल्तवी ?’ मैंने थोड़ी चुहल की।श्रीमती जी ने पलटकर जवाब दिया,’भाड़ में जाए ऐसी अमीरी।हम गरीब ही ठीक हैं।’

 

 

शनिवार, 27 जुलाई 2013

गिनीज़ बुक वाले भारत में !


२७/०७/२०१३ को 'नई दुनिया' में !
 

पहली बार गिनीज़ बुक वालों को महसूस हुआ कि वो रिकॉर्ड्स लेने के लिए अमेरिका और यूरोप में अपना समय व्यर्थ ही जाया कर रहे हैं। उन्हें जब यह खबर मिली कि भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई  में बारह रूपये में और राजधानी दिल्ली में महज़ पाँच रूपये में भरपेट भोजन मिलता है तो वे छटपटा उठे। कहीं उनके देश के नागरिक इस बात को लेकर सरकारों का तख्ता न पलट दें,इसलिए पूरा रहस्य जानने के लिए वे तुरंत  भारत आ गए। वे अपने नए संस्करण में इस रिकॉर्ड को शामिल करने के लिए उतावले थे।

सबसे पहले गिनीज़ बुक वाले मुंबई पहुँचे। पूरा दिन वे सड़कों,ढाबों और होटलों में ख़ाक छानते रहे पर बारह क्या पचास रूपये में भी पेट भरने की गुंजाइश न हुई। अलबत्ता,एक सिनेमा हाल में पॉपकोर्न का पैकेट ज़रूर उन्होंने खरीद लिया जो उन्हें एक डॉलर का पड़ा। तभी उनको बारह रूपये वाले नेताजी मिल गए। गिनीज़ बुक वालों ने उनसे पूछा कि वे यह सिद्ध करें कि बारह रूपये में भरपेट भोजन कैसे और कहाँ मिलता है ताकि वे इसे रिकॉर्ड में शामिल कर सकें ?

बारह रूपये वाले नेताजी ने उत्साहित होकर कहना शुरू किया,’बिलकुल जी। मैं अभी प्रमाण देता हूँ। मेरे सामने झुग्गी में एक परिवार रहता है जिसमें एक बच्चा सहित कुल ढाई लोग हैं। पति-पत्नी मेरे यहाँ ही दिहाड़ी पर काम करते हैं,इसके लिए उन्हें महज तीस रूपये देता हूँ। रोज़ काम करने के बाद अगले दिन वे जीवित भी मिलते हैं । इस तरह सिद्ध हो गया कि भरपेट भोजन के लिए बारह रूपये पर्याप्त हैं। ’ ‘पर हो सकता है कि उनकी कोई अन्य आय हो ?’ गिनीज़ वालों ने शंका-समाधान करना चाहा। नेताजी ने भी तुरत समाधान कर दिया,’भई,उनकी बाहरी आय का और कोई स्रोत नहीं है। वे न तो बाबू हैं और न ही नेता। इसलिए अतिरिक्त आय का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ’गिनीस वाले अब निरुत्तर हो चुके थे। नेताजी को ऐसे अद्भुत रिकॉर्ड के लिए बधाई देकर वे दिल्ली आ गए।

पाँच रूपये वाले नेताजी जामा मस्जिद पर ही टकरा गए। गिनीज़ वालों के कैमरे देखते ही शुरू हो गए,’मुझे खुशी है कि आपको मेरे रिकॉर्ड की जानकारी मिल गई। ’गिनीज़ वालों ने नेताजी की भारी-भरकम तोंद देखते हुए सवाल किया,’आप राजधानी में महज पाँच रूपये में कैसे अपना पेट भरते हैं?’ पाँच रूपये वाले नेताजी हँसते हुए बोले,’आप मेरे पेट के साइज़ पर मत जाइए। यह आलरेडी रुपयों,खदानों और ठेकों से भरा पड़ा है। हम और कुछ खाते ही नहीं। कभी-कभार एक-आध काजू-किशमिश अंदर डाल लेते हैं । सच पूछिए तो मुझे पेट भरने के लिए पाँच रूपये भी खर्चने नहीं पड़ते। ’ पर आपके घर-परिवार और आम आदमी का गुजारा कैसे चलता होगा ?’गिनीज़ वालों ने अभी हार नहीं मानी थी।

‘अरे भई ,हमारे चाहने वाले ही इत्ता राशन-पानी और मेवा देकर सेवा कर देते हैं कि कभी खुद की जेब में हाथ डालना ही नहीं पड़ता। मैं पाँच रूपये से कम खर्चकर आपके सामने हट्टा-कट्टा खड़ा हूँ। इससे बड़ा और सबूत क्या होगा ?रही बात आम आदमी की, उसका पेट पीठ से चिपका हुआ होता है। उसके लिए पाँच रूपये बहुत ज़्यादा हैं। ’

गिनीज़ बुक वालों का रिकॉर्ड बनाने का अभियान पूरा हो चुका था। उन्होंने बीस रूपये देकर पानी की बोतल से सूखे गले को राहत दी और फ़िर वे अगले रिकॉर्ड की तसदीक के लिए निकल पड़े।  

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

कृपया अमेरिका जाने दें !

२०/०७/२०१३ को जनसंदेश टाइम्स  में !


