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बुधवार, 25 दिसंबर 2013

दो हज़ार तेरह का कमाल !

जनसन्देश में 25/12/2013 को

 
इस साल ने जाते जाते आम आदमी को निहाल कर दिया है।मंहगाई से खाली उसकी झोली तेजपाल,लोकपाल और केजरीवाल से भर दी है।अब आम आदमी को न इस साल से और न सरकार से कोई मलाल बचा है।कानून-व्यवस्था पर भरोसा रखने के लिए आम आदमी के जाल में पहले संत का चोला धारे महंत पर किरपा आनी शुरू हुई।उसके बाद आम आदमी को,बिना दसबंद दिए ही,किरपा मिलने लगी।इससे उसकी खुशियों का प्याला लगातार छलकने लगा।अब यह तो बाद में ही पता चलेगा कि उसके साथ हमेशा की तरह इसमें भी कोई छल तो नही हुआ।

मीडिया के तेजतर्रार नायक इसी साल अपना सारा तेज खो बैठे।उन पर समय की मार पड़ी या अच्छी उम्मीदों की हार हुई ,पर आम आदमी को इससे बड़ा सबक मिला।इस साल ने उसे अपने आदर्शों पर पुनर्विचार करने का पाठ पढ़ाया है।संत हो,महंत हो या कोई और,इस साल ने सबके ऊपर टॉर्च मारी और उनके अँधेरे भी नज़र आये ।मगर इस अँधेरे में भी रोशनी की एक बड़ी मशाल आम आदमी के हाथ में लगी है।अब वह कुछ समय के लिए अपने मन में इस बात का भरम रख सकता है कि आने वाला काल उसका है।

भ्रष्टाचार कोई इस साल की उपज नहीं है।उसकी फसल सालोंसाल से लहलहा रही है और आम आदमी से कभी कटी नहीं।अब इसी को काटने के लिए लोकपाल आ रहा है।आम आदमी को इसी साल ने यह हथियार पकड़ाया है।भ्रष्टाचार की फसल कटने की ख़ुशी अभी से मन रही है और हथियार लाने का श्रेय हर कोई लेना चाह रहा है,पर असल श्रेय तो इस साल को ही जाता है।उसने अपना काम कर दिया है ,आगे लोकपाल और नया साल जाने।

जाते-जाते इस साल ने आम आदमी को केजरीवाल के रूप में बड़ा गिफ्ट दिया है।ठीक क्रिसमस के मौके पर यह साल सेंटाक्लॉज़ बनकर आया है।ख़ास आदमी को किसी गिफ्ट की दरकार नहीं होती क्योंकि अबतक सरकार उसी की होती रही है ।ख़ास आदमी जहाँ अपने झोले-बोरे खाली रखने का आदी नहीं होता वहीँ मंहगाई व भ्रष्टाचार आम आदमी का झोला भरने नहीं देते,पर इस साल ने आम आदमी को भारी-भरकम उपहार दे दिया है।इसने सेंटाक्लॉज़ बनकर उसे पूरी सरकार ही दे दी है।अब आम आदमी को दो हजार तेरह से कोई कोई मलाल नहीं है।उसे भ्रष्टाचार की तेरहवीं करने को लोकपाल और उस पर लगाम लगाने को केजरीवाल मिल गए हैं।ख़ास आदमी चाहे तो अपने बाल नोच सकता है।

 

लोकपाल जी का स्वागत है !

जनवाणी में 25/12/2013 को



सचिवालय के बाहर सदाचारी लाल मिले तो बहुत बेचैन दिखाई दिए।छूटते ही हमने कहा,’अब तो आपकी सरकार आ गई है,मंत्रिपद की शपथ भी ले ली है ,फिर काहे को परेशान हैं ? जनता बेसब्री से आपकी सेवा का इंतजार कर रही है।अचानक आपकी पेशानी पर बल कैसे ?’सदाचारी लाल ने गहरी साँस छोड़ते हुए कहा,’बड़ा कठिन समय आ गया है।सुनते हैं,लोकपाल जी आ रहे हैं।वे किसी की भी नहीं सुनेंगे,अपने आप जाँच करके फैसला दे देंगे।ऐसे में कोई भी काम करना खतरे से खाली नहीं होगा।आप जनता की सेवा की बात कह रहे हो पर सोचता हूँ कि अब मेरा क्या होगा ?’

‘अच्छा तो क्या आपने भी अन्ना की तरह जूस पी लिया है ? इसमें घबड़ाने जैसी कोई बात नहीं है।वैसे भी सर्व-सहमति से लोकपाल जी आ रहे हैं,वो भला अपने लाने वालों का बुरा क्यों चाहेंगे ? सभी माननीयों ने उनके आने का स्वागत ऐसे ही नहीं किया है।सबने ठोक-बजाकर यह फैसला इसलिए नहीं लिया कि वे उन सबको ही ठोंक डालेंगे।फिर लोकपाल जी किसी दूसरी दुनिया से नहीं आयेंगे।इस कानून में कहीं यह नहीं लिखा कि लोकपाल बनने के लिए संत,महात्मा या विरागी होना चाहिए।इसलिए किसी भी तरह की आशंकाओं से आप निशाखातिर रहें !’हमने उनका ढाँढ़स बढ़ाने के लिए कई ताबड़तोड़ डोज़ दे डाले।

सदाचारी लाल लगातार टहल रहे थे।लग रहा था कि वो हमारी बातों से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो पाए थे।वे अब भी गंभीर चिन्तन में लग रहे थे और हमारे बिलकुल पास आकर फुसफुसाने लगे,’मैं उस वक्त की कल्पना करता हूँ,जब लोकपाल जी हमारे द्वारा कराये गए जनहित कार्यों को घोटाले का संज्ञान लेकर जवाबतलबी करेंगे।हम काम करना तो खूब जानते हैं पर अब तक जवाब देना नहीं सीख पाए हैं।जब कोई सरकार इस तरह जवाबदेही के लिए मजबूर की जाएगी तो वह काम कब करेगी ? जनता को सवाल-जवाब से मिलना भी क्या है ? हमने सुना है कि लोकपाल जी अपने साथ चलती-फिरती जेल भी रखेंगे,जिसमें हम कभी भी समा सकते हैं।’

अब हमने जान लिया था कि सदाचारी लाल की सबसे बड़ी चिंता जेल जाने को लेकर है।हमने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा,’अव्वल तो इससे चूहे भी नहीं डर रहे,आप तो शेर हैं;दूसरे,कारागार बड़ा पुण्य-स्थल है।यहाँ तक कि भगवान ने भी वहाँ पर जन्म लिया था।मैं तो कहता हूँ कि नेता होने की सार्थकता तभी है,जब वह जेल को अपना दूसरा घर बना ले।जितने भी सामान्य लोग जेल गए हैं,बाद में महापुरुष कहलाये हैं।आप तो आलरेडी महापुरुष हैं।अब आप खुद सोचिये,जहाँ जाकर छोटे-मोटे चोर बड़े नेता बन गए,फिर आप तो इलाके के छँटे हुए महापुरुष हैं,लोकपाल जी की सेवा के बाद आपकी रेटिंग तो आसमान छुएगी,इसलिए नाहक परेशान न हों।’

हमने देखा कि अब सदाचारी लाल एक जगह स्थिर हो गए थे।उनके चेहरे से गायब चमक दोबारा लौटने लगी थी और वे सामने खड़ी लालबत्ती गाड़ी में सवार होकर फुर्र हो गए।

रविवार, 22 दिसंबर 2013

लालबत्ती बिन सब सूना !!


         
रविवाणी,जनवाणी में 22/12/2013 को।
नेताजी बहुत सदमे में हैं।जब से न्यायालय के फरमान से उनकी गाड़ी लालबत्ती-विहीन हुई है,उनको लगता है कि विरोधी पार्टी के नेता ने उनकी मूँछें ही उखाड़ दी हैं।बिना लालबत्ती के, गाड़ी ने अपनी चमक और नेताजी ने अपनी धमक खो दी है।अब वे अपने लोगों के पास कौन-सा मुँह लेकर जाएँगे ? लोग भी क्या-क्या सोचेंगे कि जो बन्दा अपनी बत्ती नहीं बचा पाया ,वह उनको क्या रोशनी दिखायेगा ?लालबत्ती वाली गाड़ी नेताजी के समर्थकों में भरपूर जोश पैदा करती थी,वे समझ पाते थे कि उनके नेताजी का रुतबा औरों से अधिक है और अलग भी।अब क्या सत्ता और क्या विपक्ष वाले,क्या जीते और हारे,सभी बराबर हो गए हैं।एक बत्ती ने पहचान का संकट खड़ा कर दिया है।यह लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण नहीं है।आखिर लालबत्ती ने किसी का क्या बिगाड़ा था ?

