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बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

परदे में रहकर देश-सेवा !


जनसंदेश में ३१/१०/२०१२ को प्रकाशित !

जनवाणी में २१/११/२०१२ को
 


अब हम सरकार और पार्टी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी हैं यह हमें कहने की भी ज़रूरत नहीं है। हमने इतने सालों में देश-सेवा करते हुए कुछ ऐसे कारिंदे तो तैयार कर ही लिए हैं जो हमारे लिए जान और बयान से प्रतिबद्ध हैं। सामने आकर देश सेवा करना इस समय बड़ा ही दुष्कर और खतरनाक कार्य है,इसलिए भक्तों की बहुप्रतीक्षित आस और मीडिया के लाख कयास के बावजूद हम परदे के पीछे रहकर ही अपने कार्य को अंजाम दे रहे हैं। इस तरह का फार्मूला हमारे ही एक परम्परावादी बुज़ुर्ग का दिया हुआ है और इसे हूबहू लागू करना ही हमारी प्राथमिकता है। मंत्रिमंडल में शामिल होने से बेहतर है कि उसे बनाने का क्रेडिट लिया जाए और गड़बड़झाला होने पर बिलकुल पल्ला झाड़ लिया जाये।

अभी कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में प्रचार करते हुए हमने अपने अपना दिमाग लगाने की कोशिश की और मुँह की खाई। हमारे सिपहसालार कह रहे थे कि वहाँ केवल दलितों के यहाँ जीमने का ही प्रोग्राम करते रहें पर हमने जोश में आकर मंच से कागज फाड़ने जैसा नया दाँव चला ,जो बिलकुल उल्टा पड़ गया। किसी पत्रकार ने उन फटे कागजों को जोड़कर इकठ्ठा किया तो वह हमारा चुनाव-घोषणा पत्र निकला । बस,इसी पत्र को विरोधियों ने अपने अजेंडे में शामिल कर लिया और हम चुनावी-दौड़ से बाहर हो गए। हमने चुनाव के समय जनता से जो वादा किया था कि हमें दो सीटें मिलें या दो सौ, हम वहाँ जाते रहेंगे; पर हमें न दो मिलीं और न दो सौ,इसलिए हम वहाँ न जाने के लिए संकल्प-बद्ध हो गए।

इस समय यदि देश के लिए सबसे ज़्यादा कोई चिंतित है तो वह हमीं हैं। हमारे अपने कार्यकर्ताओं द्वारा जिन राज्यों में सरकार चलाई जा रही है,हमें उन पर पूरा भरोसा है। इसलिए हम विपक्षद्वारा शासित राज्यों को लेकर ही आशंकित रहते हैं क्योंकि वहीँ बलात्कार और भ्रष्टाचार के मामले प्रकाश में आते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारा दस्ता पूर्णरूप से प्रशिक्षित है और विरोधी एकदम अनाड़ी।  अन्य दलों द्वारा भ्रष्टाचार करना तो दूर, मामले को ठीक से उठाना भी नहीं आता। यही वजह है कि हमारे रिश्तेदार भी ऐसा करके बच जाते हैं और वे अपने ड्राईवर तक को नहीं बचा पाते।

हमारे कार्यकर्ताओं द्वारा हमें अगले आम चुनाव में देश की सेवा करने की सुपारी दे दी गई है जिसके लिए हम और हमारी कुशल टीम दिन-रात लगी हुई है। आम आदमी की टोपी लगाकर एक आदमी इस सुपारी पर सरौता चलाने की कोशिश कर रहा है पर हमें अपने बलिदानी जत्थे पर पूरा भरोसा है।  इस मिशन में लगे कानूनी मंत्री को हमने पदोन्नत कर दिया है। देश के कानून के प्रति की गई उनकी सेवाओं को हम अब अंतर्राष्ट्रीय-स्तर पर आजमाएंगे। इससे कई फायदे होंगे;आम आदमी से उनकी जान छूटेगी और वे पड़ोस के विदेश मंत्री से सर उठाकर हाथ मिला सकेंगे। कोयला-कोयला चिल्लाने वालों को भी हमने बता दिया है कि सोने को कोयला कहने से वह कोयला नहीं हो जाता। हम जिस चश्मे से देखते हैं उसी से सबको देखना होगा।

हमें कई बातें कहनी हैं पर हम कहने में नहीं, करने में भरोसा रखते हैं। हमारी सरकार के मुखिया को देखिए जो बिना कुछ बोले, पिछले आठ सालों से हमारे मिशन को अंजाम दे रहे हैं,तो अगले चुनाव के बाद कुछ सालों तक हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते ? जब परदे में रहकर पूरा मजमा लूटा जा सकता है तो बाहर आकर पत्थर खाने की बेवकूफी क्यों की जाय ? इससे ‘सेफ गेम‘ मतलब ‘सेफ देशसेवा’ और दूसरी हो सकती है क्या ?