हमारे देश के नेताओं के लिए अमेरिका जाना सदेह स्वर्ग जाने जैसा है। कोई भी नेता कितना बड़ा है,इसकी पुष्टि वही करता है। इसलिए अपने देश में चाहे उसको कितना भी मान-सम्मान मिल जाए,जब तक अमेरिका उस पर अपनी मुहर नहीं लगाता,वह अधिकृत रूप से बड़ा और योग्य नहीं होता। अमेरिका जाने का आकर्षण इतना ज़्यादा है कि चाहे इसके लिए उस नेता की चड्डी-बनियान तक उतार ली जाए,वह फ़िर भी जाना चाहता है। आखिर ऐसा क्या है उस अमेरिका में ,जहाँ जाने के लिए लोग मन्नतें माँग रहे हैं,वीसा की याचना कर रहे हैं ? दूसरी ओर विरोधी चाहते हैं कि अमुक नेता वहाँ न जा पाए। उनको डर  है कि अगर वह नेता अमेरिका पहुँच गया तो फ़िर अपने देश में प्रलय आ जायेगी।

अमेरिका जाने वालों का एक लम्बा इतिहास है। हमारे देश के कई नेता और अभिनेता समय-समय पर वहाँ जाते रहे हैं। उनकी उपलब्धि वहाँ काम से अधिक कपड़े उतरवाने की रही है। जहाँ अभिनेताओं ने कपड़े उतरवाने के बाद अपनी फिल्म का इस बहाने प्रमोशन कर लिया ,वहीँ नेताओं ने शोर मचाकर,बयानबाजी कर दो-चार वोट हासिल कर लिए। कुछ ने यहाँ तक संकल्प कर लिया कि अब रहती ज़िन्दगी वो अमेरिका नहीं जायेंगे। इसका मतलब विरोधियों ने यह लगाया कि बंदे को इतना कुछ मिल गया है कि वह दोबारा नहीं जाना चाहता और न ही किसी और को जाने देना।

हमारे देश के नेता चाहे अपने देश के दूर-दराज इलाके में न पहुँच पाए हों,पर न्यूयार्क और वाशिंगटन ज़रूर देखना चाहते हैं। वहाँ जायेंगे तो उनका अंतर्राष्ट्रीय प्रसारण होगा,जबकि अपने मुलुक में किसी स्थानीय अखबार के कोने में पड़े मिलेंगे। स्वामी विवेकानंद भी अमेरिका गए थे पर उन्होंने अपने संक्षिप्त संबोधन से ही तहलका मचा दिया था। अब वैसा कारनामा करने की कुव्वत चाहे किसी में न हो पर नाम कमाने की तो होती ही है। इसलिए कुछ कहकर या करके न सही,वहाँ रुसवा होकर ही नाम अर्जित कर लेंगे। ’बदनाम होंगे तो क्या,नाम न होगा’ ,इस कहावत को नेता बनने से पहले ही सब गले से नीचे उतार लेते हैं। इसलिए अमेरिका जाना ज़रूरी है। वह उनके लिए काशी और मक्का है।

गाँधी बाबा की बात और है। वे वहाँ गए बिना बड़े बन गए पर वे नेता नहीं थे,महात्मा थे। अब आज के नेता महात्मा बनने जैसा धतकरम क्यों करना चाहेंगे ?दूसरी बात यह भी है कि अमेरिका के लिए गाँधी फिट भी नहीं थे। वे खुलेआम नंगे-फकीर की तरह घूमते थे। अमेरिका वाले तो उन्हीं के कपड़े उतारते हैं जो अपने को छिपाकर रखते हैं। इनका पर्दाफ़ाश वहीँ होता है। अब भले ही गाँधी वहाँ न गए हों,पर उनके नए अनुयायी ऐसा करके उनसे भी बड़ा नाम पाना चाहते हैं। इसलिए अंकल सैम से चिरौरी-विनती की जा रही है कि अमुक या तमुक बंदे को वीसा देकर कृतार्थ करें। इसके बदले में वो अपने कपड़े-लत्ते और देश की इज्ज़त उतरवाने को तैयार हैं।

अमेरिका इस दुनिया का प्रभु देश है। जिस देश या नेता पर उसकी कृपा हो गई ,उसका जनम सुफल हो गया। यह बात देश के जनसेवक भलीभांति जानते हैं। सेकुलर और प्रजातान्त्रिक होने की कसौटी तभी है जब अमेरिका जाकर अपनी नंगी देह पर उससे मुहर लगवा ली जाय। अब अपने देश के लिए ऐसा कोई करता है तो इसमें बुरा लगने वाली बात क्या है ?

बुधवार, 24 जुलाई 2013

सरकार इतनी गिरी नहीं है !


सरकार अब इतना भी नहीं गिर सकती है कि गिरे हुए रूपये को उठाने को और गिर सके। रूपये ने तय कर लिया है कि वह जमींदोज होकर रहेगा पर सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है। गिरे हुए रूपये को उठाने के लिए उसने कई ताबड़तोड़ फैसले किए हैं। उसने आनन-फानन कई क्षेत्रों को पूरा का पूरा  एफडीआई की झोली में डाल दिया है । सरकार का सोचना है कि उसकी झोली से रिसकर उसके हाथ भी कुछ लगेगा। उसे भरोसा है कि एफडीआई के आने से रुपया भी चहक उठेगा और धरती से उछलकर सीधे उसकी गोद में जा बैठेगा। इसलिए सरकार नाकारा नहीं बड़ी कारसाज है।

सरकार गिरे हुए रूपये को उठाने के साथ ही खुद के उठने के लिए कई कदम उठा रही है। देश भर में गरीबों को ‘खाद्य-सुरक्षा’ के ज़रिये खिला-पिलाकर पुष्ट और मज़बूत बनाना चाहती है ताकि वे इतने अशक्त न रहें कि मतदान-केन्द्र तक ही न जा पाएँ। इस बात को सरकार के विरोधी समझ गए हैं इसीलिए इसका विरोध कर रहे हैं। विरोधी जानते हैं कि अघाए पेट वाला मतदाता कभी भी नीयत बदल सकता है। इस बात का प्रमाण खुद उन्हें साथी दलों के नेताओं से मिल चुका है।  सरकार भले चाहे जितनी गिरी हुई हो,मर नहीं सकती । उसे अपनी प्राणरक्षा की कीमत पता है। वह जानती है कि जब तक उसके तोते में जान है,वह नहीं मरेगी। तोते ने भी अपने मालिक को कभी निराश नहीं किया है,सो ’खाद्य-सुरक्षा’ बिल और सरकार,दोनों को फिलहाल खतरा नहीं है।