नेताजी को जनता की सेवा करनी होती है,इसके लिए सबसे पहले जनता में उनकी पहचान स्थापित होना ज़रूरी है।यह बात कितनी गलत होगी जब जनता के बीच पहुँचकर,गाड़ी से उतरकर नेताजी को खुद बताना पड़ेगा कि वे ही उनके नेता और सेवक हैं।यह काम गाड़ी में लगी लालबत्ती बिना बोले कर देती थी।बड़ी दूर से आम आदमी सतर्क हो जाता था और अपने चेहरे पर नेताजी के प्रति उमड़ा हुआ श्रद्धाभाव भी इकठ्ठा कर लेता था,पर अब इसके लिए कोई समय ही नहीं मिल पायेगा।जब नेताजी स्वयं आम आदमी के पास जाकर अपने सेवक होने की गुहार लगायेंगे तो उस आदमी के लिए नेताजी के लिए ज़रूरी भाव पैदा करना बड़ा दुष्कर होगा।चलो,आम आदमी को तो इसका देर-सबेर अभ्यास हो भी जायेगा पर नेताजी की कितनी फजीहत होगी,विरोधी मुँह के सामने ही हँसेगे,ऐसा सोचा है किसी ने ?

आम और ख़ास होने में जो अंतर है,उसको लेकर किसी को कोई ऐतराज़ नहीं है तो दिखने में क्यों है ? आम आदमी की पहचान केवल मतदान केंद्र पर ही होती है,जबकि नेताजी की हर गली,बाज़ार और नुक्कड़ पर।इसलिए पहचान की सबसे ज्यादा ज़रूरत नेताजी को ही है।इस काम के लिए अगर उनकी गाड़ी हूटर वाली लालबत्ती के साथ नेताजी की पहचान ज़ाहिर करती है तो गलत क्या है ?लालबत्ती-धारी होने से फायदा यह भी है कि बिना कुछ कहे उनके सारे काम हो जायेंगे।उनके काम से यहाँ मतलब जनता के ही काम से है क्योंकि नेता बनने के बाद जो भी काम होते हैं,सब जनता के ही नाम से जाने जाते हैं।

लालबत्ती किसी निशान का प्रतीक नहीं वरन एक सामाजिक पहचान है।समाज में आम को पहचानने में कोई दिक्कत नहीं है और न यह चर्चा का विषय है।ख़ास को पहचान की सख्त ज़रूरत है क्योंकि उसी से उसकी कीमत तय होती है।गाड़ी पर लगी लालबत्ती उसे यही पहचान देती है।आम आदमी के घर में बत्ती आये न आये,नेताजी की गाड़ी में लालबत्ती चमकने से जो मानसिक प्रभाव उत्पन्न होगा,आवश्यकता उसी की है।इसी की रोशनी में नेताजी आम आदमी का अँधेरा देख पाएंगे,इसलिए उनसे लालबत्ती छीनना आम आदमी से उसकी पहचान छीनने जैसा है।

'नेशनल दुनिया' में 24/12/2013 को !

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

समर्थन लेने की शर्तें !

18/12/2013 को जन संदेश में !


 
आम आदमी पर प्रेम बरसाने वाले प्रिय बंधु  !
 
बिना माँगे ही अपना हाथ हमारे गले में डालने से हम बहुत अभिभूत हैं।इस बिना शर्त समर्पण के बदले हम भी कुछ देना चाहते हैं।रिटर्न गिफ्ट के रैपर में लिपटी हुई हमारी शर्तें ये रहीं :
 
आप के विधायक रोज पैदल ही विधान सभा आयेंगे।इससे सड़कों में जाम नहीं होगा,ईंधन की बचत होगी,पर्यावरण स्वच्छ होगा और उनका स्वास्थ्य भी दुरुस्त रहेगा।कोई भी विधायक विधान सभा की कार्यवाही के दौरान बिना हमसे पूछे राजधानी नहीं छोड़ेगा,क्योंकि पता नहीं कब उसके हाथ की ज़रूरत हमें पड़ जाए ! अगर आपका समर्थन है तो लगना भी चाहिए कि आप पूरी तरह हमारे साथ हैं।आपके किसी नेता को सरकार की नीतियों के खिलाफ़ सड़क पर मजमा लगाने की इज़ाज़त नहीं होगी।जो भी बात करनी होगी,गुप्त बैठक से तय कर ली जाएगी।इससे जनता में सन्देश जायेगा कि सरकार मजबूती से अपना काम कर रही है।कोई भी विधायक यदि अपने परिवार के साथ बाहर निकलता है तो खाने-पीने का खर्च वह नहीं देगा,ताकि लगे कि  विधायक आम आदमी से ही ताल्लुक रखता है।बिजली के दामों में पचास फीसद कटौती लागू करने के लिए होली या दीवाली में बिजली कंपनियों से मिलने वाले उपहारों पर पूरी तरह रोक होगी।घर में की गई हर खरीदारी को ऑनलाइन डालना होगा ताकि जनता जान सके कि आम आदमी की सरकार चलाने वालों का हिसाब बिलकुल पारदर्शी है। 
 
सरकार की तरफ से विधान सभा में जब भी कोई प्रस्ताव लाया जायेगा,आपके लोग दोनों हाथों को समुचित ढंग से पीटकर तालियाँ बजाने का उपक्रम करेंगे।इस तरह विपक्ष को हमला करने से हतोत्साहित किया जा सकेगा।लोगों में सफाई के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए झाड़ू पर अनुदान दिया जायेगा,इससे हाथ और झाड़ू में बेहतर तालमेल होगा। हमारे विधायक टोपी लगायेंगे पर आपके विधायकों को यह अधिकार नहीं होगा।इससे जनता को टोपी पहनाने में आसानी होगी और हमें अनुभव भी मिलेगा।
ये सभी शर्तें खुली हुई हैं और इनका घटना-बढ़ना हमारे ही हाथ में रहेगा।अगर इन शर्तों पर आप राजी हैं तो लगे हाथ इस बात का हलफनामा भी दे दें ताकि हम जनता से आपके बिना शर्त समर्थन की मंजूरी ले सकें ! बस ,सरकार बनाने की यही हमारी शर्त है।
 
आपके बिना शर्त समर्थन से सरकार बनाने की  उम्मीद में एक आम आदमी।

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

घोड़ों के गधे बनने का समय !

हिन्दुस्तान में 17/12/2013 को। 


ख़ास आदमी पहली बार भौचक है।उसे सूझ नहीं रहा कि क्या किया जाए ? अदने से आदमी ने उसे हलकान कर दिया है।अभी तक ख़ास के पास ही यह जिम्मेदारी रहती थी कि वह आपस में अदल-बदल करके आम को अपने शतरंजी चालों से चित्त करता रहे,पर इस बार बाज़ी बिलकुल पलट गई है।आम आदमी ने पासा फेंकना कब सीख लिया,ख़ास को पता ही न चला।उसमें भारी कसमसाहट है।वह आम आदमी को लोटा बता रहा है।उसे यह याद नहीं है कि उसने कई बार घोड़ा-मंडी लगाकर आम आदमी को अंगूठा दिखाया है।उसे यह बात पच नहीं पा रही है कि जिस आदमी को कंडीशंस अप्लाई के साथ जीने की मोहलत दी थी ,वही उस पर भारी शर्तें लाद रहा है।घोड़े आज गधे बनने पर मजबूर हैं,यह कैसा समय आ गया है ?

राम लीला मैदान में भूखों मरने वाला और लाल किले पर लाठी-गोली खाने वाला आम आदमी राजपथ पर सीना तानकर चले,यह बात ख़ास आदमी को नागवार गुजर रही है।वह चाहता है कि ख़ास व्यंजनों पर वह हाथ साफ़ करता रहे और आम आदमी बस टुकुर-टुकुर निहारता रहे। इस आम आदमी की जुर्रत तो देखिये।उसने साफा-पगड़ी बांधकर मंच पर माइक सम्भाल लिया है और ख़ास आदमी महज़ श्रोता बन गया है।उसे अब भी यकीन नहीं हो रहा है कि आम आदमी उसे निर्देश दे सकता है।सड़क पर मजमा लगाने वाला आदमी संसद की दहलीज़ तक आ जायेगा,यह देश के लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए नुकसानदेह है।संसद के अंदर होने वाले नाटकों का यदि सड़कों पर खुलेआम मंचन होने लगेगा तो देश की संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा का क्या होगा,जिसे अब तक ख़ास आदमी ने बड़े जतन से बचा रखा है।

आम आदमी अब भार लादने की हैसियत में आ गया है,पर घोड़े इतनी आसानी से गधे की तरह रेंकने लगेंगे,ऐसा नहीं लगता है।

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

आम आदमी की सरकार !