 जनसन्देशटाइम्स  में ३१/१०/२०१२ को प्रकाशित

मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

बुज़ुर्ग नेता की नसीहत !


 

नई दुनिया में ३०/१०/२०१२ को प्रकाशित
 (साजिशों का मौसम !)

भाइयों और बहनों,हम सब के लिए यह संकट का समय है।मौजूदा वक्त में हम अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहे है।अगर समय रहते हम नहीं चेते, तो सब मारे जायेंगे।यह साजिशों का मौसम है।लगभग हर रोज़ हममें से किसी का फोटो सड़क और टीवी पर उछाला जाता है।हमारे ऊपर हर किस्म के आरोप लगाए जा रहे हैं।यह बात हम तक रहती तब भी ठीक था,पर अब तो पानी सिर से ऊपर जा चुका है।लोग हमारे दामाद, ड्राइवर और ज्योतिषी तक खबर रख रहे हैं ।पार्टी अध्यक्ष और हाईकमान तक को कीचड़ और डैम में घसीटा जा रहा है। आरोप लगाने वालों और आरोप सहने वालों में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ मची हुई है।

आजकल जिस तरह थोकभाव से आरोप लग रहे हैं, इससे बड़ी साजिश की बू आ रही है।अभी तक आरोप लगाने का काम केवल विपक्षी पार्टी के लिए आरक्षित होता था,पर नए चलन में उसको भी घेरे में ले लिया गया है।पहले हम आपस में बारी-बारी से एक-दूसरे पर आरोप लगाकर सत्ता-सुख का बंटवारा कर लेते थे ,पर अब हमारे ऊपर दुतरफा मार पड़ रही है।हम चाहे सत्तापक्ष के हों या विपक्ष के,हमें घोटालों के विरोध में बयान तक देने के लायक नहीं समझा  जा रहा है।वैसे हमारी आपस में अलिखित सहमति इस बात को लेकर बनी हुई है कि हम एक-दूसरे के बाल-बच्चों को लेकर बिलकुल सेफ और फेयर गेमखेलेंगे,पर इधर कुछ लोग आत्मघाती गोल करने के प्रयास में लगे हुए हैं।

दोस्तों,हमारी सम्पूर्ण प्रजाति खतरे में है।हर दूसरे-तीसरे दिन चैनलों के आगे मुट्ठीभर लोग अनाप-शनाप बकते हैं और मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में हमारी पुरखों की पुण्याई  को मिट्टी में मिलाने की कोशिश करता है।इन हमलों से बचने का एकमात्र नुस्खा यही है कि हम सबको समवेत स्वर से इन्हें साजिश करार देना है,साथ में यह भी कहना है कि आरोप लगाना तो आजकल फैशन-सा हो गया है।इस तरह के दो-तीन पंक्तियों के रेडीमेड बयान हमारे हर प्रवक्ता के पास होने चाहिए,जो किसी भी समय इनका सदुपयोग कर सकें। हमारे प्रवक्ता जब भी मीडिया को बयान दें या किसी चैनल में बहस करें तो बोलने से ज़्यादा बेशर्म हंसी का समुचित स्टॉक अपने पास रखें,इससे सारे आरोप अपने आप हवा में उड़ जायेंगे।

अब जब आरोप लगाने का सिलसिला चल ही पड़ा है तो मेरी सभी भाइयों से अपील है कि जिसके पास कुछ भी छिपाने लायक है,वह इस साजिशी-मौसम का फायदा उठाकर उन्हें उजागर हो जाने दे। वैसे भी देर-सबेर हमारे जांबाजों के कारनामे सबके सामने आने ही हैं तो अभी आ जाने से हमें साजिश का संबल भी मिल जायेगा। हम साफ़-साफ़ बयान देंगे कि किसी बड़े पर आरोप लगाना तो अब फैशन में शुमार हो गया है और यह सब एक साजिश के तहत हो रहा है। इसके लिए हम बाहरी शक्तियों का भी नाम ले सकते हैं,इससे हमें काफ़ी सहूलियत मिलेगी।साथ ही,हम अपने दामादों,बेटों,ड्राइवरों,पुरोहितों से कह दें कि वे निश्चिन्त होकर स्वरोजगार-कार्यक्रम में लगे रहें।एहतियात के तौर पर हम सबको अपनी-अपनी ज़मीनों में ज़्यादा से ज़्यादा सेब के बागान लगा देने चाहिए ताकि ऐसी साजिशों का मुँहतोड़ ज़वाब दिया जा सके।

 

सोमवार, 29 अक्तूबर 2012

जनसत्ता में पहली बार व्यंग्य !

जनसत्ता में २८/१०/२०१२ को प्रकाशित !