सरकार अपने से ज़्यादा जनता के लिए फिक्रमंद है। उसे पता है कि भ्रष्टाचार और मंहगाई से कभी कोई नहीं गिरा है। खुद सरकारों का जब इनसे कुछ नुकसान नहीं होता तो आम जनता की क्या बिसात ? उसे तो विकास चाहिए और इसके लिए पहले सरकार खुद विकसित होना चाहती है। तभी उसने विकसित देशों से एफडीआई और डॉलर को न्योता भेजा है। सरकार हर वो काम करना चाहती है जिसमें उसका हाथ तंग न हो। रुपया वैसे भी हाथ का मैल है,गिर जाय तो भी क्या फर्क पड़ता है ? डॉलर सारी दुनिया का मालिक है,उसका मजबूती से स्थापित होना ज़रूरी है।

सरकार गिरे हुए रूपये की तरह ही गरीब की गिरावट को लेकर भी चिंतित है। वह इसके लिए तन-मन-धन से उसकी सेवा करना चाहती है। सरकार गरीब की झोली भरकर और मीठी गोली देकर उसकी सेहत ठीक करने में जुटी है। अपने बीमार और दागी लोगों को भी वह जीवनदान देने का जतन कर रही है। जनता और नेता के हित में समान रूप से सोचने वाली सरकार गिरी हुई हालत में यह सब कर रही है। अगर कहीं मज़बूती से खड़ी होती तो जनता की अच्छी-खासी सेवा कर डालती। ऐसी सरकार को गिरने देना अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। उम्मीद है कि चुनाव तक गरीब इतना तो उठ सकेगा कि पास के मतदान-केन्द्र तक पहुँच सके । यदि इसमें कोई कोताही हुई तो सरकार को मजबूरन इस क्षेत्र में भी एफडीआई बुलानी पड़ेगी। भला कोई गरीब विदेशी-सुन्दरी को कैसे मना कर सकेगा ?

फ़िलहाल ,सरकार को बचाने के लिए रुपया आत्म-बलिदान पर उतारू है। उसके चिथड़े उड़ रहे हैं पर मजाल है कि सरकार को कोई आँच आ जाय। वहीँ तोते ने कड़वे फल कुतरने शुरू कर दिए हैं। मीठे फल उसने अपने आका की झोली में डाल दिए हैं !
 
'जनवाणी' में २४/०७/२०१३ को !

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

ये दाग वाकई अच्छे हैं !


१९/०७/२०१३ को हरिभूमि में !
 

नेता जी कई दिनों के बाद शहर से गाँव आए थे।उनसे मेरी मुलाकात हुए अरसा बीत चुका था। पिछली बार वे आम चुनावों के समय आए थे और क्षेत्र के लिए काफ़ी फ़िक्र भी जताई थी। चुनाव जीतने के बाद वे सबकी फ़िक्र के वास्ते राजधानी में ही स्थाई रूप से बस गए थे।चुनाव फ़िर से सिर पर आ गए तो मुझे अंदेशा हुआ कि कहीं वे फ़िर से फिक्रमंद तो नहीं हो गए ? उनसे मिलने की उत्कट इच्छा लेकर जब मैं उनके प्रासाद पहुँचा तो संतरी ने बताया कि साहब अभी चिंता में ग्रस्त हैं,वे किसी से नहीं मिल रहे हैं।मैंने उसे यह बताया कि उनकी चिंता को ही दूर करने के लिए आया हूँ,तो उसने मुझे झट से अंदर प्रवेश करा दिया।

नेता जी ड्राइंग रूम में ही दिख गए ।वे शीर्षासन कर रहे थे।मुझे लगा कि वे अपनी चिंता को योगाभ्यास के द्वारा निर्गत करने में तल्लीन हैं,पर यह मेरा भ्रम साबित हुआ।नेताजी पूरी श्रद्धा के साथ हाईकमान के चित्र के सामने दोहरे हुए जा रहे थे।वातावरण में अगरबत्ती और लोबान की गंध व्याप्त थी। वे कुछ बुदबुदाए जा रहे है थे।आहट पाकर नेताजी सहज अवस्था में लौट आए और मुझे सोफ़े पर बैठने का इशारा किया।उनका शरीर पसीने से तर-बतर था।वे ज़मीन पर ही पसर गए।नेताजी से अपनापा दिखाते हुए मैंने उनके चेहरे पर आए पसीने का असली कारण पूछा ।

’क्या बताऊँ पत्रकार जी  ? अब तो लगता है सारी पुण्याई ही अकारथ जायेगी।हमने जनता की सेवा करने का सनातन काल से जो टेंडर लिया हुआ है,उसमें अचानक व्यवधान पैदा हो गया है।अब हमें जनता के लिए संघर्ष करने से भी रोका जा रहा है।यहाँ तक आने के लिए हमने लाठी-गोली खाई और खिलाई है।दसियों बार जेल गए हैं,सजा काटी है।हमारी सत्ता कारागार से ही निकलती है ।जेल तो हमारा दूसरा घर है पर इसको अब दाग कहा जा रहा है।भला बताओ,यह सब करके ही हम सेवा करने के लायक हुए हैं ,फ़िर हम दागी कैसे हुए ?’नेता जी ने बड़ा गंभीर प्रश्न उछाला था।

मैंने उन्हें आश्वस्त करते हुए बताया,’बस ,इत्ती-सी बात ! आप तनिक भी परेशान न हों।आपके दल के प्रवक्ता से मेरी आज ही बात हुई है।उसने बताया है कि सभी दल देश पर आए इस संकट के समय एक साथ हैं।सबमें आम सहमति है कि अगर यह फार्मूला लागू कर दिया गया तो देश बिलकुल अनाथ हो जायेगा,यहाँ की उर्वरा जमीन बंजर हो जायेगी।अपराध का क्षेत्र राजनीति की नर्सरी है,ऐसे में हम नेता कहाँ से लायेंगे ? अभी इस क्षेत्र में एफडीआई भी नहीं लागू की गई है।इसलिए आप बेख़ौफ़ जनता की सेवा करते रहें।’पर यह होगा कैसे ? बड़े ‘कोरट’ ने तो कह दिया है ?’नेता जी अभी भी आशंकित लग रहे थे।मैंने आखिरी समाधान प्रस्तुत करते हुए बताया कि कानून बनाने  वालों को खुद से ज़्यादा जनता की चिंता है,इसके लिए वे ज़रूरी कदम उठा लेंगे।उन्होंने जो पिछले कई सालों से जनता में निवेश किया है ,उसको यूँ ही जाया नहीं होने देंगे।इसलिए आपके जो भी दाग हैं,अच्छे हैं।इन पर शर्म नहीं, गर्व करने का समय है।

मेरी बात सुनकर नेताजी धरती पर ही लोटने लगे।अगरबत्ती और लोबान की महक अचानक तेज हो गई थी और सामने रखा हाईकमान का चित्र धीरे-धीरे मुस्कराने लगा था।

'कल्पतरु एक्सप्रेस' में  23/07/2013 को !