Welcome To Jansandesh  Times: Daily Hindi News Paper
11/12/2013 को जनसन्देश में
 

शाम को जैसे ही घर पहुँचा,माना चाचा गाँव से आये हुए थे।अचानक उनके दिल्ली आने से मुझे ख़ुशी भी हुई और कुछ खटका भी लगा।वे गाँव में हमारे पिताजी के करीबी दोस्त हैं और जब भी मैं गाँव जाता हूँ,उनसे भेंट हो जाती है।गाँव में ही वे एक छोटी-सी दुकान चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं।उनके आने की कोई खबर नहीं थी,इसलिए घर में उनको पाकर मैं चौंक गया।सबसे पहले माना चाचा से मैंने यही सवाल पूछा कि गाँव-घर में सब ठीक-ठाक है तो उन्होंने बताया कि वहां तो सब ठीक है,पर दिल्ली की खबर सुनकर उनसे रहा नहीं गया।आगे मैंने पूछा ,’आपने दिल्ली के बारे में ऐसा क्या सुन लिया है कि इसके लिए आपको यहाँ आना पड़ा ?’
माना चाचा गंभीर होते हुए बोले,’ हम दिल्ली ख़ास मकसद से आये हैं।जब से रेडियो में खबर सुनी कि आम आदमी पार्टी दिल्ली में चुनाव जीत गई है पर सरकार बनाने से बच रही है,मन में बेचैनी-सी है ।पता चला है कि उसके पास आम आदमी की कुछ कमी रह गई है ।दूसरी पार्टी भाजपा भी कुर्सी से दूर रहना चाहती है।ऐसे में सरकार की कुर्सी वीरान पड़ी है।मैंने सोचा मैं भी आम आदमी हूँ इसलिए सरकार बनाने के लिए हमें भी योगदान करना चाहिए।आपकी चाची के लाख मना करने के बावजूद यहाँ आ गया हूँ।’मैंने आश्चर्य जताते हुए उनसे पूछा,’मगर आप को पता कैसे लगा कि आप आम आदमी हैं ?चाचा ने बड़े ही भोलेपन से बताया कि पिछले दिनों ही प्रधान जी ने ‘मनरेगा’ का जॉब-कार्ड बना के उनके हाथ में धरते हुए बताया था कि वे आम आदमी हैं ।इसके अलावा गरीबी रेखा से नीचे वाला बीपीएल कार्ड भी मेरे पास है और झाड़ू से मैं अपने घर-दुवार की सफाई भी बढ़िया तरीके से कर लेता हूँ, सो मैंने सोचा कि सबसे योग्य आम आदमी मैं ही हूँ।इसलिए दिल्ली आ गया।

अब गंभीर होने की बारी मेरी थी।दिल्ली में रहते हुए यह बात मुझे क्यों नहीं सूझी ? चाचा जी ने तो हमारी आँखें खोल दीं।वे आम आदमी की जगह भरने के लिए इतनी दूर से यहाँ तक आ गए और मैं समाचार चैनलों के भरोसे ही बैठा रहा।रही बात आम आदमी बनने की,सो उसकी पात्रता मेरी भी तो है।मुझे याद नहीं पड़ता कि पिछली बार घर में बाज़ार से थैला भरकर सब्जी कब लाया था ?आने-जाने के लिए हमेशा पैदल ही रास्ता तय करता हूँ।इससे जेब भारी और शरीर हल्का होने का गुमान भी रहता है।इस हैसियत से तो आम आदमी बनने की पहली दावेदारी हमारी बनती थी, पर अब कुछ नहीं हो सकता है।वे गाँव से आये हैं,इसलिए मैं उनका समर्थन करने को मजबूर हूँ।मैंने इस बावत चाचा जी को आश्वस्त कर दिया है कि उनकी सरकार बनने पर मैं विरोध नहीं करूँगा।वे अब सरकार बनाने के लिए राज्यपाल के बुलावे के इंतजार में बैठे हैं।

झाड़ू,तूने क्या किया ?


11/12/13 को जनवाणी में
 

घर-बाहर की सफाई करते-करते झाड़ू कब सत्ता की कुर्सी तक आ गई,पता ही न चला।कुर्सी सामने रखी है,पर उस पर बैठ नहीं सकते । टनों लड्डू तुलकर अपने हजम होने की राह तक रहे हैं,पर झाड़ू ने सबके अरमानों को बुहार दिया है।जीतकर भी हारने का अहसास हो रहा है।हार की जीत तो कई बार सुना होगा पर आज जीत को हार महसूस हो रही है।बड़ी मिन्नतों के बाद,बाप-दादों का वास्ता देकर टिकट मिली,गली-गली ख़ाक छानी,विजयश्री की मालाएं भी पहन लीं,पर नामुराद झाड़ू ने कहीं का न छोड़ा।बीच रास्ते में अड़ गई।न आगे बढ़ रही है न बढ़ने दे रही है।इससे भले तो वे थे,जो खेत रहे।सामने लड्डुओं का थाल सजा रखा है पर चखने का मन नहीं कर रहा।दोस्तों और कार्यकर्ताओं की दुआएँ सुई की तरह बदन में चुभ रही हैं।कैसी मुसीबत है कि बधाई भी भरे मन से ली जा रही है,जो झाड़ू के मारे न उगलते बन रही है,न निगलते।

झाड़ू की मार चौतरफ़ा पड़ी है।जिस हाथ ने उसे नाचीज़ और नाकुछ समझा था,उसी ने उसकी हड्डी-पसली तोड़ दी।हाथ पर सीधा हमला हुआ और वह आईसीयू में पहुँच गया है ।अंदर से बार-बार विज्ञप्ति आ रही है कि जल्द ही वह स्वस्थ होकर आएगा।तब तक खपच्चियों और टांकों से वह पूरी तरह उबर लेगा।वह झाड़ू से सीख लेकर अपनी मानसिक दशा भी बदलने को तैयार है।हाथ की चोट गहरी है।वो पहले तो फूल से अधमरा हुआ,बाद में झाड़ू की मार से हिलना-डुलना भी बंद हो गया ।वैसे जानकारों ने छह महीने बेड-रेस्ट की सलाह दी है पर जनसेवा का आदी रहा हाथ हार मानने को तैयार नहीं है।

झाड़ू की मार फूल पर भी पड़ी है।वह जीत के हार को पहनने ही वाला था कि झाड़ू ने रास्ता छेंक लिया।फूल को अचानक ऐसी झाड़ूगीरी की उम्मीद नहीं थी।पंद्रह सालों के वनवास के बाद फिर से पुनर्वास का इंतजार करना कितना दुखदायी होता है,यह दर्द झाड़ू क्या जाने ? वो तो कल की आई हुई नव-विवाहिता जैसी है।फूल को अब तक यही जानकारी थी कि झाड़ू को हाथ ने थाम रखा है पर उसकी मार ऐसी अदृश्य होगी,सोचा न था।फूल खिला मगर कुर्सी तक शूल बिछ गए और वह फूल कर कुप्पा भी न हो पाया।ऐसे में जीत का हर्ष कैसे मनाया जाए,उसे समझ नहीं आ रहा है ।

झाड़ू स्वयं हतप्रभ है।वह घर-आँगन से सबको बुहारकर खुद भी घर के बाहर खड़ी है।हाथ को चोट पहुँचाकर वह गर्वित तो है पर फूल से काँटे का मुकाबला करके वह खुद रुक गई है।इतनी ज्यादा सफाई की उम्मीद खुद झाड़ू को नहीं थी।कुर्सी थोड़ी दूर पर दिख रही है पर उस तक उसे पहुँचाने वाला कोई हाथ नहीं है।उसे बिखरना मंज़ूर है पर फूल का सहारा नहीं स्वीकार है।यही हाल फूल का है।उसे इस बात की कसक है कि हवा थोड़ा और तेज़ होती तो वह कुर्सी तक आसानी से पहुँच जाता।ऐसे में वह पड़े-पड़े मुरझा सकता है पर झाड़ू के हाथ नहीं लगने वाला ।तब से दोनों घर के बाहर ही खड़े हैं।मुश्किल यह है कि यदि इस बीच फिर कूड़ा-करकट इकठ्ठा हो गया तो झाड़ने-बुहारने और खिलने-फूलने का मौका दुबारा मिलेगा भी या नहीं ? यह सारा ‘टंटा’ झाड़ू की वज़ह से ही खड़ा हुआ है,इसलिए जिम्मेदार भी वही है।ईश्वर, झाड़ू की ऐसी मार से सबको बचाए !

