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रविवार, 2 जुलाई 2017

गधे-घोड़ों का सेवा-मूल्य !

जीएसटी,जीएसटी का चौतरफ़ा हल्ला मचा हुआ है।बहुत सारे लोग चकरा गए हैं कि यह कौन-सी बला है भला ! पढ़े-लिखों की माने तो पूरे देश में अब एक समान कर व्यवस्था लागू होने जा रही है।सरकार ने अलग-अलग चीज़ों को उनकी उपयोगिता के मुताबिक़ बाँट दिया है ताकि निशानदेही में आसानी हो सके।कई चीज़ें जहाँ कर-मुक्त कर दी गई हैं,वहीं कुछ को ख़रीदने में ही मुक्ति वाली अवस्था प्राप्त की जा सकती है।कुछ लोग जीएसटी को 'गधा,घोड़ा सर्विस टैक्स' समझ रहे हैं।यह ग़लतफ़हमी उन्हें तब हुई ,जब उन्हें यह ख़बर मिली कि नए क़ानून के बाद गधों की ख़रीद-फ़रोख़्त पर कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा जबकि घोड़ों की ख़रीदारी पर भारी कर लगेगा।अब जीएसटी माने कुछ भी हो,पर सरकार नहीं चाहती कि आम आदमी को व्यापार में नुक़सान उठाना पड़े।गधा आम आदमी के ज़्यादा काम आता है इसलिए उस पर और बोझ नहीं लादा गया है।सरकार गधे और घोड़े दोनों का महत्व बख़ूबी जानती है।गधा हमेशा से बोझा ढोने वाला प्राणी रहा है।वह निहायत सहनशील और समझदार जीव है।बिना कोई सवाल किए ईंट,पत्थर और लकड़ी के गट्ठर समान भाव से ढोता रहता है।घोड़े की नस्ल ऊँची होती है और वह ख़ास लोगों के ही क़ाबू में आता है ।घोड़े पर यूँ ही नहीं कुछ अल्लम-ग़ल्लम लादा जा सकता।न ही कोई ऐरा-गैरा उसकी सवारी गाँठ सकता है।उसकी लगाम वही थाम सकता है,जो ख़ुद बेलग़ाम होता है।घोड़े उन्हीं को अपने ऊपर लादते हैं,जो पहले से ही जनता की सेवा से लदे होते हैं।ऐसे में घोड़े के गिरने का ख़तरा बना रहता है।इससे जनसेवा का पूरा पैकेज धराशायी होने की आशंका रहती है।बाज़ार में इनकी क़ीमत ऊँची इसीलिए रखी जाती है कि यदि ये गिरें तो भी मुँह सही-सलामत रहे।इसके उलट बाज़ार में गधों की माँग कभी नहीं रहती जबकि इनकी आपूर्ति अधिक होती है ।'हॉर्स-ट्रेडिंग' व 'रेसकोर्स' जैसी कुलीन परम्पराएँ और 'हॉर्स-पॉवर' जैसी नैसर्गिक विशेषता गधों में देखने को नहीं मिलती।गधे न बिकते हैं न बिदकते हैं,जबकि घोड़े दोनों गुणों में पारंगत होते हैं।एक बार बिकने पर उतारू हो जाँय तो सरकारें बना-बिगाड़ सकते हैं।उनमें ग़ज़ब की गति होती है।जहाँ ऊँची बोली लगी,वहीं हिनहिनाने लगते हैं।

रहन-सहन के मामले में भी दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है।गधे खुले आसमान में विचरण करते हैं।वे कहीं भी लीद कर देते हैं इसीलिए उनकी मिट्टी पलीद होने का डर नहीं रहता।घोड़ों के लिए बक़ायदा अस्तबल होता है।वे उसके बिना नहीं रह सकते।पशुओं में घोड़े को आभिजात्य वर्ग का माना जाता है।प्राचीन काल में यदि किसी राजा को चक्रवर्ती बनने की इच्छा प्रबल होती तो वह घोड़ा छोड़ता था।'अश्वमेध-यज्ञ' संपूर्ण होने पर ही वह चक्रवर्ती सम्राट माना जाता था।आज भी उसकी शान बरक़रार है।यह प्राणी औरों से अधिक सम्वेदनशील होता है।इसे सर्दी भी जल्द सताती है और गरमी भी।जबकि गधा सारे मौसमों से बेफिक्र होता है।बारिश हो या धूप,उसे अपने रूप के नष्ट होने की आशंका नहीं रहती।कहीं भी अपनी टाँगें पसार देता है।वह मान-अपमान से परे होता है।गधे का चेहरा हरदम भावशून्य रहता है।शायद इसीलिए उसको कोई भाव नहीं देता।यही वजह है कि अभिनय के मामले में वह बिलकुल फिसड्डी होता है।भारी बोझा या टेढ़ी बात उसको विचलित नहीं करती।कितना भी बोझ लदा हो,तब भी उसके पास अतिरिक्त 'स्पेस' होता है।दो-चार गालियों से उसका कुछ बिगड़ता नहीं।वह पलट के दुलत्ती भी नहीं लगाता।अपशब्द सुनना और तिरस्कार सहना उसकी आदत में शुमार है।इससे गधे की गुणवत्ता तो बढ़ती है पर क़ीमत नहीं।'अबे गधे' कहकर किसी की भी मार्केट-वैल्यू ज़मींदोज़ की जा सकती है।इन विलक्षण गुणों के चलते वह संत-कोटि में आता है।अब ऐसे सीधे,निरीह और स्थितिप्रज्ञ जीव पर गरीबसेवी सरकार किस मुँह से अधिभार लगाए?