दैनिक ट्रिब्यून में ०२/०८/२०१३ को !

बुधवार, 17 जुलाई 2013

कव्वाली के ज़रिये भारत-निर्माण !


१७/०७/२०१३ को जनसंदेश में !
 


दिन-भर का थका-हारा कल शाम जब घर पहुँचा तो देश के ताज़ा हालात जानने के लिए मैंने टीवी खोल लिया।जब भी उदासीन होता हूँ,न्यूज़-चैनल लगा लेता हूँ।हर चैनल पर चुनावी-कव्वाली का सीधा प्रसारण देखकर सारी थकान फुर्र हो गई।यहाँ पेश हैं उसके चुनिन्दा अंश :

‘आपकी धर्मनिरपेक्षता छुपी हुई है।वह हमेशा बुरके की ओट में रहती है पर वोट के मौसम में बाहर झाँक लेती है।’

‘अजी, आप वैसे तो खाकी निक्कर पहनकर पार्कों में घूमते हो पर सत्ता की आहट आने पर बेपर्द होकर सांप्रदायिक-नाच दिखाते हो।इससे तो हमें घूँघट ओढ़ना पसंद है ताकि आपके बोरिंग डांडिया-नृत्य से बच सकें।’

‘आपने देश को कबड्डी में छोड़कर बाकी खेलों में फिसड्डी कर दिया।राष्ट्रमंडल खेलों में खेल से ज़्यादा पैसे बनाने का खेल हुआ था। देश पदक तालिका के बजाय भ्रष्टाचार की रेटिंग में ऊपर रहा।ओलम्पिक में सबसे बुरा हाल है।’

‘और आप तो खेल ही नहीं पाए।देश की छोड़िये, अपने प्रदेश को खेल में कोई उपलब्धि नहीं दिला सके।आप तो एक ही खेल जानते हैं,जिसका जवाब जनता चुनावों के समय देगी।उसकी याददाश्त को हम ताज़ा करेंगे।ओलम्पिक में जो भी खिलाड़ी गए वो सब हमारे थे,आपने तो यह भी नहीं किया ’’

‘पिछले ग्यारह सालों से हमारा प्रदेश ज़बरदस्त विकास कर रहा है।इस बारे में मीडिया ने हमें कई बार प्रमाण-पत्र भी दिया है।जबसे आपने शासन संभाला है ,देश का नाम केवल स्विस बैंक की वजह से आगे रहा है।देश को एक्ट नहीं एक्शन चाहिए।वो सिर्फ़ हमारे पास है।’

‘हम पिछले दस सालों से लगातार भारत-निर्माण में व्यस्त हैं।हम इसको पूरा करके ही दम लेंगे।रही बात आपके विकास की,हमने सारी रिपोर्टें हमने मंगवा ली हैं।’मिड डे मील’ बंटवाने में आपका राज्य औरों से दो प्रतिशत पीछे है,जबकि हम तो अब खाने की पूरी गारंटी दे रहे हैं।हम खुद में और जनता में कोई भेद न करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।इसके ज़रिये हम सबको खाने का मौका मुहैया कराएँगे और फ़िर से आएँगे।यह हमारा एक्शन--प्लान है।’

‘चीन हो या पाकिस्तान,बंगलादेश हो या मालदीव,सबके आगे आप घुग्घू बने रहते हो,अपना मौन व्रत नहीं तोड़ते।इस देश को चुप्पा या ठप्पा-प्रधानमंत्री नहीं चाहिए।’

‘हमारी विदेश-नीति पर उँगली उठाना ठीक नहीं है।हमने कई क्षेत्रों में एफडीआई लाकर अपनी प्रतिबद्धता जता दी है।हम किसी के आगे झुकते हैं तो वह शिष्टाचार-वश ।इसे हमारी कमजोरी न समझी जाय।’

‘आपने शिक्षा में क्या किया। ?दुनिया की पांच सौ टॉप यूनिवर्सिटी में हमारी सिर्फ़ एक है।’

‘हमने शिक्षा के लिए बराबर प्रयास किए हैं।टीवी तक में ‘जागो ग्राहक जागो’ से सबको जगाया है।आपके यहाँ तो शिक्षकों का ही टोटा है।’

‘हम राष्ट्रवादी हिन्दू हैं और पैदाइशी भी।हमें अपनी पहचान तक याद है,आपकी क्या है ?’

‘हम बिना किसी वाद या विवाद के राष्ट्रीय हैं।हम सबमें मिले हुए हैं या यूँ कहिये कि हम बहुरूपिये हैं।’

कव्वाली बड़े रोचक मोड़ पर पहुँच चुकी थी।तभी श्रीमती जी ने व्यवधान डालते हुए टीवी ऑफ कर दिया।तब से मैं सोच रहा हूँ कि ‘भारत-निर्माण’ का काम चरम पर था और यदि श्रीमती जी थोड़ा-सा और सब्र कर लेतीं तो उसी दिन सारा काम पूरा हो जाता।क्या कोई बताएगा कि काम की प्रगति कैसी है ?

 'हरिभूमि' में २५/०७/२०१३ को

बुधवार, 10 जुलाई 2013

बाज़ार में समाजवाद के पहरुए !