शनिवार, 30 नवंबर 2013

कुर्सी वाले साहब !


30/11/2013 को हरिभूमि में
 

कुर्सी पर बैठने वाले साहब ही होते हैं,यह तब और पक्का हो गया जब खबर आई कि वे जिस पर बैठे थे ,वह नीलामी की हक़दार हो गई ।इससे साहब के रुतबे को चार चाँद लग गए और वे बड़ी कुर्सी की ओर दो इंच और सरक गए।इस कुर्सी की कीमत तय करेगी कि साहब की मार्केट-वैल्यू क्या है ? उनके बन्दों ने फ़िलहाल उस सौभाग्यशाली कुर्सी के ऊपर पाँच लाख का दाँव लगा रखा है।यह कीमत साहब के ‘टाइम’ के ऑनलाइन सर्वे में नॉमिनेट होने से पहले की है,इस लिहाज़ से अब इसमें और बढ़ोत्तरी हो सकती है।नीलामीकर्ता अब उस कुर्सी पर ‘टाइम-इफेक्ट’ का टैग लगाकर मनचाही कीमत वसूल सकते हैं।फ़िलहाल,जिन लोगों की निष्ठा महज़ कुर्सी तक होती है,वे साहब के ‘कुर्सी-त्याग’ की कीमत से अपनी हैसियत का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

कीमत कुर्सी की नहीं उस पर बैठने वाले की होती है।यूँ तो कुर्सी पर मास्टर जी भी विराजते हैं पर उनकी कुर्सी की कीमत टका भर की नहीं है।न मास्टर जी के बच्चे और न ही सरकार उनकी कुर्सी के अवमूल्यन पर चिंतित है।इसकी सीधी वज़ह यही है कि मास्टर जी साहब नहीं हैं।उन्हें हर कोई घुड़क देता है।जो व्यक्ति अपनी इज्ज़त नहीं सुरक्षित रख सकता ,वो बेचारा कुर्सी को क्या खाक संभाल पायेगा ? कुर्सी-कुर्सी में भी तो फर्क होता है।मास्टर जी की कुर्सी का दायरा एक कक्षा तक सीमित है जबकि साहब की कुर्सी अपने लिए इच्छित स्पेस बना सकती है,उसके आगे खुला आसमान है।जहाँ मास्टर जी का सौभाग्य है कि वे कुर्सी पर बैठ पाते हैं,वहीँ कुर्सी का सौभाग्य है कि उसमें साहब विराजें और उसे सिंहासन में तब्दील कर बाज़ार के लायक बना दें।यह मामला दो कौड़ी बनाम लखटकिया ग्लैमर का है,जिसे समझना आम आदमी के बस का नहीं है

साहब कोई आम साहब नहीं हैं।पढ़-लिख के साहब बनने वालों को अब कोई पूछता भी  नहीं,इसलिए उनकी कुर्सी भी अपनी किस्मत पर रोती रहती है।साहब का संसर्ग पाने वाली कुर्सी धन्य है।पहली बार कोई ब्रांड और यूएसपी वाले साहब ने उसको कृतार्थ किया है।साहब की यूएसपी है कि उनको सुनने के लिए टिकट लगती है,स्पीच बिकती है।वे चलते-चलते रास्ते में अपना लालकिला बना लेते हैं,रोज नया इतिहास गढ़ते हैं।ऐसे जादूगर साहब अपने बन्दों की तालियाँ पाकर सातवें आसमान में हैं।इतने बड़े पैकेज के साथ वे जिस कुर्सी पर बैठेंगे,वह क्योंकर न इतराएगी ? उसी कुर्सी को नीलामी में हासिल कर साहब के बंदे भी अगली पीढ़ी का निर्माण आसानी से कर सकेंगे।

कुर्सी मिलना बहुत बड़े पुण्यों का फल होता है।कई लोग अपना पूरा जीवन लगा देते हैं पर उस तक पहुँच नहीं पाते।कुछ निकट आते हैं तो दूसरे उसे सरका देते हैं।पुण्याई से कुर्सी पाने वालों की संख्या बहुत कम है।अधिकतर मामलों में बढ़िया मैनेजमेंट और शतरंजी चालों से ही कुर्सी हथियाई जाती है।इसमें ‘गन्दी-गन्दी-गन्दी बात’ जैसा कुछ भी नहीं होता।बड़ी और मार्के की बात यही है कि कुर्सी पर उसी का हक बनता है जो इस पर बैठकर इसकी कीमत बढ़ाये;और आज किसकी कीमत अधिक है,यह बाज़ार के हाथ में है।इसलिए जिस कुर्सी पर सबसे ज्यादा सट्टा या दाँव लगे,वही कीमती है।सभी लोग जहाँ पाने वाली कुर्सी की कीमत लगाते हैं,वहीँ साहब जिस कुर्सी पर विराजमान हो जाते हैं,उसी का बाज़ार-मूल्य बढ़ जाता है।इससे यह साबित होता है कि कीमत कुर्सी की नहीं,साहब की है।सोचिये,जिस कुर्सी पर बैठने के लिए देश की कई पुण्यात्माऐं व्यग्र हैं,उस पर साहब बैठ गए तो वह कितनी कीमती हो जाएगी ! ऐसी पायेदार बड़ी कुर्सी साहब की पकड़ के बिना कब तक दो कौड़ी की बनी रहती है,यही देखने वाली बात है !

एब्सोल्यूट इंडिया में १/१२/२०१३ को
 

बुधवार, 27 नवंबर 2013

मुझे भी प्रायश्चित्त करना है !

२७/११/२०१३ को जनसन्देश में


मैं बहुत खिन्न हूँ इसलिए प्रायश्चित्त करना चाहता हूँ।मेरी नैतिकता मुझे बार-बार उकसा रही  है कि इससे पहले कोई अनहोनी हो,तिहाड़ के दरवाजे खुलें,मुझे प्रायश्चित्त कर लेना चाहिए।मेरी तो इच्छा है कि मैं प्रायश्चित्त-दिवस या मास नहीं पूरा ‘प्रायश्चित्त-पर्व’ ही मना डालूँ।पर इसमें एक संकट भी है।प्रायश्चित्त करने के लिए पहले मुझे तहलका टाइप कुछ करना होगा,फिर इस्तीफ़ा देना होगा पर वह कहाँ से लाऊँ ? मेरे पास ऐसा कोई प्रभावशाली पद भी तो नहीं है।इसलिए मेरे प्रायश्चित्त का कोई जुगाड़ बनता नज़र नहीं आ रहा है।

मुझे गुनाह करने के मौके खूब मिले पर प्रायश्चित्त का ही अवसर नहीं मिल पाया।हाँ,प्रसिद्ध दार्शनिक रूसो के ‘कन्फेशन’ से ज़रूर मैंने प्रेरणा ली है और इसीलिए ‘कन्फेस’ करना चाहता हूँ।मैंने चर्च में भी ‘कन्फेशन’ करने की सोची पर वहां फेस टू फेस करने की वज़ह से थोड़ा पंगा है।जिस गुनाह को हम साफ़ करना चाहते हैं वह केवल गॉड या ईश्वर के आगे करने से कोई फायदा नहीं है।मैं चाहता हूँ कि भले ही मैंने गुनाह छुपकर और बलात किया हो पर प्रायश्चित्त सार्वजनिक होना ही चाहिए।इससे यह सन्देश जायेगा कि बंदे ने गलत हरकत भले ही की हो,पर उसकी नीयत बिलकुल पाक-साफ़ है ।अब यह उसकी भी गलती है, जो समय से मेरी नीयत नहीं भांप सका ,फिर भी मैं प्रायश्चित्त को तैयार हूँ।यह उच्च स्तर की नैतिकता नहीं तो क्या है ? वैसे भी एक अपराधी को सुधार का मौका मिलता है ।अगर कोई बलात्कारी अपने गुनाह को मानकर खुलेआम माफ़ी की मांग करता है तो उसे माफ़ कर देने से कानून और समाज का बड़ा भला होगा ।इससे स्वीकारोक्ति का चलन बढेगा और पुलिस को भी अपराधी ढूँढने में ‘लुक-आउट’ का सहारा नहीं लेना पड़ेगा।लोग किसी भी तरह का तहलका करके अख़बारों में प्रायश्चित्त का एक प्रेसनोट भेज देंगे,इस तरह उनकी और समाज की इज्ज़त बची रहेगी।