मुंशी प्रेमचंद ने इस जीव को बहुत पहले परख लिया था।वे इसको जानवरों में सबसे बुद्धिमान मानते थे।लेकिन आज भी यह आदमियों के बीच बेवक़ूफ़ समझा जाता है।सच तो यह है कि बुद्धिमान से बेवक़ूफ़ कहीं अधिक दमदार होता है।उसमें न कोई बनावट होती है और न कोई मिलावट की जा सकती है।सरकार ने इसीलिए इसे 'अमूल्य' घोषित किया है।

दूसरी तरफ़ घोड़ा पूरी तरह यथार्थवादी होता है।बिदकने को लेकर उसके मन में कभी कोई सशोपंज नहीं होता।शादी-ब्याह में फूफा और जीजा की तरह उसका मूड पता नहीं कब ख़राब हो जाय,इसलिए उस पर सेवा का ‘प्रकोप’ भी अधिक होता है।जब तक उसको ढंग से घास नहीं डाली जाती,वह शांत नहीं रहता।कहावत है,घोड़ा घास से यारी करेगा तो क्या खाएगा ! इसी परम्परा को क़ायम रखने के लिए वह हमेशा कटिबद्ध रहता है।हरी-भरी घास के लिए वह कहीं भी और कभी भी मुँह मार सकता है।गधे पंजीरी फाँकते हैं और ख़ुश रहते हैं।ये आदमी की सेवा ख़ूब करते हैं पर वो ’स्किल’ नहीं पैदा कर पाते,जिसमें घोड़े निपुण होते हैं।दोनों की तुलना कहाँ ? ये मुँह खोलते हैं तो भी रेंकते हैं।वो हिनहिनाते भी हैं तो बयान झड़ते हैं।सेवा करना बड़े स्किल की बात है इसीलिए गधों को सेवा-श्रेणी से बाहर रखा गया है और घोड़ों को अंदर।

रविवार, 7 मई 2017

मित्रता पर ऑनलाइन वज्रपात !

वे मित्र थे।अब नहीं रहे।पिछली रात जब हम सोए थे,सब कुछ ठीक-ठाक था।यह जानकर हमने इत्मीनान की नींद ली थी कि उनके फेसबुकी दिल में अपन महफूज हैं।सुबह उठे तो देखा;ठुकराए प्रेमी के गुलदस्ते की तरह अपन उनके फेसबुकी दरवाजे पर मुरझाए पड़े हैं।दरवाजा अंदर से कसकर बंद है।धूल झाडक़र अंदर जाने की कोशिश की, तो यह जानकर दिल बैठ गया कि दरवाजा लॉक है और हम ब्लॉक !
मित्र गहरे थे इसलिए हम भी गहराई में डूब गए।भूकंप की तरह फेसबुक में ब्लॉक हो जाने का पूर्वानुमान अभी तक नहीं लग सका है।हमने तुरंत इस हादसे की खबर दूसरे मित्र से फ़ोन पर साझा की।सुनते ही वे टूट पड़े-गलती तुम्हारी है।तुम दो दिन पहले देशभक्ति और नैतिकता पर उनसे खूब बहसियाये थे।उनसे तार्किक जवाब पाने की अशिष्ट कोशिश भी की थी।अब भुगतो।पर वे तो कल तक मेरी इसी अशिष्टता के धुर प्रशंसक थे।अचानक ऐसा क्या हुआ ? ’ उदासी को फोन में टैग कर हमने मित्र की ओर सवाल उछाल दिया।मित्र तैयार थे,पलटकर बोले-पहले मैं भी चेक कर लूं कि इस वक्त उनका मित्र हूँ कि नहीं।दो मिनट बाद ही राहत की साँस लेते हुए उन्होंने बताया कि फ़िलहाल वे इस अनिष्ट से बच गए हैं।साथ ही इसके समर्थन में उन्होंने यह तर्क भी जोड़ दिया कि उनका शनि बहुत मजबूत स्थान पर बैठा हुआ है और वे खुद भी पहुँचे हुए सनीचर हैं।हम अवाक् रह गए।इस कोण से तो हमने सोचा ही नहीं संयोग से यह वाकया शनिवार को ही घटित हुआ था।शायद इसीलिए वे बच गए और हम पर गाज गिर गई। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह कि अब हमारा  क्या होगा ?इसी उधेड़बुन में दुनिया में अपनी मुँह-दिखाई के तमाम विकल्पों पर हम विचार करने लगे।