 

10/07/2013 को 'जनसंदेश टाइम्स' में !
12/07/2013 को हरिभूमि में
 
 

बाज़ार पहुँचा तो कोहराम-सा मचा था।खरीदारों में ऐसा जोश दिख रहा था,जैसे वे देश की ओर से लड़ने सीमा पर गए हों।वे सब टमाटर लेने के लिए किसी से पीछे नहीं दिखना चाहते थे।बाज़ार की बाकी सब्जियाँ आतंकित दिखाई दीं।मुझे देखते ही उनकी बेचारगी बोलने लगी।सबसे पहले धनिया की हरियाली  में रौनक आई।उसने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा,’ये जो भी हो रहा है,बहुत गलत है।अगर आप पक्के समाजवादी हैं तो एक टमाटर को इतना भाव देना ठीक नहीं है।उसकी औकात ही क्या है ?’मैंने धनिया के कंधे पर हाथ रखकर उसे सहलाते हुए बताया,’ टमाटर के योगदान को मत भूलो।तुम तो केवल पूरक का काम करती हो,जबकि टमाटर अपने आप में पूर्ण होता है।वह सबके साथ फिट हो सकता है।उसका स्वतंत्र अस्तित्व भी है।’

पास में बेसुध पड़ी मटर अचानक बोल पड़ी,’उसमें ऐसी क्या खासियत है जो हम सबमें नहीं है ? वह आज अपने भाव दिखा रहा है,मैं तो हमेशा सातवें आसमान में रही हूँ।ज़्यादा दिन नहीं हुए जब उसे सड़कों पर फेंका गया था।तब उसके ये चाहने वाले कहाँ चले गए थे ?’मटर की नाराज़गी पर पानी डालते हुए मैंने उसे समझाया,’तुम तो पब्लिक का सामना करती नहीं हो।तुम्हारा काम केवल रसोई तक सीमित है जबकि टमाटर को रसोई से लेकर सड़क तक,कवि-सम्मेलनों से लेकर हमारी सभाओं तक प्रहार झेलने होते हैं।वह हमारे अन्तः और वाह्य दोनों प्रकार के स्वाद का कारण बनता है।इसलिए उसकी निष्ठा असंदिग्ध है।घर-बाहर उससे हमारी कहीं भी मुठभेड़ हो सकती है,मेरी तरह वह भी पक्का समाजवादी है।’

तभी भिंडी ने प्याज को उकसाते हुए कहा,’क्या तुम्हें कोई तकलीफ नहीं है ? टमाटर की इतनी हैसियत बढ़ना हम सबके अस्तित्व के लिए खतरा है।तुम इसके विरोध में अपना भाव क्यों नहीं बढ़ाते ?’मेरे कुछ कहने से पहले ही प्याज ने छिलके उतारते हुए जवाब दिया,’ऐसा है बहन ! मैं अपने भाव बढ़ाकर किसी को एकाध बार ही सत्ता से बाहर कर सकता हूँ,बार-बार नहीं।इस काम में भी मेरे छिलके उतर जाते हैं।रही बात टमाटर की ,सो नेता जी ठीक कहते हैं।इनकी सभाओं में जब टमाटर फेंके जाते हैं,सीधे नेताजी की देह का स्पर्श करते हैं।अब इनकी देह पारसमणि से कम थोड़ी है।इसिलए टमाटर भी इनका संसर्ग पाकर आज आम पब्लिक से दूर है।इसके भाव बढ़ने से चुनावी-माहौल में नेताजी को बड़ी राहत मिलेगी।यह जानबूझकर टमाटर से बचना चाहते हैं।’

प्याज से ऐसी हरकत की मुझे आशंका थी,इसलिए मैंने विषय बदलते हुए बैंगन का उदाहरण दिया।उसकी जन-सेवा की भावना को टमाटर से ज़्यादा बताते हुए कहा,’बिना किसी भेद-भाव के बैंगन इधर-उधर लुढ़कता रहता है।यह पूर्णतः शर्मनिरपेक्ष और समाजवादी है।इसीलिए इसका महत्व हर काल में रहा है।रही बात इसके भाव की,ज़रूरतमंद स्वयं खुशी-खुशी इसको बख्शीश दे देते हैं।इसलिए सबकी थाली में यह सुलभ रहता है।’मेरी बातें सुनकर बैंगन कुछ बोला नहीं,बस मंद-मंद मुस्कुराता रहा।

अचानक हरी मिर्च ने सूचना दी कि टमाटर के खरीदार मुझे ही खोज रहे हैं।मुझे इसमें अपने किसी विरोधी की साजिश समझ में आई।मैंने सोचा,अभी अगर यहाँ रुका तो सारे टमाटर मुझे ही समर्पित कर दिए जायेंगे और बाज़ार में इनका अकाल पड़ जायेगा।मैं बाहर निकलने की जुगत में लगा ही था कि तब तक टमाटर की आवाज़ आई,’मेरा प्रणाम तो स्वीकार कर लो।मैं पब्लिक के झोले के बजाय आपके गोल-मटोल बदन से लिपटना चाहता हूँ।’ किसी अप्राकृतिक कृत्य की आशंका से अपने को बचाने के लिए मैं वहाँ से तुरंत अदृश्य हो गया।

रुतबे में चार-टमाटर लगना !


18/07/2013 को नेशनल दुनिया में

10/07/2013 को 'जनवाणी' में !
१२/०७/२०१३ को कल्पतरु एक्सप्रेस में !