प्रायश्चित्त मनाने की बात कोई नई नहीं है।हमारे देश में प्राचीन काल में ऐसी व्यवस्था थी कि राजा और ऋषि लोग अपराध होने पर ‘प्रायश्चित्त-मोड’ में चले जाते थे और बकायदा ‘प्रायश्चित्त-पर्व’ मनाते थे।यह बात और है कि तब अनजाने में हुई गलतियों के लिए यह कदम उठाया जाता था।कहते हैं कि इंद्र ने अहिल्या के साथ छल-कपट से काम-क्रीड़ा की थी पर दोनों को इसका प्रायश्चित्त भोगना पड़ा था।इंद्र कुछ समय के प्रायश्चित्त के बाद पुनः इन्द्रासन पर बैठ गए थे लेकिन अहिल्या को वर्षों तक पत्थर बनना पड़ा था।और भी कई उदाहरण हैं जब राजाओं ने सिंहासन त्यागकर कंदराओं में विचरण किया था। इससे यह तो साबित होता है कि तब भी अपराधी को प्रायश्चित्त करने की सुविधा मिली हुई थी।अब तो तब से लेकर हम काफी प्रगति कर चुके हैं।ऐसे में प्रायश्चित्त करने का साहस दिखाने वालों का सार्वजनिक अभिनन्दन होना चाहिए पर मेरे सामने मुख्य समस्या यही है कि न मेरे पास कोई सिंहासन है और न ही कोई बड़ा पद।फिर मैं कैसे और कहाँ से इस्तीफ़ा दूं ?

मैं बिलकुल प्रायश्चित्त के मूड में हूँ पर इसे करने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है।एक पद-विहीन लेखक यदि लेखन से भी इस्तीफ़ा दे देगा तो उसके प्रायश्चित्त की सूचना भी कैसे होगी ? लगता है मुझे अपने पापों और गुनाहों की मुक्ति के लिए कोई रास्ता नहीं मिलेगा।मुक्ति पाने के लिए पहले बड़ा बनना होगा तभी मुक्ति का सक्षम अधिकारी बन सकूँगा।

दैनिक ट्रिब्यून में ०२/१२/१३ को व नेशनल दुनिया में ५/१२/२०१३ को
 

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

चाय वाले साहब ही ठीक हैं !


Welcome To Jansandesh  Times: Daily Hindi News Paper
जनसंदेश में २१/११/२०१३ को

आखिर इस देश के लोगों को क्या हो गया है ? अगर एक चाय वाला साहब बनकर लाल किले पर चढ़ना चाहता है,तो क्यों कुछ लोग आसमान-पाताल एक किये हैं ? बड़े-बूढ़ों को धकेलकर यदि वह मंचासीन होना चाहता है तो इसमें गलत क्या है ? हमारे देश में ऐसे लोग बड़ी संख्या में हैं,जिन्हें किसी गरीब का सुख देखा नहीं जाता।ऐसे ही लोगों को परसंतापीकहा जाता है।हमारे लिए तो बड़े फख्र की बात होगी,जिस दिन चाय वाला देश का साहब बन जायेगा ।इससे खाली बैठे कारिंदों और पुलिस वालों को भी ढंग का काम मिल जायेगा और वे आम आदमी की सुरक्षा के लिए दिन-रात उसके पीछे लगे रहेंगे ।ऐसे में साहब और उसके बंदे की नीयत पर शक करना कतई मुनासिब नहीं है ।सीधी बात है कि एक चाय वाले का साहब बनना कइयों को नागवार गुजर रहा है।

लोग बहुत नादान हैं।उन्हें सोना खोदने और सपने बेचने वालों पर तो भरोसा है लेकिन एक  चाय बेचने वाले की क्षमताओं पर संदेह हैं।मयूर-तख़्तपर उसका दावा सामने आते ही स्वयंभू शहजादे का भविष्य डगमगाने लगा है ।दिक्कततलब  बात तो यह है कि परसंतापीलोग अब उस तख़्त में नुकीले बयानों की कील चुभो रहे हैं।भले ही देश की बागडोर थामने के लिए इतिहासकार होना ज़रूरी न हो पर चाय के इतिहास का अध्ययन करने पर तो रोक नहीं है।कहते हैं कि नामालूम-सा यह कड़क उत्पाद इंग्लैंड से अंग्रेज़ अपने साथ लाए थे।इस तरह चाय का कारोबार अंतरराष्ट्रीय ब्रांड से जुड़ा हुआ है।आज बाज़ार में उसी चाय की डिमांड है,जिसका ब्रांड दमदार और ग्लोबल हो ।यह आप पर निर्भर है कि आप टाटा की जागो रेपसंद करते हैं या बाघ-बकरी जैसी एक घाट पर लाने वाली समाजवादी चाय ?यदि कोई ग्रीन-टीपीने की कसम ही खा चुका है तो अलग बात है,पर ऐसों की संख्या कितनी है ?फ़िलहाल,तुलसी,अदरक,वंजारा और साहिब जैसे नए-नए फ्लेवर की चाय परोसी जा रही है ।मीडिया और कार्पोरेट ने भी सबको आश्वस्त किया है कि यही चाय मुर्दनी वाले चेहरों पर ताजगी ला सकती है।

भूले-बिसरे नायकों पर टॉर्च मारी जा रही है।महापुरुष चुनाव के समय उधारी पर चल रहे हैं।लौहपुरुष को उबारने के लिए लोहा लिया जा रहा है तो बापू को मोहन लाल के रूप में गढ़ा जा रहा है।देश के इतिहास में यह पहली बार होगा कि सत्ता के लिए नया  इतिहास लिखने की होड़ मची है ।इस इतिहास का अवलोकन किसी विश्वविद्यालय या स्कूल के पाठ्यक्रम में नहीं,बल्कि विशेष शाखाओं में किया जा सकता है । सभाओं और रैलियों में लोगों को चाय की ताजगी और भविष्य की बानगी दिख रही है।चाय बेचने वाले का दावा देश पर तब और पुख्ता हो जाता है,जब यह तथ्य सामने आता है कि उसने तो चाय ही बेच रखी है,जबकि दूसरे लोग देश बेचने में लगे हैं।जब बिना किसी अनुभव के कोयला,स्पेक्ट्रम,तोप,सब कुछ बेचा जा सकता है तो चाय बेचकर और बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है। इससे साहब और उनके बन्दों को तगड़ी स्फूर्ति मिलेगी,इसलिए हमारी नज़र में देश-सेवा के लिए चाय और बन्दे वाले साहब की प्रोफाइल ज्यादा दमदार है।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

हम आभारी हैं सरकार !


 
जनसन्देश और जनवाणी में १३/११/२०१३ को

हम तो बाल-बाल बच गए ! हमारे घर के चौकीदार ने जब इसकी औपचारिक घोषणा की तो पहले हम कुछ समझ ही नहीं पाए।बाद में उसने बड़ी ख़ुशी से यह खुलासा किया कि हम उसके बचाने से नहीं बचे हुए हैं बल्कि जो हमला करते हैं,वे ही हमें मारना नहीं चाह रहे।अगर उसके वश में हो तो वह आये दिन हमारे ऊपर गोले फिकवाए।इतनी संवेदनशील जानकारी पाकर हम चौकन्ने हो गए और जिस चौकीदार को हम केवल अपना रक्षक समझ रहे थे,उसकी ओर कातर नेत्रों से देखने लगे।हमें उसमें साक्षात् प्रभु के दर्शन दिखाई देने लगे।वह सरकार,पालनहार ही नहीं,संहारक भी है।ऐसे व्यक्ति को चौकीदार या सेवक समझना हमारी निरा मूर्खता थी।’मन बावड़ो हो गयो’ जैसी स्थिति में हम गंभीर चिन्तन करने लगे. 