संयुक्त राष्ट्र चले जाओ जी !


जब से देश की राजनीति से लालू-तत्व नदारद हुआ है,हमें ठठाकर हँसने का मौका शायद ही मिला हो. लगता है कि इस बात को हमारी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने समझा है,तभी हमें पिछले कुछ दिनों से ज़ोरदार हँसी का अहसास कराया जा रहा है.सबसे मौलिक और सुखद अनुभूति हमारे कानून मंत्री ने कराई है.अन्ना टीम द्वारा लोकपाल की माँग पर उन्होंने सीधे और निष्कपट भाव से यह कहा कि भइया,इस बारे में अगर कुछ करना ही चाहते हो तो संयुक्त राष्ट्र संघचले जाओ,हम आपकी और सेवा नहीं कर सकते.सच पूछिए,इस बयान की साफ़गोई से हम तो बिलकुल गदगद हुए जा रहे हैं.

 

वैसे हम सबको आनंद प्रदान करने की यह इनकी पहली कोशिश नहीं है.इससे पहले उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में ये अपनी ज़ोरदार उपस्थिति दर्ज़ करा चुके हैं.तब हमें हंसाने के लिए ये खुद रोने लगे थे और सुबकते हुए बोले थे कि बाटला कांड को सुनकर उनकी नेता भी ऐसे ही जार-जार रोई थीं.हमें तो लगता है कि उनकी इस बात से इनकी पार्टी के समर्थक इतना दुखी हो गए कि वे वोट डालना ही भूल गए.फ़िर भी,अपने नुकसान की क़ीमत पर अगर इनका ज़ज्बा क़ायम है तो यह बड़ी बात है.

 

इस सरकार को महंगाई से इतना दुःख है कि वो लगातार हमें हंसाने और खुश रखने का प्रयास कर रही है.समय-समय पर इसके सहयोगी दल भी इस काम में अपना भरपूर सहयोग दे रहे हैं,पर मुख्य सत्ता दल होने के नाते कांग्रेस अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहती.इसलिए उसके एक और मंत्री ने अन्ना-टीम के आन्दोलन को ड्रामा करार देने में ज़्यादा समय नहीं लिया.उनका मतलब यही था कि ड्रामा होगा तभी तो जनता का मनोरंजन होगा.वे भी यही चाहते हैं कि जनता ड्रामा देखती रहे और बाकी चीज़ें भूल जाय.

 

कुछ समय पहले दो दिन तक हमारे देश में बिजली के ग्रिड फेल हो जाने से अधिकतर हिस्से अँधेरे में ही मगन थे.बिजली मंत्री ने उन्हें यह कहकर खुश कर दिया कि इसी तरह के हालात से अमेरिका भी जूझा है और उसे उबरने में तो चार दिन लगे थे,जबकि हमने यह कमाल सिर्फ दस घंटे में ही कर दिखाया है.सरकार ने भी उनकी बात और उनके काम को गंभीरता से लिया और तुरत ही पदोन्नति के आदेश दे दिए.सुनते हैं कि मंत्रीजी ने भी नए मंत्रालय को सँभालने से पहले ही अमेरिका में हुई कई ऐसी घटनाओं का रिकॉर्ड तलब कर लिया ताकि समय आने पर वे उनकी नज़ीर देकर हमारा मनोरंजन कर सकें.

 

हम तो कहते हैं कि बिजली नहीं है,पानी नहीं है,सड़क नहीं है तो बेखटके हम सबको संयुक्त राष्ट्र की शरण में जाना चाहिए क्योंकि वो भी समझदार है कि हमारी सरकार का मुखिया कितना लाचार है.अब जब तक राहुल बाबा का आगमन नहीं होता,लोकपाल तो छोड़ो, हमें हर ऐसे काम के लिए अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र का मुँह देखना पड़ेगा.इससे हमारी पीर भी कम होगी और सरकार की भी.पर,यह भी हो सकता है कि ऐसा करते-करते हमारी इतनी आदत पड़ जाय और आगामी चुनावों में भी हम वोट मांगने वालों से कह दें कि भइया,आप भी संयुक्त राष्ट्र चले जाओ,वोट भी वही देगा,तब कैसा रहेगा ? कभी उनको भी तो हँसने का मौका हमें देना चाहिए कि नहीं..?

 

 



गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

कानून जी और आम आदमी !