‘ये लो झोला और बाज़ार चले जाओ।घर में पिछले पन्द्रह दिन से टमाटर नहीं हैं पर मैं चुप्पी साधे बैठी हूँ।पड़ोस वाले पांडेजी तब से अब तक तीन बार मुझे टमाटर दिखा चुके हैं।अब इज्ज़त पर आन पड़ी है इसलिए तुम भी कुछ करो।’पत्नी ने घुड़कते हुए फरमान सुनाया।

‘भागवान,मुझ पर जुलुम क्यों ढाती हो ? तुम तो घर के सामने रेहड़ी वाले से ही सब्जी लेती हो, आज भी ले लो।रही बात पांडेजी की,उनको मैं जानता हूँ।मँहगे टमाटर एक बार ही लाए होंगे।उन्हें ही फ्रिज से बार-बार निकालकर तुम्हें दिखा रहे हैं।तुम इस जाल में मत फँसो’,मैंने जान छुड़ाने की नीयत से पाँसा फेंका।

‘अजी,एक तो तुम्हें खुद अकल नहीं है और मैं बता रही हूँ तो उसमें भी मीन-मेख निकाल रहे हो।टमाटर लेने जा रहे हो,यह छोटी-मोटी बात नहीं है।बाज़ार से खरीदते और लाते हुए देखकर दस लोगों की छाती पर साँप लोटेगा।इससे तुम्हारा ही रुतबा बढ़ेगा,मेरा क्या ,मैं तो घर में ही रहती हूँ।’श्रीमती जी पूरे फॉर्म में थीं।

मरता क्या न करता,झोला उठाकर बाज़ार की ओर चल दिया।घर से निकलते ही पहली मुठभेड़ पांडेजी से हुई।मन ही मन खुश हो रहा था कि वो मुझसे ज़रूर पूँछ-पछोर करेंगे ,पर मुझे मायूसी  हाथ लगी।वो अपने गमलों में पानी डाल रहे थे।मैंने झोले को आगे करते हुए खुद ही बता दिया कि बाज़ार से टमाटर लेने जा रहा हूँ।तभी पांडेजी के मुँह से बकुर निकला ,’हाँ,ज़रूर लाओ ! अब तक माल छँट चुका होगा और सस्ता भी।’मैं कुढ़ता हुआ बिना जवाब दिए सीधे बाज़ार पहुँच गया।

सबसे पहले आम के बड़े ढेर पर मेरी नज़र गई और मैंने बिना भाव-ताव किए पाँच किलो आम झोले के हवाले कर लिए। महज सौ रुपये में झोला भरने के कगार पर था।अब टमाटरों के लिए आरक्षित जगह को भरने के लिए मैं आतुर हो उठा।झोले के आम कोई देख ले,इसके पहले ही मैं उसे टमाटरों से परिपूर्ण कर देना चाहता था।थोड़ी ही दूर पर टमाटरों की छोटी-सी ढेरी दिखाई दी।उसके इर्द-गिर्द तीन-चार ग्राहक झुके हुए थे।टमाटर-विक्रेता से मैंने सवाल किया ,’क्या इत्ते ही टमाटर बचे हैं ?’ मेरी आवाज़ सुनकर सभी ग्राहक मेरी ओर ताकने लगे।वो मुझे ऐसे देख रहे थे,मानो वो आपदा-पीड़ित हों और मैं मुआवजा बाँटने वाला।अब बारी विक्रेता की थी,बोला ‘आप चिंता न करें।आप तो हमेशा पाव भर ले जाते हैं,उतने तो मैं निकाल ही दूँगा।’

इतना सुनते ही ऐसा लगा ,जैसे नेता जी मंत्री बनने के लिए पद और गोपनीयता की शपथ लेने जा रहे हों और हाईकमान ने अचानक पार्टी की सेवा करने का निर्देश दे दिया हो।मैंने भी चेहरे पर नेताई-शरमाहट को लाते हुए बात संभाली,’नहीं,दरअसल आज तो झोला लाए ही टमाटर लेने के इरादे से थे पर शुरुआत में ही आमों की महक से मैं बौरा गया और न चाहते हुए भी इत्ते ले लिए।अब इसमें जो जगह बची है,उसी में टमाटर आ सकते हैं।’

टमाटर विक्रेता भी तब तक मेरा धर्म-संकट समझ गया था और उसने गिनकर चार टमाटर मेरे झोले को समर्पित कर दिए।मैंने अपनी जेब खाली करते हुए उसकी जेब रुपयों से पाट दी ।ऐसा दृश्य देखकर आस-पास के ग्राहकों ने हरी मिर्च की खरीदारी शुरू कर दी।चारों टमाटर पूरी निष्ठा के साथ झोले से झाँकने लगे थे।रास्ते भर मैं खुद को इस बात के लिए कोसता रहा कि पाव भर टमाटर लेने के लिए पाँच किलो आम लेने पड़े पर रुतबा बढ़ने की खुशी इससे कहीं ज़्यादा थी।उसमें अब चार-चाँद नहीं चार-टमाटर लग चुके थे।

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

रूपये की आत्म-कथा !


 
05/07/2013 को हरिभूमि में मेरा व्यंग्य....बस नाम बदल गया !
 

मैं आज़ाद भारत का ऐसा प्रतिनिधि हूँ,जिसकी हालत इन दिनों सबसे ज़्यादा खस्ता है।आज हमारे गिरे होने को लेकर बड़ा हल्ला मच रहा है,पर इसमें मेरा रत्ती भर भी कुसूर नहीं है।आज़ादी के साथ ही कई और चीज़ें व प्रजातियाँ अस्तित्व में आईं थीं,जिन्हें मुझसे जीवनदान मिला और वो आज सबसे ऊपर हैं।इसका मुख्य कारण यही है कि इन सबने मुझ पर ही अपने पाँव रखकर चढ़ाई की ।मेरे गिरने की  एकमात्र जिम्मेदार वह खास प्रजाति है,जिसने दिखाने के लिए तो मुझ पर गाँधी बाबा को बिठा दिया पर असल में वही अपने घर-परिवार के साथ मुझ पर सवार हो गई । मुझमें फ़िर भी थोड़ी शर्म बची हुई है जिससे मैं ज़मीन में गड़ा जा रहा हूँ पर उनके बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा जो मेरे बहाने अपनी गिरावट को छुपाये हुए हैं।