मित्र ने इसका भी फ़ौरी समाधान कर दिया।बोले-ऐसा करो,कुछ दिनों के लिए तुम भूमिगत हो जाओ।मेरा मतलब मित्रता का खाता ही बंद कर दो।इससे ब्लॉक से पड़ने वाले विपरीत प्रभाव से बचा जा सकता है।उसने तुम्हें ब्लॉक किया है,तुम सबके लिए ब्लॉक हो जाओ।’ ‘लेकिन अभी कल ही हमने साहित्य-महोत्सव की अपनी ढेरों फोटुएँ फेसबुक को समर्पित की हैं,उन पर ठीक तरह से लाइक और कमेन्ट तो जाने दो।यह मौक़ा हाथ से निकल गया तो साहित्यकार बनने की अंतिम सम्भावना भी नष्ट हो जाएगी।हम आर्तनाद कर उठे।उन्होंने हमें गहरे संकट से उबारने की कोशिश जारी रखी।कहने लगे--फिर ठीक है।अब तुम अपने अनब्लॉक होने की प्रतीक्षा करो।ऐसे लोग प्रतिक्रिया जानने के लिए ज्यादा देर तक इंतज़ार नहीं करते।किसी दूसरी पहचान से तुम्हारी गतिविधि अभी भी देख रहे होंगे।तुम्हें रणनीति बनानी होगी तभी तुम्हारी मित्रता फिर से ऐक्टिवेट हो सकती है।तुम मुझे अपना गुरू मानते हो,इसलिए इसका गुर तुम्हें बता रहा हूँ।तुम उनकी किताब पर एक झटपट-समीक्षा लिख दो।अब यह मत पूछना कि कौन-सी टाइप की।तुम इसमें कुशल हो और तुम्हारे इसी हुनर का मैं भी क़ायल हूँ।इस समीक्षा को फ़ेसबुक पर प्रसारित कर दो।फिर देखना जल्द ही तुम्हें सम्पूर्ण निर्वाण की प्राप्ति होगी।मरी हुई मित्रता संजीवनी पाकर चहक उठेगी।'


ऐसे परम शुभचिंतक मित्र से बात करने के बाद मैं काफ़ी हल्का हो गया।फेसबुक की मेरी मित्रसूची पहले ही हल्की होकर पाँच हज़ार से सीधे चार हज़ार नौ सौ निन्यान्नवे पर चुकी थी।लग रहा था जैसे एक ही कारोबारी-सत्र में निफ्टी-सूचकांक एकदम से बैठ गया हो ! उस मित्र के एक क्लिक ने मुझे शीर्ष पायदान से नीचे ढकेल दिया था।मित्रता की सारी मेमोरी एक ही बटन से डिलीट हो गई थी मैं स्मृति-शून्य हो चुका था।यह काम घुप्प अँधेरे में हुआ था।इसलिए कि अँधेरे में ट्रिगर दबाने से आत्मग्लानि की आशंका न्यूनतम होती है सारे चौर्य सॉरी शौर्य-कर्म  अंधेरे में ही किये जाते हैं।इससे नैतिकता भी बेदाग बनी रहती है।
मैं अभी इस दुर्घटना से पूरी तरह उबरा भी नहीं था कि श्रीमती जी ने पूछताछ शुरू कर दी-‘ये सुबह से क्या ब्लॉक-ब्लॉक लगाए हो ? हम तो अभी वाशरूम से आये हैं।फ्लश भी सही ढंग से काम कर रहा है।जाओ तुम भी हल्के हो लो ?’ मैंने निवेदन किया,‘भागवान मैं ऑलरेडी हल्का हो चुका हूँ।अब और अफोर्ड नहीं कर सकता।दरअसल बात यह है कि मेरे एक मित्र ने मुझे फेसबुक में ब्लॉक कर दिया है।इतना सुनते ही श्रीमती जी मुझे धिक्कारने लगीं-तुमसे एक भी काम ठीक से नहीं सधता ! एक मित्र को साधने में भी तुम सफल नहीं हो पाए।इस मुए ब्लॉक से हम पर दुखों का पहाड़ टूट सकता है।अगर यह बात खुल गई तो सामने वाला रग्घू बनिया उधारी देना बंद कर देगा।मुझे तो यही चिन्ता खाए जा रही है।

इस घोर संकट की तरफ़ हमारा ध्यान ही नहीं गया था।एक ब्लॉक ऐसे दुर्दिन भी दिखा सकता है,कभी सोचा था।बहरहाल,उनकी किताब की समीक्षा में मैं अपनी सम्भावना देखने लगा हूँ।