हम बाज़ार पहुँचे तो नवरात्र और दशहरे की चहल-पहल सर्वत्र विद्यमान थी। बच्चे रावण के पुतले को लेकर उत्साहित थे।अचानक मुख्य बाज़ार में प्रवेश करते ही कानून जी मिल गए। वे पूरे बाजू का सफ़ेद कुर्ता पहने हुए थे। हमको देखते ही उनके दोनों बाजुओं में एकदम से हरकत आ गई । हमने बड़े ही आत्मीय भाव से उनका हाल पूछा,’आप इस आम बाज़ार में कैसे?’वे तनिक त्यौरियाँ चढ़ाकर बोले,’हम अपने लिए यहाँ नहीं आए हैं। दर-असल आम आदमी आजकल सड़क पर है और हमें उसको खास सन्देश देना है ,सो हम लहू की तलाश में हैं।मगर सन्देश देने के लिए तो कलम-स्याही से आप पत्र लिख सकते थे,लहू क्यों ? मैंने डरते हुए पूछा। अब वे अपनी पर उतर आए थे और कहने लगे,समय बहुत तेज़ी से बदल रहा है। हमारे बुजुर्गों ने कलम और तलवार को एक ही माना है ,सो जहाँ कलम से काम नहीं आता वहाँ तलवार से काम लेने में कोई हर्ज़ नहीं है। आखिर तलवार का काम भी तो कलम करना ही है,इसीलिए बाज़ार तक आए हैं।

हमने अब रहस्य को खोलने की गरज से पूछा ,’अब यह आम आदमी कब से इतना खास हो गया है कि आपको उसके लिए इतना वक्त निकालकर यहाँ तक आना पड़ा?’

देखिए,हम खास तौर से आम आदमी को यह बताने आए हैं कि इस देश में एक कानून है और वह कतई कमज़ोर नहीं है। कानून का काम-काज देखने वाले जब हम हैं तो हम जो भी कहेंगे,वही तो कानून हुआ ना...? सड़क वाले आदमी की यह हिम्मत कि वह हमारे घर में आकर हमें ललकारे और हम चुपचाप बैठे रहें,यह संभव नहीं है। कानून अंधा हो सकता है पर बहरा नहीं। देश-सेवा करते हुए जो भी मुश्किलात आएँगी,हम उनसे निपटने में पूरी तरह तैयार हैं।कानून जी अपनी रौ में बहे जा रहे थे।

हमने कलम से पढ़ाई की है पर कानून में यह तो कहीं नहीं लिखा है कि इस कलम की स्याही हमेशा नीली ही हो। हमारी पीढ़ियों ने देश को बचाने के लिए अपना लहू बहाया है तो हम अपनी कुर्सी और सत्ता के लिए दूसरे का लहू क्यों नहीं बहा सकते ?यह सब इसलिए कर रहे हैं कि संविधान को बचाने की शपथ हमने खुलेआम ली हुई है और हम उसे हर हाल में पूरा करने को प्रतिबद्ध हैं। भले ही देश में चोर-लुटेरे,माफिया अपनी पूरी ताकत से सक्रिय हों पर इस वज़ह से कानून भी तो सक्रिय है। ऐसा न होने पर हमारा औचित्य ही क्या रह जायेगा ?’

पर इससे क्या आप कानून को अपने हाथ में नहीं ले लेंगे ?’ मैंने सकुचाते हुए पूछा। उन्होंने तुरत अस्वीकृति में सिर हिलाया और बोले,’हम ही तो साक्षात् कानून हैं।आम आदमी की जगह सड़क पर ही है और हम यह भी सुनिश्चित करेंगे कि वह वहीँ रहे क्योंकि वह वहाँ से सीधे संसद की ओर जा सकता है। इस लोकतंत्र का तंत्र हमारे पास है जो संसदीय-कवच के अंदर सुरक्षित है और लोक फटा-कुरता पहने सड़क पर केवल चिल्ला रहा है। हम सभी को यह आश्वस्त कर देना चाहते हैं कि देश के लिए लहू बहाने में हम कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे । ऐसा कहकर कानून जी ने लंबी साँस ली और हम मौका पाकर आगे बढ़ गए,जहाँ बच्चे रावण के पुतले को देखकर चहक रहे थे ।
'डीएलए' में 25 अक्‍तूबर 2012 को प्रकाशित !

बुधवार, 17 अक्तूबर 2012

मंत्री जी,प्रेसवार्ता और पानी !


१७/१०/२०१२ को 'जन संदेश टाइम्स ' में..
 

१७/१०/२०१२ को 'दैनिक ट्रिब्यून' में...
 
१८/१०/२०१२ को 'जनवाणी' में
श्रीटाइम्स में २४/१०/२०१२ को !