मुझे याद है जब शुरू में मैं ‘आना’ था,तब मेरी शुद्धता और सत्यनिष्ठा को लेकर लोग कई तरह की बातें किया करते थे।किसी बात को बल देने के लिए अकसर वे ‘सोलहों आना सच ’की मिसाल देते थे।उस समय किसी के पास ‘आना’ होना,खुशियों का आना होता था।लोग मेला-हाट जाते थे और बच्चों को ‘आना-दो आना’ देकर निश्चिन्त हो लेते थे।’चार आने की पाव जलेबी बैठ सड़क पर खाऊँगी’ या ‘सैंया दिल माँगे चवन्नी उछाल के’ गाने उस समय सबकी जुबान पर रहते थे।इससे साबित होता है कि उस समय ‘आना’ की हैसियत क्या थी।एक और बात ,तब ’आना’ हथेली पर होता था और सामान झोले में जबकि अब हम झोले में होते हैं और सामान हथेली में।

मेरी मुद्रा में तब अप्रत्याशित रूप से बदलाव आया,जब सारी दुनिया में आर्थिक उदारीकरण की हवा चली।इस प्रक्रिया में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया और मुझे पाने की चाह में आदमी ने अपने को सामान बना लिया।वह बकायदा बड़े तराजुओं में तुलने लगा।मेरे लिए उसने अपनी बोली तक लगा ली। मुझे लपकने के लिए वह लगातार गिरता गया ।मेरी निकटता में वह अपने नैसर्गिक सम्बन्धों,रिश्तों को भूल गया।हद तो तब हुई जब वह विदेसिया ’डालर’ के तराजू में मुझे तौलने लगा।’डालर’ के ऊपर जहाँ ज्यादा दबाव नहीं है,मेरे ऊपर वह अपने खानदान सहित चढ़ बैठा।अब इसके नीचे दबे-दबे मेरा दम फूल रहा है पर वह हटने को तैयार नहीं है।

अब जब मैं ज़मीन पर आ चुका हूँ,मुझ पर बैठे लोगों ने राहत की साँस ली है। अभी तक उनकी जग-हंसाई हो रही थी,क्योंकि वे इसके लिए किसी भी सीमा तक नीचे गिर सकते हैं ।अब उन्होंने खुद मुझे इतना नीचे गिरा दिया है कि लोग गिरने के मामले में उनके बजाय मेरा उदाहरण दें।अभी तक वो मुझ से पेट भरते थे,अब पीठ पर चढ़कर बैठ गए हैं।देश को आज़ादी मिले कई बरस हो गए और अभी होंगे ,पर मुझे  हिलने-डुलने तक की आज़ादी नहीं है और न होगी।इस मुद्रा में पड़े-पड़े मैं केवल असहाय होकर अपने रहनुमा को देख रहा हूँ,जो छुड़ाने के बजाय मुझे विदेसिया ‘डालर’ के साथ तौलने और स्विस बैंक के हवाले करने में लगा है।मुझे अपने मरने की चिंता नहीं है क्योंकि मुझ पर सवार लोग ही मुझे बचा लेंगे ।ऐसा न होने पर फ़िर वो किस पर अपनी सवारी गाँठेंगे ? इसीलिए मैं अजर-अमर हूँ ।

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

बयान प्रसाद जी और उनकी झाडू !

Welcome To Jansandesh  Times: Daily Hindi News Paper
04/07/2013  को जनसंदेश में




आज नुक्कड़ पर बयान प्रसाद जी मिले तो उनके हाथ में बड़ा-सा झाड़ू था.मुझे देखते ही वह अपनी झाड़ू लहराने लगे.मैंने उत्सुकतावश पूछा कि कहीं सफ़ाई-अभियान पर निकल रहे हो तो पलट के जवाब दिया,’यह झाड़ू कोई सड़क साफ़ करने या कचरा झाड़ने के लिए नहीं है.यह एक वीआईपी झाड़ू है जो सबके नसीब में नहीं है.इसे पार्टी हाईकमान ने हमें इसलिए दी हुई है कि इसके द्वारा हम जनता का  दुःख-दलिद्दर साफ़ कर सकें.यह देश-सेवा करने का असली लाइसेंस है जिसे आज़ादी के बाद से हाकिम पार्टी ही  निर्गत करती रही है.हम इसके द्वारा हाईकमान-सेवा करते हैं तभी पार्टी में टिकने की अर्हता मिलती है.इसी को दिखा-दिखाकर हम टिकट पाते हैं जिससे हमें जन-सेवा का मौका मिलता है .’

‘पर ऐसी झाड़ू तो बाज़ार से कोई भी ला सकता है ?’बिलकुल अनाड़ी बनते हुए हमने पूछा.बयान प्रसाद जी तुरंत तैश में आ गए और हमारी तरफ झाड़ू फेंकते हुए बोले,’आप क्या समझते हैं,मैं यूँ ही नेता बन गया ? झाड़ू पाना और इसका भरपूर उपयोग करना सबको नहीं आता.यह हमारे हाईकमान के द्वारा दी गई झाड़ू है,जिसे लगा-लगाकर हम इतनी ऊँचाई तक पहुँचे हैं.मैं जब भी पार्टी दफ्तर या अपने हाईकमान के पास जाता हूँ,अपनी झाड़ू साथ रखता हूँ.पार्टी अपने हिसाब से हमारा उपयोग कर लेती है.जो अपनी झाड़ू ज़्यादा बड़ी कर लेता है,उसको उतना ही बड़ा ओहदा मिल जाता है .’

‘क्या यह स्कीम मनरेगा की तरह सर्व-सुलभ है ?दूसरे दलों के नेता इसे क्यों नहीं आजमाते ?’मैंने एक साथ दो सवाल दाग दिए.बयान प्रसाद जी ने झाड़ू एक तरफ रख दी और मेरे कंधे पर हाथ रखकर बड़े आत्मीय स्वर में बोले,’झाड़ू लगाना हँसी-खेल नहीं है.हर दल के नेता बाजारू झाड़ू लिए हुए मिल जायेंगे,पर उन्हें पूछता कौन है.अब अपने नेताजी को ही देखिए,बहुत दिनों से देश पर झाड़ू मारने की फ़िराक में लगे हैं,पर मैं जानता हूँ कि उन्हें अब प्रदेश में भी झाड़ू लगाना नसीब नहीं होगा.हम ठहरे पैदाइशी झाड़ूबाज,इसलिए हम हर कहीं झाडू फेर सकते हैं.हमें ऐसे कामों में शर्म नहीं महसूस होती,जिनसे जन-सेवा की महक आती हो.’