उस पालनहार की बात हमें सोलहों आने सच्ची लगी।अपनी खाली होती जेब और हल्के होते सब्जी के झोले के बीच भी अगर हम इस नश्वर दुनिया में बने और बचे हुए हैं तो यह उसी का प्रताप है।जो आदमी काजू,बादाम और च्यवनप्राश का स्वाद न ले सके,वह मूँगफली और देसी ठर्रे के दम पर पूरी सर्दी काट लेता है,यह सरकार की ही रहमत का कमाल है।खाने की थाली में  आलू,प्याज़ और टमाटर का जुगाड़ न कर पाने वाला यदि अभी भी जिंदा है तो यह उसकी निर्लज्ज सहनशीलता का द्योतक है।सरकार के हाथ में फ़िलहाल जो हथियार हैं,उनसे वह हमारे ऊपर भरपूर वार करने में जुटी है पर हमारी सूखी चमड़ी पर कुछ असर ही नहीं होता।ऐसी सुनहरी मंहगाई और उछाल लेते भ्रष्टाचार के शिकार होने से तो हम बच गए पर आतंकी गोलों से बिलकुल नहीं बच सकते हैं।फ़िलहाल,आतंकियों की ओर से हमें कोई खतरा इसलिए नहीं है क्योंकि अभी तक उनके गोलों पर हमारे चौकीदार या सरकार का नियंत्रण नहीं है।

हम तभी से सोच रहे हैं कि वही सरकार हमारे लिए सबसे मुफ़ीद है,जिसका न मंहगाई पर,न भ्रष्टाचार पर और न ही आतंक पर नियंत्रण हो ।ये तीनों चीज़ें आम आदमी की जान की दुश्मन हैं।अगर कोई सरकार इन सब पर नियंत्रण कर लेती है,फिर हमारा बचना नामुमकिन है।हम अपने चौकीदार का शुक्रिया अदा करते हैं,जिसने हमारे जीवित रहने का रहस्य उजागर कर दिया है।यह धमकी नहीं बल्कि परामर्शी-नुस्खा है,जिसे हमें समझना है।कोई कितना भी इतिहास या भूगोल बदल ले,राजनीति और अर्थशास्त्र चौपट कर दे, पर हमारा गणित यही कहता है कि हमें मज़बूत नहीं मजबूर सरकार ही चाहिए।अपनी जान बची रहेगी तभी इस काया का मतलब है।इसलिए यह सरकार हममें इतनी जान तो बचाए रखेगी कि हम उसे बचाने के लिए मतदान-केंद्र तक जा सकें ! इसके लिए हम अपने चौकीदार और सरकार के आभारी हैं।

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

ओपिनियन पर बैन ज़रूरी !

06/11/2013 को नईदुनिया में

 
देश में इस समय दो ही चीज़ें चर्चा में हैं;ओनियन और ओपिनियन।जहाँ ओनियन आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है,वहीँ ओपिनियन सत्ताधारी दल पर।दोनों चीजों का सम्बन्ध कहीं न कहीं खाने से जुड़ा है।आम आदमी ओनियन को नहीं खा पा रहा है और ओपिनियन-पोल कुर्सी पर बैठे नेताओं को खाने में लगा है।इसलिए ज़रूरी हो गया है कि इन दोनों को बैन कर दिया जाय।इससे आम आदमी और सरकार दोनों को राहत मिलेगी।यह मांग कोई नई नहीं है।पहले भी ओनियन के मंहगे होने पर उसके निर्यात पर बैन लग चुका है और अब यदि कोई ओपिनियन सरकार पर मंहगी पड़ रही है तो इस पर भी बैन लगना निहायत ज़रूरी है।

सरकार कई सालों से आम आदमी को नचा रही है पर यह उसका विशेषाधिकार है।कोई ओपिनियन इस हद तक लोकतान्त्रिक नहीं हो सकती कि वह किसी सरकार को पोल-डांस करवाना शुरू कर दे।टीवी चैनलों पर समाचारों के नाम पर डरावने और क्राइम एपिसोड तथा हास्य के नाम पर फूहड़ और अश्लील कॉमेडी सरकार का सिरदर्द नहीं है क्योंकि इन सबमें आम आदमी रीझा रहता है।सरकार को ये कार्यक्रम इसलिए भी मुफ़ीद लगते हैं क्योंकि आम आदमी इन सबको देख-देखकर मंहगाई और भ्रष्टाचार जैसे दकियानूसी और सनातनी मुद्दों से थोड़ी देर के लिए अपना दिमागी-चैनल बदल लेता है।इसलिए उन चैनलों और कार्यक्रमों पर बैन लगाना जनहित में नहीं होगा।

ओपिनियन पोल पर बैन इसलिए भी ज़रूरी है कि इससे सरकार को बचे हुए समय को पूरा करना मुश्किल हो जाता है।वह शासन सँभालने के बजाय अपने सहयोगियों को साधने में ही जुट जाती है।जनता की ओपिनियन चुनाव के पहले जाहिर होने से सरकार को चंदे का टोटा भी पड़ जाता है और काफी बड़ा निवेश उसके हाथ से निकल जाता है।इस तरह ओपिनियन पोल से सरकार की पोल खुलने से बड़े अफसर भी आँखें दिखाना शुरू कर देते हैं।वैसे भी जबसे बड़े कोर्ट ने अफसरों को नेताओं और मंत्रियों के मौखिक आदेश लेने से मना कर दिया है,सरकार चलाना बहुत रिस्की हो गया है।इसलिए ऐसे विपरीत समय में सरकार को पोल-डांस के लिए मजबूर करना ‘चुनावी आचार-संहिता’ के उल्लंघन के दायरे में तो आता है ही,गैर-मानवीय कृत्य भी है।महत्वपूर्ण बात यह है कि मरणासन्न की निंदा हमारे शास्त्रों तक में वर्जित है।शायद इसी दिन के लिए कहा गया है कि ‘अकीर्तिम चापि भूतानि,मरणादतिरिच्यते’,अर्थात किसी का जीते-जी अपयश ,उसके मरने से अधिक है।

सरकार को पोल-डांस पर इसलिए भी एतराज है क्योंकि इस पर पहला और आखिरी अधिकार आम आदमी का ही है।जब वह भूखे पेट और नंगे बदन होकर सुपरहिट परफोर्मेंस दे रहा है तो मोटे पेट और भरी जेब वाली सरकार फ्लॉप होने का रिस्क क्यों ले ? ओपिनियन वही सटीक और ठीक होती है जो सरकारी-धुन में बजे,अन्यथा वह सिवाय शोर के कुछ नहीं है।विपरीत ओपिनियन-पोल का सरकार के धंधों और उसके कारिंदों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।कोई भी सरकार ऐसे में आर्थिक और राजनैतिक नुकसान उठाने का जोखिम नहीं ले सकती,इसलिए जनता की बेहतरी के लिए ओनियन की तरह ओपिनियन पर बैन आवश्यक हो गया है।

 

बुधवार, 6 नवंबर 2013

आलू-प्याज और लौहपुरुष !

जनसंदेश में 8/11/2013 को।

उधर वे खजाने की खोज में लगे हुए थे और इधर आलू के लाले पड़ गए।खजाने में टूटा-फूटा चूल्हा और कुछ चूड़ियों के अवशेष ज़रूर मिले मगर जिस सोने पर नज़र थी ,वह दूर-दूर तक नज़र नहीं आया।इस खुदाई से उन्हें बड़ी उम्मीदें थीं कि सारी मुफलिसी दूर हो जाएगी,पर बुरा हो सपने का,वही गच्चा दे गया।सोना तो मिला नहीं,रसोई में आग और लग गई।खजाने को खोदने के चक्कर में आलू भी नहीं जमा कर पाए।प्याज़ को आसमानी होते देखकर वे अच्छे-खासे वैष्णव बन गए थे।पिछले दो महीनों से इस बहाने उन्होंने प्याज़ को हाथ न लगाया था पर अब आलू के बिना कैसे चलेगा ? इसे भी अपने सब्जी के झोले में न डाल पाए तो दुनिया को क्या मुँह दिखायेंगे ? यही सोच-सोचकर वे हलकान हुए जा रहे थे।

हमें देखते ही उन्होंने अपने झोले को समेटकर अपनी खाली जेब में धर लिया।हमने आज उनसे खजाने का हाल न पूछा क्योंकि वे बिना खुदे ही धरती में गड़े जा रहे थे।हमने भी अपनी तरफ से उनके ज़ख्मों पर फावड़ा चलाना उचित न समझा। वे ही उबल पड़े,’क्या ज़माना आ गया है ? पहले प्याज़,टमाटर और अब आलू भी ? कितना अजीब समय है,जिसको भी भाव न दो,अपने भाव बढ़ा देता है।ये वो दिन भूल गया ,जब इसे खाने से ज्यादा इसके ठप्पे बनाकर लोगों की पीठ पर छापते थे।अब यह हमारी ही पीठ पर सवार हो गया है।’वे बिलकुल भुने हुए आलू हुए जा रहे थे।

हमने उनके जेब में पड़े खाली झोले को देखते हुए सांत्वना दी,’अब आप आम आदमी नहीं रहे ।आपको आलू-प्याज़ पर चिंतन करने की ज़रूरत नहीं है।सोना न मिला न सही ,अब लोहे पर ध्यान केन्द्रित करो।हाड़-मांस के बने पुतलों से लोहे का पुतला कहीं अधिक कीमती है।आलू-प्याज़ की सोचकर अपनी दैहिक भूख शांत कर सकते हो जबकि लोहा इकठ्ठा करोगे तो सात पीढियों के खाने का इंतजाम हो जायेगा।’

‘पर यह सब होगा कैसे ? हम तो अभी तक भूख से ही लोहा ले रहे थे,अब क्या सच्ची-मुच्ची वाला लोहा लेना होगा ? वे जेब से खाली झोले को बाहर निकालते हुए बोले।

‘हाँ,अब बदले समय को पहचानो।आलू-प्याज़ उगाने और खाने के लिए पूरी जिंदगी पड़ी है।फ़िलहाल कहीं से एकठो महापुरुष का इंतजाम कर लो और उसमें लोहे का लेप लगाकर चौराहे पर खड़ा कर दो।इससे खाली जेब और पेट दोनों भर जायेंगे।और हाँ,यह काम जितनी जल्दी हो, कर डालो क्योंकि कहीं आलू-प्याज़ की तरह महापुरुषों का भी टोटा पड़ गया तो फिर कुदाल लेकर गड़े हुए खजाने की तरह उन्हें भी खोदना पड़ेगा !