 

जैसे ही टीवी खोलकर समाचार-चैनल लगाया,मंत्री जी पानी माँग रहे थे। सवाल-जवाब तो हमारी समझ में ज़्यादा नहीं आए पर एक फ्रेंच-कट दाढ़ीनुमा पत्रकार बार-बार उनसे सवाल की माँग कर रहा था और मंत्री जी पानी की।वह कई गिलास अपने हलक से नीचे उतार चुके थे और कह रहे थे कि उसे न्यायालय में देखेंगे। पत्रकार भी बावला था,वहीँ दिखाने पर आमादा था। हमसे मंत्री जी की यह हालत देखी नहीं गई और उनसे गज़ब की सहानुभूति पैदा हो गई। लगा कि इस क़ातिल वक्त में हमें ज़रूर उनके पास होना चाहिए क्योंकि मीडिया और सत्ता का साथ तभी तक अच्छा रहता है जब तक उसमें मिठास बनी रहे। हमें मंत्री जी की सेहत की फ़िक्र हो रही थी,जिसे अब तक बड़े जतन से उन्होंने मेन्टेन कर रखा था।

अगले ही दिन हम मंत्री जी के यहाँ थे। बंगले के गेट पर पहुँचते ही संतरी ने पहला सवाल पूछा कि आप किस चैनल से हैं। हमने कहा भाई हम छोटे-मोटे पत्रकार हैं लेकिन यह आप पूछ क्यों रहे हैं ? उसने उत्तर दिया कि वो बस इतना जानना चाहता था कि कहीं हम सबसे तेज चैनल से तो नहीं है ?हमने तुरत इसका खंडन किया और फ़िर गेट के अंदर प्रविष्ट हो गए। मंत्री जी लॉन में ही मैडम के साथ बैठे पानी पी रहे थे। हमें देखते ही बोले,’आओ भई,एक आप ही हैं जो हमें समझते हैं वर्ना आपकी बिरादरी ने तो हमें बारादरी में बैठने लायक नहीं छोड़ा है।

हमने अपनापा दिखाते हुए कहा,’आप तफसील से अपनी बात कहें,भरोसा रखिये,आप पाक-साफ़ निकलेंगे। मंत्री जी ने लंबी साँस लेते हुए कहा,’यह सब हमारे विरुद्ध साजिश रची जा रही है। हमने यूँ ही कह दिया था कि आलाकमान के लिए अपनी जान दे देंगे पर कुछ सिरफिरे लोगों ने इसे लागू करने की ठान ली है। मैंने पहले ही साफ़ कर दिया था कि प्रेस-कांफ्रेंस हमारे मुताबिक चलेगी। यह भी कि हम केवल जवाब देने आए हैं,किसी सड़क वाले आदमी के सवाल का और तेज चैनल के बवाल का उत्तर देने नहीं । ’ ‘फ़िर क्या हुआ?’ हमको भीषण जिज्ञासा हो रही थी।

भई ,हम इस देश के कानून मंत्री हैं। हम कानून पढ़ाते और सुनाते हैं,सुनते नहीं। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए हम मजमा लूटने की तैयारी में थे। एक फोटू और एक गवाह का भी इंतजाम कर लिया था। शो बिलकुल सही जा रहा था,पर तेज चैनल के पत्रकार ने हमको हल्के में लिया और बड़ा चिरकुट टाइप का सवाल पूछने लगा। हमें सवाल से कहीं अधिक उसकी चिरकुटई पर गुस्सा आ रहा था। अब इत्ती-सी रकम को हमने और हमारी सरकार ने पहले कभी डिफेंड किया ही नहीं और वे हैं कि हमारी जान के पीछे पड़ गए। बस,इसी वजह से हम पानी पर पानी पी गए कि कहीं चुल्लू भर रकम के लिए पानी कम न पड़ जाए। ’ ‘पर अब आप क्या करेंगे?’ ‘कुछ नहीं,मानहानि के दावे की रकम को सौ करोड़ से बढाकर दो सौ करोड़ कर देंगे। ’ ‘लेकिन एकदम से रकम इतनी ज़्यादा...?’ मंत्री जी हमें आश्वस्त करते हुए बोले ,’प्रेस कांफ्रेंस में जो इतना पानी पिया है,उसका बिल कौन भरेगा ?कानून मंत्री को पानी पिलाने वालों को कुछ तो सबक सिखाना होगा।

तब तक कुछ बंदे एक चल पाने में असमर्थ व्यक्ति को टाँगकर उनके पास ले आए और मंत्री जी को बधाई देते हुए बोले,’अब इन्हें सुनाई भी नहीं देता है। आप जो भी कहेंगे,ये सिर हिला देंगे। हमने देखा कि मंत्री जी ताली बजाने का अभ्यास करने लगे । उन्हें सहज होते देखकर हम वहाँ से खिसक आए ।

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

कार्टून नहीं,कोयला बनाओ !



१५/१०/२०१२ को डीएलए में प्रकाशित !
 