मैंने अपने कंधे से उनका हाथ उठाते हुए जिज्ञासा प्रकट की,’फ़िर नेता जी के सपने का क्या होगा ? क्या झाड़ू न लगा पाने की वजह से वह देश-सेवा से वंचित हो जायेंगे ? सुना है कि प्रदेश में बच्चों को लैपटॉप बाँटकर और आपराधिक मामलों में फँसे निरीह मतदाताओं के मामले वापिस लेकर चुनाव के समय अपनी झाड़ू से बटोर लेंगे ?’ बयान प्रसाद जी ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे .जब उनकी हँसी रुकी तो बोले ,’भाई ! नेता जी ने फ़िलहाल हमारे हाईकमान के यहाँ बड़ी झाड़ू पाने की दरख्वास्त लगा रखी है,पर यह उनका दिवास्वप्न ही है.हमारे यहाँ जो भी कार्यकर्त्ता हैं,हाईकमान के लिए काम करते हैं और वो बड़े पद की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते.रही बात नेता जी की ,सो वह छोटी-मोटी सफ़ाई ही करते रहें.बड़ी सफ़ाई करने की योग्यता उनमें नहीं है.मैं इसीलिए तो उनकी झाड़ू फेंक आया हूँ.’

इतना कहकर बयान प्रसाद जी ने सामने पड़ी झाड़ू उठाई और मुझसे माफ़ी मांगते हुए कहा कि उनको हाईकमान ने बुलावा भेजा है और वह झाड़ू लेकर वे वहीँ जा रहे हैं.

बुधवार, 3 जुलाई 2013

राहत का बेशर्म हो जाना !


पहाड़ पर आई आफत के बाद राहत की खबर यह रही कि इसी बहाने हमारे देश के नेताओं की जन-सेवा का बेहतरीन उदाहरण सामने आया है ।जो लोग अभी तक राजनेताओं को भ्रष्टाचार और कदाचार के लिए पानी पी-पीकर कोस रहे थे,उनके द्वारा किए गए राहत-प्रदर्शन को देखकर अब सबका कलेजा ठंडा हो गया है।इससे पहले सड़क और संसद में ही हम सबने हाथापाई होती देखी थी पर इस आपदा ने दिखा दिया है कि हमारे नेता केवल पैसे ही नहीं जनता के नाम पर मुक्के और घूँसे भी खा सकते हैं।सच में, भ्रष्टाचार और कालाधन बटोरने के लिए दुनिया में नाम कमाने वाले हमारे माननीयों ने परंपरागत लीक से हटकर पहली बार वास्तविक सेवाभावना के लिए मार-पीट तक कर डाली ।

पता चला है कि कई दिनों के थके-हारे तीर्थयात्री जब एअरपोर्ट पहुँचे तो वहाँ उन्हें असली देवताओं के दर्शन मिले ।इन देवताओं ने अपने भक्तों पर लगे राज्यों के टैग से उनकी पहले भलीभांति पहचान करी और फ़िर अपने –अपने वायुयानों में घसीटने लगे।उस समय भक्तों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा,जब उन्होंने देखा कि एक ही भक्त को राहत देने के लिए दो-दो सुर-नेता,असुर-नेता बनने को तैयार थे।थोड़ी देर के लिए वे अपना दुःख-दर्द भी भूल गए क्योंकि वे देवासुर-संग्राम का सीधा प्रसारण देख रहे थे।नेता अपने मतदाताओं की सेवा करने को इतने तत्पर दिखे कि आपस में मंत्रोच्चारण के साथ-साथ कबड्डी का खेल भी खेलने लगे।यह सब दृश्य देखकर वहाँ भूख से तड़पती भारत माँ की आँखों में आँसू आ गए।उसे उसी समय अहसास हो गया कि अब उसके अस्तित्व को कोई खतरा नहीं है।वह बिलकुल सुरक्षित हाथों में है।नेताओं की आँखों ने शर्म त्यागने की इसकी सगर्व घोषणा कर दी ।

जब अख़बारों और टीवी चैनलों के माध्यम से इस अतुलनीय पराक्रम की खबर आई तो देश की जनता ने राहत के लिए अपना बलिदान देने वालों पर बड़ा फख्र महसूस किया ।ऐसे नेताओं से सम्बंधित पार्टी ने भी अपनी इस अभूतपूर्व उपलब्धि को प्रेसवार्ता में बड़ी नम्रता से स्वीकार किया।साथ ही इस प्रशंसनीय कृत्य में शामिल कार्यकर्ताओं को आगे भी देश-सेवा करते रहने का वचन दिया।इस तरह एक छोटी आपदा के जरिये जिन लोगों ने एक मिसाल कायम की है,उनके लिए यह देश सदा ऋणी रहेगा।आगे चलकर इनमें से यदि किसी भी दल की सरकार आई तो इनके लिए परमवीर या महावीर चक्र की भी सिफारिश की जा सकती है।रही बात सेना के काम करने की,सो उसका तो काम ही यही है।अब भला ,जिसका जो काम है,उसके करने में कौन-सा शौर्य या पुरस्कार ?

हमारे देश में ऐसी आपदा के समय निःस्वार्थ जन-सेवा और राहत का ऐसा दुर्लभ नज़ारा पहले कभी नहीं देखा गया।आज गाँधीजी होते तो उनकी आत्मा पूरी तरह संतृप्त हो जाती।हमारी जनता नेताओं की सेवा से वैसे ही प्रफुल्लित रहती है,आपदा के समय भी उसने देख और जान लिया कि उनका परम-हितैषी आखिर कौन है ?भले ही,यह बात बताने के लिए वे इस नश्वर जगत में न बचे हों,पर उनकी पीढ़ी और बाकी देश ने यह भलीभांति समझ लिया है और इस कृत्य से कृतकृत्य हो उठी है।
 
'जनवाणी' में ०३/०७/२०१३ को प्रकाशित