 'जनवाणी' में ०६/११/२०१३ को प्रकाशित

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

हुँकारत्व से ही शांति पसरेगी !

जनवाणी में ३०/१०/२०१३ व जनसन्देश में ३१/१०//२०१३ को

 

उन्होंने हमें देखते ही हुँकार भरी।हम पहले से ही लुटे,अधमरे बैठे थे,और डर गए।वे एकदम पास आकर गुर्राकर बोले,’तुम्हें अब किसी और से डरने की ज़रूरत नहीं है।हम तुम्हारी ही रक्षा के लिए अवतरित हुए हैं।साठ सालों का तुम्हारा डर हम साठ दिनों में ही छू-मंतर कर देंगे।तुम्हारे ही उद्धार के लिए हम चाय बेचने के अच्छे-खासे व्यापार को छोड़कर सियासत में वादे बेच रहे हैं।हमारे ये वादे सामान्य वादे नहीं,इरादे भी हैं।हुँकार अब हमारा ब्रांड बन चुका है,हमारी यूएसपी है।इसके फ्लेवर से बने वादे खूब चलते हैं,यह हम आजमा चुके हैं।इसे अब हम व्यापक पैमाने पर लागू करने जा रहे हैं।’

हमने ज़रा-सी हिम्मत करके उनकी हुँकार के बीच अपने लिए थोड़ा स्पेस पैदा करने की कोशिश करते हुए सांस भरी,’मगर आप बिना हुँकार के भी हमारी सेवा कर सकते हैं,फिर यह ललकार ?’ वे अपनी हुँकार पर अटल होते हुए गरजे,’यह सब हम तुम्हारे लिए ही कर रहे हैं पर तुम सुन कहाँ रहे हो ? सालों से हम तुम्हारी सेवा करने को आतुर हैं पर तुम तो एक ही परिवार को वसीयत लिखे बैठे हो।न हमें आने देते हो और न ही ठीक से मुँह मारने ।अब हम इत्ता तो समझ ही चुके हैं कि केवल राम-राम की माला जपने से कुछ नहीं होने वाला।शिकार के लिए हुँकार पहली ज़रूरत होती है,हम तुम्हें बस यही समझा रहे हैं।जंगल का शासन सियार की हुआ-हुआ से नहीं शेर के गरजने से चलता है,इसलिए यह हुँकार ज़रूरी है।’

‘पर इस हुँकार से तो हमें डर लग रहा है।ऐसे में हम अपने दड़बे से बाहर नहीं निकले,तो आपको ‘भोट’ कैसे मिलेगा ? कहीं डर गहरे बैठ गया तो गलत बटन दब सकता है,इससे आपके हुँकारत्व की रेटिंग गिर जाएगी।हम तो अपने खाली पेट और खाली जेब को भरने के लिए आपका मुँह ताक रहे हैं,पर आप तो हमें ही...?’ उन्होंने पहले से अधिक हुँकार भरी,’तुम फ़िलहाल हमें भकोसने दो,हम तुम्हारे अवशेषों को राष्ट्रीय संग्रहालय में स्थापित करने का प्रयास करेंगे।हम हुँकार भरते हैं कि खाने-खिलाने की हमारी खुली डराऊ नीति होगी।इसीलिए डर ज़रूरी है।’

‘क्या मंहगाई और भ्रष्टाचार भी इस हुँकार से डर जायेंगे ?’ हमने डरते-डरते ही पूछा।’बस,इत्ता-सा काम? ये तो हमारी फुफकार से ही दूर भाग जायेंगे।जब तुम जैसे जिंदा प्राणी हमारी हुँकार का अर्थ समझते हैं तो फिर गड़े मुर्दे और मरे मुद्दे क्या चीज़ हैं ? बस,चारों तरफ डर और सिर्फ डर होगा !’इतना सुनते ही हम फिर से बेहोश हो गए।



बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

सच्चे वादे,झूठा सपना।

जनवाणी में 23/10/2013 को।
खजाने की आस लगाने वाले निराश होने लगे हैं। पहले ख़ूब हल्ला मचा;अख़बारों ने कई पन्नों में खजाने और सपने को ख़ूब परवान चढ़ाया और टीवी चैनलों ने विमर्श से अधिक विज्ञापन बटोरे । अब हल्ला ज़रा-सा शिफ्ट हुआ है। विमर्शकार लोग अब बाबा की आलोचना करने में जुट गए हैं,जो निहायत ज्यादती है।

हमारे देश में आज़ादी के बाद से ही नेता आए दिन वादे करते रहे हैं। वे सब वादे खुली आँखों से और दिन-दहाड़े किए गए,पर उनमें से एक भी सच नहीं हुआ।हमने भी ज़्यादा उफ़ नहीं की ।फ़िर यह तो महज एक सपना था,जो एक बाबा ने बंद आँखों से देखा था। यदि यह सच नहीं भी निकलता है तो एक सामान्य बात होगी। बंद आँखों से देखे सपने का टूटना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। तुलसीदास बाबा ने पहले ही सचेत कर दिया था,’सपने होई भिखारि नृप,रंक नाकपति होय’,अब इसके बाद भी सरकार गैंती और फावड़ा लेकर कूद जाय तो उसका ही दोष है। उसे सब दोषों की तरह इस दोष को भी अपने मत्थे लेने पर कोई गुरेज नहीं है। सरकार ने इस बहाने सिद्ध कर दिया है कि वह बाबा और धर्म-विरोधी नहीं है।

हमारा देश सनातन काल से चमत्कारों और आस्थाओं में विश्वास रखने वाला रहा है। बीच में कुछ समय के लिए इसे सोने की चिड़िया भी कहा गया । बाद में कुछ बाहरी आक्रमणकारियों ने सारा सोना उड़ा दिया । आज़ादी के बाद लोगों के सपनों का भारत बना और हमारे रहनुमाओं ने अपने सपने सच्चे कर लिए। लोगों के सपने हवा में ही तैरते रहे ।इस तरह आम आदमी की धीरे-धीरे सपनों से आस्था डगमगाने लगी। नेताओं को लगा कि यदि ये लोग सपने देखना बंद कर देंगे तो उनका जीवन कठिन हो जायेगा। ऐसे में सपनों को पुनर्जीवित करने का मौका बाबा ने दे दिया और नेताओं ने उसे लपक लिया ।

गड़े खजाने की खुदाई से कुछ मिले या न मिले,कई लोगों के सपने ज़रूर पूरे हो गए हैं । बाबा अहर्निश चैनलों पर प्रकट हो रहे हैं । आर्थिक तंगी से जूझ रहे मीडिया को तगड़ा आर्थिक पैकेज मिल गया है  और जनता को भी कुछ समय के लिए मनहूसियत की खबरों से निजात। खुदाई वाली जगह में कई तरह के कुटीर-उद्योग भी विकसित हुए हैं,जिनमें ढेर सारा रोज़गार सृजित हुआ। इसमें विशेषकर जलेबी ,पकौड़े और समोसे वालों ने सक्रिय भागीदारी की।

जो लोग सपने के आधार पर की गई खुदाई की आलोचना कर रहे हैं,वे नादान हैं। अगर खुदाई में सोना निकलता है तो हम फ़िर से जादूगरों और बाबाओं वाले देश होने का गौरव पायेंगे और नहीं, तो हजारों वादों की तरह इस सपने को भी सब भूल जायेंगे । जनता नेताओं के वादे के साथ बाबा के सपने को भी भुला देगी और इस तरह नेता और बाबा सब बराबर हो जायेंगे ।

काश ,मुझे कोई सपना आए!