दफ्तर से बाहर निकलते ही मैंने कार्टून जी को घेरना चाहा पर वे किसी पतली गली की तलाश में लगे। मैं भी कच्चा खिलाड़ी नहीं हूँ,मैंने सोच रखा था कि बहुत दिनों से महाशय चर्चा में हैं तो इनसे ज़रूर मिला जाय।कार्टून जी बचते-बचाते हुए कैम्पस के बाहर निकलने ही वाले थे कि मैंने उन्हें धर लिया।वे फुसफुसाते हुए बोले,’जिस बात का अंदेशा था,वही हुआ।आजकल मेरे साथ यह रोज़ ही हो रहा है।मैंने आश्चर्य जताते हुए पूछा,’क्यों भई ! आप ऐसा कैसे कह रहे हैं ?आज हर तरफ अखबार या टीवी में आप प्रकट हो रहे हैं।पहले तो अखबारों में किसी कोने में पड़े रहते थे,कोई पूछता तक नहीं था,अब तो सम्पादकीय पृष्ठ तक आपने कब्ज़ा लिया है,और क्या चाहिए आपको ?’

कार्टून जी बोले,’चलिए,चाय की गुमटी के पास चलते हैं।आपको अंदर की बात वहीँ पर बताते हैं।अगर यहाँ बाहर रहे तो हम फ़िर से अंदर हो जायेंगे।आजकल हमारे पब्लिकली आने पर रोक लगी हुई है।मैंने तुरत हामी भर दी और आशंकित नज़रों से देखते हुए मैं उनके साथ हो लिया।चाय वाले को एक बटा दो का आर्डर देकर कार्टून जी ने अपन मुँह खोला,’आप अपने काम में इतना तल्लीन हैं कि देश-दुनिया की कोई खबर नहीं है आपको ! आजकल व्यवस्था जी ने ख़बरें छपने-छापने का सारा काम अपने हाथ में ले लिया है।जब सीधी-सादी और सरल ख़बरें छन रही हैं तो हम इत्ते टेढ़े-मेढे और वक्र होकर कैसे बाहर आ सकते हैं?कुछ कार्टूनों ने बाहर ज़बरिया निकलने की हिमाकत की थी तो किसी को निष्कासित कर दिया गया तो किसी पर राज-द्रोह का पक्का केस बन गया।अब बताओ,ऐसे में हम करें तो क्या करें ?’

मैंने मुद्दे की गंभीरता को ताड़ते हुए पूछा,’तो फ़िर आप क्या करेंगे?अगर बनेंगे तो बाहर निकलेंगे,नहीं निकलने पर तो आपका अस्तित्व ही नहीं रहेगा।कार्टून जी ने संयत स्वर में जवाब दिया,’भई मैंने खूब सोच-समझ लिया है।मुझे तो कुछ सूझ नहीं रहा है।अगर बनते हैं तो पुलिस जी हमारी सेवा को लालायित हो उठते हैं और अगर नहीं तो देश जी हमारी सेवा से महरूम हो जाते हैं।अब आप ही सलाह दो कि हम करें तो क्या करें?’ मैंने उनकी परेशानी को अपनी समझते हुए सलाह दी,’भई!आपको बनाने से कौन रोक रहा है,आप खूब बनाइये पर कार्टून नहीं,कोयला बनाइये।इस क्षेत्र में किसी तरह का कोई खतरा नहीं है।सबसे बड़ी बात है कि यह काम अभी तक देश-सेवा की श्रेणी में है’,‘पर इसके लिए मुझे क्या करना होगा ?’ उतावले होकर कार्टून जी ने पूछा।

बस,आपको एक चुनाव लड़ना होगा।अगर उसमें जीत गए तो फ़िर आप पारसमणि जैसे हो जायेंगे।सांसद या मंत्री बनकर जो भी कोयला करेंगे सब सोना हो जायेगा और यह कि इत्ता सारा कोयला बनाने के बाद भी आप राजद्रोह से बरी रहेंगे,असली देशसेवक कहलायेंगे सो अलग ।इसलिए अगर कहो तो एक-दो ब्लॉक आपके नाम आवंटित करवा देते हैं।अखबार में जो भी बनाते हो वह एक दिन के लिए होता है,कोयला बनाओगे तो ज़िंदगी भर के लिए फुरसत मिल जायेगी।अब खुद ही सोच लो,क्या करना है?’मैंने देखा कि कार्टून जी अब आश्वस्त से दिख रहे थे।तब तक चाय आ गई थी और हम दोनों कोयले की सिगड़ी में बनी चाय को सुड़कने लगे थे !


शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

बनाना रिपब्लिक में आम आदमी का स्टेटमेंट !

१२ /१०/२०१२ को 'नई दुनिया' में प्रकाशित !

 

अजी,इस देश के लोगों के पास न कोई काम है और न धेले भर की समझ। हम पिछले इक्कीस सालों से व्यापार के क्षेत्र में हैं और लोग समझते हैं कि हम केवल मक्खी मार रहे हैं। अरे,आज दो-सौ,तीन सौ करोड़ की रकम भी कोई रकम होती है ?हमने जिससे सौदा किया,उसमें केवल आपसी लेन-देन हुआ है बस। इसमें दोनों पक्षकारों को कोई तकलीफ भी नहीं है,पर दूसरे लोगों के पेट में अनायास मरोड़ उठ रही है।सबसे ज़्यादा ऐंठन आम आदमी की टोपी पहनकर उसे ही टोपी पहनाने वाले लोगों के पेट में मची हुई है। हम चुपचाप अपना काम करने में लगे हुए हैं पर कुछ लोग हैं कि उन्हें दूसरों की ढंकी उठाने में परमानन्द की अनुभूति होती है।

हम सबसे ज़्यादा निराश इसलिए हैं कि इस देश के लोग मजाक भी नहीं समझते। हम अपने व्यापारिक सहयोगी के साथ जो भी करते हैं,वह हमारा हँसी-मजाक भी तो हो सकता है। जब ऐसे मजाक पर हम दोनों को कोई आपत्ति नहीं है तो फ़िर जाँच-जाँच की रट क्यों लगाई हुई है ?हमने तो सरकार जी से कह भी दिया कि करवा लो भई ,एक जाँच और सही। उसमें कौन-सा हम पाप से सने निकलने वाले हैं ?पर सरकार जी ने भी साफ़-साफ़ कह दिया कि यह जाँच लायक रकम ही नहीं है। इसके ऊपर जाँच बिठाने से उसकी बदनामी होगी। सरकार जी के इस तर्क से हम सहमत हैं कि जब तक पूर्ववर्ती रकम से ज़्यादा धनराशि नहीं होती तब तक जाँच बैठाना फ़िज़ूल है। इत्ते में उसका खर्चा भी तो नहीं निकलेगा।

देश के लोगों में मजाक को लेकर बहुत ही रूढ़िवादी सोच है। एक खालिस मजाक को फेसबुक से लेकर तूफ़ान खड़ा कर दिया गया है। एक सीधे-सादे व्यापारी को केवल उसकी रिश्तेदारी से मारा जा रहा है। हम कोई नेता भी नहीं हैं कि बयान देने का हमारा अभ्यास हो फ़िर भी हमारे मजाक को हमारा बयान समझा जा रहा है। हमने तो मजाक में ही देश को बनाना रिपब्लिक कहा था पर पिछले साठ-पैंसठ सालों से सहते आ रहे मजाक को न समझने वाला आम आदमी फ़िर गच्चा खा गया। बनाना रिपब्लिक का उसने अपनी समझ से कुछ और ही मतलब निकाल लिया। इसका अर्थ यह भी तो हो सकता है कि देश को रिपब्लिक बनाना,ऐसा कहकर हम आम आदमी को बना नहीं रहे हैं। हम तो स्वयं आम आदमी की खाल में देश-सेवा करने को प्रयत्नशील हैं पर हम यह  भूल गए थे कि ये देश विकासशील है और अभी यहाँ उच्च-स्तर की समझ विकसित नहीं हुई है।

हमारे आपसी करार को लेकर कुछ लोग उसमें दरार डालने की कोशिश कर रहे हैं,जबकि हमारी डील  बिलकुल पारदर्शी और कानून के मुताबिक है। इस सन्दर्भ में हमने स्टेटमेंट दे रखा है जिसे सरकार जी और उसके अधिकारियों ने पढ़ लिया है और उनकी समझ में भी आ गया है। जो लोग हमारे स्टेटमेंट को पढ़ या समझ नहीं पा रहे हैं उनके लिए कानून मंत्री जी ने उन्हें पाठ पढ़ाने की गारंटी भी दी है,सो बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए। हमारा कानून मंत्रालय भ्रष्टाचारियों और अपराधियों की तरफ से बिंदास है क्योंकि ये तबका खूब पढ़ा-लिखा है। हम तो केवल स्टेटमेंट देते हैं,उसे समझाने का काम सरकार जी और उसके अधिकारियों का है। अब मैं यह स्टेटमेंट फ़िर से दे रहा हूँ ,आप लोग यह न कहना कि आपने पढ़ा नहीं है ।

 

बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

चिंतन-बैठक के बाद का चिंतन !


१०/१०/२०१२ को जनसंदेश में !
 