जनसंदेश में 23/10/2013 को।
सपने फ़िर से चर्चा में हैं। एक साधु ने हाल ही में सपना देखा कि फलां जगह सोने का खजाना गड़ा है । खजाना अभी हाथ नहीं लगा है पर उसको लेकर कई लोग सपने देखने लगे हैं। खजाना मिलने पर देश का बहुत सारा क़र्ज़ निपटने का सपना मीडिया भी दिखा रहा है। कुछ दिन पहले कुछ नेताओं के सपने भी चर्चा में छाये हुए थे। कोई सपनों में प्रधानमंत्री बन रहा था तो कोई अपने को इस स्थिति में बता रहा था कि वह सपने नहीं देखता,उन पर डायरेक्ट अमल करता है। कुछ बाबा लोग भी सपने देखते,दिखाते हुए धरे गए थे।

सपनों को लेकर की जा रही चर्चाओं ने मेरी बेचैनी फ़िर से बढ़ा दी। आखिर सपने मुझे क्यों नहीं आते ? क्या मुझे कोई बीमारी है यह सोचकर नुक्कड़ वाले डॉ. झोलाराम के यहाँ अपनी परेशानी लेकर पहुँच गया । वे आँखें मूँदे कुर्सी पर अधलेटी मुद्रा में पड़े हुए थे। हमारी आहट पाकर डॉक्टर साहब उठ बैठे और अपने आले को टटोलने लगे। मुझे प्रत्यक्ष पाकर कहने लगे,’मुझे अपने सपने पर पूरा भरोसा था और तुमने उसे सच कर दिखाया’। इतना सुनते ही मेरी धड़कन और बढ़ गई। अब यहाँ भी सपने की बात ? साधु,नेता,डॉक्टर सभी को सपने आ रहे हैं फ़िर मुझे क्यों नहीं ?

डॉक्टर झोलाराम ने मेरी चिंतन-प्रक्रिया को भंग करते हुए पूछा,’क्या परेशानी है आपको ?’ ‘डॉ. साहब,बहुत दिन हुए ,मुझे कोई सपना नहीं दिखा। क्या यह कोई गंभीर बीमारी है ? मैंने डरते-डरते ही पूछा। डॉ. साहब ने मुझको ऐसे घूरा जैसे मुझे कोई बड़ी संक्रामक बीमारी हो। उन्होंने मेरी आँखों की पुतलियों को कई बार उलट-पुलटकर देखा। अंत में गंभीर होते हुए बोले,’आप को नींद बहुत आती है। आपकी आँखों से लगता है कि आप हमेशा घोड़े बेचकर सोते हैं,इसलिए ऐसी नींद में किसी सपने के लिए गुंजाइश नहीं है। इतना सोना स्वास्थ्य के लिए भले ही हितकर हो,पर सपनों के लिए ठीक नहीं। ’ 'मगर डॉ.साहब, क्या करें ? खुले आसमान में मच्छरों का संगीत सुनते हुए गहरी नींद आ जाती है। बस,यह ससुरा सपना ही नहीं आता। ’

डॉ. झोलाराम ने अब मेरे पेट पर हाथ फिराया। कहने लगे,’सपने न आना तुम्हारी वंशानुगत बीमारी है। मुझे  तो लगता है कि तुम्हारी कई पीढ़ियों ने कोई सपना ही नहीं देखा है। इसकी दवा मेरे पास नहीं है। आप चाहें तो सरपंच जी से मिलकर ‘मनरेगा’ का जॉब-कार्ड बनवा लें। सपने की गारंटी नहीं है, पर देह में पेट का एहसास जरूर हो जायेगा। ’यह सुनकर मैं निराश हो गया। लौटते-लौटते डॉ. साहब से पूछ ही लिया कि आखिर सपने देखने का कोई उपाय तो होगा ? डॉ. झोलाराम ने ज़ोर देकर कहा कहा,’उपाय तो है,पर यह गाँव में रहकर नहीं हो सकता। सपने देखने के लिए पहले जमीन तैयार करनी पड़ती है । बड़े शहर में जाओ। वहाँ सोने से पहले बड़े मॉल के चक्कर लगाओ। वहाँ की हर दुकान पर भरपूर नज़र डालो। बस,कीमत मत पूछना,नहीं तो सपना भी नहीं आएगा। किसी नेता के फार्म-हाउस या बाबा के आश्रम का फेरा भी नियमित रूप से लगाओ,तभी कुछ हो सकता है। ’

डॉ. साहब का यह नुस्खा लेकर घर लौट आया हूँ। तब से शहर जाने के इंतजाम में लगा हूँ। सोच रहा हूँ  कि अपने जीते-जी शहर जाने का सपना पूरा कर लूँ,ताकि नींद में सोने के खजाने जैसा कोई सपना मुझे भी इस जनम में नसीब हो जाय।
 
 
हरिभूमि में १२/११/२०१३ को

शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

सपने और सरकार ।

19/10/2013 को नईदुनिया में।
हमारी सरकार आम आदमी की तरह सोचती है और वैसा ही करती भी है। जो लोग यह कहते नहीं थकते कि सरकार की नीतियां आम आदमी के लिए नहीं बनती हैं,उन्हें अब अपनी धारणा बदलनी पड़ेगी। आम आदमी और उसमें एक बुनियादी फर्क है कि सरकार स्वयं सपने नहीं देखती वरन उसके सपनों को पूरा करती है। यही काम करने के लिए तो जनता उसे चुनती है और वह वही कर रही है। फ़िर कोई कैसे कह सकता है कि सरकार आम आदमी का ध्यान नहीं रखती। वह उसके जीते-जागते मुद्दों पर भले टालमटोल कर दे पर सपनों को पूरा करने के लिए बिलकुल कृतसंकल्प है।

हाल ही में एक बाबा को ज़मीन में गड़े हुए खजाने का सपना आया। उन्होंने सपने को सरकार तक पहुँचाया और सरकार फ़ौरन उसको पूरा करने में लग गई। वह युद्ध-स्तर पर खुदाई का कार्य करवा रही है,भले ही उसमें कुछ हासिल हो या नहीं पर उस पर यह इलज़ाम तो आयद न होगा कि उसे जनभावनाओं की फ़िक्र नहीं है। जो सरकार किसी सपने पर इतना सक्रिय हो जाये,वह दिन के उजाले में उठाये हुए जनांदोलनों की आवाज़ को वह क्यों नहीं सुनेगी ? बस ,ज़रूरत इस बात की है कि सपना कौन देखता है और आन्दोलन की अगुवाई कौन करता है ? अब कब और किस पर सरकार को अमल करना है ,इतना तो अधिकार उसको मिलना ही चाहिए।

ज़्यादा समय नहीं हुआ जब एक और बाबा ने सपना देखा था कि स्विस बैंक में इतनी रकम जमा है कि जिससे देश का सारा कर्जा उतर जायेगा। इस पर सरकार को बिलकुल यकीन नहीं हुआ क्योंकि यह सपना था ही नहीं,बाबा ने यह सब खुलेआम कहा था। सरकार इस पर व्यर्थ में खोजबीन कराकर जनता के ही पैसों को जाया नहीं करना चाहती थी । दूसरी वजह यह रही कि सरकार केवल जनता के सपनों को ही पूरा करने के लिए होती है। सरकार ने फ़िर भी बाबा की खैर-खबर लेने व खजाने के संबंध में आधी रात में उनका बयान दर्ज़ करना चाहा तो वे भेष बदल कर भाग खड़े हुए। उन्हें लगा कि खजाने के बजाय सरकार उन्हीं को समाधिस्थ करने पर आमादा है। अब बिना कोई जोखिम लिए खज़ाना तो क्या मीडिया का अटेंशन और इनकम टैक्स का नोटिस भी नहीं मिलता।

लोकतंत्र में सपने देखने से अधिक ज़रूरी है कि कौन उसे देखता है ? सपने बहुत सारे हैं पर पूरे वही होते हैं जो युवराज-टाइप के हों या आम आदमी-टाइप । आम आदमी के लिए ‘मनरेगा-कार्ड’ और ‘मुफ़्त-खाना’ वाले सपनों पर सरकार ने अमल करना शुरू भी कर दिया है। इससे सरकार का युवराज-टाइप का सपना भी पूरा हो जायेगा। सरकार को ऐसे ही सपने पूरे करने चाहिए जिसमें उसका और जनता ,दोनों का भला हो। यानी एक तीर से दो शिकार। अब ऐसे में कौन से बाबा को भगवान बनाना है और किसको ‘मैराथन-दौड़’ का अभ्यास कराना,यह सरकार ही सुनिश्चित करेगी। इसलिए सपने भले कोई देखे, उनके ऊपर कंट्रोल सरकार का ही रहेगा। अगली बार यदि आप कोई सपना देखना चाहें तो सरकार से उसकी पूर्व-स्वीकृति अवश्य ले लें !