चिंतन-बैठक के बाद से ही हमें उनकी तलाश थी,पर वो कहीं नज़र नहीं आ रहे थे।हमारे मन में इस बैठक को लेकर बड़ी उत्सुकता थी क्योंकि इसी से हमारे मुलुक का लुक भी निर्धारित होना था।अमूमन नुक्कड़ और चौराहे पर उनसे भेंट हो जाती थी और मिलते ही वे इस मुलुक के प्रति अपनी चिंता हमसे साझा करते थे।वे पिछली बार भारत-बंद के दौरान चौराहे पर डंडा लिए हुए हमसे टकराए थे।उस वक़्त कई दुकानों के शीशे तोड़ने का गर्व और राष्ट्र के प्रति कुछ करने का योगदान उनके चेहरे पर साफ़-साफ़ झलक रहा था।बस,उसके बाद ही उनकी पार्टी की चिंतन-बैठक हुई थी और इसी का हाल जानने के लिए मैं उतावला था।आख़िरकार हमने उनके घर की ओर का रुख किया और सौभाग्य से वो बरामदे में ही हमें टहलते दिखाई दे गए !

आइये,आइयेहमको देखते ही चेहरे पर ज़बरिया हँसी लादकर वे बोले।मैंने बड़े ही आत्मीय स्वजन की तरह चिंता व्यक्त की,’सब ठीक तो है ? चौराहे और नुक्कड़ आपके बिना सूने-सूने से हैं।वे सपाट भाव लिए हमसे मुखातिब हुए, ’’ऐसी कोई बात नहीं है।दर-असल जबसे हमारी चिंतन-बैठक हुई है तभी से मैं चिंतन में लगा हुआ हूँ।वहाँ हमारे नेता ने एक बात ज़ोर देकर कही थी कि हमें दूसरों की तरह अपने लिए भी कठोर बनना होगा।जो बात कठोरता से हम दूसरों के लिए कहते हैं,उसको अपने लोगों पर भी लागू करना होगा।तबसे मैं यही सोच रहा हूँ कि अपनों की खातिर कैसे कठोर बना जाए ।ऐसा करेंगे तो कर्नाटक और गुजरात हमारे हाथ से निकल जायेंगे। हम नई परम्परा कैसे चालू करें ?

मैंने उन्हें घोर चिंतित देखते हुए आश्वस्त किया,’बस इत्ती सी बात और आप हलकान हुए जा रहे हो ?अरे भई,नेता जी ने केवल यह कहा है कि भ्रष्टाचार और घोटालों के प्रति कठोरता का भाव रखो।आपने उनके कहे को गंभीरता से ले लिया।देखिए,साठ-पैंसठ सालों से दूसरे लोग कितनी शिद्दत और कठोरता से देश की सेवा में लगे हुए हैं।एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं और जनता भी इनके प्रति पत्थर की तरह कठोर हो गई है।थोड़े समय के लिए इनके पास ममता थी जिससे प्रगति में बाधा पड़ रही थी,पर ममतारहित होते ही सब कुछ कठोरता से सबके हित में फ़िर होने लगा है।’ ‘पर इस कठोरता का मेरे लिए क्या अर्थ है?’वो समझने की कोशिश करते हुए बोले।

मैंने उन्हें अब स्पष्ट करते हुए बताया,‘आप शायद भूल रहे हैं।इस देश की जनता मूलरूप से घोटालापसंद है।एक कच्चे अनुमान के अनुसार हर परिवार में कम से कम एक घोटालेबाज तो है क्‍योंकि उन्‍हें घुट्टी में घोटाला ही घोलकर पिलाया जाता है तभी तो दशकों से शीर्ष पर भी घोटालेबाज जमे हुए हैं।आज़ादी के बाद से बिला नागा यह सिलसिला चला आ रहा है।दूसरे लोग इसी के चलते पूरे आत्मविश्वास के साथ काम कर रहे हैं।जनता ने तो आपको भी एक बार मौका दिया था पर उसमें आप अनाड़ी निकले।कफ़न व ताबूत जैसे टुच्चे सेक्टर भला क्या छवि बनाते ?आपके अनुभवहीन अध्यक्ष के चलते जनता में यह सन्देश गया कि ये लोग कोई भी काम ढंग से नहीं कर सकते हैं।तब से लेकर अब तक कोई बुनियादी अंतर नहीं आ पाया है।सुनते हैं कि वर्तमान अध्यक्ष जी भी महज़ सत्तर हज़ार करोड़ की सिफारिश करते पकड़े गए हैं।अब उछाल भरती अर्थ-व्यवस्था के दौर में यह गिनती मामूली लगती है।इसलिए आपके नेता जी ने जिस कठोरता की बात की है,उस पर अमल करिये और जी कड़ा करके घोटालों की गिनती बढ़ाइए तभी जनता का आप पर भरोसा बढ़ेगा।आखिर गुजरात और गडकरी के बल पर आप पूरे देश पर शासन नहीं कर सकते!

अब वे सामान्य दिख रहे थे।इस बीच हमारे चिंतन से वे काफ़ी-कुछ आत्मविश्वास बटोर चुके थे।मैंने देखा कि उनके चेहरे पर चिंतन-बैठक का खुमार उतर चुका था।